बिनवंति नानक दइआ धारहु सदा हरि गुण गावा ॥2॥
गुर मिलि सागरु तरिआ ॥
हरि चरण जपत निसतरिआ ॥
हरि चरण धिआए सभि फल पाए मिटे आवण जाणा ॥
भाइ भगति सुभाइ हरि जपि आपणे प्रभ भावा ॥
जपि एकु अलख अपार पूरन तिसु बिना नही कोई ॥
बिनवंति नानक गुरि भरमु खोइआ जत देखा तत सोई ॥3॥
पतित पावन हरि नामा ॥
पूरन संत जना के कामा ॥
गुरु संतु पाइआ प्रभु धिआइआ सगल इछा पुंनीआ ॥
हउ ताप बिनसे सदा सरसे प्रभ मिले चिरी विछुंनिआ ॥
मनि साति आई वजी वधाई मनहु कदे न वीसरै ॥
बिनवंति नानक सतिगुरि द्रिड़ाइआ सदा भजु जगदीसरै ॥4॥1॥3॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तू ठाकुरो बैरागरो मै जेही घण चेरी राम ॥
तूं सागरो रतनागरो हउ सार न जाणा तेरी राम ॥
सार न जाणा तू वड दाणा करि मिहरंमति सांई ॥
किरपा कीजै सा मति दीजै आठ पहर तुधु धिआई ॥
गरबु न कीजै रेण होवीजै ता गति जीअरे तेरी ॥
सभ ऊपरि नानक का ठाकुरु मै जेही घण चेरी राम ॥1॥
तुम॑ गउहर अति गहिर गंभीरा तुम पिर हम बहुरीआ राम ॥
तुम वडे वडे वड ऊचे हउ इतनीक लहुरीआ राम ॥
हउ किछु नाही एको तूहै आपे आपि सुजाना ॥
अंम्रित द्रिसटि निमख प्रभ जीवा सरब रंग रस माना ॥
चरणह सरनी दासह दासी मनि मउलै तनु हरीआ ॥
नानक ठाकुरु सरब समाणा आपन भावन करीआ ॥2॥
तुझु ऊपरि मेरा है माणा तूहै मेरा ताणा राम ॥
सुरति मति चतुराई तेरी तू जाणाइहि जाणा राम ॥
सोई जाणै सोई पछाणै जा कउ नदरि सिरंदे ॥
मनमुखि भूली बहुती राही फाथी माइआ फंदे ॥
ठाकुर भाणी सा गुणवंती तिन ही सभ रंग माणा ॥
नानक की धर तूहै ठाकुर तू नानक का माणा ॥3॥
हउ वारी वंञा घोली वंञा तू परबतु मेरा ओल॑ा राम ॥
हउ बलि जाई लख लख लख बरीआ जिनि भ्रमु परदा खोल॑ा राम ॥
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू की चरण-धूल हो के जो मनुष्य परमात्मा की आराधना करते रहते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।