Lulla Family

अंग 76

अंग
76
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अंति कालि पछुतासी अंधुले जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥
सभु किछु अपुना करि करि राखिआ खिन महि भइआ पराइआ ॥
बुधि विसरजी गई सिआणप करि अवगण पछुताइ ॥
कहु नानक प्राणी तीजै पहरै प्रभु चेतहु लिव लाइ ॥3॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिरधि भइआ तनु खीणु ॥
अखी अंधु न दीसई वणजारिआ मित्रा कंनी सुणै न वैण ॥
अखी अंधु जीभ रसु नाही रहे पराकउ ताणा ॥
गुण अंतरि नाही किउ सुखु पावै मनमुख आवण जाणा ॥
खड़ु पकी कुड़ि भजै बिनसै आइ चलै किआ माणु ॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै गुरमुखि सबदु पछाणु ॥4॥
ओड़कु आइआ तिन साहिआ वणजारिआ मित्रा जरु जरवाणा कंनि ॥
इक रती गुण न समाणिआ वणजारिआ मित्रा अवगण खड़सनि बंनि ॥
गुण संजमि जावै चोट न खावै ना तिसु जंमणु मरणा ॥
कालु जालु जमु जोहि न साकै भाइ भगति भै तरणा ॥
पति सेती जावै सहजि समावै सगले दूख मिटावै ॥
कहु नानक प्राणी गुरमुखि छूटै साचे ते पति पावै ॥5॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: हे माया के मोह में अंधे हुए जीव ! जब यम ने पकड़ के आपको आगे लगा लिया, तब आखिरी वक्त पर आप पछताएगा। आप हरेक चीज को अपनी बना बना के संभालता गया, वह सब कुछ एक छिन में पराया माल हो जाएगा। (माया के मोह में फंस के जीव की) अक्ल मारी जाती है, बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, बुरे काम कर कर के (आखिर अंत समय) पछताता है। हे नानक ! कह, हे जीव ! (जिंदगी की रात के) तीसरे पहर (सिर पर सफेद बाल आ गए हैं, अब तो प्रभू चरणों में) सुरति जोड़ के सिमरन कर।3। हरि नाम का व्यापार करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के चौथे पहर (जीव) बुड्ढा हो जाता है, (उसका) शरीर कमजोर हो जाता है। हे वणजारे मित्र ! आँखों के आगे अंधेरा आ जाता है, (आंखों से ठीक) दिखाई नहीं देता, कानों से बोल (ठीक तरह) नहीं सुनाई देते। आँखों से अंधा हो जाता है, जीभ में स्वाद (की ताकत) नहीं रहती। उद्यम और ताकत कमजोर हो जाते हैं। अपने हृदय में कभी परमात्मा के गुण नहीं बसाए, अब सुख कहां मिले? मन के मुरीद को जनम मरण का चक्कर पड़ जाता है। (जैसे) पके हुए गेहूँ का नाड़ कुड़क के टूट जाता है (वैसे ही बुढ़ापा आने पर शरीर) नाश हो जाता है, (जीव जगत में) आ के (आखिर यहां से) चल पड़ता है (इस शरीर का) माण करना व्यर्थ है। हे नानक ! कह,हे प्राणी ! (जिंदगी की रात के) चौथे पहर (आप बूढ़ा हैं गया है, अब) गुरू के शबद को पहिचान (गुरू शबद से गहरी सांझ डाल)।4। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जीव को उम्र के जितने श्वास मिले हैं, आखिर) उन श्वासों का अंत आ गया, बलवान बुढ़ापा कांधे पर (नाचने लग पड़ा)। हे वणजारे मित्र ! जिसके हृदय में रॅती भर भी गुण ना टिके, उस को (उसके अपने ही किए हुए) औगुण बांध के ले चलते हैं। जो जीव (यहां से आत्मिक) गुणों के संजम (की सहायता) से जाता है, वह (यमराज की) चोट नहीं सहता, उसे जनम मरण का चक्कर नहीं व्यापता। यम का जाल मौत का डर उसकी ओर कोई देख भी नहीं सकता। परमात्मा के प्रेम की बरकति से परमात्मा की भक्ति से वह (संसार समुंद्र के सारे) डरों से पार लांघ जाता है। वह यहां से इज्जत से जाता है, सदा अडोल अवस्था में टिका रहता है, वह अपने सारे दुख कलेश दूर कर लेता है। हे नानक ! कह, जो जीव गुरू की शरण पड़ता है वह (संसार समुंद्र के सारे डरों से) बच जाता है, वह सदा स्थिर प्रभू के दर से आदर प्राप्त करता है।5।2।
