नानक कउ प्रभ किरपा कीजै नेत्र देखहि दरसु तेरा ॥1॥ कोटि करन दीजहि प्रभ प्रीतम हरि गुण सुणीअहि अबिनासी राम ॥ सुणि सुणि इहु मनु निरमलु होवै कटीऐ काल की फासी राम ॥ कटीऐ जम फासी सिमरि अबिनासी सगल मंगल सुगिआना ॥ हरि हरि जपु जपीऐ दिनु राती लागै सहजि धिआना ॥ कलमल दुख जारे प्रभू चितारे मन की दुरमति नासी ॥ कहु नानक प्रभ किरपा कीजै हरि गुण सुणीअहि अविनासी ॥2॥ करोड़ि हसत तेरी टहल कमावहि चरण चलहि प्रभ मारगि राम ॥ भव सागर नाव हरि सेवा जो चड़ै तिसु तारगि राम ॥ भवजलु तरिआ हरि हरि सिमरिआ सगल मनोरथ पूरे ॥ महा बिकार गए सुख उपजे बाजे अनहद तूरे ॥ मन बांछत फल पाए सगले कुदरति कीम अपारगि ॥ कहु नानक प्रभ किरपा कीजै मनु सदा चलै तेरै मारगि ॥3॥ एहो वरु एहा वडिआई इहु धनु होइ वडभागा राम ॥ एहो रंगु एहो रस भोगा हरि चरणी मनु लागा राम ॥ मनु लागा चरणे प्रभ की सरणे करण कारण गोपाला ॥ सभु किछु तेरा तू प्रभु मेरा मेरे ठाकुर दीन दइआला ॥ मोहि निरगुण प्रीतम सुख सागर संतसंगि मनु जागा ॥ कहु नानक प्रभि किरपा कीन॑ी चरण कमल मनु लागा ॥4॥3॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! नानक पर मेहर कर।(नानक की) आँखें (हर जगह) आपका ही दर्शन करती रहें। 1। हे (मेरे) प्रीतम प्रभू ! हे अविनाशी हरी ! (यदि मुझे) करोड़ों कान दिए जाएं।तो (उनसे) आपके गुण सुने जा सकें। हे भाई ! (परमात्मा की सिफत सालाह) सुन-सुन के ये मन पवित्र हो जाता है।और (आत्मिक) मौत की फाही काटी जाती है। अविनाशी प्रभू का नाम सिमर के जम की फाही काटी जाती है (अंतरात्मे) खुशियां ही खुशियां बन जाती हैं।आत्मिक जीवन की समझ पैदा हो जाती है। हे भाई ! दिन-रात परमात्मा का नाम जपना चाहिए।(नाम की बरकति से) आत्मिक अडोलता में सुरति टिकी रहती है। प्रभू का नाम चित्त में बसाने से सारे पाप।सारे दुख जल जाते हैं।मन की खोटी मति नाश हो जाती हैं। हे नानक ! कह, हे प्रभू ! अगर आप मेहर करे।तो आपके गुण (इन कानों से) सुने जाएं। 2। हे प्रभू ! (जिन पर आपकी मेहर होती है उन जीवों के) करोड़ों हाथ आपकी टहल कर रहे हैं (उन जीवों के करोड़ो) पैर आपके रास्ते पर चल रहे हैं। हे भाई ! संसार-समुंद्र (से पार लांघने के लिए) परमात्मा की भक्ति (जीवों के लिए) बेड़ी है।जो जीव (इस बेड़ी में) सवार होता है।उसको (प्रभू) पार लंघा देता है। जिसने भी परमात्मा का नाम सिमरा।वह संसार-समुंद्र से पार लांघ गया।उसकी सारी मुरादें प्रभू पूरी कर देता है। (उसके अंदर से) बड़े-बड़े विकार दूर हो जाते हैं (उसके अंदर सुख पैदा हो जाते हैं) (मानो) एक रस बाजे बज उठे हैं। (उस मनुष्य ने) सारी मन-मांगी मुरादें हासिल कर लीं।(हे प्रभू !) आपकी इस कुदरत का मूल्य नहीं पाया जा सकता। हे नानक ! कह, हे प्रभू ! (मेरे पर भी) मेहर कर।(मेरा) मन सदा आपके रास्ते पर चलता रहे। 3। यही (उसके वास्ते) वडिआई है उपमा है।उसके वास्ते धन है।यही उसके वास्ते बड़ी किस्मत है। (जिसका) मन प्रभू के चरणों में लीन हो जाता है। यही है उसके लिए दुनिया का रंग-तमाशा और सारे स्वादिष्ट पदार्थों का भोगना। हे भाई ! (जिस मनुष्य का) मन परमात्मा के चरणों में जुड़ जाता है।जो मनुष्य जगत के मूल गोपाल के चरणों में पड़ा रहता है नाम में टिके रहना ही उस मनुष्य के लिए बख्शिश है। हे मेरे प्रभू ! हे मेरे ठाकुर ! हे दीनों पर दया करने वाले ! हरेक दाति (हम जीवों को) आपकी ही बख्शी हुई है। हे मेरे प्रीतम ! हे सुखों के समुंद्र ! (आपकी मेहर से) मुझ गुण-हीन का मन संतजनों की संगति में (रह के माया के मोह की नींद में से) जाग पड़ा है। हे नानक ! कह, हे प्रभू ! (जब) तूने मेहर की।तो (मेरा) मन (आपके) सोहाने चरणों में लीन हैं गया। 4। 3। 6।
