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अंग ७८५ · सूही

अंग
785
सूही
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  1. सभ कै मधि सभ हू ते बाहरि राग दोख ते निआरो ॥
  2. सूहै वेसि दोहागणी पर पिरु रावण जाइ ॥
  3. सूहवीए निमाणीए सो सहु सदा सम॑ालि ॥
  4. आपे तखतु रचाइओनु आकास पताला ॥
  5. सूहब ता सोहागणी जा मंनि लैहि सचु नाउ ॥
  6. लोका वे हउ सूहवी सूहा वेसु करी ॥

सभ कै मधि सभ हू ते बाहरि राग दोख ते निआरो ॥

अंग ७८४ से चला आ रहा अंश

सभ कै मधि सभ हू ते बाहरि राग दोख ते निआरो ॥
नानक दास गोबिंद सरणाई हरि प्रीतमु मनहि सधारो ॥3॥
मै खोजत खोजत जी हरि निहचलु सु घरु पाइआ ॥
सभि अध्रुव डिठे जीउ ता चरन कमल चितु लाइआ ॥
प्रभु अबिनासी हउ तिस की दासी मरै न आवै जाए ॥
धरम अरथ काम सभि पूरन मनि चिंदी इछ पुजाए ॥
स्रुति सिम्रिति गुन गावहि करते सिध साधिक मुनि जन धिआइआ ॥
नानक सरनि क्रिपा निधि सुआमी वडभागी हरि हरि गाइआ ॥4॥1॥11॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! परमात्मा सब जीवों के अंदर है।सबसे अलग भी है।(सबके अंदर होता हुआ भी वह) मोह और ईष्या (आदि) से निर्लिप रहता है। उसके सेवक सदा उसकी शरण पड़े रहते हैं।वह प्रीतम हरी सब जीवों के मन का आसरा (बना रहता है)। 3। हे भाई ! तलाश करते-करते मैंने हरी-प्रभू का वह ठिकाना ढूँढ लिया है जो कभी भी डोलता नहीं। जब मैंने देखा कि (जगत के) सारे (पदार्थ) नाशवंत हैं।तब मैंने प्रभू के सुंदर चरणों में (अपना) मन जोड़ लिया। हे भाई ! परमात्मा कभी नाश होने वाला नहीं।मैं (तो) उसकी दासी बन गई हूँ।वह कभी जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। (दुनिया के बड़े से बड़े प्रसिद्ध पदार्थ) धर्म अर्थ काम (आदिक) सारे ही (उस प्रभू में) मौजूद हैं।वह प्रभू (जीव के) मन में चितवी हरेक कामना पूरी कर देता है। हे भाई ! (काफी पुरातन समय से ही प्राचीन धर्म पुस्तकें) स्मृतियाँ-वेद (आदिक) उस करतार के गुण गाते आ रहे हैं।जोग-साधना में सिद्ध योगी।योग साधना करने वाले जोगी।सारे ऋषि-मुनि (उसी का नाम) सिमरते आ रहे हैं। हे नानक ! वह मालिक-प्रभू कृपा का खजाना है।मनुष्य बड़े भाग्यों से उसकी शरण पड़ता है।उसकी सिफत सालाह करता है। 4। 1। 11।

सूहै वेसि दोहागणी पर पिरु रावण जाइ ॥

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
वार सूही की सलोका नालि महला 3 ॥
सलोकु मः 3 ॥
सूहै वेसि दोहागणी पर पिरु रावण जाइ ॥
पिरु छोडिआ घरि आपणै मोही दूजै भाइ ॥
मिठा करि कै खाइआ बहु सादहु वधिआ रोगु ॥
सुधु भतारु हरि छोडिआ फिरि लगा जाइ विजोगु ॥
गुरमुखि होवै सु पलटिआ हरि राती साजि सीगारि ॥
सहजि सचु पिरु राविआ हरि नामा उर धारि ॥
आगिआकारी सदा सोुहागणि आपि मेली करतारि ॥
नानक पिरु पाइआ हरि साचा सदा सोुहागणि नारि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ वार सूही की सलोका नालि महला 3 ॥ श्लोक महला 3॥ जो जीव-स्त्री दुनिया के सुंदर पदार्थ-रूप कुसंभे के चुहचुहे रंग वाले वेश में (मस्त) है वह दुर्भागनि है।वह (जैसे) पराए पति से भोग करने चल पड़ी है। माया के प्यार में वह लूटी जा रही है (क्योंकि) वह अपने हृदय-घर में बसते पति-प्रभू को बिसार देती है। (जिस जीव-स्त्री ने दुनिया के पदार्थों को) स्वादिष्ट समझ के भोगा है (उसके मन में) इस बहुत सारे चस्कों से रोग बढ़ता है। (भाव) वह निरोल अपने पति-प्रभू को छोड़ बैठती है और इस तरह उससे इसका विछोड़ा हो जाता है। जो जीव-स्त्री गुरू के हुकम में चलती है उसका मन (दुनियाँ के भोगों की तरफ से) पलट जाता है।वह (प्रभू के प्यार रूपी गहनों से अपने आप को) सजा-धजा के परमात्मा (के प्यार में) रंगी रहती है। प्रभू का नाम हृदय में धारण करके सहज अवस्था में (टिक के) सदा-स्थिर रहने वाले पति का आनंद लेती है। प्रभू के हुकम में चलने वाली जीव-स्त्री सदा सोहागभाग वाली है।ईश्वर ने उसको अपने साथ मिला लिया है। हे नानक ! जिसने सदा-स्थिर प्रभू पति प्राप्त कर लिया है वह (जीव-) स्त्री सदा सोहाग-भाग वाली है। 1।

