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अंग 788

अंग
788
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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जुग चारे सभ भवि थकी किनि कीमति होई ॥
सतिगुरि एकु विखालिआ मनि तनि सुखु होई ॥
गुरमुखि सदा सलाहीऐ करता करे सु होई ॥7॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: जब से जगत बना है उस समय से लेकर अब तक ध्यान लगा के देखा है किसी भी जीव द्वारा प्रभू की बुजुर्गीयत का मूल्य नहीं पड़ सका (महानता आँकी नहीं जा सकी)। जिस मनुष्य को गुरू ने वह एक प्रभू दिखा दिया है उस के मन में उसके तन में सुख होता है; जो करतार सब कुछ करने में खुद समर्थ है उसकी गुरू के माध्यम से ही सिफत सालाह की जा सकती है। 7।
सलोक महला 2 ॥
जिना भउ तिन॑ नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥
नानक एहु पटंतरा तितु दीबाणि गइआह ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ जिन मनुष्यों को (ईश्वर का) डर है उनको (दुनिया वाला कोई) डर नहीं (सताता)।(ईश्वर की ओर से जो) निडर (बनते फिरते हैं।उन) को (दुनिया का) बहुत डर सताता है। हे नानक ! यह निर्णय तब होता है जब मनुष्य उस (ईश्वर) हजूरी में पहुँचे (भाव।जब प्रभू के चरणों में जुड़े)। 1।
मः 2 ॥
तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥
जीवते कउ जीवता मिलै मूए कउ मूआ ॥
नानक सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 2 ॥ (चीटीं से लेकर हाथी और मनुष्य तक) चलने वाले के साथ चलने वाला साथ करता है और उड़ने वाले के साथ (भाव।पंछी) के साथ उड़ने वाला। जिंदा दिल को जिंदा दिल मनुष्य आ मिलता है और मुर्दा दिल को मुर्दा दिल (भाव।हरेक जीव अपने-अपने स्वभाव वाले का ही संग करना पसंद करता है)। हे नानक ! (जीव भी ईश्वरीय गुणो वाला है।सो।इसको) चाहिए कि जिस प्रभू ने ये जगत रचा है उसकी सिफत सालाह करे (भाव।उसके साथ मन जोड़े)। 2।
पउड़ी ॥
सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥
हउमै मारि मनु निरमला हरि नामु उरि धारी ॥
कोठे मंडप माड़ीआ लगि पए गावारी ॥
जिनि॑ कीए तिसहि न जाणनी मनमुखि गुबारी ॥
जिसु बुझाइहि सो बुझसी सचिआ किआ जंत विचारी ॥8॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। गुरू के शबद के द्वारा उच्च विचार वाले हो के जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू को सिमरते हैं वह भी उसका रूप हो जाते हैं; प्रभू का नाम हृदय में रख के अहंकार को मार के उनका मन पवित्र हो जाता है। पर मूर्ख मनुष्य घरों महलों माड़ियों (के मोह) में लग जाते हैं। मनमुख (मोह के) घोर अंधेरे में फस के उसको पहचानते ही नहीं जिसने पैदा किया है। हे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू ! जीव बिचारे क्या हैं।आप जिसे समझ बख्शता है वही समझता है। 8।
सलोक मः 3 ॥
कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥
मतु सेजै कंतु न आवई एवै बिरथा जाइ ॥
कामणि पिर मनु मानिआ तउ बणिआ सीगारु ॥
कीआ तउ परवाणु है जा सहु धरे पिआरु ॥
भउ सीगारु तबोल रसु भोजनु भाउ करेइ ॥
तनु मनु सउपे कंत कउ तउ नानक भोगु करेइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ॥3॥ हे स्त्री ! तब श्रृंगार कर जब पहले पति को रिझा ले। (नहीं तो) कहीं ऐसा ना हो कि पति सेज पर आए ही ना और (आपका किया हुआ) श्रंृगार ऐसे व्यर्थ चला जाए। हे स्त्री ! अगर पति का मन मान जाए तो ही किए हुए श्रृंगार को सफल समझ। स्त्री का किया हुआ श्रृंगार तभी कबूल है अगर पति उसको प्यार करे। हे नानक ! अगर जीव स्त्री प्रभू के डर (में रहने) को श्रृंगार और पान का रस बनाती है।प्रभू के प्यार को भोजन (भाव।जिंदगी का आधार) बनाती है। और अपना तन मन पति प्रभू के हवाले कर देती है (भाव।पूर्ण तौर पर प्रभू की रजा में चलती है) उसको ही पति-प्रभू मिलता है। 1।
