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सूही
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- जुग चारे सभ भवि थकी किनि कीमति होई ॥
- जिना भउ तिन॑ नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥
- तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥
- सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥
- कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥
- काजल फूल तंबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥
- धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥
- भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥
- वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥
- उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥
· सूही की वार, पउड़ी · राग सूही
जुग चारे सभ भवि थकी किनि कीमति होई ॥
जुग चारे सभ भवि थकी किनि कीमति होई ॥
सतिगुरि एकु विखालिआ मनि तनि सुखु होई ॥
गुरमुखि सदा सलाहीऐ करता करे सु होई ॥7॥
सतिगुरि एकु विखालिआ मनि तनि सुखु होई ॥
गुरमुखि सदा सलाहीऐ करता करे सु होई ॥7॥
हिन्दी अर्थ: जब से जगत बना है उस समय से लेकर अब तक ध्यान लगा के देखा है किसी भी जीव द्वारा प्रभू की बुजुर्गीयत का मूल्य नहीं पड़ सका (महानता आँकी नहीं जा सकी)। जिस मनुष्य को गुरू ने वह एक प्रभू दिखा दिया है उस के मन में उसके तन में सुख होता है; जो करतार सब कुछ करने में खुद समर्थ है उसकी गुरू के माध्यम से ही सिफत सालाह की जा सकती है। 7।
· सूही की वार, सलोक · राग सूही
जिना भउ तिन॑ नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥
सलोक महला 2 ॥
जिना भउ तिन॑ नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥
नानक एहु पटंतरा तितु दीबाणि गइआह ॥1॥
जिना भउ तिन॑ नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥
नानक एहु पटंतरा तितु दीबाणि गइआह ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ जिन मनुष्यों को (ईश्वर का) डर है उनको (दुनिया वाला कोई) डर नहीं (सताता)। (ईश्वर की ओर से जो) निडर (बनते फिरते हैं। उन) को (दुनिया का) बहुत डर सताता है। हे नानक! यह निर्णय तब होता है जब मनुष्य उस (ईश्वर) हजूरी में पहुँचे (भाव, जब प्रभू के चरणों में जुड़े)। 1।
· सूही की वार, सलोक · राग सूही
तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥
मः 2 ॥
तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥
जीवते कउ जीवता मिलै मूए कउ मूआ ॥
नानक सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥2॥
तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥
जीवते कउ जीवता मिलै मूए कउ मूआ ॥
नानक सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 2 ॥ (चीटीं से लेकर हाथी और मनुष्य तक) चलने वाले के साथ चलने वाला साथ करता है और उड़ने वाले के साथ (भाव, पंछी) के साथ उड़ने वाला। जिंदा दिल को जिंदा दिल मनुष्य आ मिलता है और मुर्दा दिल को मुर्दा दिल (भाव, हरेक जीव अपने-अपने स्वभाव वाले का ही संग करना पसंद करता है)। हे नानक! (जीव भी ईश्वरीय गुणो वाला है। सो, इसको) चाहिए कि जिस प्रभू ने ये जगत रचा है उसकी सिफत सालाह करे (भाव, उसके साथ मन जोड़े)। 2।
· सूही की वार, पउड़ी · राग सूही
सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥
पउड़ी ॥
सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥
हउमै मारि मनु निरमला हरि नामु उरि धारी ॥
कोठे मंडप माड़ीआ लगि पए गावारी ॥
जिनि॑ कीए तिसहि न जाणनी मनमुखि गुबारी ॥
