मेरै मनि तनि लोचा गुरमुखे राम राजिआ हरि सरधा सेज विछाई ॥ जन नानक हरि प्रभ भाणीआ राम राजिआ मिलिआ सहजि सुभाई ॥3॥ इकतु सेजै हरि प्रभो राम राजिआ गुरु दसे हरि मेलेई ॥ मै मनि तनि प्रेम बैरागु है राम राजिआ गुरु मेले किरपा करेई ॥ हउ गुर विटहु घोलि घुमाइआ राम राजिआ जीउ सतिगुर आगै देई ॥ गुरु तुठा जीउ राम राजिआ जन नानक हरि मेलेई ॥4॥2॥6॥5॥7॥6॥18॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू पातशाह ! गुरू की शरण पड़ कर मेरे मन में।मेरे तन में (आपके मिलाप की) तमन्ना पैदा हैं चुकी है।हे हरी ! मैंने श्रद्धा की सेज बिछा रखी है। हे दास नानक ! (कह) हे प्रभू पातशाह ! हे हरी ! जो जीव-स्त्री आपको प्यारी लग जाती है।आप उस आत्मिक अडोलता में टिकी को प्रेम में ठहरी हुई को मिल जाता है। 3। हे भाई ! (जीव-स्त्री की) एक ही (हृदय-) सेज पर हरी प्रभू (बसता है)।(जिस जीव स्त्री को) गुरू बताता है।उसको हरी से मिलवा देता है। मेरे मन में मेरे हृदय में (प्रभू के मिलाप के लिए) आकर्षण है तमन्ना है (पर जिस जीव स्त्री पर) गुरू मेहर करता है।उसको (प्रभू से) मिलाता है। हे भाई ! मैं गुरू से सदके कुर्बान जाता हूँ।मैं (अपनी) जिंद को गुरू के आगे अर्पित करता हूँ। हे दास नानक ! (कह) जिस पर गुरू दयालु होता है।उसको हरी-प्रभू से मिला देता है। 4। 2। 6। 18।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रागु सूही छंत महला 5 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ (माया के मोह में) पागल हो रहे हे मनुष्य ! (जो कुछ मैं कह रहा हूँ।इसको ध्यान से) सुन।आप (माया को) देख के क्यों (जीवन राह से) भटक रहा है। हे बावरे ! सुन।(ये माया) कुसंभ के रंग (जैसी है।तूने इससे) प्यार डाला हुआ है जो सदा निभने वाला नहीं। आप (उस) नाशवंत (माया) को देख के जीवन-राह से भटक रहा है।(जो आखिर) आधी कौड़ी के बदले में भी नहीं खरीदी जा सकती।हे भाई ! परमात्मा का नाम ही मजीठ के पक्के रंग की तरह सदा साथ (निभाने वाला) है। अगर आप गुरू के मीठे शबद से गहरी सांझ डाल के (परमात्मा का नाम जपता रहे।तो) आप सुंदर गहरे रंग वाले लाल फूल बन जाएगा। पर आप तो नाशवंत (माया) के मोह में मस्त हैं रहा है।आप उन पदार्थों के साथ चिपक रहा है जिनसे आपका साथ नहीं निभना। हे नानक ! (कह) हे दया के खजाने प्रभू ! (मैं) गरीब (आपकी) शरण (आया हूँ मेरी) लाज रख।(जैसे) आप अपने भक्तों की (लाज रखता आया है)। 1। हे बावरे ! सुन; जिंद के मालिक प्रभू की सेवा-भक्ति किया कर। हे झल्ले ! सुन ! (यहाँ सदा किसी ने नहीं बैठे रहना) जो (जीव जगत में) आया है उसको (यहाँ से) जाना भी पड़ेगा। हे पराए देश में आए जीव ! सुन।(जिस जगत को आप) अटल (समझ रहा है।यह) सारी सृष्टि नाश हैं जाएगी।हे परदेसी ! साध-संगति में टिक के प्रभू-चरणों में जुड़े रहना चाहिए। हे भाई ! सुन।(माया के मोह से) उपराम (हो के ही) अच्छी किस्मत से प्रभू को मिला जा सकता है।(इस वास्ते) प्रभू के चरणों को अच्छी तरह पकड़ के रखना चाहिए। हे भाई ! ये मन गुरू के हवाले कर।(इसमें रक्ती भर भी) झिझकना नहीं चाहिए।गुरू की शरण पड़ कर (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर। हे नानक ! (प्रभू दर पर अरदास कर और कह) हे (शरण पड़े) गरीबों को और भक्तों को संसार-समुंद्र से पार लंघाने वाले ! (आप बेअंत गुणों का मालिक है) मैं आपके कौन-कौन से गुण कह के बता सकता हूँ। 2। हे बावरे ! (नाशवंत पदार्थों का) झूठा अहंकार नहीं करना चाहिए। हे बावरे ! सुन।(पदार्थों से संबंध टूटने पर ये) सारा गर्व और गुमान भी खत्म हो जाएगा। हे भाई1 जिस जगत को (आप) सदा स्थिर समझता है।यह सारी सृष्टि चलायमान है।इसका मान करना झूठा कर्म है।(यहाँ) गुरू का प्रभू का दास बने रहना चाहिए। अगर सदा स्वै भाव दूर किए रखें।तो संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है।(पर ये तब ही हो सकता है।) अगर (परमात्मा की) मेहर से (माथे पर लेख) लिखे हों। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े रहना चाहिए (गुरू से ही) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीया जा सकता है।(पर।हे प्रभू ! वही मनुष्य आपका नाम-अमृत पीता है) जिसकी सुरति आप आत्मिक अडोलता में टिकाता है। हे हरी ! (आपका दास) नानक आपके दर पर आपकी शरण आ पड़ा है।मैं (आपसे) सदा-सदा कुर्बान जाता हूँ। 3। हे (माया के मोह में) झल्ले (हो रहे) मनुष्य (जो कुछ मैं कर रहा हूँ।ध्यान से) सुन।ये ना समझ कि (माया के गुमान में रहके भी) मैंने (भाव।तूने) परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया है। हे बावरे ! सुन।जिन लोगों ने परमात्मा का सिमरन किया है।(उनके) चरणों की धूल बना रह (तब ही प्रभू-मिलाप होता है)। हे भाई ! जिस (मनुष्य) ने परमात्मा का सिमरन किया है।उसने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया है।बड़े भाग्यों से ही (परमात्मा के) दर्शन होते हैं। गरीब स्वभाव वाला बना रहा कर।(जिन्होंने प्रभू का सिमरन किया है।उन पर से) सदा सदके हुआ कर।हे भाई ! सवै भाव (अहंकार भाव) अच्छी तरह से दूर कर देना चाहिए। हे भाई ! जिस (मनुष्य) ने परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया।वह साराहनीय हो गया।उसके भाग्य उक्तम हो गए।मैंने तो अपना-आप ऐसे मनुष्य के आगे भेट कर दिया है। हे नानक ! (कह) हे गरीबों की सहायता करने वाले ! हे सुखों के समुंद्र ! (मैं आपकी शरण आया हूँ) अपने सेवक की लाज रख। 4। 1।
सूही महला 5 ॥ हरि चरण कमल की टेक सतिगुरि दिती तुसि कै बलि राम जीउ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! मैं सुंदर प्रभू से सदके जाता हूँ (उसकी मेहर से) गुरू ने मेहरवान हो के मुझे उसके सुंदर चरणों का आसरा दिया है।मैं उस प्रभू से कुर्बान हूँ।
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू पातशाह ! गुरू की शरण पड़ कर मेरे मन में।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।