सिरीरागु महला 4 ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि पाइआ उदर मंझारि ॥
हरि धिआवै हरि उचरै वणजारिआ मित्रा हरि हरि नामु समारि ॥
हरि हरि नामु जपे आराधे विचि अगनी हरि जपि जीविआ ॥
बाहरि जनमु भइआ मुखि लागा सरसे पिता मात थीविआ ॥
जिस की वसतु तिसु चेतहु प्राणी करि हिरदै गुरमुखि बीचारि ॥
कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै हरि जपीऐ किरपा धारि ॥1॥
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लागा दूजै भाइ ॥
मेरा मेरा करि पालीऐ वणजारिआ मित्रा ले मात पिता गलि लाइ ॥
लावै मात पिता सदा गल सेती मनि जाणै खटि खवाए ॥
जो देवै तिसै न जाणै मूड़ा दिते नो लपटाए ॥
कोई गुरमुखि होवै सु करै वीचारु हरि धिआवै मनि लिव लाइ ॥
कहु नानक दूजै पहरै प्राणी तिसु कालु न कबहूं खाइ ॥2॥
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लगा आलि जंजालि ॥
धनु चितवै धनु संचवै वणजारिआ मित्रा हरि नामा हरि न समालि ॥
हरि नामा हरि हरि कदे न समालै जि होवै अंति सखाई ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ॥ हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की रात के) पहले पहर में परमात्मा (जीव को) माँ के पेट में निवास देता है। (माँ के पेट में जीव), हे वणजारे मित्र ! परमात्मा का ध्यान धरता है, परमात्मा का नाम उचारता है, और परमातमा के नाम को हृदय में बसाए रखता है। (माँ के पेट में जीव) परमात्मा का नाम जपता है आराधता है, हरि नाम जप के आग में जीता रहता है। (माँ के पेट में से) बाहर (आ के) जनम लेता है (माता-पिता के) मुंह लगता है, माता-पिता खुश होते हैं। हे प्राणियों ! जिस परमात्मा का भेजा हुआ ये बालक पैदा हुआ है, उसका ध्यान धरो, गुरू के द्वारा अपने हृदय में (उसके गुणों का) विचार करो। हे नानक ! कह, हे प्राणी ! यदि परमात्मा मेहर करे तो (जिंदगी की रात के) पहिले पहर में परमात्मा का नाम जपा जा सकता है।1। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की रात के) दूसरे पहर में (जीव का) मन (परमात्मा को भुला के) और प्यार में लग जाता है। हे वणजारे मित्र ! (ये) मेरा (पुत्र है, ये) मेरा (पुत्र है, ये) कह कह के (बालक) पाला जाता है। माँ पकड़ के गले से लगाती है, पिता पकड़ के गले से लगाता है। माँ बार बार गले से लगाती है, पिता बार बार गले से लगाता है। माँ अपने मन में समझती है, पिता अपने मन में समझता है कि (हमें) कमा के खिलाएगा। मूर्ख (मनुष्य) उस परमात्मा को नहीं पहचानता (नहीं याद करता) जो (धन पुत्र आदि) देता है, परमात्मा के दिए हुए (धन पुत्र आदिक) से मोह करता है। जो कोई (भाग्यशाली मनुष्य) गुरू की शरण पड़ता है वह (इस असलियत की) विचार करता है, और सुरति जोड़ के अपने मन में परमात्मा का ध्यान धरता है। हे नानक ! कह, (जिंदगी की रात के) दूसरे पहर में (जो) प्राणी (परमात्मा का ध्यान धरता है, उसको) आत्मिक मौत कभी भी नहीं खाती।2। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की रात के) तीसरे पहर में (मनुष्य का) मन घर के मोह में लग जाता है, दुनिया के धंधों के मोह में फंस जाता है। मनुष्य धन (ही) चितवता है, धन (ही) इकट्ठा करता है, और परमात्मा का नाम कभी भी हृदय में नहीं बसाता। (मोह में फंस के मनुष्य) कभी भी परमात्मा का वह नाम अपने दिल में नहीं बसाता जो आखिरी समय में साथी बनता है।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे माया के मोह में अंधे हुए जीव ! जब यम ने पकड़ के आपको आगे लगा लिया, तब आखिरी वक्त पर आप पछताएगा।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।