अंग
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सूही
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मिटे अंधारे तजे बिकारे ठाकुर सिउ मनु माना ॥
मिटे अंधारे तजे बिकारे ठाकुर सिउ मनु माना ॥
प्रभ जी भाणी भई निकाणी सफल जनमु परवाना ॥
भई अमोली भारा तोली मुकति जुगति दरु खोल॑ा ॥
कहु नानक हउ निरभउ होई सो प्रभु मेरा ओल॑ा ॥4॥1॥4॥
प्रभ जी भाणी भई निकाणी सफल जनमु परवाना ॥
भई अमोली भारा तोली मुकति जुगति दरु खोल॑ा ॥
कहु नानक हउ निरभउ होई सो प्रभु मेरा ओल॑ा ॥4॥1॥4॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस जीव-स्त्री का मन मालिक-प्रभू के साथ पतीज जाता है।वह सारे विकार त्याग देती है।(उसके अंदर से माया के मोह वाले) अंधेरे दूर हो जाते हैं। (जो जीव-स्त्री) प्रभू को अच्छी लगने लग जाती है।वह (दुनिया की ओर से) बे-मुथाज हो जाती है।उसकी जिंदगी कामयाब हो जाती है।वह प्रभू दर पर कबूल हो जाती है। उसकी जिंदगी बहुत ही कीमती हो जाती है।भार वाले तोल वाली हो जाती है।उसके लिए वह दरवाजा खुल जाता है जहाँ उसको विकारों से खलासी मिल जाती है और सही जीवन की जाच आ जाती है। हे नानक ! जब से वह प्रभू मेरा सहारा बन गया है।मैं (विकारों।माया के हमलों की ओर से) निडर हो गई हूँ। 4। 1। 4।
साजनु पुरखु सतिगुरु मेरा पूरा तिसु बिनु अवरु न जाणा राम ॥
सूही महला 5 ॥
साजनु पुरखु सतिगुरु मेरा पूरा तिसु बिनु अवरु न जाणा राम ॥
मात पिता भाई सुत बंधप जीअ प्राण मनि भाणा राम ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का दीआ सरब गुणा भरपूरे ॥
अंतरजामी सो प्रभु मेरा सरब रहिआ भरपूरे ॥
ता की सरणि सरब सुख पाए होए सरब कलिआणा ॥
सदा सदा प्रभ कउ बलिहारै नानक सद कुरबाणा ॥1॥
ऐसा गुरु वडभागी पाईऐ जितु मिलिऐ प्रभु जापै राम ॥
जनम जनम के किलविख उतरहि हरि संत धूड़ी नित नापै राम ॥
हरि धूड़ी नाईऐ प्रभू धिआईऐ बाहुड़ि जोनि न आईऐ ॥
गुर चरणी लागे भ्रम भउ भागे मनि चिंदिआ फलु पाईऐ ॥
हरि गुण नित गाए नामु धिआए फिरि सोगु नाही संतापै ॥
नानक सो प्रभु जीअ का दाता पूरा जिसु परतापै ॥2॥
हरि हरे हरि गुण निधे हरि संतन कै वसि आए राम ॥
संत चरण गुर सेवा लागे तिनी परम पद पाए राम ॥
परम पदु पाइआ आपु मिटाइआ हरि पूरन किरपा धारी ॥
सफल जनमु होआ भउ भागा हरि भेटिआ एकु मुरारी ॥
जिस का सा तिन ही मेलि लीआ जोती जोति समाइआ ॥
नानक नामु निरंजन जपीऐ मिलि सतिगुर सुखु पाइआ ॥3॥
गाउ मंगलो नित हरि जनहु पुंनी इछ सबाई राम ॥
रंगि रते अपुने सुआमी सेती मरै न आवै जाई राम ॥
अबिनासी पाइआ नामु धिआइआ सगल मनोरथ पाए ॥
सांति सहज आनंद घनेरे गुर चरणी मनु लाए ॥
पूरि रहिआ घटि घटि अबिनासी थान थनंतरि साई ॥
कहु नानक कारज सगले पूरे गुर चरणी मनु लाई ॥4॥2॥5॥
साजनु पुरखु सतिगुरु मेरा पूरा तिसु बिनु अवरु न जाणा राम ॥
मात पिता भाई सुत बंधप जीअ प्राण मनि भाणा राम ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का दीआ सरब गुणा भरपूरे ॥
