अंग
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सूही
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मेरै मनि तनि लोचा गुरमुखे राम राजिआ हरि सरधा सेज विछाई ॥
मेरै मनि तनि लोचा गुरमुखे राम राजिआ हरि सरधा सेज विछाई ॥
जन नानक हरि प्रभ भाणीआ राम राजिआ मिलिआ सहजि सुभाई ॥3॥
इकतु सेजै हरि प्रभो राम राजिआ गुरु दसे हरि मेलेई ॥
मै मनि तनि प्रेम बैरागु है राम राजिआ गुरु मेले किरपा करेई ॥
हउ गुर विटहु घोलि घुमाइआ राम राजिआ जीउ सतिगुर आगै देई ॥
गुरु तुठा जीउ राम राजिआ जन नानक हरि मेलेई ॥4॥2॥6॥5॥7॥6॥18॥
जन नानक हरि प्रभ भाणीआ राम राजिआ मिलिआ सहजि सुभाई ॥3॥
इकतु सेजै हरि प्रभो राम राजिआ गुरु दसे हरि मेलेई ॥
मै मनि तनि प्रेम बैरागु है राम राजिआ गुरु मेले किरपा करेई ॥
हउ गुर विटहु घोलि घुमाइआ राम राजिआ जीउ सतिगुर आगै देई ॥
गुरु तुठा जीउ राम राजिआ जन नानक हरि मेलेई ॥4॥2॥6॥5॥7॥6॥18॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू पातशाह ! गुरू की शरण पड़ कर मेरे मन में।मेरे तन में (आपके मिलाप की) तमन्ना पैदा हो चुकी है।हे हरी ! मैंने श्रद्धा की सेज बिछा रखी है। हे दास नानक ! (कह) हे प्रभू पातशाह ! हे हरी ! जो जीव-स्त्री आपको प्यारी लग जाती है।आप उस आत्मिक अडोलता में टिकी को प्रेम में ठहरी हुई को मिल जाते हैं। 3। हे भाई ! (जीव-स्त्री की) एक ही (हृदय-) सेज पर हरी प्रभू (बसता है)।(जिस जीव स्त्री को) गुरू बताता है।उसको हरी से मिलवा देता है। मेरे मन में मेरे हृदय में (प्रभू के मिलाप के लिए) आकर्षण है तमन्ना है (पर जिस जीव स्त्री पर) गुरू मेहर करता है।उसको (प्रभू से) मिलाता है। हे भाई ! मैं गुरू से सदके कुर्बान जाता हूँ।मैं (अपनी) जिंद को गुरू के आगे अर्पित करता हूँ। हे दास नानक ! (कह) जिस पर गुरू दयालु होता है।उसको हरी-प्रभू से मिला देता है। 4। 2। 6। 18।
सुणि बावरे तू काए देखि भुलाना ॥
रागु सूही छंत महला 5 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुणि बावरे तू काए देखि भुलाना ॥
सुणि बावरे नेहु कूड़ा लाइओ कुसंभ रंगाना ॥
कूड़ी डेखि भुलो अढु लहै न मुलो गोविद नामु मजीठा ॥
थीवहि लाला अति गुलाला सबदु चीनि गुर मीठा ॥
मिथिआ मोहि मगनु थी रहिआ झूठ संगि लपटाना ॥
नानक दीन सरणि किरपा निधि राखु लाज भगताना ॥1॥
सुणि बावरे सेवि ठाकुरु नाथु पराणा ॥
सुणि बावरे जो आइआ तिसु जाणा ॥
निहचलु हभ वैसी सुणि परदेसी संतसंगि मिलि रहीऐ ॥
हरि पाईऐ भागी सुणि बैरागी चरण प्रभू गहि रहीऐ ॥
एहु मनु दीजै संक न कीजै गुरमुखि तजि बहु माणा ॥
नानक दीन भगत भव तारण तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥2॥
सुणि बावरे किआ कीचै कूड़ा मानो ॥
सुणि बावरे हभु वैसी गरबु गुमानो ॥
निहचलु हभ जाणा मिथिआ माणा संत प्रभू होइ दासा ॥
जीवत मरीऐ भउजलु तरीऐ जे थीवै करमि लिखिआसा ॥
गुरु सेवीजै अंम्रितु पीजै जिसु लावहि सहजि धिआनो ॥
नानकु सरणि पइआ हरि दुआरै हउ बलि बलि सद कुरबानो ॥3॥
सुणि बावरे मतु जाणहि प्रभु मै पाइआ ॥
सुणि बावरे थीउ रेणु जिनी प्रभु धिआइआ ॥
जिनि प्रभु धिआइआ तिनि सुखु पाइआ वडभागी दरसनु पाईऐ ॥
