Lulla Family

अंग 77

अंग
77
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
इहु धनु संपै माइआ झूठी अंति छोडि चलिआ पछुताई ॥
जिस नो किरपा करे गुरु मेले सो हरि हरि नामु समालि ॥
कहु नानक तीजै पहरै प्राणी से जाइ मिले हरि नालि ॥3॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि चलण वेला आदी ॥
करि सेवहु पूरा सतिगुरू वणजारिआ मित्रा सभ चली रैणि विहादी ॥
हरि सेवहु खिनु खिनु ढिल मूलि न करिहु जितु असथिरु जुगु जुगु होवहु ॥
हरि सेती सद माणहु रलीआ जनम मरण दुख खोवहु ॥
गुर सतिगुर सुआमी भेदु न जाणहु जितु मिलि हरि भगति सुखांदी ॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै सफलिओु रैणि भगता दी ॥4॥1॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: ये धन पदार्थ ये माया सदा साथ निभाने वाले नहीं हैं, और समय आने पर पछताता हुआ इनको छोड़ के जाता है। जिस मनुष्य पर परमात्मा मिहर करता है उसे गुरू मिलता है, और वह सदा परमात्मा का नाम हृदय में संभालता है। हे नानक ! कह, जो प्राणी हरि का नाम संभालते हैं, वह परमात्मा में जा मिलते हैं।3। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की रात के) चौथे पहर परमात्मा (जीव के यहां से) चलने का समय (ही) आता है। हे वणजारे जीव मित्र ! गुरू को अभुल जान के गुरू की शरण पड़ो, (जिंदगी की) सारी रात बीतती जा रही है। (हे जीव मित्र !)श्वाश – श्वाश परमात्मा का नाम सिमरो, (इस काम में) बिल्कुल आलस ना करो, सिमरन की बरकति से ही सदा के लिए अटॅल आत्मिक जीवन वाले बन सकोगे। (हे जीव मित्र ! सिमरन की बरकति से ही) परमात्मा के मिलाप का आनंद प्राप्त कर सकोगे और जनम मरण के चक्कर में पड़ने वाले दुखों को खत्म कर सकोगे। (हे जीव मित्र !) गुरू और परमात्मा के बीच रॅती भर भी फर्क ना समझो गुरू (के चरणों) में जुड़ के ही परमात्मा की भक्ति प्यारी लगती है। हे नानक ! कह, जो प्राणी (जिंदगी की रात के) चौथे पहर में भी (परमात्मा की भक्ति करते रहते हैं उन) भक्तों की (जिंदगी की सारी) रात कामयाब रहती है।4।1।3।
सिरीरागु महला 5 ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धरि पाइता उदरै माहि ॥
दसी मासी मानसु कीआ वणजारिआ मित्रा करि मुहलति करम कमाहि ॥
मुहलति करि दीनी करम कमाणे जैसा लिखतु धुरि पाइआ ॥
मात पिता भाई सुत बनिता तिन भीतरि प्रभू संजोइआ ॥
करम सुकरम कराए आपे इसु जंतै वसि किछु नाहि ॥
कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै धरि पाइता उदरै माहि ॥1॥
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा भरि जुआनी लहरी देइ ॥
बुरा भला न पछाणई वणजारिआ मित्रा मनु मता अहंमेइ ॥
बुरा भला न पछाणै प्राणी आगै पंथु करारा ॥
पूरा सतिगुरु कबहूं न सेविआ सिरि ठाढे जम जंदारा ॥
धरम राइ जब पकरसि बवरे तब किआ जबाबु करेइ ॥
कहु नानक दूजै पहरै प्राणी भरि जोबनु लहरी देइ ॥2॥
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिखु संचै अंधु अगिआनु ॥
पुत्रि कलत्रि मोहि लपटिआ वणजारिआ मित्रा अंतरि लहरि लोभानु ॥
अंतरि लहरि लोभानु परानी सो प्रभु चिति न आवै ॥
साधसंगति सिउ संगु न कीआ बहु जोनी दुखु पावै ॥
सिरजनहारु विसारिआ सुआमी इक निमख न लगो धिआनु ॥
कहु नानक प्राणी तीजै पहरै बिखु संचे अंधु अगिआनु ॥3॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥
गुरमुखि नामु समालि तूं वणजारिआ मित्रा तेरा दरगह बेली होइ ॥
