Lulla Family

अंग 782

अंग
782
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सो प्रभु अपुना सदा धिआईऐ सोवत बैसत खलिआ ॥
गुण निधान सुख सागर सुआमी जलि थलि महीअलि सोई ॥
जन नानक प्रभ की सरणाई तिसु बिनु अवरु न कोई ॥3॥
मेरा घरु बनिआ बनु तालु बनिआ प्रभ परसे हरि राइआ राम ॥
मेरा मनु सोहिआ मीत साजन सरसे गुण मंगल हरि गाइआ राम ॥
गुण गाइ प्रभू धिआइ साचा सगल इछा पाईआ ॥
गुर चरण लागे सदा जागे मनि वजीआ वाधाईआ ॥
करी नदरि सुआमी सुखह गामी हलतु पलतु सवारिआ ॥
बिनवंति नानक नित नामु जपीऐ जीउ पिंडु जिनि धारिआ ॥4॥4॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! सोते हुए बैठे हुए और खड़े हुए (हर वक्त) उस परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए। हे दास नानक ! (जो मनुष्य ध्यान धरता है।उस को) वह गुणों के खजाने प्रभू सुखों का समुंद्र प्रभू।पानी में।धरती में।आकाश में (हर जगह व्यापक) दिखता है। वह मनुष्य प्रभू की शरण में पड़ा रहता है।उस (प्रभू) के बिना उसको कोई अन्य आसरा नहीं दिखता। 3। हे भाई ! (जब से) प्रभू-पातशाह के चरन परसे हैं।मेरा शरीर मेरा हृदय (सब कुछ) सुंदर (सुंदर आत्मिक रंगत वाला) बन गया है (जब से) मैंने परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाने शुरू किए हैं। मेरा मन सुंदर (सोहणे संस्कारों वाला) हो गया है।मेरे सारे मित्र (सारी ज्ञानेन्द्रियां) आत्मिक जीवन वाली बन गई हैं। हे भाई ! प्रभू के गुण गा के सदा-स्थिर हरी का नाम सिमर के सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। जो मनुष्य गुरू की चरणी लगते हैं।वे (माया के हमलों की ओर से) सदा सचेत रहते हैं।उनके अंदर उत्साह-भरा आत्मिक जीवन बना रहता है। हे भाई ! सुखों के दाते मालिक-प्रभू ने (जिस मनुष्य पर) मेहर की निगाह की।(उसका उसने) ये लोक और परलोक दोनों सुंदर बना दिए। नानक विनती करता है, हे भाई ! जिस (परमात्मा) ने यह जिंद और यह शरीर टिका के रखे हैं।उसका नाम सदा जपना चाहिए। 4। 4। 7।
सूही महला 5 ॥
भै सागरो भै सागरु तरिआ हरि हरि नामु धिआए राम ॥
बोहिथड़ा हरि चरण अराधे मिलि सतिगुर पारि लघाए राम ॥
गुर सबदी तरीऐ बहुड़ि न मरीऐ चूकै आवण जाणा ॥
जो किछु करै सोई भल मानउ ता मनु सहजि समाणा ॥
दूख न भूख न रोगु न बिआपै सुख सागर सरणी पाए ॥
हरि सिमरि सिमरि नानक रंगि राता मन की चिंत मिटाए ॥1॥
संत जना हरि मंत्रु द्रिड़ाइआ हरि साजन वसगति कीने राम ॥
आपनड़ा मनु आगै धरिआ सरबसु ठाकुरि दीने राम ॥
करि अपुनी दासी मिटी उदासी हरि मंदरि थिति पाई ॥
अनद बिनोद सिमरहु प्रभु साचा विछुड़ि कबहू न जाई ॥
सा वडभागणि सदा सोहागणि राम नाम गुण चीन॑े ॥
कहु नानक रवहि रंगि राते प्रेम महा रसि भीने ॥2॥
अनद बिनोद भए नित सखीए मंगल सदा हमारै राम ॥
आपनड़ै प्रभि आपि सीगारी सोभावंती नारे राम ॥
सहज सुभाइ भए किरपाला गुण अवगण न बीचारिआ ॥
कंठि लगाइ लीए जन अपुने राम नाम उरि धारिआ ॥
मान मोह मद सगल बिआपी करि किरपा आपि निवारे ॥
कहु नानक भै सागरु तरिआ पूरन काज हमारे ॥3॥
गुण गोपाल गावहु नित सखीहो सगल मनोरथ पाए राम ॥
सफल जनमु होआ मिलि साधू एकंकारु धिआए राम ॥
जपि एक प्रभू अनेक रविआ सरब मंडलि छाइआ ॥
ब्रहमो पसारा ब्रहमु पसरिआ सभु ब्रहमु द्रिसटी आइआ ॥
