Lulla Family

अंग 775

अंग
775
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि मंगल रसि रसन रसाए नानक नामु प्रगासा ॥2॥
अंतरि रतनु बीचारे ॥ गुरमुखि नामु पिआरे ॥
हरि नामु पिआरे सबदि निसतारे अगिआनु अधेरु गवाइआ ॥
गिआनु प्रचंडु बलिआ घटि चानणु घर मंदर सोहाइआ ॥
तनु मनु अरपि सीगार बणाए हरि प्रभ साचे भाइआ ॥
जो प्रभु कहै सोई परु कीजै नानक अंकि समाइआ ॥3॥
हरि प्रभि काजु रचाइआ ॥
गुरमुखि वीआहणि आइआ ॥
वीआहणि आइआ गुरमुखि हरि पाइआ सा धन कंत पिआरी ॥
संत जना मिलि मंगल गाए हरि जीउ आपि सवारी ॥
सुरि नर गण गंधरब मिलि आए अपूरब जंञ बणाई ॥
नानक प्रभु पाइआ मै साचा ना कदे मरै न जाई ॥4॥1॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! वह मनुष्य स्वाद से परमातमा की सिफत सालाह के गीतों का रस लेता है।(उसके अंदर परमात्मा का) नाम (आत्मिक जीवन का) प्रकाश पैदा कर देता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य अपने अंदर प्रभू की अमूल्य सिफत सालाह को परोए रखता है। गुरू के सन्मुख रहके परमात्मा के नाम को प्यार करता है। हरी-नाम से प्यार डाले रखता है।(गुरू अपने) शबद के द्वारा (उसको संसार समुंद्र से) पार लंघा देता है।(उसके अंदर से) आत्मिक जीवन के प्रति अज्ञानता (का) अंधकार दूर कर देता है। (उस मनुष्य के) हृदय में आत्मिक जीवन की सूझ वाला तेज प्रकाश जल उठता है।उसकी सारी ज्ञानेन्द्रियां सुंदर आत्मिक जीवन वाली बन जाती हैं। (वह मनुष्य अपना) शरीर भेट करके।(अपना) मन भेट करके आत्मिक जीवन का सुहज पैदा कर लेता है।वह सदा-स्थिर प्रभू को प्यारा लगने लग जाता है। हे नानक ! (वह मनुष्य सदा प्रभू की) गोद में लीन रहता है (उसकी ये श्रद्धा बनी रहती है कि) जो कुछ प्रभू हुकम करता है।वही ध्यान से करना चाहिए (प्रभू की रजा में पूरी तौर पर राजी रहना चाहिए)। 3। हे भाई ! हरी प्रभू ने (जिस जीव-स्त्री के विवाह का) काम रच दिया। उसको वह गुरू के द्वारा ब्याहने के लिए आ पहुँचा (जिस जीव-स्त्री को परमात्मा अपने चरणों से जोड़ता है।उसको गुरू की शरण में टिकाता है)। हे भाई ! (जिस जीव-स्त्री को) प्रभू अपने साथ जोड़ने की मेहर करता है।उसको गुरू के माध्यम से मिल जाता है।वह जीव-स्त्री प्रभू-पति को प्यारी लगने लग जाती है। वह जीव-स्त्री संत जनों के साथ मिल के प्रभू-पति की सिफत-सालाह के गीत गाती है।प्रभू स्वयं उसका जीवन सुंदर बना देता है। (जैसे विवाह के समय बाराती मिलजुल के आते हैं।वैसे ही जीव स्त्री को प्रभू-पति से मिलाने के लिए) दैवी-गुणों वाले संत-जन।प्रभू की सिफत सालाह करने वाले भक्तजन मिल के आते हैं (उस जीव-स्त्री का प्रभू-पति के साथ विवाह करने के लिए) एक अद्वितीय बारात बनाते हैं। हे नानक ! (सत्संगियों की उस बारात की बरकति से।भाव।उस सत्संग की कृपा से उस जीव-स्त्री को) वह प्यारा प्रभू मिल जाता है।जो सदा कायम रहने वाला है।जो कभी पैदा होता मरता नहीं। 4। 1। 3।
रागु सूही छंत महला 4 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आवहो संत जनहु गुण गावह गोविंद केरे राम ॥
गुरमुखि मिलि रहीऐ घरि वाजहि सबद घनेरे राम ॥
सबद घनेरे हरि प्रभ तेरे तू करता सभ थाई ॥
अहिनिसि जपी सदा सालाही साच सबदि लिव लाई ॥
अनदिनु सहजि रहै रंगि राता राम नामु रिद पूजा ॥
नानक गुरमुखि एकु पछाणै अवरु न जाणै दूजा ॥1॥
सभ महि रवि रहिआ सो प्रभु अंतरजामी राम ॥
गुर सबदि रवै रवि रहिआ सो प्रभु मेरा सुआमी राम ॥
प्रभु मेरा सुआमी अंतरजामी घटि घटि रविआ सोई ॥
गुरमति सचु पाईऐ सहजि समाईऐ तिसु बिनु अवरु न कोई ॥
सहजे गुण गावा जे प्रभ भावा आपे लए मिलाए ॥
नानक सो प्रभु सबदे जापै अहिनिसि नामु धिआए ॥2॥
इहु जगो दुतरु मनमुखु पारि न पाई राम ॥
अंतरे हउमै ममता कामु क्रोधु चतुराई राम ॥
अंतरि चतुराई थाइ न पाई बिरथा जनमु गवाइआ ॥
जम मगि दुखु पावै चोटा खावै अंति गइआ पछुताइआ ॥