अंतरजामी सो प्रभु मेरा सरब रहिआ भरपूरे ॥
ता की सरणि सरब सुख पाए होए सरब कलिआणा ॥
सदा सदा प्रभ कउ बलिहारै नानक सद कुरबाणा ॥1॥
ऐसा गुरु वडभागी पाईऐ जितु मिलिऐ प्रभु जापै राम ॥
जनम जनम के किलविख उतरहि हरि संत धूड़ी नित नापै राम ॥
हरि धूड़ी नाईऐ प्रभू धिआईऐ बाहुड़ि जोनि न आईऐ ॥
गुर चरणी लागे भ्रम भउ भागे मनि चिंदिआ फलु पाईऐ ॥
हरि गुण नित गाए नामु धिआए फिरि सोगु नाही संतापै ॥
नानक सो प्रभु जीअ का दाता पूरा जिसु परतापै ॥2॥
हरि हरे हरि गुण निधे हरि संतन कै वसि आए राम ॥
संत चरण गुर सेवा लागे तिनी परम पद पाए राम ॥
परम पदु पाइआ आपु मिटाइआ हरि पूरन किरपा धारी ॥
सफल जनमु होआ भउ भागा हरि भेटिआ एकु मुरारी ॥
जिस का सा तिन ही मेलि लीआ जोती जोति समाइआ ॥
नानक नामु निरंजन जपीऐ मिलि सतिगुर सुखु पाइआ ॥3॥
गाउ मंगलो नित हरि जनहु पुंनी इछ सबाई राम ॥
रंगि रते अपुने सुआमी सेती मरै न आवै जाई राम ॥
अबिनासी पाइआ नामु धिआइआ सगल मनोरथ पाए ॥
सांति सहज आनंद घनेरे गुर चरणी मनु लाए ॥
पूरि रहिआ घटि घटि अबिनासी थान थनंतरि साई ॥
कहु नानक कारज सगले पूरे गुर चरणी मनु लाई ॥4॥2॥5॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू महापुरुष ही मेरा (असल) सज्जन है।उस (गुरू) के बिना मैं किसी और को नहीं जानता (जो मुझे परमात्मा की समझ दे सके)। हे भाई ! (गुरू मुझे) मन में (ऐसे) प्यारा लग रहा है (जैसे) माता।पिता।पुत्र।संबंधी।जिंद।प्राण (प्यारे लगते हैं)। हे भाई ! (गुरू ने यह समझ बख्शी है कि) जिंद-शरीर सब कुछ उस (परमात्मा) का दिया हुआ है।(वह परमात्मा) सारे गुणों से भरपूर है। (गुरू ने ही मति दी है कि) हरेक के दिल की जानने वाला मेरा वह प्रभू सब जगह व्यापक है। उसकी शरण पड़ने से सारे सुख-आनंद मिलते हैं। हे नानक ! (कह, गुरू की कृपा से ही) मैं परमात्मा से सदा ही सदा ही सदा ही सदके कुर्बान जाता हूँ। 1। हे भाई ! ऐसा गुरू बड़े भाग्यों से मिलता है।जिसके मिलने से (हृदय में) परमात्मा की समझ पड़ने लग जाती है। अनेकों जन्मों के (सारे) पाप दूर हो जाते हैं।और हरी के संत जनों के चरणों की धूड़ में सदा स्नान होता रहता है। (जिस गुरू के मिलने से) प्रभू के संत जनों की चरण-धूड़ में स्नान हो सकता है।प्रभू का सिमरन हो सकता है और दोबारा जन्मों के चक्कर में नहीं पड़ते। हे भाई ! गुरू के चरणों में लग के भ्रम-डर नाश हो जाते हैं।मन में चितरे हुए हरेक फल प्राप्त हो जाते हैं। (गुरू की शरण पड़ कर जिस मनुष्य ने) सदा परमात्मा के गुण गाए हैं; परमात्मा का नाम सिमरा है।उसको फिर कोई ग़म कोई दुख-कलेश छू नहीं सकता। हे नानक ! (गुरू की कृपा से समझ आ जाती है कि) जिस परमात्मा का पूरा प्रताप है।वही जिंद देने वाला (आत्मिक जीवन देने वाला है)। 2। हे भाई ! सारे गुणों का खजाना परमात्मा संत जनों के (प्यार के) बस में टिका रहता है। जो मनुष्य संतजनों के चरण पड़ के गुरू की सेवा में लगे।