अंग
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सूही
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अंदरहु दुरमति दूजी खोई सो जनु हरि लिव लागा ॥
अंदरहु दुरमति दूजी खोई सो जनु हरि लिव लागा ॥
जिन कउ क्रिपा कीनी मेरै सुआमी तिन अनदिनु हरि गुण गाए ॥
सुणि मन भीने सहजि सुभाए ॥2॥
जुग महि राम नामु निसतारा ॥
गुर ते उपजै सबदु वीचारा ॥
गुर सबदु वीचारा राम नामु पिआरा जिसु किरपा करे सु पाए ॥
सहजे गुण गावै दिनु राती किलविख सभि गवाए ॥
सभु को तेरा तू सभना का हउ तेरा तू हमारा ॥
जुग महि राम नामु निसतारा ॥3॥
साजन आइ वुठे घर माही ॥
हरि गुण गावहि त्रिपति अघाही ॥
हरि गुण गाइ सदा त्रिपतासी फिरि भूख न लागै आए ॥
दह दिसि पूज होवै हरि जन की जो हरि हरि नामु धिआए ॥
नानक हरि आपे जोड़ि विछोड़े हरि बिनु को दूजा नाही ॥
साजन आइ वुठे घर माही ॥4॥1॥
जिन कउ क्रिपा कीनी मेरै सुआमी तिन अनदिनु हरि गुण गाए ॥
सुणि मन भीने सहजि सुभाए ॥2॥
जुग महि राम नामु निसतारा ॥
गुर ते उपजै सबदु वीचारा ॥
गुर सबदु वीचारा राम नामु पिआरा जिसु किरपा करे सु पाए ॥
सहजे गुण गावै दिनु राती किलविख सभि गवाए ॥
सभु को तेरा तू सभना का हउ तेरा तू हमारा ॥
जुग महि राम नामु निसतारा ॥3॥
साजन आइ वुठे घर माही ॥
हरि गुण गावहि त्रिपति अघाही ॥
हरि गुण गाइ सदा त्रिपतासी फिरि भूख न लागै आए ॥
दह दिसि पूज होवै हरि जन की जो हरि हरि नामु धिआए ॥
नानक हरि आपे जोड़ि विछोड़े हरि बिनु को दूजा नाही ॥
साजन आइ वुठे घर माही ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर अपने) हृदय में से माया की ओर ले जाने वाली खोटी मति दूर करता है।वह मनुष्य परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़ता है। हे भाई ! मेरे मालिक प्रभू ने जिन मनुष्यों पर मेहर की।उन्होंने हर वक्त परमात्मा के गुण गाने आरम्भ कर दिए। हे मन ! (परमात्मा की सिफत सालाह) सुन के आत्मिक अडोलता में प्रेम में भीगा जाता है। 2। हे भाई ! जगत में परमात्मा का नाम ही (हरेक जीव का) पार उतारा करता है। जो मनुष्य गुरू से नया आत्मिक जीवन लेता है।वह गुरू के शबद को विचारता है। वह मनुष्य गुरू के शबद को (ज्यों-ज्यों) विचारता है (त्यों-त्यों) परमात्मा का नाम उसको प्यारा लगने लग जाता है।पर।हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्रभू कृपा करता है।वही मनुष्य (ये दाति) प्राप्त करता है। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के दिन-रात परमात्मा के गुण गाता रहता है।और अपने सारे पाप दूर कर लेता है। हे प्रभू ! हरेक जीव आपका (पैदा किया हुआ है)।आप सारे जीवों के पति हैं।हे प्रभू ! मैं आपका (सेवक) हॅूँ।आप हमारे मालिक हैं (हमें अपना नाम बख्श)। हे भाई ! संसार में परमात्मा का नाम (ही हरेक जीव का पार-उतारा करता है)। 3। हे भाई ! जिन मनुष्यों के हृदय-घर में सज्जन-प्रभू जी आ बसते हैं। वह मनुष्य परमात्मा के गुण गाते रहते हैं।माया की ओर से संतोषी हो जाते हैं।वे तृप्त हो जाते हैं। हे भाई ! जो जीवात्मा सदा प्रभू के गुण गा-गा के (माया की ओर से) तृप्त हो जाती है।उसे दोबारा माया की भूख आ के नहीं चिपकती। जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता रहता है।उस सेवक की हर जगह इज्जत होती है। हे नानक ! परमात्मा खुद ही (किसी को माया में) जोड़ के (अपने चरणों से) विछोड़ता है।परमात्मा के बिना और कोई (ऐसी समर्था वाला) नहीं। (जिस के ऊपर मेहर करते हैं) उसके हृदय-गृह में सज्जन-प्रभू जी आ के निवास करते हैं। 4। 1।
भगत जना की हरि जीउ राखै जुगि जुगि रखदा आइआ राम ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु सूही महला 3 घरु 3 ॥
भगत जना की हरि जीउ राखै जुगि जुगि रखदा आइआ राम ॥
सो भगतु जो गुरमुखि होवै हउमै सबदि जलाइआ राम ॥
हउमै सबदि जलाइआ मेरे हरि भाइआ जिस दी साची बाणी ॥
सची भगति करहि दिनु राती गुरमुखि आखि वखाणी ॥
भगता की चाल सची अति निरमल नामु सचा मनि भाइआ ॥
नानक भगत सोहहि दरि साचै जिनी सचो सचु कमाइआ ॥1॥
हरि भगता की जाति पति है भगत हरि कै नामि समाणे राम ॥
हरि भगति करहि विचहु आपु गवावहि जिन गुण अवगण पछाणे राम ॥
गुण अउगण पछाणै हरि नामु वखाणै भै भगति मीठी लागी ॥
अनदिनु भगति करहि दिनु राती घर ही महि बैरागी ॥