बिनु नावै को बेली नाही पुतु कुटंबु सुतु भाई ॥
नानक माइआ मोहु पसारा आगै साथि न जाई ॥3॥
हउ पूछउ अपना सतिगुरु दाता किन बिधि दुतरु तरीऐ राम ॥
सतिगुर भाइ चलहु जीवतिआ इव मरीऐ राम ॥
जीवतिआ मरीऐ भउजलु तरीऐ गुरमुखि नामि समावै ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही छंत महला 4 घरु 3 सतिगुर प्रसादि ॥ हे संत जनो ! आएँ।(साध-संगति में मिल के) परमात्मा के गुण गाते रहें। (हे संत जनों !) गुरू की शरण पड़ कर (प्रभू चरणों में) जुड़े रहना चाहिए (प्रभू चरणों में जुड़ने की बरकति से) हृदय-घर में प्रभू की सिफत-सालाह के शबद अपना प्रभाव डाले रखते हैं। हे प्रभू ! (ज्यों-ज्यों) आपकी सिफत सालाह के शबद (मनुष्य के हृदय में) प्रभाव डालते हैं।(त्यों-त्यों तू।हे प्रभू !) उसको हर जगह बसता दिखाई देता है। (हे प्रभू ! मेरे ऊपर भी मेहर कर) मैं दिन-रात आपका नाम जपता रहूँ।मैं सदा आपकी सिफत-सालाह करता रहूँ।मैं आपकी सदा सिफत सालाह में सुरति जोड़े रखूँ। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम को अपने हृदय की पूजा बनाता है (भाव। हर वक्त हृदय में बसाए रखता है) वह मनुष्य हर समय आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। वह मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा रहता है।गुरू की शरण पड़ कर वह एक प्रभू के साथ ही सांझ डाले रखता है।किसी और दूसरे के साथ सांझ नहीं डालता। 1। हे भाई ! वह परमात्मा हरेक के दिल की जानने वाला है।और सब जीवों में व्यापक है। (पर जो मनुष्य) गुरू के शबद के द्वारा (उसको) सिमरता है। उसको ही वह मालिक प्रभू (सब जगह) व्यापक दिखाई देता है। (उस मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है कि कहीं भी) उस परमात्मा के बिना और कोई नहीं। हे भाई ! (प्रभू की अपनी ही मेहर से) अगर मैं उस प्रभू को अच्छा लग पड़ूँ।तो आत्मिक अडोलता में टिक के मैं उसके गुण गा सकता हूँ।वह खुद ही (जीव को अपने साथ) मिलाता है। हे नानक ! गुरू के शबद के द्वारा ही उस प्रभू के साथ गहरी सांझ पड़ सकती है (जो मनुष्य शबद में) जुड़ता है।(वह) दिन-रात परमात्मा का नाम सिमरता रहता है। 2। हे भाई ! ये जगत (एक ऐसा समुंद्र है।जिससे) पार लांघना मुश्किल है।अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (इसके) दूसरे छोर पर नहीं पहुँच सकता। (क्योंकि उसके) अंदर ही अहंकार।अस्लियत की लालसा।काम।क्रोध चतुराई (आदि बुराईयाँ) टिकी रहती हैं। हे भाई ! (जिस मनुष्य के) अंदर अपनी समझदारी का मान टिका रहता है वह मनुष्य (प्रभू के दर पर) प्रवान नहीं होता।वह अपना मानस जन्म व्यर्थ गवा लेता है। (वह मनुष्य सारी उम्र) जमराज के रास्ते पर चलता है।दुख सहता है (आत्मिक मौत की) चोटें खाता रहता है।अंत के समय यहाँ से हाथ मलता जाता है। हे भाई ! (जीवन-यात्रा में यहाँ) पुत्र।परिवार।भाई – इनमें से कोई भी मददगार नहीं। परमात्मा के नाम के बिना कोई बेली नहीं बनता।हे नानक ! ये सारा माया के मोह का पसारा (ही) है।परलोक में (भी मनुष्य के) साथ नहीं जाता। 3। हे भाई ! (जब) मैं (नाम की) दाति देने वाले अपने गुरू को पूछता हूँ कि ये दुष्तर संसार-समुंद्र कैसे पार लांघा जा सकता है (तो आगे से उक्तर मिलता है कि) गुरू की रजा में (जीवन की चाल) चलते रहो। इस तरह दुनिया की किरत-कार करते हुए ही विकारों से बचे रहा जा सकता है। (गुरू की रजा में चलने से) दुनिया के काम करते हुए ही विकारों की ओर से मृतक रहा जाता है।संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है।(क्योंकि) जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है।वह परमात्मा के नाम में लीन रहता है

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! वह मनुष्य स्वाद से परमातमा की सिफत सालाह के गीतों का रस लेता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।