अंग
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सूही
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कोटि मधे किनै पछाणिआ हरि नामा सचु सोई ॥
कोटि मधे किनै पछाणिआ हरि नामा सचु सोई ॥
नानक नामि मिलै वडिआई दूजै भाइ पति खोई ॥3॥
भगता कै घरि कारजु साचा हरि गुण सदा वखाणे राम ॥
भगति खजाना आपे दीआ कालु कंटकु मारि समाणे राम ॥
कालु कंटकु मारि समाणे हरि मनि भाणे नामु निधानु सचु पाइआ ॥
सदा अखुटु कदे न निखुटै हरि दीआ सहजि सुभाइआ ॥
हरि जन ऊचे सद ही ऊचे गुर कै सबदि सुहाइआ ॥
नानक आपे बखसि मिलाए जुगि जुगि सोभा पाइआ ॥4॥1॥2॥
नानक नामि मिलै वडिआई दूजै भाइ पति खोई ॥3॥
भगता कै घरि कारजु साचा हरि गुण सदा वखाणे राम ॥
भगति खजाना आपे दीआ कालु कंटकु मारि समाणे राम ॥
कालु कंटकु मारि समाणे हरि मनि भाणे नामु निधानु सचु पाइआ ॥
सदा अखुटु कदे न निखुटै हरि दीआ सहजि सुभाइआ ॥
हरि जन ऊचे सद ही ऊचे गुर कै सबदि सुहाइआ ॥
नानक आपे बखसि मिलाए जुगि जुगि सोभा पाइआ ॥4॥1॥2॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! करोड़ों में से किसी विरले मनुष्य ने ये बात समझी है कि परमात्मा का नाम ही सदा कायम रहने वाला है। नाम में जुड़ने से ही (लोक-परलोक में) इज्जत मिलती है।और।माया के मोह में मनुष्य इज्जत गवा लेता है। 3। परमात्मा के गुण सदा गाते रहने के कारण भक्तों के हृदय में ये आहर सदा बना रहता है। भक्ति का खजाना परमात्मा ने खुद ही अपने भक्तों को दिया हुआ है।(इसकी बरकति से वे) दुखद मौत के डर को समाप्त करके (परमात्मा में) लीन रहते हैं। दुखदाई मौत के डर को खत्म करके भक्त परमात्मा में लीन रहते हैं।परमात्मा के मन को प्यारे लगते हैं।(परमात्मा के पास से भक्त) सदा कायम रहने वाला नाम-खजाना प्राप्त कर लेते हैं। ये खजाना ना खत्म होने वाला है।कभी खत्म नहीं होता।परमात्मा ने उनको आत्मिक अडोलता में प्रेम में टिके हुओं को ये खजाना दे दिया। (इस खजाने के सदका) भक्त सदा ही ऊँचे आत्मिक मण्डल में टिके रहते हैं।गुरू के शबद की बरकति से उनका जीवन सोहाना बन जाता हे नानक ! परमात्मा खुद ही मेहर कर के उनको चरणों से जोड़े रखता है।हरेक युग में वे शोभा कमाते हैं। 4। 1। 2।
सबदि सचै सचु सोहिला जिथै सचे का होइ वीचारो राम ॥
सूही महला 3 ॥
सबदि सचै सचु सोहिला जिथै सचे का होइ वीचारो राम ॥
हउमै सभि किलविख काटे साचु रखिआ उरि धारे राम ॥
सचु रखिआ उर धारे दुतरु तारे फिरि भवजलु तरणु न होई ॥
सचा सतिगुरु सची बाणी जिनि सचु विखालिआ सोई ॥
साचे गुण गावै सचि समावै सचु वेखै सभु सोई ॥
नानक साचा साहिबु साची नाई सचु निसतारा होई ॥1॥
साचै सतिगुरि साचु बुझाइआ पति राखै सचु सोई राम ॥
सचा भोजनु भाउ सचा है सचै नामि सुखु होई राम ॥
साचै नामि सुखु होई मरै न कोई गरभि न जूनी वासा ॥
जोती जोति मिलाई सचि समाई सचि नाइ परगासा ॥
जिनी सचु जाता से सचे होए अनदिनु सचु धिआइनि ॥
नानक सचु नामु जिन हिरदै वसिआ ना वीछुड़ि दुखु पाइनि ॥2॥
सची बाणी सचे गुण गावहि तितु घरि सोहिला होई राम ॥
निरमल गुण साचे तनु मनु साचा विचि साचा पुरखु प्रभु सोई राम ॥
सभु सचु वरतै सचो बोलै जो सचु करै सु होई ॥
जह देखा तह सचु पसरिआ अवरु न दूजा कोई ॥
सचे उपजै सचि समावै मरि जनमै दूजा होई ॥
नानक सभु किछु आपे करता आपि करावै सोई ॥3॥
सचे भगत सोहहि दरवारे सचो सचु वखाणे राम ॥
घट अंतरे साची बाणी साचो आपि पछाणे राम ॥