मः 3 ॥
काजल फूल तंबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥
सेजै कंतु न आइओ एवै भइआ विकारु ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ स्त्री ने सुर्मा।फूल और पान का रस ले के श्रृंगार किया। (पर अगर) पति सेज पर ना आया तो ये (किया हुआ) श्रृंगार बल्कि बेकार हो गया (क्योंकि विछोड़े के कारण ये दुखद हो गया)। 2।
मः 3 ॥
धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥
एक जोति दुइ मूरती धन पिरु कहीऐ सोइ ॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो (सिर्फ शारीरिक तौर पर) मिल के बैठैं उन्हें असल पति-पत्नी नहीं कहा जाता। जिनके दोनों जिस्मों में एक ही आत्मा हो जाए (दरअसल) वही असली पत्नी है और असल पति है। 3।
पउड़ी ॥
भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥
सतिगुरि मिलिऐ भउ ऊपजै भै भाइ रंगु सवारि ॥
तनु मनु रता रंग सिउ हउमै त्रिसना मारि ॥
मनु तनु निरमलु अति सोहणा भेटिआ क्रिसन मुरारि ॥
भउ भाउ सभु तिस दा सो सचु वरतै संसारि ॥9॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू के डर (में रहे) बिना उसकी भक्ति नहीं हो सकती और उसके नाम में प्यार नहीं बन सकता (भाव।उसका नाम प्यारा नहीं लग सकता); ये डर तब ही पैदा होता है अगर गुरू मिले।(इस तरह) डर से प्यार से (भक्ति का) रंग बढ़िया चढ़ता है। (प्रभू के डर और प्यार की सहायता से) अहंकार और तृष्णा को मार के मनुष्य का मन और शरीर (प्रभू की भगती के) रंग से रंगे जाते हैं; प्रभू को मिलके शरीर और मन पवित्र व सुंदर हो जाते हैं। ये डर और प्रेम सब कुछ जिस प्रभू का (बख्शा हुआ मिलता) है वह खुद जगत में (हर जगह) मौजूद है। 9।
सलोक मः 1 ॥
वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥
सागर लहरि समुंद सर वेलि वरस वराहु ॥
आपि खड़ोवहि आपि करि आपीणै आपाहु ॥
गुरमुखि सेवा थाइ पवै उनमनि ततु कमाहु ॥
मसकति लहहु मजूरीआ मंगि मंगि खसम दराहु ॥
नानक पुर दर वेपरवाह तउ दरि ऊणा नाहि को सचा वेपरवाहु ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे मालिक पति ! आप धन्य है ! आप धन्य है ! जिसने जगत रचना रच के हम (जीवों को) पैदा किया है। समुंद्र। समुंद्र की लहरें।तालाब।हरी बेलें।बरखा करने वाले बादल – (ये सारी रचना करने वाला आप ही तो है)। आप खुद ही सबको पैदा करके सब में खुद व्यापक है और (सबसे निर्लिप भी है) उत्साह से आपके नाम की कमाई करके गुरसिखों की मेहनत (आपके दर पर) कबूल हैं जाती है। वे बँदगी की मेहनत करके।हे पति ! आपके दर से मांग-मांग के मजदूरी लेते हैं (मुरादें पाते हैं)। हे नानक ! (कह) हे बेपरवाह प्रभू ! आपके दर (बरकतों से) भरे पड़े हैं।कोई जीव आपके दर पर (आ के) खाली नहीं गया।आप सदा कायम रहने वाला और बेमुहताज है। 1।
महला 1 ॥
उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥
तिन जरु वैरी नानका जि बुढे थीइ मरंनि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जो शरीर सुंदर सफेद दाँतों से सुंदर नैनों से शोभा दे रहे हैं। हे नानक ! बुढ़ापा इनका वैरी है।क्योंकि बुढे हो के ये नाश हो जाते हैं। 2।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जब से जगत बना है उस समय से लेकर अब तक ध्यान लगा के देखा है किसी भी जीव द्वारा प्रभू की बुजुर्गीयत का मूल्य नहीं पड़ सका (महानता आँकी नहीं जा सकी)।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।