गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: उस प्रभू-पति का हुकम अटल है (कि गुरू के द्वारा ही उसका मिलाप प्राप्त होता है)।उसके बिना कोई और उसकी बराबरी का नहीं (जो इस हुकम को बदलवा सके)। हे भाई ! जिस प्रभू के बिना उस जैसा और कोई नहीं।वह प्रभू स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है।गुरू के सन्मुख रहने वाली जीव-स्त्री उस एक के साथ गहरी सांझ बनाती है। जब गुरू की मति पर चल के जीव-स्त्री का मन (परमात्म की याद में) रीझ जाता है।तब जीव-स्त्री का प्रभू-पति से मिलाप हो जाता है। हे भाई ! जब गुरू मिलता है तब ही प्रभू की प्राप्ति होती है (गुरू ही) प्रभू का नाम जीव-स्त्री के हृदय में बसाता है।और परमात्मा के नाम के बिना (माया के बँधनों से) खलासी नहीं होती। हे नानक ! अगर मन प्रभू की याद में रीझ जाए।तो जीव-स्त्री प्रभू के मिलाप का आनंद भोगती है।उसके हृदय में आनंद पैदा हुआ रहता है। 1। हे अंजान जीवात्मा ! गुरू के बताए हुए काम किया कर।(इस तरह) आप प्रभू-पति को प्राप्त कर लेगी। आप सदा के लिए पति वाली (सोहागनि) हैं जाएगी।फिर कभी प्रभू-पति से विछोड़ा नहीं होंगे। कोई विरली जीव-स्त्री ही गुरू के बताए हुए मार्ग पर चल के इस बात को समझती है (कि गुरू के द्वारा प्रभू से मिलाप होने पर) फिर उससे कभी विछोड़ा नहीं होता।वह जीव-स्त्री (अपने अंदर से) अहंकार दूर करके प्रभू से सांझ कायम रखती है। वह जीव-स्त्री (प्रभू सिमरन का) करने-योग्य कार्य करती रहती है।गुरू के शबद में लीन रहती है।अपने हृदय में एक प्रभू के साथ जीव-स्त्री पहचान बनाए रखती है। गुरू के सन्मुख रहने वाली जीव-स्त्री दिन-रात अपने प्रभू का नाम सिमरती रहती है।(लोक-परलोक में) उसको सदा कायम रहने वाली इज्जत मिलती है। हे नानक !वह जीव-स्त्री अपने उस प्रभू-पति को हर वक्त याद करती है जो हर जगह व्यापक है। 2। हे अंजान जिंदे ! गुरू का बताया हुआ काम किया कर।गुरू प्रभू-पति के साथ मिला देता है। जो जीव-स्त्री प्रभू के प्रेम-रंग में रंगी जाती है।वह प्यारे प्रभू को मिल के आत्मिक आनंद पाती है। प्रभू प्रीतम को मिल के वह आत्मिक आनंद भोगती है।सदा स्थिर प्रभू में लीन रहती है।वह सदा स्थिर प्रभू उसे हर जगह बसता दिखाई देता है। वह जीव स्त्री सदा-स्थिर प्रभू की याद में मस्त रहती है।यही सदा कायम रहने वाला (आत्मिक) श्रंृगार दिन-रात वह किए रखती है। गुरू के शबद में जुड़ के वह जीव-स्त्री सारे सुख देने वाले प्रभू के साथ सांझ डालती है।उसको अपने गले से लगाए रखती है (गले में परोए रखती है।हर वक्त उसका जाप करती है)। हे नानक ! वह जीव स्त्री मालिक प्रभू का महल ढॅूँढ लेती है।गुरू की मति पर चल के वह प्रभू-पति का मिलाप प्राप्त कर लेती है। 3। हे भाई ! जिस अंजान जीव स्त्री को धुर दरगाह से मिलाप के लेख प्राप्त हुआ।उसको प्रभू ने स्वयं अपने चरणों से जोड़ लिया। उस जीव-स्त्री के हृदय में ये रौशनी हो गई कि परमात्मा हर जगह मौजूद है।सब जगह व्यापक प्रभू को उस जीव-स्त्री ने अपने मन में बसा लिया। पिछले जन्म के लिखे लेख (उसके माथे पर) उघड़ आए। वह जीव-स्त्री प्यारे प्रभू को अच्छी लगने लग पड़ी।