थीउ निमाणा सद कुरबाणा सगला आपु मिटाईऐ ॥
ओहु धनु भाग सुधा जिनि प्रभु लधा हम तिसु पहि आपु वेचाइआ ॥
नानक दीन सरणि सुख सागर राखु लाज अपनाइआ ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुणि बावरे तू काए देखि भुलाना ॥
सुणि बावरे नेहु कूड़ा लाइओ कुसंभ रंगाना ॥
कूड़ी डेखि भुलो अढु लहै न मुलो गोविद नामु मजीठा ॥
थीवहि लाला अति गुलाला सबदु चीनि गुर मीठा ॥
मिथिआ मोहि मगनु थी रहिआ झूठ संगि लपटाना ॥
नानक दीन सरणि किरपा निधि राखु लाज भगताना ॥1॥
सुणि बावरे सेवि ठाकुरु नाथु पराणा ॥
सुणि बावरे जो आइआ तिसु जाणा ॥
निहचलु हभ वैसी सुणि परदेसी संतसंगि मिलि रहीऐ ॥
हरि पाईऐ भागी सुणि बैरागी चरण प्रभू गहि रहीऐ ॥
एहु मनु दीजै संक न कीजै गुरमुखि तजि बहु माणा ॥
नानक दीन भगत भव तारण तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥2॥
सुणि बावरे किआ कीचै कूड़ा मानो ॥
सुणि बावरे हभु वैसी गरबु गुमानो ॥
निहचलु हभ जाणा मिथिआ माणा संत प्रभू होइ दासा ॥
जीवत मरीऐ भउजलु तरीऐ जे थीवै करमि लिखिआसा ॥
गुरु सेवीजै अंम्रितु पीजै जिसु लावहि सहजि धिआनो ॥
नानकु सरणि पइआ हरि दुआरै हउ बलि बलि सद कुरबानो ॥3॥
सुणि बावरे मतु जाणहि प्रभु मै पाइआ ॥
सुणि बावरे थीउ रेणु जिनी प्रभु धिआइआ ॥
जिनि प्रभु धिआइआ तिनि सुखु पाइआ वडभागी दरसनु पाईऐ ॥
थीउ निमाणा सद कुरबाणा सगला आपु मिटाईऐ ॥
ओहु धनु भाग सुधा जिनि प्रभु लधा हम तिसु पहि आपु वेचाइआ ॥
नानक दीन सरणि सुख सागर राखु लाज अपनाइआ ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: रागु सूही छंत महला 5 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ (माया के मोह में) पागल हो रहे हे मनुष्य ! (जो कुछ मैं कह रहा हूँ।इसको ध्यान से) सुन।आप (माया को) देख के क्यों (जीवन राह से) भटक रहे हैं। हे बावरे ! सुन।(ये माया) कुसंभ के रंग (जैसी है।आपने इससे) प्यार डाला हुआ है जो सदा निभने वाला नहीं। आप (उस) नाशवंत (माया) को देख के जीवन-राह से भटक रहे हैं।(जो आखिर) आधी कौड़ी के बदले में भी नहीं खरीदी जा सकती।हे भाई ! परमात्मा का नाम ही मजीठ के पक्के रंग की तरह सदा साथ (निभाने वाला) है। अगर आप गुरू के मीठे शबद से गहरी सांझ डाल के (परमात्मा का नाम जपते रहें।तो) आप सुंदर गहरे रंग वाले लाल फूल बन जाएँगे। पर आप तो नाशवंत (माया) के मोह में मस्त हो रहे हैं।आप उन पदार्थों के साथ चिपक रहे हैं जिनसे आपका साथ नहीं निभना। हे नानक ! (कह) हे दया के खजाने प्रभू ! (मैं) गरीब (आपकी) शरण (आया हूँ मेरी) लाज रख।(जैसे) आप अपने भक्तों की (लाज रखते आए हैं)। 1। हे बावरे ! सुन; जिंद के मालिक प्रभू की सेवा-भक्ति किया कर। हे झल्ले ! सुन ! (यहाँ सदा किसी ने नहीं बैठे रहना) जो (जीव जगत में) आया है उसको (यहाँ से) जाना भी पड़ेगा। हे पराए देश में आए जीव ! सुन।(जिस जगत को आप) अटल (समझ रहे हैं।यह) सारी सृष्टि नाश हो जाएगी।हे परदेसी ! साध-संगति में टिक के प्रभू-चरणों में जुड़े रहना चाहिए। हे भाई ! सुन।(माया के मोह से) उपराम (हो के ही) अच्छी किस्मत से प्रभू को मिला जा सकता है।