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अंग 768

अंग
768
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अंदरहु दुरमति दूजी खोई सो जनु हरि लिव लागा ॥
जिन कउ क्रिपा कीनी मेरै सुआमी तिन अनदिनु हरि गुण गाए ॥
सुणि मन भीने सहजि सुभाए ॥2॥
जुग महि राम नामु निसतारा ॥
गुर ते उपजै सबदु वीचारा ॥
गुर सबदु वीचारा राम नामु पिआरा जिसु किरपा करे सु पाए ॥
सहजे गुण गावै दिनु राती किलविख सभि गवाए ॥
सभु को तेरा तू सभना का हउ तेरा तू हमारा ॥
जुग महि राम नामु निसतारा ॥3॥
साजन आइ वुठे घर माही ॥
हरि गुण गावहि त्रिपति अघाही ॥
हरि गुण गाइ सदा त्रिपतासी फिरि भूख न लागै आए ॥
दह दिसि पूज होवै हरि जन की जो हरि हरि नामु धिआए ॥
नानक हरि आपे जोड़ि विछोड़े हरि बिनु को दूजा नाही ॥
साजन आइ वुठे घर माही ॥4॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर अपने) हृदय में से माया की ओर ले जाने वाली खोटी मति दूर करता है।वह मनुष्य परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़ता है। हे भाई ! मेरे मालिक प्रभू ने जिन मनुष्यों पर मेहर की।उन्होंने हर वक्त परमात्मा के गुण गाने आरम्भ कर दिए। हे मन ! (परमात्मा की सिफत सालाह) सुन के आत्मिक अडोलता में प्रेम में भीगा जाता है। 2। हे भाई ! जगत में परमात्मा का नाम ही (हरेक जीव का) पार उतारा करता है। जो मनुष्य गुरू से नया आत्मिक जीवन लेता है।वह गुरू के शबद को विचारता है। वह मनुष्य गुरू के शबद को (ज्यों-ज्यों) विचारता है (त्यों-त्यों) परमात्मा का नाम उसको प्यारा लगने लग जाता है।पर।हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्रभू कृपा करता है।वही मनुष्य (ये दाति) प्राप्त करता है। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के दिन-रात परमात्मा के गुण गाता रहता है।और अपने सारे पाप दूर कर लेता है। हे प्रभू ! हरेक जीव आपका (पैदा किया हुआ है)।आप सारे जीवों का पति है।हे प्रभू ! मैं आपका (सेवक) हॅूँ।आप हमारा मालिक है (हमें अपना नाम बख्श)। हे भाई ! संसार में परमात्मा का नाम (ही हरेक जीव का पार-उतारा करता है)। 3। हे भाई ! जिन मनुष्यों के हृदय-घर में सज्जन-प्रभू जी आ बसते हैं। वह मनुष्य परमात्मा के गुण गाते रहते हैं।माया की ओर से संतोषी हो जाते हैं।वे तृप्त हो जाते हैं। हे भाई ! जो जीवात्मा सदा प्रभू के गुण गा-गा के (माया की ओर से) तृप्त हो जाती है।उसे दोबारा माया की भूख आ के नहीं चिपकती। जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता रहता है।उस सेवक की हर जगह इज्जत होती है। हे नानक ! परमात्मा खुद ही (किसी को माया में) जोड़ के (अपने चरणों से) विछोड़ता है।परमात्मा के बिना और कोई (ऐसी समर्था वाला) नहीं। (जिस के ऊपर मेहर करते हैं) उसके हृदय-गृह में सज्जन-प्रभू जी आ के निवास करते हैं। 4। 1।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु सूही महला 3 घरु 3 ॥
भगत जना की हरि जीउ राखै जुगि जुगि रखदा आइआ राम ॥
सो भगतु जो गुरमुखि होवै हउमै सबदि जलाइआ राम ॥
हउमै सबदि जलाइआ मेरे हरि भाइआ जिस दी साची बाणी ॥
सची भगति करहि दिनु राती गुरमुखि आखि वखाणी ॥
भगता की चाल सची अति निरमल नामु सचा मनि भाइआ ॥
नानक भगत सोहहि दरि साचै जिनी सचो सचु कमाइआ ॥1॥
हरि भगता की जाति पति है भगत हरि कै नामि समाणे राम ॥
हरि भगति करहि विचहु आपु गवावहि जिन गुण अवगण पछाणे राम ॥
गुण अउगण पछाणै हरि नामु वखाणै भै भगति मीठी लागी ॥
