Lulla Family

अंग 771

अंग
771
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तेरे गुण गावहि सहजि समावहि सबदे मेलि मिलाए ॥
नानक सफल जनमु तिन केरा जि सतिगुरि हरि मारगि पाए ॥2॥
संतसंगति सिउ मेलु भइआ हरि हरि नामि समाए राम ॥
गुर कै सबदि सद जीवन मुकत भए हरि कै नामि लिव लाए राम ॥
हरि नामि चितु लाए गुरि मेलि मिलाए मनूआ रता हरि नाले ॥
सुखदाता पाइआ मोहु चुकाइआ अनदिनु नामु सम॑ाले ॥
गुर सबदे राता सहजे माता नामु मनि वसाए ॥
नानक तिन घरि सद ही सोहिला जि सतिगुर सेवि समाए ॥3॥
बिनु सतिगुर जगु भरमि भुलाइआ हरि का महलु न पाइआ राम ॥
गुरमुखे इकि मेलि मिलाइआ तिन के दूख गवाइआ राम ॥
तिन के दूख गवाइआ जा हरि मनि भाइआ सदा गावहि रंगि राते ॥
हरि के भगत सदा जन निरमल जुगि जुगि सद ही जाते ॥
साची भगति करहि दरि जापहि घरि दरि सचा सोई ॥
नानक सचा सोहिला सची सचु बाणी सबदे ही सुखु होई ॥4॥4॥5॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! जो मनुष्य आपके गुण गाते हैं।वे आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं।गुरू अपने शबद के द्वारा उनको (हे प्रभू !) आपके चरणों में जोड़ देता है। हे नानक ! उन मनुष्यों का जनम कामयाब हो जाता है।जिनको गुरू परमात्मा के रास्ते पर चला देता है। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों का साध-संगति के साथ मिलाप हो जाता है।वे परमात्मा के नाम में लीन रहते हैं। गुरू के शबद की बरकति से परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ के वे दुनिया के काम-काज करते हुए ही माया से निर्लिप रहते हैं। जिनको गुरू ने प्रभू-चरणों में जोड़ दिया।उन मनुष्यों ने परमात्मा के नाम में मन जोड़ लिया।उनका मन परमात्मा के (प्रेम-रंग से) रंगा गया। उन्होंने हर वक्त परमात्मा का नाम हृदय में बसा के (अपने अंदर से माया का) मोह दूर कर लिया।और।सारे सुख देने वाले परमात्मा के साथ मिलाप हासिल कर लिया। जो मनुष्य गुरू के शबद में रंगा जाता है।वह आत्मिक अडोलता में मस्त रहता है।वह हरी-नाम को मन में बसाए रखता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की बताई हुई सेवा करके प्रभू में लीन रहते हैं।उनके हृदय में सदा ही खुशी बनी रहती है। 3। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना जगत भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है।परमात्मा की हजूरी प्राप्त नहीं कर सकता। पर कई (भाग्यशाली ऐसे हैं।जो) गुरू के सन्मुख (रहते हैं।उन्हें गुरू ने) प्रभू-चरणों में जोड़ दिया है।उनके सारे दुख दूर कर दिए हैं। जब वे प्रभू के मन को प्यारे लगते हैं।उनके दुख दूर हो जाते हैं।वे प्रेम-रंग में रंगीज के सदा परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते रहते हैं। परमात्मा के वे भक्त सदा के लिए पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं।वे हरेक युग में सदा ही प्रकट हो जाते हैं। वे (भाग्यशाली मनुष्य) सदा-स्थिर प्रभू की भक्ति करते हैं।उसके दर पर इज्जत पाते हैं।उनके हृदय में उनके अंदर सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू बस जाता है। हे नानक ! उनके अंदर सिफत सालाह वाली बाणी बसी रहती है।शबद की बरकति से उनके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है। 4। 4। 5।
सूही महला 3 ॥
जे लोड़हि वरु बालड़ीए ता गुर चरणी चितु लाए राम ॥
सदा होवहि सोहागणी हरि जीउ मरै न जाए राम ॥
हरि जीउ मरै न जाए गुर कै सहजि सुभाए सा धन कंत पिआरी ॥