(इस वास्ते) प्रभू के चरणों को अच्छी तरह पकड़ के रखना चाहिए। हे भाई ! ये मन गुरू के हवाले कर।(इसमें रक्ती भर भी) झिझकना नहीं चाहिए।गुरू की शरण पड़ कर (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर। हे नानक ! (प्रभू दर पर अरदास कर और कह) हे (शरण पड़े) गरीबों को और भक्तों को संसार-समुंद्र से पार लंघाने वाले ! (आप बेअंत गुणों के मालिक हैं) मैं आपके कौन-कौन से गुण कह के बता सकता हूँ। 2। हे बावरे ! (नाशवंत पदार्थों का) झूठा अहंकार नहीं करना चाहिए। हे बावरे ! सुन।(पदार्थों से संबंध टूटने पर ये) सारा गर्व और गुमान भी खत्म हो जाएगा। हे भाई1 जिस जगत को (आप) सदा स्थिर समझते हैं।यह सारी सृष्टि चलायमान है।इसका मान करना झूठा कर्म है।(यहाँ) गुरू का प्रभू का दास बने रहना चाहिए। अगर सदा स्वै भाव दूर किए रखें।तो संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है।(पर ये तब ही हो सकता है।) अगर (परमात्मा की) मेहर से (माथे पर लेख) लिखे हों। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े रहना चाहिए (गुरू से ही) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीया जा सकता है।(पर।हे प्रभू ! वही मनुष्य आपका नाम-अमृत पीता है) जिसकी सुरति आप आत्मिक अडोलता में टिकाते हैं। हे हरी ! (आपका दास) नानक आपके दर पर आपकी शरण आ पड़ा है।मैं (आपसे) सदा-सदा कुर्बान जाता हूँ। 3। हे (माया के मोह में) झल्ले (हो रहे) मनुष्य (जो कुछ मैं कर रहा हूँ।ध्यान से) सुन।ये ना समझ कि (माया के गुमान में रहके भी) मैंने (भाव।आपने) परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया है। हे बावरे ! सुन।जिन लोगों ने परमात्मा का सिमरन किया है।(उनके) चरणों की धूल बना रह (तब ही प्रभू-मिलाप होता है)। हे भाई ! जिस (मनुष्य) ने परमात्मा का सिमरन किया है।उसने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया है।बड़े भाग्यों से ही (परमात्मा के) दर्शन होते हैं। गरीब स्वभाव वाला बना रहा कर।(जिन्होंने प्रभू का सिमरन किया है।उन पर से) सदा सदके हुआ कर।हे भाई ! सवै भाव (अहंकार भाव) अच्छी तरह से दूर कर देना चाहिए। हे भाई ! जिस (मनुष्य) ने परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया।वह साराहनीय हो गया।उसके भाग्य उक्तम हो गए।मैंने तो अपना-आप ऐसे मनुष्य के आगे भेट कर दिया है। हे नानक ! (कह) हे गरीबों की सहायता करने वाले ! हे सुखों के समुंद्र ! (मैं आपकी शरण आया हूँ) अपने सेवक की लाज रख। 4। 1।
हरि चरण कमल की टेक सतिगुरि दिती तुसि कै बलि राम जीउ ॥
सूही महला 5 ॥
हरि चरण कमल की टेक सतिगुरि दिती तुसि कै बलि राम जीउ ॥
हरि चरण कमल की टेक सतिगुरि दिती तुसि कै बलि राम जीउ ॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! मैं सुंदर प्रभू से सदके जाता हूँ (उसकी मेहर से) गुरू ने मेहरवान हो के मुझे उसके सुंदर चरणों का आसरा दिया है।मैं उस प्रभू से कुर्बान हूँ।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी; महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७७७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।