आपु पछाणहि ता सचु जाणहि साचे सोझी होई ॥
सचा सबदु सची है सोभा साचे ही सुखु होई ॥
साचि रते भगत इक रंगी दूजा रंगु न कोई ॥
नानक जिस कउ मसतकि लिखिआ तिसु सचु परापति होई ॥4॥2॥3॥
सबदि सचै सचु सोहिला जिथै सचे का होइ वीचारो राम ॥
हउमै सभि किलविख काटे साचु रखिआ उरि धारे राम ॥
सचु रखिआ उर धारे दुतरु तारे फिरि भवजलु तरणु न होई ॥
सचा सतिगुरु सची बाणी जिनि सचु विखालिआ सोई ॥
साचे गुण गावै सचि समावै सचु वेखै सभु सोई ॥
नानक साचा साहिबु साची नाई सचु निसतारा होई ॥1॥
साचै सतिगुरि साचु बुझाइआ पति राखै सचु सोई राम ॥
सचा भोजनु भाउ सचा है सचै नामि सुखु होई राम ॥
साचै नामि सुखु होई मरै न कोई गरभि न जूनी वासा ॥
जोती जोति मिलाई सचि समाई सचि नाइ परगासा ॥
जिनी सचु जाता से सचे होए अनदिनु सचु धिआइनि ॥
नानक सचु नामु जिन हिरदै वसिआ ना वीछुड़ि दुखु पाइनि ॥2॥
सची बाणी सचे गुण गावहि तितु घरि सोहिला होई राम ॥
निरमल गुण साचे तनु मनु साचा विचि साचा पुरखु प्रभु सोई राम ॥
सभु सचु वरतै सचो बोलै जो सचु करै सु होई ॥
जह देखा तह सचु पसरिआ अवरु न दूजा कोई ॥
सचे उपजै सचि समावै मरि जनमै दूजा होई ॥
नानक सभु किछु आपे करता आपि करावै सोई ॥3॥
सचे भगत सोहहि दरवारे सचो सचु वखाणे राम ॥
घट अंतरे साची बाणी साचो आपि पछाणे राम ॥
आपु पछाणहि ता सचु जाणहि साचे सोझी होई ॥
सचा सबदु सची है सोभा साचे ही सुखु होई ॥
साचि रते भगत इक रंगी दूजा रंगु न कोई ॥
नानक जिस कउ मसतकि लिखिआ तिसु सचु परापति होई ॥4॥2॥3॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 3 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय-गृह में सच्चे शबद के द्वारा सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह का गीत होता रहता है।सदा स्थिर प्रभू के गुणों की विचार होती रहती है। उसके अंदर से अहंकार आदि जैसे सारे पाप कट जाते हैं।वह मनुष्य सदा-कायम रहने वाले परमात्मा को अपने दिल में बसाए रखता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू को हृदय में बसाए रखता है।मुश्किल से तैरे जाने वाले संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है।संसार-समुंद्र से पार लांघने की उसे बार-बार आवश्यक्ता नहीं रहती। हे भाई ! जिस गुरू ने उसको सदा-स्थिर प्रभू के दर्शन करवा दिए हैं।वह खुद भी सदा-स्थिर प्रभू का रूप है।उसकी बाणी प्रभू की सिफत सालाह से भरपूर है। (गुरू की कृपा से) वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाता रहता है।उसमें ही लीन रहता है।और उसको हर जगह बसा हुआ देखता है। हे नानक ! जो परमात्मा खुद सदा-स्थिर है।जिसकी महिमा सदा-स्थिर है वह उस मनुष्य का सदा के लिए पार-उतारा कर देता है। 1। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू के रूप गुरू ने जिस मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू का ज्ञान दिया उसकी लाज सदा-स्थिर प्रभू स्वयं रखता है। प्रभू-चरणों से अटल प्यार उस मनुष्य की आत्मिक खुराक बन जाता है।सदा-स्थिर हरी-नाम से उसको आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। जिस भी मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू के नाम में आत्मिक आनंद मिलता है।वह कभी आत्मिक मौत नहीं सहेड़ता।वह जनम-मरण के चक्करों जूनियों में नहीं पड़ता। (गुरू ने जिस मनुष्य की) सुरति परमात्मा की ज्योति में मिला दी।वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू में लीन हो जाता है।सदा-स्थिर हरी-नाम की बरकति से (उसके अंदर आत्मिक जीवन का) प्रकाश पैदा हो जाता है। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने सदा-स्थिर प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल ली वे उसी का रूप बन गए।वे हर वक्त उस सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमरते रहते हैं। हे नानक ! जिन मनुष्यों के हृदय में सदा-स्थिर प्रभू का नाम बस जाता है।वे फिर परमात्मा के चरणों से विछुड़ के दुख नहीं पाते। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य अपने हृदय में) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी के द्वारा सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाते हैं (उनकी) उस हृदय-गृह में आनंद मीठी सुरीली अवस्था बनी रहती है। सदा-स्थिर प्रभू के पवित्र गुणों की बरकति से उनका मन उनका तन (विकारों की ओर से) अडोल हो जाता है।उनके अंदर सदा-स्थिर प्रभू-पुरुख प्रत्यक्ष प्रकट हो जाता है। (उन्हें यकीन बन जाता है कि) हर जगह सदा-स्थिर प्रभू काम कर रहा है।वह ही बोल रहा है।जो कुछ वह करता है वही होता है। जिधर भी उन्होंने निगाह की।उधर ही उनको सदा-स्थिर प्रभू का पसारा दिखा।प्रभू के बिना उनको (कहीं भी) कोई और नहीं दिखता। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू से नया आत्मिक जीवन प्राप्त करता है।वह सदा-स्थिर प्रभू में ही लीन रहता है।पर माया के साथ प्यार करने वाला जनम-मरण में पड़ा रहता है। हे नानक ! करतार खुद ही सब कुछ कर रहा है।खुद ही जीवों से करवा रहा है। 3। हे भाई ! सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के भक्त उस सदा स्थिर प्रभू का नाम ही हर वक्त उचार के उसकी हजूरी में शोभा पाते हैं। उनके हृदय में सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी सदा बसती है।वे सदा-स्थिर प्रभू को अपने अंदर बसता देखते हैं। जब भक्तजन अपने आत्मिक जीवन की पड़ताल (आत्मचिंतन) करते हैं।तब वे सदा-स्थिर प्रभू के साथ गहरी सांझ डालते हैं।उन्हें उस सदा-स्थिर प्रभू की जान-पहचान हो जाती है। उनके अंदर प्रभू की सिफत सालाह वाला गुरू-शबद बसता रहता है।(इस कारण लोक-परलोक में) उन्हें सदा के लिए शोभा मिल जाती है।प्रभू में जुड़े रहने के कारण उन्हें आत्मिक आनंद मिला रहता है। सदा कायम रहने वाले परमात्मा (के प्रेम रंग) में रंगे हुए भक्तजन एक ही प्रभू-प्रेम के रंग में रंगे रहते हैं।कोई और (माया के मोह आदि का) रंग उन पर नहीं चढ़ता। हे नानक ! जिस मनुष्य के माथे पर (प्रभू-मिलाप के लेख) लिखे होते हैं।उसको सदा कायम रहने वाले परमात्मा का मिलाप प्राप्त हो जाता है। 4। 2। 3।
जुग चारे धन जे भवै बिनु सतिगुर सोहागु न होई राम ॥
सूही महला 3 ॥
जुग चारे धन जे भवै बिनु सतिगुर सोहागु न होई राम ॥
जुग चारे धन जे भवै बिनु सतिगुर सोहागु न होई राम ॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 3 ॥ हे भाई ! (युग चाहे कोई भी हो) गुरू (की शरण पड़े) बिना पति प्रभू का मिलाप नहीं होता।जीव-स्त्री चाहे चारों युगों में भटकती फिरे।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७६९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।