हुकमी स्रिसटि साजीअनु बहु भिति संसारा ॥
तेरा हुकमु न जापी केतड़ा सचे अलख अपारा ॥
इकना नो तू मेलि लैहि गुर सबदि बीचारा ॥
सचि रते से निरमले हउमै तजि विकारा ॥
जिसु तू मेलहि सो तुधु मिलै सोई सचिआरा ॥2॥
सूहवीए सूहा सभु संसारु है जिन दुरमति दूजा भाउ ॥
खिन महि झूठु सभु बिनसि जाइ जिउ टिकै न बिरख की छाउ ॥
गुरमुखि लालो लालु है जिउ रंगि मजीठ सचड़ाउ ॥
उलटी सकति सिवै घरि आई मनि वसिआ हरि अंम्रित नाउ ॥
नानक बलिहारी गुर आपणे जितु मिलिऐ हरि गुण गाउ ॥1॥
सूहा रंगु विकारु है कंतु न पाइआ जाइ ॥
इसु लहदे बिलम न होवई रंड बैठी दूजै भाइ ॥
मुंध इआणी दुंमणी सूहै वेसि लोुभाइ ॥
सबदि सचै रंगु लालु करि भै भाइ सीगारु बणाइ ॥
नानक सदा सोहागणी जि चलनि सतिगुर भाइ ॥2॥
आपे आपि उपाइअनु आपि कीमति पाई ॥
तिस दा अंतु न जापई गुर सबदि बुझाई ॥
माइआ मोहु गुबारु है दूजै भरमाई ॥
मनमुख ठउर न पाइन॑ी फिरि आवै जाई ॥
जो तिसु भावै सो थीऐ सभ चलै रजाई ॥3॥
सूहै वेसि कामणि कुलखणी जो प्रभ छोडि पर पुरख धरे पिआरु ॥
ओसु सीलु न संजमु सदा झूठु बोलै मनमुखि करम खुआरु ॥
जिसु पूरबि होवै लिखिआ तिसु सतिगुरु मिलै भतारु ॥
सूहा वेसु सभु उतारि धरे गलि पहिरै खिमा सीगारु ॥
पेईऐ साहुरै बहु सोभा पाए तिसु पूज करे सभु सैसारु ॥
ओह रलाई किसै दी ना रलै जिसु रावे सिरजनहारु ॥
नानक गुरमुखि सदा सुहागणी जिसु अविनासी पुरखु भरतारु ॥1॥
सूहा रंगु सुपनै निसी बिनु तागे गलि हारु ॥
सचा रंगु मजीठ का गुरमुखि ब्रहम बीचारु ॥
नानक प्रेम महा रसी सभि बुरिआईआ छारु ॥2॥
इहु जगु आपि उपाइओनु करि चोज विडानु ॥
पंच धातु विचि पाईअनु मोहु झूठु गुमानु ॥
आवै जाइ भवाईऐ मनमुखु अगिआनु ॥
इकना आपि बुझाइओनु गुरमुखि हरि गिआनु ॥
भगति खजाना बखसिओनु हरि नामु निधानु ॥4॥
सूहवीए सूहा वेसु छडि तू ता पिर लगी पिआरु ॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पउड़ी॥ उस प्रभू ने ये सृष्टि ये संसार अपने हुकम के अनुसार कई किस्मों का बनाया है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।