सूहवीए निमाणीए सो सहु सदा सम॑ालि ॥

मः 3 ॥
सूहवीए निमाणीए सो सहु सदा सम॑ालि ॥
नानक जनमु सवारहि आपणा कुलु भी छुटी नालि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे चुहचुहे कुसंभी रंग से प्यार करने वाली बिचारी ! पति-प्रभू को आप सदा याद रख। हे नानक ! (कह कि इस तरह) आप अपना जीवन सवारलेगी।आपकी कुल भी आपके साथ मुक्त हो जाएगी। 2।

आपे तखतु रचाइओनु आकास पताला ॥

पउड़ी ॥
आपे तखतु रचाइओनु आकास पताला ॥
हुकमे धरती साजीअनु सची धरम साला ॥
आपि उपाइ खपाइदा सचे दीन दइआला ॥
सभना रिजकु संबाहिदा तेरा हुकमु निराला ॥
आपे आपि वरतदा आपे प्रतिपाला ॥1॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ आकाश और पाताल के बीच का सारा जगत-रूपी तख्त प्रभू ने ही बनाया है। उसने अपने हुकम में ही धरती के जीवों के धर्म कमाने के लिए जगह बनाई है। हे दीनों पर दया करने वाले सदा कायम रहने वाले ! आप खुद ही पैदा करके खुद ही नाश करते हैं। (हे प्रभू !) आपका हुकम अनोखा है (भाव।कोई इसको मोड़ नहीं सकता) आप सब जीवों को रिजक पहुँचाते हैं। हर जगह आप स्वयं मौजूद हैं और आप स्वयं ही जीवों की पालना करते हैं। 1।

सूहब ता सोहागणी जा मंनि लैहि सचु नाउ ॥

सलोकु मः 3 ॥
सूहब ता सोहागणी जा मंनि लैहि सचु नाउ ॥
सतिगुरु अपणा मनाइ लै रूपु चड़ी ता अगला दूजा नाही थाउ ॥
ऐसा सीगारु बणाइ तू मैला कदे न होवई अहिनिसि लागै भाउ ॥
नानक सोहागणि का किआ चिहनु है अंदरि सचु मुखु उजला खसमै माहि समाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे सूहे वेश वालिए ! अगर आप सदा-स्थिर (प्रभू का) नाम मान ले तो आप सोहाग-भाग वाली हो जाए। अपने गुरू को प्रसन्न कर ले। बड़ी (नाम-) रंगत चढ़ आएगी (पर इस रंगत के लिए गुरू के बिना) कोई और जगह नहीं। (सो गुरू की शरण पड़ कर) ऐसा (सुंदर) श्रृंगार बना जो कभी मैला ना हो और दिन-रात आपका प्यार (प्रभू से) बना रहे। हे नानक ! (इसके बिना) सोहाग-भाग वाली जीव-स्त्री के और क्या लक्षण हो सकते हैं।उसके अंदर सच्चा नाम हो।मुँह (पर नाम की) लाली हो और वह पति-प्रभू में जुड़ी रहे। 1।

लोका वे हउ सूहवी सूहा वेसु करी ॥

मः 3 ॥
लोका वे हउ सूहवी सूहा वेसु करी ॥
वेसी सहु न पाईऐ करि करि वेस रही ॥
नानक तिनी सहु पाइआ जिनी गुर की सिख सुणी ॥
जो तिसु भावै सो थीऐ इन बिधि कंत मिली ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे लोगो ! मैं (निरी) सूहे वेश वाली (ही) हूँ।मैं (सिर्फ) सूहे कपड़े (ही) पहनती हूँ; पर (निरे) वेशों से पति (-प्रभू) नहीं मिलता।मैं भेस कर-कर के थक गई हूँ। हे नानक ! पति उनको (ही) मिलता है जिन्होंने सतिगुरू की शिक्षा सुनी है। (जब जीव-स्त्री इस अवस्था में पहुँच जाए कि) जो प्रभू को भाता है वही होता है।तो इस तरह वह प्रभू-पति को मिल जाती है। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी; महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७८५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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