सतिगुरि एकु विखालिआ मनि तनि सुखु होई ॥
गुरमुखि सदा सलाहीऐ करता करे सु होई ॥7॥
जिना भउ तिन॑ नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥
नानक एहु पटंतरा तितु दीबाणि गइआह ॥1॥
तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥
जीवते कउ जीवता मिलै मूए कउ मूआ ॥
नानक सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥2॥
सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥
हउमै मारि मनु निरमला हरि नामु उरि धारी ॥
कोठे मंडप माड़ीआ लगि पए गावारी ॥
जिनि॑ कीए तिसहि न जाणनी मनमुखि गुबारी ॥
जिसु बुझाइहि सो बुझसी सचिआ किआ जंत विचारी ॥8॥
कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥
मतु सेजै कंतु न आवई एवै बिरथा जाइ ॥
कामणि पिर मनु मानिआ तउ बणिआ सीगारु ॥
कीआ तउ परवाणु है जा सहु धरे पिआरु ॥
भउ सीगारु तबोल रसु भोजनु भाउ करेइ ॥
तनु मनु सउपे कंत कउ तउ नानक भोगु करेइ ॥1॥
काजल फूल तंबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥
सेजै कंतु न आइओ एवै भइआ विकारु ॥2॥
धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥
एक जोति दुइ मूरती धन पिरु कहीऐ सोइ ॥3॥
भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥
सतिगुरि मिलिऐ भउ ऊपजै भै भाइ रंगु सवारि ॥
तनु मनु रता रंग सिउ हउमै त्रिसना मारि ॥
मनु तनु निरमलु अति सोहणा भेटिआ क्रिसन मुरारि ॥
भउ भाउ सभु तिस दा सो सचु वरतै संसारि ॥9॥
वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥
सागर लहरि समुंद सर वेलि वरस वराहु ॥
आपि खड़ोवहि आपि करि आपीणै आपाहु ॥
गुरमुखि सेवा थाइ पवै उनमनि ततु कमाहु ॥
मसकति लहहु मजूरीआ मंगि मंगि खसम दराहु ॥
नानक पुर दर वेपरवाह तउ दरि ऊणा नाहि को सचा वेपरवाहु ॥1॥
उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥
तिन जरु वैरी नानका जि बुढे थीइ मरंनि ॥2॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जब से जगत बना है उस समय से लेकर अब तक ध्यान लगा के देखा है किसी भी जीव द्वारा प्रभू की बुजुर्गीयत का मूल्य नहीं पड़ सका (महानता आँकी नहीं जा सकी)।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।