सभु किछु अपुना करि करि राखिआ खिन महि भइआ पराइआ ॥
बुधि विसरजी गई सिआणप करि अवगण पछुताइ ॥
कहु नानक प्राणी तीजै पहरै प्रभु चेतहु लिव लाइ ॥3॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिरधि भइआ तनु खीणु ॥
अखी अंधु न दीसई वणजारिआ मित्रा कंनी सुणै न वैण ॥
अखी अंधु जीभ रसु नाही रहे पराकउ ताणा ॥
गुण अंतरि नाही किउ सुखु पावै मनमुख आवण जाणा ॥
खड़ु पकी कुड़ि भजै बिनसै आइ चलै किआ माणु ॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै गुरमुखि सबदु पछाणु ॥4॥
ओड़कु आइआ तिन साहिआ वणजारिआ मित्रा जरु जरवाणा कंनि ॥
इक रती गुण न समाणिआ वणजारिआ मित्रा अवगण खड़सनि बंनि ॥
गुण संजमि जावै चोट न खावै ना तिसु जंमणु मरणा ॥
कालु जालु जमु जोहि न साकै भाइ भगति भै तरणा ॥
पति सेती जावै सहजि समावै सगले दूख मिटावै ॥
कहु नानक प्राणी गुरमुखि छूटै साचे ते पति पावै ॥5॥2॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि पाइआ उदर मंझारि ॥
हरि धिआवै हरि उचरै वणजारिआ मित्रा हरि हरि नामु समारि ॥
हरि हरि नामु जपे आराधे विचि अगनी हरि जपि जीविआ ॥
बाहरि जनमु भइआ मुखि लागा सरसे पिता मात थीविआ ॥
जिस की वसतु तिसु चेतहु प्राणी करि हिरदै गुरमुखि बीचारि ॥
कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै हरि जपीऐ किरपा धारि ॥1॥
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लागा दूजै भाइ ॥
मेरा मेरा करि पालीऐ वणजारिआ मित्रा ले मात पिता गलि लाइ ॥
लावै मात पिता सदा गल सेती मनि जाणै खटि खवाए ॥
जो देवै तिसै न जाणै मूड़ा दिते नो लपटाए ॥
कोई गुरमुखि होवै सु करै वीचारु हरि धिआवै मनि लिव लाइ ॥
कहु नानक दूजै पहरै प्राणी तिसु कालु न कबहूं खाइ ॥2॥
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लगा आलि जंजालि ॥
धनु चितवै धनु संचवै वणजारिआ मित्रा हरि नामा हरि न समालि ॥
हरि नामा हरि हरि कदे न समालै जि होवै अंति सखाई ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे माया के मोह में अंधे हुए जीव ! जब यम ने पकड़ के आपको आगे लगा लिया, तब आखिरी वक्त पर आप पछताएगा।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।