Lulla Family

अंग 772

अंग
772
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक रंगि रवै रंगि राती जिनि हरि सेती चितु लाइआ ॥3॥
कामणि मनि सोहिलड़ा साजन मिले पिआरे राम ॥
गुरमती मनु निरमलु होआ हरि राखिआ उरि धारे राम ॥
हरि राखिआ उरि धारे अपना कारजु सवारे गुरमती हरि जाता ॥
प्रीतमि मोहि लइआ मनु मेरा पाइआ करम बिधाता ॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ हरि वसिआ मंनि मुरारे ॥
नानक मेलि लई गुरि अपुनै गुर कै सबदि सवारे ॥4॥5॥6॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जिस जीव-स्त्री ने परमात्मा से अपना मन जोड़ लिया।वह उसके प्रेम-रंग में रंगी हुई उसके प्रेम में उसका सिमरन करती है। 3। जिस जीव स्त्री को प्यारे सज्जन प्रभू जी मिल जाते हैं।उसके मन में आनंद बना रहता है। गुरू की मति पर चल कर उसका मन पवित्र हो जाता है।वह अपने दिल में हरी-प्रभू को टिकाए रखती है। वह जीव-स्त्री परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखती है।इस तरह अपने जीवन के उद्देश्य को सँवार लेती है।गुरू की शिक्षा की बरकति से वह परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना लेती है। उसका मन।जो पहले ममता में फसा हुआ था।प्रीतम प्रभू ने अपने बस में कर लिया।और। उस जीव-स्त्री ने सदा आत्मिक आनंद पाया है।मुरारी प्रभू उस के मन में आ बसा है। हे नानक ! गुरू के शबद की बरकति से उस जीव-स्त्री ने अपना जीवन सुंदर बना लिया है।प्यारे गुरू ने उसको प्रभू-चरणों में जोड़ दिया है। 4। 5। 6।
सूही महला 3 ॥
सोहिलड़ा हरि राम नामु गुर सबदी वीचारे राम ॥
हरि मनु तनो गुरमुखि भीजै राम नामु पिआरे राम ॥
राम नामु पिआरे सभि कुल उधारे राम नामु मुखि बाणी ॥
आवण जाण रहे सुखु पाइआ घरि अनहद सुरति समाणी ॥
हरि हरि एको पाइआ हरि प्रभु नानक किरपा धारे ॥
सोहिलड़ा हरि राम नामु गुर सबदी वीचारे ॥1॥
हम नीवी प्रभु अति ऊचा किउ करि मिलिआ जाए राम ॥
गुरि मेली बहु किरपा धारी हरि कै सबदि सुभाए राम ॥
मिलु सबदि सुभाए आपु गवाए रंग सिउ रलीआ माणे ॥
सेज सुखाली जा प्रभु भाइआ हरि हरि नामि समाणे ॥
नानक सोहागणि सा वडभागी जे चलै सतिगुर भाए ॥
हम नीवी प्रभु अति ऊचा किउ करि मिलिआ जाए राम ॥2॥
घटि घटे सभना विचि एको एको राम भतारो राम ॥
इकना प्रभु दूरि वसै इकना मनि आधारो राम ॥
इकना मन आधारो सिरजणहारो वडभागी गुरु पाइआ ॥
घटि घटि हरि प्रभु एको सुआमी गुरमुखि अलखु लखाइआ ॥
सहजे अनदु होआ मनु मानिआ नानक ब्रहम बीचारो ॥
घटि घटे सभना विचि एको एको राम भतारो राम ॥3॥
गुरु सेवनि सतिगुरु दाता हरि हरि नामि समाइआ राम ॥
हरि धूड़ि देवहु मै पूरे गुर की हम पापी मुकतु कराइआ राम ॥
पापी मुकतु कराए आपु गवाए निज घरि पाइआ वासा ॥
बिबेक बुधी सुखि रैणि विहाणी गुरमति नामि प्रगासा ॥
हरि हरि अनदु भइआ दिनु राती नानक हरि मीठ लगाए ॥
गुरु सेवनि सतिगुरु दाता हरि हरि नामि समाए ॥4॥6॥7॥5॥7॥12॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 3 ॥ जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा के नाम को विचारता है।उसके अंदर आनंद की लहर चलती रहती है। गुरू के सन्मुख रहने वाला उसका मन उसका हृदय परमात्मा (के प्यार रस) में भीग जाता है।वह मनुष्य परमात्मा के नाम को प्यार करता है। वह मनुष्य परमात्मा के नाम से प्यार करता है।परमात्मा का नाम।परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी वह अपने मुँह से उचारता है।और अपनी सारी कुलों को (विकारों से) बचा लेता है। उसके जनम-मरन के चक्कर खत्म हो जाते हैं।वह अपने हृदय-घर में एक रस आनंद लेता रहता है।उसकी सुरति (प्रभू-चरणों में) लीन रहती है। हे नानक ! परमात्मा उस मनुष्य पर मेहर करता है।वह मनुष्य परमात्मा के साथ मिलाप हासिल कर लेता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा प्रभू के नाम को विचारता है।उसके अंदर आत्मिक आनंद की रौंअ चल पड़ती है। 1। हे भाई ! हम जीव सि्त्रयां (आत्मिक जीवन की) निम्न स्तर पर हैं।पर प्रभू (इस स्तर से) बहुत ऊँचा है (उच्च स्तर पर है)।फिर हमारा उसके साथ मिलाप कैसे हो। (उक्तर) जिस पर गुरू ने कृपा कर दी।उसको (प्रभू चरणों में) जोड़ दिया।गुरू के शबद के द्वारा वह जीव स्त्री प्रभू के प्यार में लीन हो जाती है। गुरू के शबद के द्वारा वह जीव-स्त्री प्रभू में मिल के प्रभू के प्रेम में टिक के (अपने अंदर से) स्वै-भाव दूर कर लेती है।और प्रेम में प्रभू का मिलाप भोगती है। जब उसे परमात्मा प्यारा लगने लग जाता है।तब उसके हृदय की सेज आनंद-भरपूर हो जाती है।वह प्रभू के नाम में ही लीन रहती है। हे नानक ! सोहाग-भाग वाली जीव-स्त्री जब गुरू की रजा के अनुसार चलती है तब वह बड़ी किस्मत वाली बन जाती है। (वैसे तो) हम जीव-सि्त्रयां (आत्मिक जीवन के) निम्न स्तर पर हैं (पर) प्रभू (इस स्तर से) बहुत ऊँचा है।उसके साथ हमारा मेल नहीं हो सकता। 2। हे भाई ! हरेक शरीर में।सब जीवों में एक प्रभू-पति ही बस रहा है।पर। कई जीवों को वह प्रभू कहीं दूर बसता प्रतीत होता है।और।कई जीवों के मन में उस प्रभू का ही आसरा है। सबको पैदा करने वाला प्रभू ही कई जीवों के मन का सहारा है (क्योंकि उन्होंने उनके) बड़े भाग्यों से गुरू ढूँढ लिया है। हे भाई ! हरेक शरीर में एक मालिक प्रभू ही बसता है।गुरू की शरण रहने वाले मनुष्य ने उस अदृश्य प्रभू को (हरेक शरीर में बसता) देख लिया है। हे नानक ! वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिका रहता है।उसके अंदर आनंद बना रहता है।उसका मन परमात्मा के गुणों की विचार करने में पतीजा रहता है। हरेक शरीर में सब जीवों में एक प्रभू-पति ही बस रहा है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य हरी-नाम की दाति देने वाले गुरू की शरण पड़ते हैं।वे परमात्मा के नाम में लीन रहते हैं। हे हरी ! मुझे भी पूरे गुरू के चरणों की धूड़ बख्श।गुरू हम पापी जीवों को (विकारों से) आजाद कर देता है। गुरू विकारी जीवों को विकारों से स्वतंत्र कर देता है।(उनके अंदर से) स्वै-भाव दूर कर देता है।(गुरू की शरण आए मनुष्य) प्रभू-चरणों में ठिकाना प्राप्त कर लेते हैं। (गुरू से) अच्छे-बुरे कामों की परख कर सकने वाली बुद्धि प्राप्त करके उनकी (जिंदगी की) रात आनंद में बीतती है।गुरू की मति के सदके हरी-नाम के द्वारा (उनके अंदर आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं।उनको हरी-नाम प्यारा लगने लगता है। दिन-रात उनके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है।वह मनुष्य परमात्मा के नाम में लीन हुए रहते हैं। 4। 6। 7। 5। 7। 12।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! जिस जीव-स्त्री ने परमात्मा से अपना मन जोड़ लिया।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।