भगती राते सदा मनु निरमलु हरि जीउ वेखहि सदा नाले ॥
नानक से भगत हरि कै दरि साचे अनदिनु नामु सम॑ाले ॥2॥
मनमुख भगति करहि बिनु सतिगुर विणु सतिगुर भगति न होई राम ॥
हउमै माइआ रोगि विआपे मरि जनमहि दुखु होई राम ॥
मरि जनमहि दुखु होई दूजै भाइ परज विगोई विणु गुर ततु न जानिआ ॥
भगति विहूणा सभु जगु भरमिआ अंति गइआ पछुतानिआ ॥
रागु सूही महला 3 घरु 3 ॥
भगत जना की हरि जीउ राखै जुगि जुगि रखदा आइआ राम ॥
सो भगतु जो गुरमुखि होवै हउमै सबदि जलाइआ राम ॥
हउमै सबदि जलाइआ मेरे हरि भाइआ जिस दी साची बाणी ॥
सची भगति करहि दिनु राती गुरमुखि आखि वखाणी ॥
भगता की चाल सची अति निरमल नामु सचा मनि भाइआ ॥
नानक भगत सोहहि दरि साचै जिनी सचो सचु कमाइआ ॥1॥
हरि भगता की जाति पति है भगत हरि कै नामि समाणे राम ॥
हरि भगति करहि विचहु आपु गवावहि जिन गुण अवगण पछाणे राम ॥
गुण अउगण पछाणै हरि नामु वखाणै भै भगति मीठी लागी ॥
अनदिनु भगति करहि दिनु राती घर ही महि बैरागी ॥
भगती राते सदा मनु निरमलु हरि जीउ वेखहि सदा नाले ॥
नानक से भगत हरि कै दरि साचे अनदिनु नामु सम॑ाले ॥2॥
मनमुख भगति करहि बिनु सतिगुर विणु सतिगुर भगति न होई राम ॥
हउमै माइआ रोगि विआपे मरि जनमहि दुखु होई राम ॥
मरि जनमहि दुखु होई दूजै भाइ परज विगोई विणु गुर ततु न जानिआ ॥
भगति विहूणा सभु जगु भरमिआ अंति गइआ पछुतानिआ ॥
हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही महला 3 घरु 3 ॥ हे भाई ! परमात्मा अपने भक्तों की इज्जत रखता है।हरेक युग में ही (भक्तों की) इज्जत रखता आया है। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है।वह प्रभू का भक्त बन जाता है।वह मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के अपने अहंकार को दूर करता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा अपने अंदर से अहंकार को जला देता है।वह उस परमात्मा को प्यारा लगता है जिसकी सिफत सालाह सदा अटल रहने वाली है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य दिन-रात परमात्मा की सदा स्थिर रहने वाले भगती करते रहते हैं।वे खुद सिफत सालाह वाली बाणी उचारते रहते हैं।और औरों को भी उसकी समझ देते हैं। हे भाई ! भक्तों की जीवन-जुगति सदा एक रस रहने वाली और बड़ी पवित्र होती है।उनके मन को परमात्मा का सदा-स्थिर नाम प्यारा लगता रहता है। हे नानक ! परमात्मा के भक्त सदा-स्थिर परमात्मा के दर पर शोभा देते हैं।वे परमात्मा का सदा-स्थिर रहने वाला नाम ही सदा जपते रहते हैं। 1। हे भाई ! परमात्मा ही भक्तों के लिए (ऊँची) जाति है।परमात्मा ही उनकी इज्जत है।भक्त परमात्मा के नाम में ही लीन रहते हैं। भक्त (सदा) हरी की भक्ति करते हैं।अपने अंदर से स्वै भाव (भी) दूर कर लेते हैं।क्योंकि उन्होंने गुणों व अवगुणों की परख कर ली होती है (उनको पता होता है कि अहंकार अवगुण है)। जो मनुष्य गुण और अवगुण की परख कर लेता है।और परमात्मा का नाम उचारता रहता है।उसको प्रभू के डर-अदब में रहने के कारण प्रभू की भक्ति प्यारी लगती है। जो मनुष्य दिन-रात हर वक्त परमात्मा की भक्ति करते हैं।वे गृहस्त में ही माया के मोह से निर्लिप रहते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य सदा प्रभू की भगती (के रंग) में रंगे रहते हैं।उनका मन पवित्र हो जाता है।वे परमात्मा को सदा अपने अंग-संग बसता देखते हैं। हे नानक ! ऐसे भक्त हर वक्त प्रभू के नाम को अपने हृदय में बसा के परमात्मा के दर पर सुर्ख-रू हो जाते हैं। 2। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य गुरू की शरण पड़े बिना (अपनी ओर से ही) प्रभू की भक्ति करते हैं।पर गुरू की शरण पड़े बिना भक्ति नहीं हो सकती। वह मनुष्य अहंकार में।माया के रोग में।फंसे रहते हैं।आत्मिक मौत सहेड़ के वे जन्मों के चक्करों में पड़े रहते हैं।उन्हें दुख चिपका रहता है। आत्मिक मौत सहेड़ के वे जन्मों के चक्करों में पड़े रहते हैं।उन्हें दुख चिपका रहता है।हे भाई ! माया के मोह में फस के दुनिया ख्वार होती है। गुरू की शरण पड़े बिना कोई भी अस्लियत को नहीं समझता।भक्ति से वंचित हुआ सारा जगत ही भटकता फिरता है।और।आखिर हाथ मलता (दुनिया से) जाता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७६८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।