गुरमुखि नामु समालि पराणी अंते होइ सखाई ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (मानस जिंदगी की) रात के पहले पहर परमात्मा माँ के पेट में (जीव का) पैंतड़ा रखता है। हे वणजारे मित्र ! (फिर) दसों महीनों में प्रभू मनुष्य (का साबत बुत) बना देता है। (जीवों को जिंदगी का) मुकरॅर समय देता है। (जिसमें जीव अच्छे-बुरे कर्म) कमाते हैं। परमात्मा जीव के लिए जिंदगी का समय मुकरॅर कर देता है। पीछे किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार प्रभू जीव के माथे पे धुर से जैसा लेख लिख देता है, वैसे ही कर्म जीव कमाते हैं। माता पिता भाई पुत्र स्त्री (आदिक) इन संबंधियों में प्रभू जीव को रचा मचा देता है।परमात्मा स्वयं ही इससे अच्छे बुरे कर्म कराता है। हे नानक ! कह, (जिंदगी की रात के) पहले पहर परमात्मा प्राणी का पैंतड़ा माँ के पेट में रख देता है।1। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर शिखर पर पहुँची हुई जवानी (जीव के अंदर) उछाले मारती है। हे वणजारे मित्र ! तब जीव का मन अहंकार (गुरूर) में मस्त रहता है, और वह अच्छे-बुरे काम में तमीज नही करता। (जवानी के नशे में) प्राणी ये नहीं पहचानता, कि जो कुछ मैं कर रहा हूँ अच्छा है या बुरा (विकारों में पड़ जाता है, और) परलोक में रास्ता मुश्किल बना लेता है। (अहंकार में मस्त मनुष्य) पूरे गुरू की शरण नही पड़ता, (इस वास्ते उस के) सिर पर जालिम यम आ खड़े हुए हैं। (जवानी के नशे में मनुष्य कभी नही सोचता कि अहंकार में) झल्ले हो चुके को जब धर्मराज आ पकड़ेगा, तब (अपनी गलत करतूतों के बारे में) वह क्या जवाब देगा? हे नानक ! कह, (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर शिखर पे पहुँचा हुआ जोबन (मनुष्य के अंदर) उछाले मारता है।2। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी के) रात के तीसरे पहर माया के मोह में अंधा हुआ व ज्ञानहीन मनुष्य (आत्मिक जीवन को खत्म कर देनें वाला धन रूपी) जहर एकत्र करता रहता है। हे वणजारे मित्र ! तब मनुष्य माया का लोभी हो जाता है। इसके अंदर (लोभ की) लहरें उठती हैं, मनुष्य पुत्र (के मोह) में, स्त्री (के मोह) में, (माया के) मोह में फंसा रहता है। प्राणी के अंदर (लोभ की) लहरें उठती हैं, मनुष्य लोभी हुआ रहता है, वह परमात्मा कभी इसके चित्त में नहीं आता। मनुष्य तब साध-संगति से मेल मिलाप नहीं रखता, (आखिर) कई जूनियों में (भटकता) दुख बर्दाश्त करता है। मनुष्य अपने सृजनहार मालिक को भुला देता है, आँख झपकने के जितना समय भी परमात्मा में सुरति नहीं जोड़ता। हे नानक ! कह, (जिंदगी की) रात के तीसरे पहर अंधा ज्ञान हीन मनुष्य (आत्मिक मौत ले आने धन-रूप) जहर (ही) एकत्र करता रहता है।3। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की रात) के चौथे पहर वह दिन नजदीक आ जाता है, (जब यहां से कूच करना होता है)। हे वणजारे मित्र ! प्रभू का नाम हृदय में बसा, नाम ही प्रभू की दरगाह में आपका मददगार बनेगा। हे प्राणी ! गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रख, नाम ही आखिरी समय साथी बनता है।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ये धन पदार्थ ये माया सदा साथ निभाने वाले नहीं हैं, और समय आने पर पछताता हुआ इनको छोड़ के जाता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।