उसकी हृदय-सेज आनंद-भरपूर हो गई।सदा-स्थिर प्रभू के नाम सिमरन को उसने (अपने जीवन का) श्रृंगार बना लिया। जो जीव-स्त्री गुरू की मति ले के सदा-स्थिर प्रभू के नाम में लीन हो जाती है।वह (अपने अंदर से) अहंकार की मैल दूर कर लेती है।वह पवित्र जीवन वाली बन जाती है। हे नानक ! (कह) करतार ने स्वयं उसे अपने साथ मिला लिया।उसने परमात्मा का नाम प्राप्त कर लिया।जो उसके लिए सृष्टि के नौ खजानों के तूल्य है। 4। 3। 4।
सूही महला 3 ॥ हरि हरे हरि गुण गावहु हरि गुरमुखे पाए राम ॥ अनदिनो सबदि रवहु अनहद सबद वजाए राम ॥ अनहद सबद वजाए हरि जीउ घरि आए हरि गुण गावहु नारी ॥ अनदिनु भगति करहि गुर आगै सा धन कंत पिआरी ॥ गुर का सबदु वसिआ घट अंतरि से जन सबदि सुहाए ॥ नानक तिन घरि सद ही सोहिला हरि करि किरपा घरि आए ॥1॥ भगता मनि आनंदु भइआ हरि नामि रहे लिव लाए राम ॥ गुरमुखे मनु निरमलु होआ निरमल हरि गुण गाए राम ॥ निरमल गुण गाए नामु मंनि वसाए हरि की अंम्रित बाणी ॥ जिन॑ मनि वसिआ सेई जन निसतरे घटि घटि सबदि समाणी ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 3 ॥ हे भाई ! सदा परमात्मा के गुण गाया करो।(जो मनुष्य प्रभू के गुण गाता है वह) गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा को मिल जाता है। हे भाई ! एक रस परमात्मा के सिफत सालाह की बाणी (के बाजे) बजा के गुरू के शबद के द्वारा हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरा करो। जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी के बाजे एक-रस बजाता रहता है।परमात्मा उसके हृदय-गृह में प्रकट हो जाता है।हे (मेरी) ज्ञानेन्द्रियो ! आप भी परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाया करो। जो जीव-सि्त्रयां गुरू के सन्मुख हैं के हर वक्त परमात्मा की भक्ति करती हैं।वे प्रभू-पति को प्यारी लगती हैं। हे नानक ! जिन मनुष्यों के दिल में गुरू का शबद बस पड़ता है।गुरू के शबद की बरकति से उनका जीवन सुंदर बन जाता है। उनके हृदय-घर में सदा ही (मानो) खुशी के गीत चलते रहते हैं।प्रभू कृपा करके उनके हृदय-घर में आ बसता है। 1। हे भाई ! प्रभू के भक्तों के मन में आनंद बना रहता है।क्योकि वह परमात्मा के नाम में सदा सुरति जोड़े रखते हैं। गुरू के द्वारा परमात्मा के पवित्र गुण गा गा के उनका मन पवित्र हो जाता है।परमात्मा की आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बाणी के द्वारा। प्रभू के पवित्र गुण गा गा के।प्रभू का नाम अपने मन में बसा के (उनका मन पवित्र हो जाता है)। हे भाई ! जिन मनुष्यों के मन में परमात्मा का नाम बस जाता है।वे मनुष्य संसार सागर से पार लांघ जाते हैं।गुरू के शबद की बरकति सेउनको परमात्मा हरेक शरीर में बसता दिखता है।
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस प्रभू-पति का हुकम अटल है (कि गुरू के द्वारा ही उसका मिलाप प्राप्त होता है)।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।