पूरा पुरखु पाइआ वडभागी सचि नामि लिव लावै ॥ मति परगासु भई मनु मानिआ राम नामि वडिआई ॥ नानक प्रभु पाइआ सबदि मिलाइआ जोती जोति मिलाई ॥4॥1॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: उसको बड़े-भाग्यों से सारे गुणों से भरपूर प्रभू मिल जाता है।सदा स्थिर हरी नाम में वह सुरति जोड़े रखता है। उसकी मति में आत्मिक जीवन की सूझ का प्रकाश हो जाता है।उसका मन नाम में पतीज जाता है।उसको नाम की बरकति से (लोक-परलोक में) इज्जत मिल जाती है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है उसे प्रभू मिल जाता है।उसकी जीवात्मा प्रभू की ज्योति में एक-मेक हुई रहती है। 4। 1। 4।
सूही महला 4 घरु 5 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ गुरु संत जनो पिआरा मै मिलिआ मेरी त्रिसना बुझि गईआसे ॥ हउ मनु तनु देवा सतिगुरै मै मेले प्रभ गुणतासे ॥ धनु धंनु गुरू वड पुरखु है मै दसे हरि साबासे ॥ वडभागी हरि पाइआ जन नानक नामि विगासे ॥1॥ गुरु सजणु पिआरा मै मिलिआ हरि मारगु पंथु दसाहा ॥ घरि आवहु चिरी विछुंनिआ मिलु सबदि गुरू प्रभ नाहा ॥ हउ तुझु बाझहु खरी उडीणीआ जिउ जल बिनु मीनु मराहा ॥ वडभागी हरि धिआइआ जन नानक नामि समाहा ॥2॥ मनु दह दिसि चलि चलि भरमिआ मनमुखु भरमि भुलाइआ ॥ नित आसा मनि चितवै मन त्रिसना भुख लगाइआ ॥ अनता धनु धरि दबिआ फिरि बिखु भालण गइआ ॥ जन नानक नामु सलाहि तू बिनु नावै पचि पचि मुइआ ॥3॥ गुरु सुंदरु मोहनु पाइ करे हरि प्रेम बाणी मनु मारिआ ॥ मेरै हिरदै सुधि बुधि विसरि गई मन आसा चिंत विसारिआ ॥ मै अंतरि वेदन प्रेम की गुर देखत मनु साधारिआ ॥ वडभागी प्रभ आइ मिलु जनु नानकु खिनु खिनु वारिआ ॥4॥1॥5॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 घरु 5 सतिगुर प्रसादि ॥ हे संत जनो ! मुझे प्यारा गुरू मिल गया है (उसकी मेहर से) मेरी (माया की) तृष्णा मिट गई है। (गुरू) मुझे गुणों के खजाने परमात्मा के साथ मिला रहा है।मैं अपना मन।अपना तन गुरू के आगे भेट धरता हूँ। हे भाई ! गुरू सराहनीय है।गुरू महापुरुष है।गुरू को शाबाश।गुरू मुझे परमात्मा के बारे में बता रहा है। हे दास नानक ! जिन्हें परमात्मा बड़े भाग्यों से मिल जाता है।(वे मनुष्य परमात्मा के) नाम में जुड़ के आत्मिक आनंद से भरपूर हो जाते हैं। 1। हे संत जनो ! (जबका) प्यारा गुरू सज्जन मुझे मिला है।मैं (उससे) परमात्मा (के मिलाप) का रास्ता पूछती रहती हूँ। (और प्रभू-पति को भी कहती रहती हूँ-) हे प्रभू-पति ! गुरू के शबद के द्वारा मुझ चिरों से विछुड़ी हुई को आ के मिल।मेरे (हृदय-) घर में आ के बस। हे प्रभू ! जैसे पानी के बिना मछली (तड़प) के मरती है।(वैसे ही) आपके बिना मैं बहुत उदास रहती हूँ। हे दास नानक ! जिन मनुष्यों ने बहुत भाग्यों से परमात्मा का सिमरन किया।वे परमात्मा के नाम में (ही) लीन हो गए। 2। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया की) भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है।(उसका) मन दसों-दिशाओं में दौड़-दौड़ के भटकता रहता है। (अपने मन का मुरीद मनुष्य अपने) मन में सदा (माया की) आशाएं चितारता रहता है।(उसके) मन को (माया की) तृष्णा (माया की) भूख चिपकी रहती है। बेअंत धन धरती में दबा के रखता है।