जिसु बुझाइहि सो बुझसी सचिआ किआ जंत विचारी ॥8॥
सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥
हउमै मारि मनु निरमला हरि नामु उरि धारी ॥
कोठे मंडप माड़ीआ लगि पए गावारी ॥
जिनि॑ कीए तिसहि न जाणनी मनमुखि गुबारी ॥
जिसु बुझाइहि सो बुझसी सचिआ किआ जंत विचारी ॥8॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। गुरू के शबद के द्वारा उच्च विचार वाले हो के जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू को सिमरते हैं वह भी उसका रूप हो जाते हैं; प्रभू का नाम हृदय में रख के अहंकार को मार के उनका मन पवित्र हो जाता है। पर मूर्ख मनुष्य घरों महलों माड़ियों (के मोह) में लग जाते हैं। मनमुख (मोह के) घोर अंधेरे में फस के उसको पहचानते ही नहीं जिसने पैदा किया है। हे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू! जीव बिचारे क्या हैं। आप जिसे समझ बख्शते हैं वही समझता है। 8।
· सूही की वार, सलोक · राग सूही
कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥
सलोक मः 3 ॥
कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥
मतु सेजै कंतु न आवई एवै बिरथा जाइ ॥
कामणि पिर मनु मानिआ तउ बणिआ सीगारु ॥
कीआ तउ परवाणु है जा सहु धरे पिआरु ॥
भउ सीगारु तबोल रसु भोजनु भाउ करेइ ॥
तनु मनु सउपे कंत कउ तउ नानक भोगु करेइ ॥1॥
कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥
मतु सेजै कंतु न आवई एवै बिरथा जाइ ॥
कामणि पिर मनु मानिआ तउ बणिआ सीगारु ॥
कीआ तउ परवाणु है जा सहु धरे पिआरु ॥
भउ सीगारु तबोल रसु भोजनु भाउ करेइ ॥
तनु मनु सउपे कंत कउ तउ नानक भोगु करेइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ॥3॥ हे स्त्री! तब श्रृंगार करें जब पहले पति को रिझा लें। (नहीं तो) कहीं ऐसा ना हो कि पति सेज पर आए ही ना और (आपका किया हुआ) श्रंृगार ऐसे व्यर्थ चला जाए। हे स्त्री! अगर पति का मन मान जाए तो ही किए हुए श्रृंगार को सफल समझें। स्त्री का किया हुआ श्रृंगार तभी कबूल है अगर पति उसको प्यार करे। हे नानक! अगर जीव स्त्री प्रभू के डर (में रहने) को श्रृंगार और पान का रस बनाती है। प्रभू के प्यार को भोजन (भाव, जिंदगी का आधार) बनाती है। और अपना तन मन पति प्रभू के हवाले कर देती है (भाव, पूर्ण तौर पर प्रभू की रजा में चलती है) उसको ही पति-प्रभू मिलता है। 1।
· सूही की वार, सलोक · राग सूही
काजल फूल तंबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥
मः 3 ॥
काजल फूल तंबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥
सेजै कंतु न आइओ एवै भइआ विकारु ॥2॥
काजल फूल तंबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥
सेजै कंतु न आइओ एवै भइआ विकारु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ स्त्री ने सुर्मा। फूल और पान का रस ले के श्रृंगार किया। (पर अगर) पति सेज पर ना आया तो ये (किया हुआ) श्रृंगार बल्कि बेकार हो गया (क्योंकि विछोड़े के कारण ये दुखद हो गया)। 2।
· सूही की वार, सलोक · राग सूही
धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥
मः 3 ॥
धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥
एक जोति दुइ मूरती धन पिरु कहीऐ सोइ ॥3॥
धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥
एक जोति दुइ मूरती धन पिरु कहीऐ सोइ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो (सिर्फ शारीरिक तौर पर) मिल के बैठैं उन्हें असल पति-पत्नी नहीं कहा जाता। जिनके दोनों जिस्मों में एक ही आत्मा हो जाए (दरअसल) वही असली पत्नी है और असल पति है। 3।