उन्होंने सबसे ऊँचे आत्मिक दर्जे प्राप्त कर लिए। हे भाई ! जिस मनुष्य पर पूर्ण प्रभू ने मेहर की।(उसने अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लिया।उसने सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल करा लिया। उसकी जिंदगी कामयाब हो गई।उसका (हरेक) डर दूर हो गया।उसको वह परमात्मा मिल गया जो एक स्वयं ही स्वयं है। जिस परमात्मा का वह पैदा किया हुआ था।उसने ही (उसको अपने चरणों में) मिला लिया।उस मनुष्य की जिंद परमात्मा की ज्योति में एक-मेक हो गई। हे नानक ! निर्लिप प्रभू का नाम (सदा) जपना चाहिए।(जिसने) गुरू को मिल के (नाम जपा।उसने) आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया। 3। हे संत जनो ! सदा (परमात्मा की) सिफतसालाह के गीत गाया करो।(सिफत सालाह के प्रताप से) हरेक मुराद पूरी हो जाती है। जो प्रभू कभी जनम-मरन के चक्कर में नहीं आता (सिफतसालाह की बरकति से मनुष्य) उस मालिक के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम सिमरा उसने नाश-रहित प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया।उसने सारी मुरादें हासिल कर लीं। हे भाई ! गुरू के चरणों में मन जोड़ के मनुष्य शांति प्राप्त करता है।आत्मिक अडोलता में आनंद लेता है। (सिमरन की बरकति से यह निश्चय बन जाता है कि) नाश-रहित परमात्मा ही हरेक जगह में हरेक शरीर में व्याप रहा है हे नानक ! कह, (हे भाई !) गुरू के चरणों में मन लगा के सारे काम सफल हो जाते हैं। 4। 2। 5।
करि किरपा मेरे प्रीतम सुआमी नेत्र देखहि दरसु तेरा राम ॥
सूही महला 5 ॥
करि किरपा मेरे प्रीतम सुआमी नेत्र देखहि दरसु तेरा राम ॥
लाख जिहवा देहु मेरे पिआरे मुखु हरि आराधे मेरा राम ॥
हरि आराधे जम पंथु साधे दूखु न विआपै कोई ॥
जलि थलि महीअलि पूरन सुआमी जत देखा तत सोई ॥
भरम मोह बिकार नाठे प्रभु नेर हू ते नेरा ॥
करि किरपा मेरे प्रीतम सुआमी नेत्र देखहि दरसु तेरा राम ॥
लाख जिहवा देहु मेरे पिआरे मुखु हरि आराधे मेरा राम ॥
हरि आराधे जम पंथु साधे दूखु न विआपै कोई ॥
जलि थलि महीअलि पूरन सुआमी जत देखा तत सोई ॥
भरम मोह बिकार नाठे प्रभु नेर हू ते नेरा ॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे मेरे प्रीतम ! हे मेरे स्वामी ! मेहर कर।मेरी आँखें आपके दर्शन करती रहें। हे मेरे प्यारे ! मुझे लाख जीभें दे (मेरी जीभें आपका नाम जपती रहें।मेहर कर) मेरा मुँह आपका हरी-नाम जपता रहे। (मेरा मुँह) आपका नाम जपता रहे (जिससे) यमराज वाला रास्ता जीता जा सके।और कोई भी दुख (मेरे पर अपना) जोर ना डाल सके। पानी में।धरती में। आकाश में व्यापक हे स्वामी ! (मेहर कर) मैं जिधर देखूँ।उधर (मुझे) वह आपका ही रूप दिखे। हे भाई ! (हरी-नाम जपने की बरकति से) सारे भ्रम।सारे मोह।सारे विकार नाश हो जाते हैं।परमात्मा नजदीक से नजदीक दिखाई देने लग जाता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७८० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।