जलि थलि महीअलि पूरि पूरन तिसु बिना नही जाए ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के अनेकों डरों से भरपूर संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है। परमात्मा के चरण सुंदर जहाज हैं।(जो मनुष्य) गुरू को मिल के हरी-चरणों की आराधना करता है।(गुरू उसको संसार-समुंद्र से) पार लंघा देता है। हे भाई ! गुरू के शबद के प्रताप से (संसार-समुंद्र से) पार लांघा जाया जाता है।बार-बार आत्मिक मौत का शिकार नहीं होना पड़ता।जनम-मरन के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। हे भाई ! जो कुछ परमात्मा करता है (गुरू के शबद की बरकति से) मैं उसको भला मानता हूँ।(जब ये रास्ता पकड़ा जाए) तब मन आत्मिक अडोलता में टिक जाता है। हे भाई ! सुखों के समुंद्र प्रभू की शरण पड़ने से कोई दुख।कोई रोग कोई भी अपना जोर नहीं डाल सकता। हे नानक ! परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के जो मनुष्य (प्रभू के) प्रेम रंग में रंगा जाता है।वह अपने मन की हरेक चिंता मिटा लेता है। 1। हे भाई ! संत जनो ने (जिस जीव-स्त्री के) हृदय में परमात्मा का नाम-मंत्र पक्का कर दिया।प्रभू जी उस जीव-स्त्री के प्रेम-वश हो गए। (उस जीव-स्त्री ने) अपना प्यारा मन (प्रभू-ठाकुर के) आगे भेट कर दिया।(आगे से) ठाकुर-प्रभू ने सब कुछ (उस जीव-स्त्री को) दे दिया। ठाकुर-प्रभू ने उस जीव-स्त्री को अपनी दासी बना लिया।(उसके अंदर से माया आदि के लिए) भटकना समाप्त हो गई।उसने परमात्मा के बनाए इस शरीर-मंदिर में ही ठहराव हासिल कर लिया। हे भाई ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम सिमरते रहो (आपके अंदर) आत्मिक आनंद बने रहेंगे।(जो जीव-स्त्री हरी-नाम सिमरती है।वह प्रभू चरणों से) विछुड़ के कभी भी (किसी और तरफ़) भटकती नहीं। जिसने परमात्मा के नाम से।परमात्मा के गुणों से गहरी सांझ बना ली।वह जीव-स्त्री बड़े भाग्यों वाली बन जाती है।वह सदा प्रभू-पति वाली बनी रहती है। हे नानक ! कह, जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगीज के हरी-नाम सिमरते हैं।वे मनुष्य प्रेम के बड़े स्वाद में भीगे रहते हैं। 2। हे सहेली ! अब मेरे हृदय-गृह में सदा ही आनंद खुशिया व चाव बने रहते हैं। (क्योंकि) मेरे अपने प्यारे प्रभू ने स्वयं मेरी जिंदगी सुंदर बना दी है।मुझे शोभा वाली जीव-स्त्री बना दी है। हे सहेली ! प्रभू जी अपने सेवकों को (अपने) गले से लगा लेते हैं।(उनके) हृदय में अपना नाम बसा देते हैं।प्रभू जी अपने सेवकों के गुणों-अवगुणों की ओर ध्यान नहीं देते। अपने आत्मिक अडोलता वाले प्यार के कारण ही (सहज-सह जाएते इति सहजं) अपने सेवकों पर दयावान हो जाते हैं। हे नानक ! कह, हे सहेली ! अहंकार।माया का मोह।माया का नशा जो सारी सृष्टि पर भारी हो रहे हैं (प्रभू जी ने मेरे पर) मेहर करके (मेरे अंदर से) स्वयं ही दूर कर दिए हैं। (उसकी मेहर से इस) भयानक संसार-समुंद्र से मैं पार लांघ रहा हूँ।मेरे सारे काम (भी) सिरे चढ़ रहे हैं। 3। हे सहेलियो ! सृष्टि के पालनहार प्रभू के गुण सदा गाया करो।वह सारी मुरादें पूरी कर देता है। गुरू को मिल के सर्व-व्यापक प्रभू का नाम सिमरने से जीवन कामयाब हो जाता है। हे सहेलियो ! वह एक परमात्मा अनेकों में व्यापक है।सारे जगत में व्यापक है। ये सारा जगत-पसारा प्रभू स्वयं ही है।(सारे जगत में) परमात्मा (अपने आप का) प्रकाश कर रहा है।(उसका नाम) जप के हर जगह वह प्रभू ही दिखाई देने लग पड़ता है। हे सहेलियो ! उस परमात्मा के बिना कोई भी जगह नहीं है (कोई भी जगह उस परमात्मा से खाली नहीं है)।पानी में।धरती में।आकाश में हर जगह वह मौजूद है।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! सोते हुए बैठे हुए और खड़े हुए (हर वक्त) उस परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।