जिस नो किरपा करे गुरु मेले सो हरि हरि नामु समालि ॥
कहु नानक तीजै पहरै प्राणी से जाइ मिले हरि नालि ॥3॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि चलण वेला आदी ॥
करि सेवहु पूरा सतिगुरू वणजारिआ मित्रा सभ चली रैणि विहादी ॥
हरि सेवहु खिनु खिनु ढिल मूलि न करिहु जितु असथिरु जुगु जुगु होवहु ॥
हरि सेती सद माणहु रलीआ जनम मरण दुख खोवहु ॥
गुर सतिगुर सुआमी भेदु न जाणहु जितु मिलि हरि भगति सुखांदी ॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै सफलिओु रैणि भगता दी ॥4॥1॥3॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धरि पाइता उदरै माहि ॥
दसी मासी मानसु कीआ वणजारिआ मित्रा करि मुहलति करम कमाहि ॥
मुहलति करि दीनी करम कमाणे जैसा लिखतु धुरि पाइआ ॥
मात पिता भाई सुत बनिता तिन भीतरि प्रभू संजोइआ ॥
करम सुकरम कराए आपे इसु जंतै वसि किछु नाहि ॥
कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै धरि पाइता उदरै माहि ॥1॥
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा भरि जुआनी लहरी देइ ॥
बुरा भला न पछाणई वणजारिआ मित्रा मनु मता अहंमेइ ॥
बुरा भला न पछाणै प्राणी आगै पंथु करारा ॥
पूरा सतिगुरु कबहूं न सेविआ सिरि ठाढे जम जंदारा ॥
धरम राइ जब पकरसि बवरे तब किआ जबाबु करेइ ॥
कहु नानक दूजै पहरै प्राणी भरि जोबनु लहरी देइ ॥2॥
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिखु संचै अंधु अगिआनु ॥
पुत्रि कलत्रि मोहि लपटिआ वणजारिआ मित्रा अंतरि लहरि लोभानु ॥
अंतरि लहरि लोभानु परानी सो प्रभु चिति न आवै ॥
साधसंगति सिउ संगु न कीआ बहु जोनी दुखु पावै ॥
सिरजनहारु विसारिआ सुआमी इक निमख न लगो धिआनु ॥
कहु नानक प्राणी तीजै पहरै बिखु संचे अंधु अगिआनु ॥3॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥
गुरमुखि नामु समालि तूं वणजारिआ मित्रा तेरा दरगह बेली होइ ॥
गुरमुखि नामु समालि पराणी अंते होइ सखाई ॥
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ये धन पदार्थ ये माया सदा साथ निभाने वाले नहीं हैं, और समय आने पर पछताता हुआ इनको छोड़ के जाता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।