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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 77 · सिरी राग

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अंग
77
सिरी राग
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  1. इहु धनु संपै माइआ झूठी अंति छोडि चलिआ पछुताई ॥
  2. पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धरि पाइता उदरै माहि ॥

इहु धनु संपै माइआ झूठी अंति छोडि चलिआ पछुताई ॥

अंग 76 से चला आ रहा अंश

इहु धनु संपै माइआ झूठी अंति छोडि चलिआ पछुताई ॥
जिस नो किरपा करे गुरु मेले सो हरि हरि नामु समालि ॥
कहु नानक तीजै पहरै प्राणी से जाइ मिले हरि नालि ॥3॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि चलण वेला आदी ॥
करि सेवहु पूरा सतिगुरू वणजारिआ मित्रा सभ चली रैणि विहादी ॥
हरि सेवहु खिनु खिनु ढिल मूलि न करिहु जितु असथिरु जुगु जुगु होवहु ॥
हरि सेती सद माणहु रलीआ जनम मरण दुख खोवहु ॥
गुर सतिगुर सुआमी भेदु न जाणहु जितु मिलि हरि भगति सुखांदी ॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै सफलिओु रैणि भगता दी ॥4॥1॥3॥

हिन्दी अर्थ: ये धन पदार्थ ये माया सदा साथ निभाने वाले नहीं हैं, और समय आने पर पछताता हुआ इनको छोड़ के जाता है। जिस मनुष्य पर परमात्मा मिहर करता है उसे गुरू मिलता है, और वह सदा परमात्मा का नाम हृदय में संभालता है। हे नानक ! कह, जो प्राणी हरि का नाम संभालते हैं, वह परमात्मा में जा मिलते हैं।3। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की रात के) चौथे पहर परमात्मा (जीव के यहां से) चलने का समय (ही) आता है। हे वणजारे जीव मित्र ! गुरू को अभुल जान के गुरू की शरण पड़ो, (जिंदगी की) सारी रात बीतती जा रही है। (हे जीव मित्र !)श्वाश - श्वाश परमात्मा का नाम सिमरो, (इस काम में) बिल्कुल आलस ना करो, सिमरन की बरकति से ही सदा के लिए अटॅल आत्मिक जीवन वाले बन सकोगे। (हे जीव मित्र ! सिमरन की बरकति से ही) परमात्मा के मिलाप का आनंद प्राप्त कर सकोगे और जनम मरण के चक्कर में पड़ने वाले दुखों को खत्म कर सकोगे। (हे जीव मित्र !) गुरू और परमात्मा के बीच रॅती भर भी फर्क ना समझो गुरू (के चरणों) में जुड़ के ही परमात्मा की भक्ति प्यारी लगती है। हे नानक ! कह, जो प्राणी (जिंदगी की रात के) चौथे पहर में भी (परमात्मा की भक्ति करते रहते हैं उन) भक्तों की (जिंदगी की सारी) रात कामयाब रहती है।4।1।3।

पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धरि पाइता उदरै माहि ॥

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सिरीरागु महला 5 ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धरि पाइता उदरै माहि ॥
दसी मासी मानसु कीआ वणजारिआ मित्रा करि मुहलति करम कमाहि ॥
मुहलति करि दीनी करम कमाणे जैसा लिखतु धुरि पाइआ ॥
मात पिता भाई सुत बनिता तिन भीतरि प्रभू संजोइआ ॥
करम सुकरम कराए आपे इसु जंतै वसि किछु नाहि ॥
कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै धरि पाइता उदरै माहि ॥1॥
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा भरि जुआनी लहरी देइ ॥
बुरा भला न पछाणई वणजारिआ मित्रा मनु मता अहंमेइ ॥
बुरा भला न पछाणै प्राणी आगै पंथु करारा ॥
पूरा सतिगुरु कबहूं न सेविआ सिरि ठाढे जम जंदारा ॥
धरम राइ जब पकरसि बवरे तब किआ जबाबु करेइ ॥
कहु नानक दूजै पहरै प्राणी भरि जोबनु लहरी देइ ॥2॥
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिखु संचै अंधु अगिआनु ॥
पुत्रि कलत्रि मोहि लपटिआ वणजारिआ मित्रा अंतरि लहरि लोभानु ॥
अंतरि लहरि लोभानु परानी सो प्रभु चिति न आवै ॥
साधसंगति सिउ संगु न कीआ बहु जोनी दुखु पावै ॥
सिरजनहारु विसारिआ सुआमी इक निमख न लगो धिआनु ॥
कहु नानक प्राणी तीजै पहरै बिखु संचे अंधु अगिआनु ॥3॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥
गुरमुखि नामु समालि तूं वणजारिआ मित्रा तेरा दरगह बेली होइ ॥
गुरमुखि नामु समालि पराणी अंते होइ सखाई ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (मानस जिंदगी की) रात के पहले पहर परमात्मा माँ के पेट में (जीव का) पैंतड़ा रखता है। हे वणजारे मित्र ! (फिर) दसों महीनों में प्रभू मनुष्य (का साबत बुत) बना देता है। (जीवों को जिंदगी का) मुकरॅर समय देता है। (जिसमें जीव अच्छे-बुरे कर्म) कमाते हैं। परमात्मा जीव के लिए जिंदगी का समय मुकरॅर कर देता है। पीछे किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार प्रभू जीव के माथे पे धुर से जैसा लेख लिख देता है, वैसे ही कर्म जीव कमाते हैं। माता पिता भाई पुत्र स्त्री (आदिक) इन संबंधियों में प्रभू जीव को रचा मचा देता है। परमात्मा स्वयं ही इससे अच्छे बुरे कर्म कराता है। हे नानक ! कह, (जिंदगी की रात के) पहले पहर परमात्मा प्राणी का पैंतड़ा माँ के पेट में रख देता है।1। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर शिखर पर पहुँची हुई जवानी (जीव के अंदर) उछाले मारती है। हे वणजारे मित्र ! तब जीव का मन अहंकार (गुरूर) में मस्त रहता है, और वह अच्छे-बुरे काम में तमीज नही करता। (जवानी के नशे में) प्राणी ये नहीं पहचानता, कि जो कुछ मैं कर रहा हूँ अच्छा है या बुरा (विकारों में पड़ जाता है, और) परलोक में रास्ता मुश्किल बना लेता है। (अहंकार में मस्त मनुष्य) पूरे गुरू की शरण नही पड़ता, (इस वास्ते उस के) सिर पर जालिम यम आ खड़े हुए हैं। (जवानी के नशे में मनुष्य कभी नही सोचता कि अहंकार में) झल्ले हो चुके को जब धर्मराज आ पकड़ेगा, तब (अपनी गलत करतूतों के बारे में) वह क्या जवाब देगा? हे नानक ! कह, (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर शिखर पे पहुँचा हुआ जोबन (मनुष्य के अंदर) उछाले मारता है।2। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी के) रात के तीसरे पहर माया के मोह में अंधा हुआ व ज्ञानहीन मनुष्य (आत्मिक जीवन को खत्म कर देनें वाला धन रूपी) जहर एकत्र करता रहता है। हे वणजारे मित्र ! तब मनुष्य माया का लोभी हो जाता है। इसके अंदर (लोभ की) लहरें उठती हैं, मनुष्य पुत्र (के मोह) में, स्त्री (के मोह) में, (माया के) मोह में फंसा रहता है। प्राणी के अंदर (लोभ की) लहरें उठती हैं, मनुष्य लोभी हुआ रहता है, वह परमात्मा कभी इसके चित्त में नहीं आता। मनुष्य तब साध-संगति से मेल मिलाप नहीं रखता, (आखिर) कई जूनियों में (भटकता) दुख बर्दाश्त करता है। मनुष्य अपने सृजनहार मालिक को भुला देता है, आँख झपकने के जितना समय भी परमात्मा में सुरति नहीं जोड़ता। हे नानक ! कह, (जिंदगी की) रात के तीसरे पहर अंधा ज्ञान हीन मनुष्य (आत्मिक मौत ले आने धन-रूप) जहर (ही) एकत्र करता रहता है।3। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की रात) के चौथे पहर वह दिन नजदीक आ जाता है, (जब यहां से कूच करना होता है)। हे वणजारे मित्र ! प्रभू का नाम हृदय में बसा, नाम ही प्रभू की दरगाह में आपका मददगार बनेगा। हे प्राणी ! गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रख, नाम ही आखिरी समय साथी बनता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 77 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।