· सूही की वार, पउड़ी · राग सूही
भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥
पउड़ी ॥
भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥
सतिगुरि मिलिऐ भउ ऊपजै भै भाइ रंगु सवारि ॥
तनु मनु रता रंग सिउ हउमै त्रिसना मारि ॥
मनु तनु निरमलु अति सोहणा भेटिआ क्रिसन मुरारि ॥
भउ भाउ सभु तिस दा सो सचु वरतै संसारि ॥9॥
भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥
सतिगुरि मिलिऐ भउ ऊपजै भै भाइ रंगु सवारि ॥
तनु मनु रता रंग सिउ हउमै त्रिसना मारि ॥
मनु तनु निरमलु अति सोहणा भेटिआ क्रिसन मुरारि ॥
भउ भाउ सभु तिस दा सो सचु वरतै संसारि ॥9॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू के डर (में रहे) बिना उसकी भक्ति नहीं हो सकती और उसके नाम में प्यार नहीं बन सकता (भाव, उसका नाम प्यारा नहीं लग सकता); ये डर तब ही पैदा होता है अगर गुरू मिले। (इस तरह) डर से प्यार से (भक्ति का) रंग बढ़िया चढ़ता है। (प्रभू के डर और प्यार की सहायता से) अहंकार और तृष्णा को मार के मनुष्य का मन और शरीर (प्रभू की भगती के) रंग से रंगे जाते हैं; प्रभू को मिलके शरीर और मन पवित्र व सुंदर हो जाते हैं। ये डर और प्रेम सब कुछ जिस प्रभू का (बख्शा हुआ मिलता) है वह खुद जगत में (हर जगह) मौजूद है। 9।
· सूही की वार, सलोक · राग सूही
वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥
सलोक मः 1 ॥
वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥
सागर लहरि समुंद सर वेलि वरस वराहु ॥
आपि खड़ोवहि आपि करि आपीणै आपाहु ॥
गुरमुखि सेवा थाइ पवै उनमनि ततु कमाहु ॥
मसकति लहहु मजूरीआ मंगि मंगि खसम दराहु ॥
नानक पुर दर वेपरवाह तउ दरि ऊणा नाहि को सचा वेपरवाहु ॥1॥
वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥
सागर लहरि समुंद सर वेलि वरस वराहु ॥
आपि खड़ोवहि आपि करि आपीणै आपाहु ॥
गुरमुखि सेवा थाइ पवै उनमनि ततु कमाहु ॥
मसकति लहहु मजूरीआ मंगि मंगि खसम दराहु ॥
नानक पुर दर वेपरवाह तउ दरि ऊणा नाहि को सचा वेपरवाहु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे मालिक पति! आप धन्य हैं! आप धन्य हैं! जिसने जगत रचना रच के हम (जीवों को) पैदा किया है। समुंद्र। समुंद्र की लहरें। तालाब, हरी बेलें। बरखा करने वाले बादल, (ये सारी रचना करने वाले आप ही तो हैं)। आप खुद ही सबको पैदा करके सब में खुद व्यापक हैं और (सबसे निर्लिप भी हैं) उत्साह से आपके नाम की कमाई करके गुरसिखों की मेहनत (आपके दर पर) कबूल हो जाती है। वे बँदगी की मेहनत करके। हे पति! आपके दर से मांग-मांग के मजदूरी लेते हैं (मुरादें पाते हैं)। हे नानक! (कहें) हे बेपरवाह प्रभू! आपके दर (बरकतों से) भरे पड़े हैं। कोई जीव आपके दर पर (आ के) खाली नहीं गया। आप सदा कायम रहने वाले और बेमुहताज हैं। 1।
· सूही की वार, सलोक · राग सूही
उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥
महला 1 ॥
उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥
तिन जरु वैरी नानका जि बुढे थीइ मरंनि ॥2॥
उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥
तिन जरु वैरी नानका जि बुढे थीइ मरंनि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जो शरीर सुंदर सफेद दाँतों से सुंदर नैनों से शोभा दे रहे हैं। हे नानक! बुढ़ापा इनका वैरी है। क्योंकि बुढे हो के ये नाश हो जाते हैं। 2।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 2: गुरु अंगद देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 788 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।