सभ कै मधि सभ हू ते बाहरि राग दोख ते निआरो ॥ नानक दास गोबिंद सरणाई हरि प्रीतमु मनहि सधारो ॥3॥ मै खोजत खोजत जी हरि निहचलु सु घरु पाइआ ॥ सभि अध्रुव डिठे जीउ ता चरन कमल चितु लाइआ ॥ प्रभु अबिनासी हउ तिस की दासी मरै न आवै जाए ॥ धरम अरथ काम सभि पूरन मनि चिंदी इछ पुजाए ॥ स्रुति सिम्रिति गुन गावहि करते सिध साधिक मुनि जन धिआइआ ॥ नानक सरनि क्रिपा निधि सुआमी वडभागी हरि हरि गाइआ ॥4॥1॥11॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! परमात्मा सब जीवों के अंदर है।सबसे अलग भी है।(सबके अंदर होता हुआ भी वह) मोह और ईष्या (आदि) से निर्लिप रहता है। उसके सेवक सदा उसकी शरण पड़े रहते हैं।वह प्रीतम हरी सब जीवों के मन का आसरा (बना रहता है)। 3। हे भाई ! तलाश करते-करते मैंने हरी-प्रभू का वह ठिकाना ढूँढ लिया है जो कभी भी डोलता नहीं। जब मैंने देखा कि (जगत के) सारे (पदार्थ) नाशवंत हैं।तब मैंने प्रभू के सुंदर चरणों में (अपना) मन जोड़ लिया। हे भाई ! परमात्मा कभी नाश होने वाला नहीं।मैं (तो) उसकी दासी बन गई हूँ।वह कभी जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। (दुनिया के बड़े से बड़े प्रसिद्ध पदार्थ) धर्म अर्थ काम (आदिक) सारे ही (उस प्रभू में) मौजूद हैं।वह प्रभू (जीव के) मन में चितवी हरेक कामना पूरी कर देता है। हे भाई ! (काफी पुरातन समय से ही प्राचीन धर्म पुस्तकें) स्मृतियाँ-वेद (आदिक) उस करतार के गुण गाते आ रहे हैं।जोग-साधना में सिद्ध योगी।योग साधना करने वाले जोगी।सारे ऋषि-मुनि (उसी का नाम) सिमरते आ रहे हैं। हे नानक ! वह मालिक-प्रभू कृपा का खजाना है।मनुष्य बड़े भाग्यों से उसकी शरण पड़ता है।उसकी सिफत सालाह करता है। 4। 1। 11।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ वार सूही की सलोका नालि महला 3 ॥ श्लोक महला 3॥ जो जीव-स्त्री दुनिया के सुंदर पदार्थ-रूप कुसंभे के चुहचुहे रंग वाले वेश में (मस्त) है वह दुर्भागनि है।वह (जैसे) पराए पति से भोग करने चल पड़ी है। माया के प्यार में वह लूटी जा रही है (क्योंकि) वह अपने हृदय-घर में बसते पति-प्रभू को बिसार देती है। (जिस जीव-स्त्री ने दुनिया के पदार्थों को) स्वादिष्ट समझ के भोगा है (उसके मन में) इस बहुत सारे चस्कों से रोग बढ़ता है। (भाव) वह निरोल अपने पति-प्रभू को छोड़ बैठती है और इस तरह उससे इसका विछोड़ा हो जाता है। जो जीव-स्त्री गुरू के हुकम में चलती है उसका मन (दुनियाँ के भोगों की तरफ से) पलट जाता है।वह (प्रभू के प्यार रूपी गहनों से अपने आप को) सजा-धजा के परमात्मा (के प्यार में) रंगी रहती है। प्रभू का नाम हृदय में धारण करके सहज अवस्था में (टिक के) सदा-स्थिर रहने वाले पति का आनंद लेती है। प्रभू के हुकम में चलने वाली जीव-स्त्री सदा सोहागभाग वाली है।ईश्वर ने उसको अपने साथ मिला लिया है। हे नानक ! जिसने सदा-स्थिर प्रभू पति प्राप्त कर लिया है वह (जीव-) स्त्री सदा सोहाग-भाग वाली है। 1।
मः 3 ॥ सूहवीए निमाणीए सो सहु सदा सम॑ालि ॥ नानक जनमु सवारहि आपणा कुलु भी छुटी नालि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे चुहचुहे कुसंभी रंग से प्यार करने वाली बिचारी ! पति-प्रभू को आप सदा याद रख। हे नानक ! (कह कि इस तरह) आप अपना जीवन सवारलेगी।आपकी कुल भी आपके साथ मुक्त हैं जाएगी। 2।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ आकाश और पाताल के बीच का सारा जगत-रूपी तख्त प्रभू ने ही बनाया है। उसने अपने हुकम में ही धरती के जीवों के धर्म कमाने के लिए जगह बनाई है। हे दीनों पर दया करने वाले सदा कायम रहने वाले ! आप खुद ही पैदा करके खुद ही नाश करता है। (हे प्रभू !) आपका हुकम अनोखा है (भाव।कोई इसको मोड़ नहीं सकता) आप सब जीवों को रिजक पहुँचाता है। हर जगह आप स्वयं मौजूद है और आप सवयं ही जीवों की पालना करता है। 1।
सलोकु मः 3 ॥ सूहब ता सोहागणी जा मंनि लैहि सचु नाउ ॥ सतिगुरु अपणा मनाइ लै रूपु चड़ी ता अगला दूजा नाही थाउ ॥ ऐसा सीगारु बणाइ तू मैला कदे न होवई अहिनिसि लागै भाउ ॥ नानक सोहागणि का किआ चिहनु है अंदरि सचु मुखु उजला खसमै माहि समाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे सूहे वेश वालिए ! अगर आप सदा-स्थिर (प्रभू का) नाम मान ले तो आप सोहाग-भाग वाली हैं जाए। अपने गुरू को प्रसन्न कर ले। बड़ी (नाम-) रंगत चढ़ आएगी (पर इस रंगत के लिए गुरू के बिना) कोई और जगह नहीं। (सो गुरू की शरण पड़ कर) ऐसा (सुंदर) श्रृंगार बना जो कभी मैला ना हो और दिन-रात आपका प्यार (प्रभू से) बना रहे। हे नानक ! (इसके बिना) सोहाग-भाग वाली जीव-स्त्री के और क्या लक्षण हो सकते हैं।उसके अंदर सच्चा नाम हो।मुँह (पर नाम की) लाली हो और वह पति-प्रभू में जुड़ी रहे। 1।
मः 3 ॥ लोका वे हउ सूहवी सूहा वेसु करी ॥ वेसी सहु न पाईऐ करि करि वेस रही ॥ नानक तिनी सहु पाइआ जिनी गुर की सिख सुणी ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ इन बिधि कंत मिली ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे लोगो ! मैं (निरी) सूहे वेश वाली (ही) हूँ।मैं (सिर्फ) सूहे कपड़े (ही) पहनती हूँ; पर (निरे) वेशों से पति (-प्रभू) नहीं मिलता।मैं भेस कर-कर के थक गई हूँ। हे नानक ! पति उनको (ही) मिलता है जिन्होंने सतिगुरू की शिक्षा सुनी है। (जब जीव-स्त्री इस अवस्था में पहुँच जाए कि) जो प्रभू को भाता है वही होता है।तो इस तरह वह प्रभू-पति को मिल जाती है। 2।
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! परमात्मा सब जीवों के अंदर है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।