नानक सफल जनमु तिन केरा जि सतिगुरि हरि मारगि पाए ॥2॥
संतसंगति सिउ मेलु भइआ हरि हरि नामि समाए राम ॥
गुर कै सबदि सद जीवन मुकत भए हरि कै नामि लिव लाए राम ॥
हरि नामि चितु लाए गुरि मेलि मिलाए मनूआ रता हरि नाले ॥
सुखदाता पाइआ मोहु चुकाइआ अनदिनु नामु सम॑ाले ॥
गुर सबदे राता सहजे माता नामु मनि वसाए ॥
नानक तिन घरि सद ही सोहिला जि सतिगुर सेवि समाए ॥3॥
बिनु सतिगुर जगु भरमि भुलाइआ हरि का महलु न पाइआ राम ॥
गुरमुखे इकि मेलि मिलाइआ तिन के दूख गवाइआ राम ॥
तिन के दूख गवाइआ जा हरि मनि भाइआ सदा गावहि रंगि राते ॥
हरि के भगत सदा जन निरमल जुगि जुगि सद ही जाते ॥
साची भगति करहि दरि जापहि घरि दरि सचा सोई ॥
नानक सचा सोहिला सची सचु बाणी सबदे ही सुखु होई ॥4॥4॥5॥
जे लोड़हि वरु बालड़ीए ता गुर चरणी चितु लाए राम ॥
सदा होवहि सोहागणी हरि जीउ मरै न जाए राम ॥
हरि जीउ मरै न जाए गुर कै सहजि सुभाए सा धन कंत पिआरी ॥
सचि संजमि सदा है निरमल गुर कै सबदि सीगारी ॥
मेरा प्रभु साचा सद ही साचा जिनि आपे आपु उपाइआ ॥
नानक सदा पिरु रावे आपणा जिनि गुर चरणी चितु लाइआ ॥1॥
पिरु पाइअड़ा बालड़ीए अनदिनु सहजे माती राम ॥
गुरमती मनि अनदु भइआ तितु तनि मैलु न राती राम ॥
तितु तनि मैलु न राती हरि प्रभि राती मेरा प्रभु मेलि मिलाए ॥
अनदिनु रावे हरि प्रभु अपणा विचहु आपु गवाए ॥
गुरमति पाइआ सहजि मिलाइआ अपणे प्रीतम राती ॥
नानक नामु मिलै वडिआई प्रभु रावे रंगि राती ॥2॥
पिरु रावे रंगि रातड़ीए पिर का महलु तिन पाइआ राम ॥
सो सहो अति निरमलु दाता जिनि विचहु आपु गवाइआ राम ॥
विचहु मोहु चुकाइआ जा हरि भाइआ हरि कामणि मनि भाणी ॥
अनदिनु गुण गावै नित साचे कथे अकथ कहाणी ॥
जुग चारे साचा एको वरतै बिनु गुर किनै न पाइआ ॥
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! जो मनुष्य आपके गुण गाते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।