सूही महला 5 ॥ हरि जपे हरि मंदरु साजिआ संत भगत गुण गावहि राम ॥ सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सगले पाप तजावहि राम ॥ हरि गुण गाइ परम पदु पाइआ प्रभ की ऊतम बाणी ॥ सहज कथा प्रभ की अति मीठी कथी अकथ कहाणी ॥ भला संजोगु मूरतु पलु साचा अबिचल नीव रखाई ॥ जन नानक प्रभ भए दइआला सरब कला बणि आई ॥1॥ आनंदा वजहि नित वाजे पारब्रहमु मनि वूठा राम ॥ गुरमुखे सचु करणी सारी बिनसे भ्रम भै झूठा राम ॥ अनहद बाणी गुरमुखि वखाणी जसु सुणि सुणि मनु तनु हरिआ ॥ सरब सुखा तिस ही बणि आए जो प्रभि अपना करिआ ॥ घर महि नव निधि भरे भंडारा राम नामि रंगु लागा ॥ नानक जन प्रभु कदे न विसरै पूरन जा के भागा ॥2॥ छाइआ प्रभि छत्रपति कीन॑ी सगली तपति बिनासी राम ॥ दूख पाप का डेरा ढाठा कारजु आइआ रासी राम ॥ हरि प्रभि फुरमाइआ मिटी बलाइआ साचु धरमु पुंनु फलिआ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (मनुष्य का ये शरीर-) घर परमात्मा ने नाम जपने के लिए बनाया है।(इस घर में) संत जन भक्त जन (परमात्मा के) गुण गाते रहते हैं। अपने मालिक प्रभू (का नाम) हर वक्त सिमर-सिमर के (संत जन अपने अंदर से) सारे पाप दूर कर लेते हैं। हे भाई ! (इस शरीर घर में संत-जनों ने) परमात्मा की पवित्र सिफत सालाह की बाणी गा के।परमात्मा के गुण गा के सबसे उच्च आत्मिक दर्जा प्राप्त किया है। (इस शरीर-घर में संत-जनों ने) उस परमात्मा की सिफत सालाह की है जिसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।उस प्रभू की अत्यंत मीठी सिफत सालाह की है जो आत्मिक अडोलता पैदा करती है। हे दास नानक ! (जिस मनुष्य पर) प्रभू जी दयावान होते हैं (उसके शरीर-घर में वह) शुभ संजोग आ बनता है।वह सदा कायम रहने वाला महूरत आ बनता है जब (परमात्मा के सिफत सालाह करने की) कभी ना हिलने वाली नींव रखी जाती है (और।जिस के अंदर ये नींव रखी जाती है।उसके अंदर)मजबूत आत्मिक शक्ति पैदा हो जाती है। हे नानक ! जब प्रभु दयालु हो गया तो सब कार्य सम्पूर्ण हो गए॥ 1॥ हे भाई ! (सिफत सालाह की ‘अविचल नींव’ की बरकति से जिस मनुष्य के) मन में परमात्मा आ बसता है (उसके शरीर-मन्दिर में आत्मिक) आनंद के सदैव (मानो) बाजे बजते रहते हैं। (उसके शरीर-घर में से) सारे भ्रम-डर झूठ नाश हो जाते हैं।गुरू के सन्मुख रह के सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरना (उस मनुष्य का) श्रेष्ठ कर्तव्य बन जाता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला वह मनुष्य सदा एक-रस सिफत सालाह की बाणी उचारता रहता है।परमात्मा की सिफत सालाह सुन-सुन के उसका मन उसका तन आत्मिक जीवन वाला हो जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा ने अपना (प्यारा) बना लिया।सारे सुख उसके अंदर आ एकत्र हुए। हे भाई ! परमात्मा के नाम में जिस मनुष्य का प्यार बन जाता है।उसके (हृदय-) घर में (मानो।धरती के) सारे खजाने और भण्डार भर जाते हैं। हे नानक ! जिस दास के पूरे भाग्य जाग पड़ते हैं।उसको परमात्मा कभी नहीं भूलता। 2। हे भाई ! प्रभू पातशाह ने (जिस मनुष्य के सिर पर) अपना हाथ रखा।(उसके अंदर से विकारों की) सारी जलन नाश हो गई। (उसके अंदर से) दुखों का विकारों का अड्डा ही गिर गया।उस मनुष्य का जीवन-मनोरथ कामयाब हो गया। हरी-प्रभू ने हुकम दे दिया (और।उस मनुष्य के अंदर से माया) बला (का प्रभाव) खत्म हो गया।सदा स्थिर हरी-नाम सिमरन का परम पून्य (उसके अंदर) बढ़ना शुरू हो गया।
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।