सचि संजमि सदा है निरमल गुर कै सबदि सीगारी ॥
मेरा प्रभु साचा सद ही साचा जिनि आपे आपु उपाइआ ॥
नानक सदा पिरु रावे आपणा जिनि गुर चरणी चितु लाइआ ॥1॥
पिरु पाइअड़ा बालड़ीए अनदिनु सहजे माती राम ॥
गुरमती मनि अनदु भइआ तितु तनि मैलु न राती राम ॥
तितु तनि मैलु न राती हरि प्रभि राती मेरा प्रभु मेलि मिलाए ॥
अनदिनु रावे हरि प्रभु अपणा विचहु आपु गवाए ॥
गुरमति पाइआ सहजि मिलाइआ अपणे प्रीतम राती ॥
नानक नामु मिलै वडिआई प्रभु रावे रंगि राती ॥2॥
पिरु रावे रंगि रातड़ीए पिर का महलु तिन पाइआ राम ॥
सो सहो अति निरमलु दाता जिनि विचहु आपु गवाइआ राम ॥
विचहु मोहु चुकाइआ जा हरि भाइआ हरि कामणि मनि भाणी ॥
अनदिनु गुण गावै नित साचे कथे अकथ कहाणी ॥
जुग चारे साचा एको वरतै बिनु गुर किनै न पाइआ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 3 ॥ हे अंजान जीव स्त्री ! अगर आप प्रभू पति का मिलाप चाहती है।तो अपने गुरू के चरणों में चित्त जोड़ के रख। आप सदा के लिए सोहाग-भाग वाली बन जाएगी।(क्योंकि) प्रभू-पति ना कभी मरता है ना कभी नाश होता है। जो जीव-स्त्री गुरू के द्वारा आत्मिक अडोलता में प्रेम में लीन रहती है।वह पति-प्रभू को प्यारी लगती है। सदा-स्थिर प्रभू में जुड़ के।(विकारों पर) संयम रख के।वह जीव-स्त्री पवित्र जीवन वाली हो जाती है।गुरू के शबद की बरकति से वह अपने आत्मिक जीवन को सुंदर बना लेती है। हे सहेलिए ! मेरा प्रभू सदा कायम रहने वाला है।उसने अपने आप को आप ही प्रकट किया हुआ है। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री ने गुरू के चरणों में अपना मन जोड़ लिया।वह सदा प्रभू पति के मिलाप का आनंद भोगती है। 1। हे अंजान जीव-स्त्री ! जो जीव-स्त्री प्रभू-पति का मिलाप हासिल कर लेती है।वह हर वक्त आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है। गुरू की मति के सदका उसके मन में आनंद बना रहता है।(उसके) शरीर में (विचारों की) रक्ती भर भी मैल नहीं होती। (उसके) शरीर में रक्ती भर भी मैल नहीं होती।वह प्रभू (के प्रेम-रंग में) रंगी रहती है प्रभू उसको अपने चरणों में मिला लेता है। वह जीव-स्त्री अपने अंदर से स्वै भाव दूर करके हर वक्त अपने हरी-प्रभू को सिमरती रहती है। गुरू की शिक्षा के साथ प्रभू से मिल जाती है।गुरू उसको आत्मिक अडोलता में टिका देता है।वह अपने प्रभू-प्रीतम के रंग में रंगी जाती है। हे नानक ! उसको हरी-नाम मिल जाता है।इज्जत मिल जाती है।वह प्रेम-रंग में रंगी हुई हर वक्त प्रभू का सिमरन करती है। 2। हे प्रभू के प्रेम-रंग में रंगी हुई जीव-स्त्री ! जो जीव-स्त्री प्रभू-पति को हर वक्त सिमरती है। जिसने अपने अंदर से स्वैभाव दूर कर दिया है।उसने उस प्रभू की हजूरी प्राप्त कर ली है जो बहुत पवित्र है।और।सबको दातें देने वाला है। जब प्रभू की रजा होती है।तब जीव-स्त्री अपने अंदर से मोह दूर करती है।और।प्रभू के मन को प्यारी लगने लगती है। फिर वह हर वक्त सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाती रहती है।और उस प्रभू की सिफत सालाह की बातें करती है जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। हे सखिए ! चारों युगों में वह सदा-स्थिर प्रभू खुद ही अपना हुकम बरता रहा है।पर गुरू की शरण के बिना किसी ने भी उसका मिलाप हासिल नहीं किया।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! जो मनुष्य आपके गुण गाते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।