फिर भी आत्मिक मौत लाने वाली और माया-जहर की तलाश करता फिरता है। हे दास नानक ! (कह, हे भाई !) आप परमात्मा का नाम जपता रहा कर।नाम से टूट के मनुष्य (तृष्णा की आग में) जल-जल के आत्मिक मौत सहेड़े रखता है। 3। हे भाई ! प्यारे सुंदर गुरू को मिल के मेरा मन प्रेम के तीरों से भेदा जा चुका है। आशा-चिंता वाली समझ मेरे हृदय में से भूल गई है।मैं अपने मन की आशा और चिंता विसार चुका हॅूँ। (अब) मेरे अंदर प्रेम की चुभन बनी रहती है।गुरू के दर्शन करके मेरा मन धैर्यवान हो गया है। हे दास नानक ! (अब यूँ अरदास किया कर-) हे प्रभू ! मेरे अच्छे भाग्यों को मुझे आ के मिल- मैं आपसे हर वक्त कुर्बान जाता हूँ। 4। 1। 5।
सूही छंत महला 4 ॥ मारेहिसु वे जन हउमै बिखिआ जिनि हरि प्रभ मिलण न दितीआ ॥ देह कंचन वे वंनीआ इनि हउमै मारि विगुतीआ ॥ मोहु माइआ वे सभ कालखा इनि मनमुखि मूड़ि सजुतीआ ॥ जन नानक गुरमुखि उबरे गुर सबदी हउमै छुटीआ ॥1॥ वसि आणिहु वे जन इसु मन कउ मनु बासे जिउ नित भउदिआ ॥ दुखि रैणि वे विहाणीआ नित आसा आस करेदिआ ॥ गुरु पाइआ वे संत जनो मनि आस पूरी हरि चउदिआ ॥ जन नानक प्रभ देहु मती छडि आसा नित सुखि सउदिआ ॥2॥ सा धन आसा चिति करे राम राजिआ हरि प्रभ सेजड़ीऐ आई ॥ मेरा ठाकुरु अगम दइआलु है राम राजिआ करि किरपा लेहु मिलाई ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: सूही छंत महला 4 ॥ हे भाई ! जिस अहंकार ने जिस माया ने (जीव को कभी) परमात्मा से मिलने नहीं दिया।इस अहंकार को इस माया को (अपने अंदर से) मार भगाओ। हे भाई ! (देखो !) ये शरीर सोने के रंग जैसा सुंदर होता है।(पर जहाँ अहंकार आ घुसा) इस अहंकार ने (उस शरीर को) मार के दुखी कर दिया। हे भाई ! माया का मोह निरी कालिख है। पर अपने मन के मुरीद इस मूर्ख मनुष्य ने (अपने आप को इस कालिख़ से ही) जोड़ रखा है। हे दास नानक ! (कह, हे भाई !) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (इस अहंकार से) बच जाते हैं।गुरू के शबद की बरकति से उन्हें अहंकार से निजात मिल जाती है। 1। हे भाई ! (अपने) इस मन को (सदा अपने) वश में रखो।(मनुष्य का ये) मन सदा (शिकारी पक्षी) बाशे की तरह भटकता है। सदा आशाएं ही आशाएं बनाते हुए (मनुष्य की सारी जिंदगी की) रात दुख में ही बीतती है। हे संत जनो ! जिस मनुष्य को गुरू मिल गया (वह परमात्मा का नाम जपने लग जाता है।और) नाम जपते हुए (उसके) मन में (उठी हरी-नाम सिमरन की) आशा पूरी हो जाती है। हे दास नानक ! (प्रभू के दर पर अरदास किया कर और कह) हे प्रभू ! (मुझे भी अपना नाम जपने की) सूझ बख्शो (जो मनुष्य नाम जपता है।वह दुनियावी) आशाएं छोड़ के आत्मिक आनंद में लीन रहता है। 2। हे भाई ! (गुरू की शरण पड़ी रहने वाली) जीव-स्त्री (अपने) चित्त में (नित्य प्रभू-पति के मिलाप की) आस करती रहती है (और कहती है) हे प्रभू पातशाह ! हे हरी ! हे प्रभू ! (मेरे हृदय की) सुदर सेज पर आ (के बस)। हे प्रभू पातशाह ! आप मेरा मालिक है।आप दया का श्रोत है।(पर आप मेरे लिए) अपहुँच है (आप स्वयं ही) मेहर कर के (मुझे अपने चरणों में) मिला ले।
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसको बड़े-भाग्यों से सारे गुणों से भरपूर प्रभू मिल जाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।