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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 76 · सिरी राग

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अंग
76
सिरी राग
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  1. अंति कालि पछुतासी अंधुले जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥
  2. पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि पाइआ उदर मंझारि ॥

अंति कालि पछुतासी अंधुले जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥

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अंति कालि पछुतासी अंधुले जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥
सभु किछु अपुना करि करि राखिआ खिन महि भइआ पराइआ ॥
बुधि विसरजी गई सिआणप करि अवगण पछुताइ ॥
कहु नानक प्राणी तीजै पहरै प्रभु चेतहु लिव लाइ ॥3॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिरधि भइआ तनु खीणु ॥
अखी अंधु न दीसई वणजारिआ मित्रा कंनी सुणै न वैण ॥
अखी अंधु जीभ रसु नाही रहे पराकउ ताणा ॥
गुण अंतरि नाही किउ सुखु पावै मनमुख आवण जाणा ॥
खड़ु पकी कुड़ि भजै बिनसै आइ चलै किआ माणु ॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै गुरमुखि सबदु पछाणु ॥4॥
ओड़कु आइआ तिन साहिआ वणजारिआ मित्रा जरु जरवाणा कंनि ॥
इक रती गुण न समाणिआ वणजारिआ मित्रा अवगण खड़सनि बंनि ॥
गुण संजमि जावै चोट न खावै ना तिसु जंमणु मरणा ॥
कालु जालु जमु जोहि न साकै भाइ भगति भै तरणा ॥
पति सेती जावै सहजि समावै सगले दूख मिटावै ॥
कहु नानक प्राणी गुरमुखि छूटै साचे ते पति पावै ॥5॥2॥

हिन्दी अर्थ: हे माया के मोह में अंधे हुए जीव ! जब यम ने पकड़ के आपको आगे लगा लिया, तब आखिरी वक्त पर आप पछताएँगे। आप हरेक चीज को अपनी बना बना के सँभालते गए, वह सब कुछ एक छिन में पराया माल हो जाएगा। (माया के मोह में फंस के जीव की) अक्ल मारी जाती है, बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, बुरे काम कर कर के (आखिर अंत समय) पछताता है। हे नानक ! कह, हे जीव ! (जिंदगी की रात के) तीसरे पहर (सिर पर सफेद बाल आ गए हैं, अब तो प्रभू चरणों में) सुरति जोड़ के सिमरन कर।3। हरि नाम का व्यापार करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के चौथे पहर (जीव) बुड्ढा हो जाता है, (उसका) शरीर कमजोर हो जाता है। हे वणजारे मित्र ! आँखों के आगे अंधेरा आ जाता है, (आंखों से ठीक) दिखाई नहीं देता, कानों से बोल (ठीक तरह) नहीं सुनाई देते। आँखों से अंधा हो जाता है, जीभ में स्वाद (की ताकत) नहीं रहती। उद्यम और ताकत कमजोर हो जाते हैं। अपने हृदय में कभी परमात्मा के गुण नहीं बसाए, अब सुख कहां मिले? मन के मुरीद को जनम मरण का चक्कर पड़ जाता है। (जैसे) पके हुए गेहूँ का नाड़ कुड़क के टूट जाता है (वैसे ही बुढ़ापा आने पर शरीर) नाश हो जाता है, (जीव जगत में) आ के (आखिर यहां से) चल पड़ता है (इस शरीर का) माण करना व्यर्थ है। हे नानक ! कह,हे प्राणी ! (जिंदगी की रात के) चौथे पहर (आप बूढ़े हो गए हैं, अब) गुरू के शबद को पहचानें (गुरू शबद से गहरी सांझ डालें)।4। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जीव को उम्र के जितने श्वास मिले हैं, आखिर) उन श्वासों का अंत आ गया, बलवान बुढ़ापा कांधे पर (नाचने लग पड़ा)। हे वणजारे मित्र ! जिसके हृदय में रॅती भर भी गुण ना टिके, उस को (उसके अपने ही किए हुए) औगुण बांध के ले चलते हैं। जो जीव (यहां से आत्मिक) गुणों के संजम (की सहायता) से जाता है, वह (यमराज की) चोट नहीं सहता, उसे जनम मरण का चक्कर नहीं व्यापता। यम का जाल मौत का डर उसकी ओर कोई देख भी नहीं सकता। परमात्मा के प्रेम की बरकति से परमात्मा की भक्ति से वह (संसार समुंद्र के सारे) डरों से पार लांघ जाता है। वह यहां से इज्जत से जाता है, सदा अडोल अवस्था में टिका रहता है, वह अपने सारे दुख कलेश दूर कर लेता है। हे नानक ! कह, जो जीव गुरू की शरण पड़ता है वह (संसार समुंद्र के सारे डरों से) बच जाता है, वह सदा स्थिर प्रभू के दर से आदर प्राप्त करता है।5।2।

पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि पाइआ उदर मंझारि ॥

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सिरीरागु महला 4 ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि पाइआ उदर मंझारि ॥
हरि धिआवै हरि उचरै वणजारिआ मित्रा हरि हरि नामु समारि ॥
हरि हरि नामु जपे आराधे विचि अगनी हरि जपि जीविआ ॥
बाहरि जनमु भइआ मुखि लागा सरसे पिता मात थीविआ ॥
जिस की वसतु तिसु चेतहु प्राणी करि हिरदै गुरमुखि बीचारि ॥
कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै हरि जपीऐ किरपा धारि ॥1॥
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लागा दूजै भाइ ॥
मेरा मेरा करि पालीऐ वणजारिआ मित्रा ले मात पिता गलि लाइ ॥
लावै मात पिता सदा गल सेती मनि जाणै खटि खवाए ॥
जो देवै तिसै न जाणै मूड़ा दिते नो लपटाए ॥
कोई गुरमुखि होवै सु करै वीचारु हरि धिआवै मनि लिव लाइ ॥
कहु नानक दूजै पहरै प्राणी तिसु कालु न कबहूं खाइ ॥2॥
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लगा आलि जंजालि ॥
धनु चितवै धनु संचवै वणजारिआ मित्रा हरि नामा हरि न समालि ॥
हरि नामा हरि हरि कदे न समालै जि होवै अंति सखाई ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ॥ हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की रात के) पहले पहर में परमात्मा (जीव को) माँ के पेट में निवास देता है। (माँ के पेट में जीव), हे वणजारे मित्र ! परमात्मा का ध्यान धरता है, परमात्मा का नाम उचारता है, और परमातमा के नाम को हृदय में बसाए रखता है। (माँ के पेट में जीव) परमात्मा का नाम जपता है आराधता है, हरि नाम जप के आग में जीता रहता है। (माँ के पेट में से) बाहर (आ के) जनम लेता है (माता-पिता के) मुंह लगता है, माता-पिता खुश होते हैं। हे प्राणियों ! जिस परमात्मा का भेजा हुआ ये बालक पैदा हुआ है, उसका ध्यान धरो, गुरू के द्वारा अपने हृदय में (उसके गुणों का) विचार करो। हे नानक ! कह, हे प्राणी ! यदि परमात्मा मेहर करे तो (जिंदगी की रात के) पहिले पहर में परमात्मा का नाम जपा जा सकता है।1। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की रात के) दूसरे पहर में (जीव का) मन (परमात्मा को भुला के) और प्यार में लग जाता है। हे वणजारे मित्र ! (ये) मेरा (पुत्र है, ये) मेरा (पुत्र है, ये) कह कह के (बालक) पाला जाता है। माँ पकड़ के गले से लगाती है, पिता पकड़ के गले से लगाता है। माँ बार बार गले से लगाती है, पिता बार बार गले से लगाता है। माँ अपने मन में समझती है, पिता अपने मन में समझता है कि (हमें) कमा के खिलाएगा। मूर्ख (मनुष्य) उस परमात्मा को नहीं पहचानता (नहीं याद करता) जो (धन पुत्र आदि) देता है, परमात्मा के दिए हुए (धन पुत्र आदिक) से मोह करता है। जो कोई (भाग्यशाली मनुष्य) गुरू की शरण पड़ता है वह (इस असलियत की) विचार करता है, और सुरति जोड़ के अपने मन में परमात्मा का ध्यान धरता है। हे नानक ! कह, (जिंदगी की रात के) दूसरे पहर में (जो) प्राणी (परमात्मा का ध्यान धरता है, उसको) आत्मिक मौत कभी भी नहीं खाती।2। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की रात के) तीसरे पहर में (मनुष्य का) मन घर के मोह में लग जाता है, दुनिया के धंधों के मोह में फंस जाता है। मनुष्य धन (ही) चितवता है, धन (ही) इकट्ठा करता है, और परमात्मा का नाम कभी भी हृदय में नहीं बसाता। (मोह में फंस के मनुष्य) कभी भी परमात्मा का वह नाम अपने दिल में नहीं बसाता जो आखिरी समय में साथी बनता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 76 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।