अनदिनु भगति करहि दिनु राती घर ही महि बैरागी ॥
भगती राते सदा मनु निरमलु हरि जीउ वेखहि सदा नाले ॥
नानक से भगत हरि कै दरि साचे अनदिनु नामु सम॑ाले ॥2॥
मनमुख भगति करहि बिनु सतिगुर विणु सतिगुर भगति न होई राम ॥
हउमै माइआ रोगि विआपे मरि जनमहि दुखु होई राम ॥
मरि जनमहि दुखु होई दूजै भाइ परज विगोई विणु गुर ततु न जानिआ ॥
भगति विहूणा सभु जगु भरमिआ अंति गइआ पछुतानिआ ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही महला 3 घरु 3 ॥ हे भाई ! परमात्मा अपने भक्तों की इज्जत रखता है।हरेक युग में ही (भक्तों की) इज्जत रखता आया है। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है।वह प्रभू का भक्त बन जाता है।वह मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के अपने अहंकार को दूर करता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा अपने अंदर से अहंकार को जला देता है।वह उस परमात्मा को प्यारा लगता है जिसकी सिफत सालाह सदा अटल रहने वाली है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य दिन-रात परमात्मा की सदा स्थिर रहने वाले भगती करते रहते हैं।वे खुद सिफत सालाह वाली बाणी उचारते रहते हैं।और औरों को भी उसकी समझ देते हैं। हे भाई ! भक्तों की जीवन-जुगति सदा एक रस रहने वाली और बड़ी पवित्र होती है।उनके मन को परमात्मा का सदा-स्थिर नाम प्यारा लगता रहता है। हे नानक ! परमात्मा के भक्त सदा-स्थिर परमात्मा के दर पर शोभा देते हैं।वे परमात्मा का सदा-स्थिर रहने वाला नाम ही सदा जपते रहते हैं। 1। हे भाई ! परमात्मा ही भक्तों के लिए (ऊँची) जाति है।परमात्मा ही उनकी इज्जत है।भक्त परमात्मा के नाम में ही लीन रहते हैं। भक्त (सदा) हरी की भक्ति करते हैं।अपने अंदर से स्वै भाव (भी) दूर कर लेते हैं।क्योंकि उन्होंने गुणों व अवगुणों की परख कर ली होती है (उनको पता होता है कि अहंकार अवगुण है)। जो मनुष्य गुण और अवगुण की परख कर लेता है।और परमात्मा का नाम उचारता रहता है।उसको प्रभू के डर-अदब में रहने के कारण प्रभू की भक्ति प्यारी लगती है। जो मनुष्य दिन-रात हर वक्त परमात्मा की भक्ति करते हैं।वे गृहस्त में ही माया के मोह से निर्लिप रहते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य सदा प्रभू की भगती (के रंग) में रंगे रहते हैं।उनका मन पवित्र हो जाता है।वे परमात्मा को सदा अपने अंग-संग बसता देखते हैं। हे नानक ! ऐसे भक्त हर वक्त प्रभू के नाम को अपने हृदय में बसा के परमात्मा के दर पर सुर्ख-रू हो जाते हैं। 2। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य गुरू की शरण पड़े बिना (अपनी ओर से ही) प्रभू की भक्ति करते हैं।पर गुरू की शरण पड़े बिना भक्ति नहीं हो सकती। वह मनुष्य अहंकार में।माया के रोग में।फंसे रहते हैं।आत्मिक मौत सहेड़ के वे जन्मों के चक्करों में पड़े रहते हैं।उन्हें दुख चिपका रहता है। आत्मिक मौत सहेड़ के वे जन्मों के चक्करों में पड़े रहते हैं।उन्हें दुख चिपका रहता है।हे भाई ! माया के मोह में फस के दुनिया ख्वार होती है। गुरू की शरण पड़े बिना कोई भी अस्लियत को नहीं समझता।भक्ति से वंचित हुआ सारा जगत ही भटकता फिरता है।और।आखिर हाथ मलता (दुनिया से) जाता है।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर अपने) हृदय में से माया की ओर ले जाने वाली खोटी मति दूर करता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।