कामणि मनि सोहिलड़ा साजन मिले पिआरे राम ॥
गुरमती मनु निरमलु होआ हरि राखिआ उरि धारे राम ॥
हरि राखिआ उरि धारे अपना कारजु सवारे गुरमती हरि जाता ॥
प्रीतमि मोहि लइआ मनु मेरा पाइआ करम बिधाता ॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ हरि वसिआ मंनि मुरारे ॥
नानक मेलि लई गुरि अपुनै गुर कै सबदि सवारे ॥4॥5॥6॥
सोहिलड़ा हरि राम नामु गुर सबदी वीचारे राम ॥
हरि मनु तनो गुरमुखि भीजै राम नामु पिआरे राम ॥
राम नामु पिआरे सभि कुल उधारे राम नामु मुखि बाणी ॥
आवण जाण रहे सुखु पाइआ घरि अनहद सुरति समाणी ॥
हरि हरि एको पाइआ हरि प्रभु नानक किरपा धारे ॥
सोहिलड़ा हरि राम नामु गुर सबदी वीचारे ॥1॥
हम नीवी प्रभु अति ऊचा किउ करि मिलिआ जाए राम ॥
गुरि मेली बहु किरपा धारी हरि कै सबदि सुभाए राम ॥
मिलु सबदि सुभाए आपु गवाए रंग सिउ रलीआ माणे ॥
सेज सुखाली जा प्रभु भाइआ हरि हरि नामि समाणे ॥
नानक सोहागणि सा वडभागी जे चलै सतिगुर भाए ॥
हम नीवी प्रभु अति ऊचा किउ करि मिलिआ जाए राम ॥2॥
घटि घटे सभना विचि एको एको राम भतारो राम ॥
इकना प्रभु दूरि वसै इकना मनि आधारो राम ॥
इकना मन आधारो सिरजणहारो वडभागी गुरु पाइआ ॥
घटि घटि हरि प्रभु एको सुआमी गुरमुखि अलखु लखाइआ ॥
सहजे अनदु होआ मनु मानिआ नानक ब्रहम बीचारो ॥
घटि घटे सभना विचि एको एको राम भतारो राम ॥3॥
गुरु सेवनि सतिगुरु दाता हरि हरि नामि समाइआ राम ॥
हरि धूड़ि देवहु मै पूरे गुर की हम पापी मुकतु कराइआ राम ॥
पापी मुकतु कराए आपु गवाए निज घरि पाइआ वासा ॥
बिबेक बुधी सुखि रैणि विहाणी गुरमति नामि प्रगासा ॥
हरि हरि अनदु भइआ दिनु राती नानक हरि मीठ लगाए ॥
गुरु सेवनि सतिगुरु दाता हरि हरि नामि समाए ॥4॥6॥7॥5॥7॥12॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! जिस जीव-स्त्री ने परमात्मा से अपना मन जोड़ लिया।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।