प्रभ जी भाणी भई निकाणी सफल जनमु परवाना ॥
भई अमोली भारा तोली मुकति जुगति दरु खोल॑ा ॥
कहु नानक हउ निरभउ होई सो प्रभु मेरा ओल॑ा ॥4॥1॥4॥
साजनु पुरखु सतिगुरु मेरा पूरा तिसु बिनु अवरु न जाणा राम ॥
मात पिता भाई सुत बंधप जीअ प्राण मनि भाणा राम ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का दीआ सरब गुणा भरपूरे ॥
अंतरजामी सो प्रभु मेरा सरब रहिआ भरपूरे ॥
ता की सरणि सरब सुख पाए होए सरब कलिआणा ॥
सदा सदा प्रभ कउ बलिहारै नानक सद कुरबाणा ॥1॥
ऐसा गुरु वडभागी पाईऐ जितु मिलिऐ प्रभु जापै राम ॥
जनम जनम के किलविख उतरहि हरि संत धूड़ी नित नापै राम ॥
हरि धूड़ी नाईऐ प्रभू धिआईऐ बाहुड़ि जोनि न आईऐ ॥
गुर चरणी लागे भ्रम भउ भागे मनि चिंदिआ फलु पाईऐ ॥
हरि गुण नित गाए नामु धिआए फिरि सोगु नाही संतापै ॥
नानक सो प्रभु जीअ का दाता पूरा जिसु परतापै ॥2॥
हरि हरे हरि गुण निधे हरि संतन कै वसि आए राम ॥
संत चरण गुर सेवा लागे तिनी परम पद पाए राम ॥
परम पदु पाइआ आपु मिटाइआ हरि पूरन किरपा धारी ॥
सफल जनमु होआ भउ भागा हरि भेटिआ एकु मुरारी ॥
जिस का सा तिन ही मेलि लीआ जोती जोति समाइआ ॥
नानक नामु निरंजन जपीऐ मिलि सतिगुर सुखु पाइआ ॥3॥
गाउ मंगलो नित हरि जनहु पुंनी इछ सबाई राम ॥
रंगि रते अपुने सुआमी सेती मरै न आवै जाई राम ॥
अबिनासी पाइआ नामु धिआइआ सगल मनोरथ पाए ॥
सांति सहज आनंद घनेरे गुर चरणी मनु लाए ॥
पूरि रहिआ घटि घटि अबिनासी थान थनंतरि साई ॥
कहु नानक कारज सगले पूरे गुर चरणी मनु लाई ॥4॥2॥5॥
करि किरपा मेरे प्रीतम सुआमी नेत्र देखहि दरसु तेरा राम ॥
लाख जिहवा देहु मेरे पिआरे मुखु हरि आराधे मेरा राम ॥
हरि आराधे जम पंथु साधे दूखु न विआपै कोई ॥
जलि थलि महीअलि पूरन सुआमी जत देखा तत सोई ॥
भरम मोह बिकार नाठे प्रभु नेर हू ते नेरा ॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस जीव-स्त्री का मन मालिक-प्रभू के साथ पतीज जाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।