गुण निधान सुख सागर सुआमी जलि थलि महीअलि सोई ॥
जन नानक प्रभ की सरणाई तिसु बिनु अवरु न कोई ॥3॥
मेरा घरु बनिआ बनु तालु बनिआ प्रभ परसे हरि राइआ राम ॥
मेरा मनु सोहिआ मीत साजन सरसे गुण मंगल हरि गाइआ राम ॥
गुण गाइ प्रभू धिआइ साचा सगल इछा पाईआ ॥
गुर चरण लागे सदा जागे मनि वजीआ वाधाईआ ॥
करी नदरि सुआमी सुखह गामी हलतु पलतु सवारिआ ॥
बिनवंति नानक नित नामु जपीऐ जीउ पिंडु जिनि धारिआ ॥4॥4॥7॥
भै सागरो भै सागरु तरिआ हरि हरि नामु धिआए राम ॥
बोहिथड़ा हरि चरण अराधे मिलि सतिगुर पारि लघाए राम ॥
गुर सबदी तरीऐ बहुड़ि न मरीऐ चूकै आवण जाणा ॥
जो किछु करै सोई भल मानउ ता मनु सहजि समाणा ॥
दूख न भूख न रोगु न बिआपै सुख सागर सरणी पाए ॥
हरि सिमरि सिमरि नानक रंगि राता मन की चिंत मिटाए ॥1॥
संत जना हरि मंत्रु द्रिड़ाइआ हरि साजन वसगति कीने राम ॥
आपनड़ा मनु आगै धरिआ सरबसु ठाकुरि दीने राम ॥
करि अपुनी दासी मिटी उदासी हरि मंदरि थिति पाई ॥
अनद बिनोद सिमरहु प्रभु साचा विछुड़ि कबहू न जाई ॥
सा वडभागणि सदा सोहागणि राम नाम गुण चीन॑े ॥
कहु नानक रवहि रंगि राते प्रेम महा रसि भीने ॥2॥
अनद बिनोद भए नित सखीए मंगल सदा हमारै राम ॥
आपनड़ै प्रभि आपि सीगारी सोभावंती नारे राम ॥
सहज सुभाइ भए किरपाला गुण अवगण न बीचारिआ ॥
कंठि लगाइ लीए जन अपुने राम नाम उरि धारिआ ॥
मान मोह मद सगल बिआपी करि किरपा आपि निवारे ॥
कहु नानक भै सागरु तरिआ पूरन काज हमारे ॥3॥
गुण गोपाल गावहु नित सखीहो सगल मनोरथ पाए राम ॥
सफल जनमु होआ मिलि साधू एकंकारु धिआए राम ॥
जपि एक प्रभू अनेक रविआ सरब मंडलि छाइआ ॥
ब्रहमो पसारा ब्रहमु पसरिआ सभु ब्रहमु द्रिसटी आइआ ॥
जलि थलि महीअलि पूरि पूरन तिसु बिना नही जाए ॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! सोते हुए बैठे हुए और खड़े हुए (हर वक्त) उस परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।