गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: दास नानक कहता है, परमात्मा का नाम जपना प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की पहली लांव है।हरी के नाम सिमरन से ही (प्रभू-पति से जीव-स्त्री के) विवाह (का) आगाज़ (आरम्भ) होता है। 1। हे राम जी ! मैं आपसे कुर्बान जाता हूँ।(आप मेहर करके जिस जीव-स्त्री को) गुरू महापुरुख मिलवा देता है (उसका) मन (दुनिया के) सारे डरों से निडर हो जाता है (निर्भय हो जाता है)।(गुरू।उसके अंदर से) अहंकार की मैल दूर कर देता है, हे भाई ! (जो जीव-स्त्री अहंकार दूर करके) परमात्मा के गुण गाती है।उसके अंदर (प्रभू-पति के लिए) आदर-सत्कार पैदा हो जाता है।वह परमात्मा को अपने अंग-संग बसता देखती है। (उसे ये निश्चय हो जाता है कि यह जगत-पसारा) प्रभू अपने स्वयं का पसारा पसार रहा है।और वह मालिक-प्रभू सब जीवों में व्याप रहा है। (उस जीव-स्त्री को अपने) अंदर और बाहर (सारे जगत में) सिर्फ परमात्मा ही (बसता दिखता है)।साध-संगति में मिल के वह प्रभू की सिफत सालाह के गीत गाती रहती है। हे दास नानक ! (कह, गुरू की शरण पड़ कर।अहंकार दूर करके प्रभू की सिफत-सालाह के गीत गाने और उसे सर्व-व्यापक देखना- प्रभू ने यह) दूसरी लांव (जीव-स्त्री के विवाह की) चाल दी है।(इस आत्मिक अवस्था पर पहुँची जीव-स्त्री के अंदर प्रभू) सिफत सालाह की बाणी के।जैसे एक-रस बाजे बजा देता है। 2। हे राम जी ! मैं आपके से सदके जाता हूँ।(आपकी मेहर से) वैरागियों के मन में (आपके से मिलने के लिए) तीव्र तमन्ना पैदा होती है।(ये आत्मिक अवस्था प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की) तीसरी सुंदर लांव है। हे भाई ! जिन अति-भाग्यशाली मनुष्यों को संतजनों का मिलाप हासिल होता है।उनको परमात्मा का मेल प्राप्त होता है। (वे मनुष्य जीवन को) पवित्र करने वाले प्रभू का मिलाप हासिल करते हैं।सदा प्रभू के गुण गाते हैं।और मुँह से परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी उचारते हैं। वह अति-भाग्यशाली मनुष्य संत-जनों की संगति में प्रभू-मिलाप प्राप्त करते हैं। हे भाई ! अकॅथ प्रभू की सिफत सालाह हमेशा करते रहना चाहिए। (जो मनुष्य प्रभू की सिफत-सालाह सदा करता रहता है।उसके) हृदय में सदा टिकी रहने वाली प्रभू-प्रेम की रौंअ चल पड़ती है।पर। हे भाई ! परमात्मा का नाम (तब ही) जपा जा सकता है।अगर माथे पर अहो-भाग्य जाग जाएं। हे भाई ! दास नानक कहता है (कि प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री की) तीसरी लांव के समय (जीव-स्त्री के) मन में प्रभू (-मिलाप की) तीव्र चाहत पैदा हो जाती है। 3। हे सुंदर राम जी ! मैं आपसे सदके हूँ।(आपकी मेहर से जिस जीव-स्त्री के) मन में आत्मिक अडोलता पैदा हैं जाती है।उसको आपका मिलाप हासिल हैं जाता है (ये आत्मिक अवस्था प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री के मिलाप की) चौथी लांव है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर (प्रभू-) प्रेम में (टिक के।जिस जीव-स्त्री को प्रभू) मिल जाता है।(उसके) मन में (उसके) तन में प्रभू प्यारा लगने लग जाता है। हे भाई ! जिस जीव को परमात्मा प्यारा लगने लग जाता है।प्रभू को (भी) वह जीव प्यारा लगने लगता है।वह मनुष्य सदा प्रभू की याद में (अपनी) सुरति जोड़े रखता है। वह मनुष्य प्रभू-मिलाप का मन-बाँछित फल प्राप्त कर लेता है।प्रभू के नाम की बरकति से (उसके अंदर सदा) चढ़दीकला बनी रहती है। हे भाई ! प्रभू ने।मालिक हरी ने (जिस जीव-स्त्री के) विवाह का उद्यम शुरू कर दिया।वह जीव-स्त्री नाम-सिमरन की बरकति से (अपने) दिल में सदैव आनंद-भरपूर रहती है। दास नानक कहता है, प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की चौथी लांव के समय जीव-स्त्री कभी नाश ना होने वाले प्रभू के मिलाप का आनंद प्राप्त कर लेती है। 4। 2।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही छंत महला 4 घरु 2 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रह के परमात्मा के गुण गाता रहता है (परमात्मा के गुण अपने) हृदय में (बसाए रखता है। अपनी) जीभ से (गुणों का) रस लेता है। (जो मनुष्य) हरी (के गुणों का) रस (अपनी) जीभ से लेता रहता है।वह मनुष्य प्रभू को प्यारा लगने लगता है।आत्मिक अडोलता में प्रेम में (उस टिके हुए को) परमात्मा मिल जाता है। वह मनुष्य हर वक्त (सिफत सालाह का) आनंद लेता है।आनंद में लीन रहता है।(गुरू के) शबद के द्वारा (वह मनुष्य प्रभू में) सुरति जोड़े रखता है। पर। हे भाई ! पूरा गुरू मिलता है बड़ी किस्मत से।(जिसको मिलता है।वह) हर वक्त हरी-नाम सिमरता रहता है। हे नानक ! वह मनुष्य हर समय आत्मिक अडोलता में टिका रहता है।जगत का सहारा प्रभू उसको मिल जाता है।वह मनुष्य उस अवस्था में लीन रहता है जहाँ माया का कोई विचार छू भी नहीं सकता। 1। हे भाई ! जो मनुष्य संत जनों की संगति में मिलता है। वह परमात्मा के पवित्र सरोवर में स्नान करता है। वह मनुष्य प्रभू के पवित्र नाम-जल में स्नान करता है।उसका शरीर पवित्र हो जाता है। (नाम-जल उसके अंदर से विकारों की) मैल दूर कर देता है।(नाम-जल के बरकति से उसके अंदर से) दुमर्ति की मैल धुल जाती है।भटकना दूर हो जाती है।अहंकार की पीड़ा नाश हा जाती है। पर। हे भाई ! परमात्मा की मेहर की निगाह के साथ ही साध-संगति मिलती है (जिसको मिलती है।उसका) ठिकाना प्रभू-चरणों में हुआ रहता है।
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “दास नानक कहता है, परमात्मा का नाम जपना प्रभू-पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की पहली लांव है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।