जिन कउ क्रिपा कीनी मेरै सुआमी तिन अनदिनु हरि गुण गाए ॥
सुणि मन भीने सहजि सुभाए ॥2॥
जुग महि राम नामु निसतारा ॥
गुर ते उपजै सबदु वीचारा ॥
गुर सबदु वीचारा राम नामु पिआरा जिसु किरपा करे सु पाए ॥
सहजे गुण गावै दिनु राती किलविख सभि गवाए ॥
सभु को तेरा तू सभना का हउ तेरा तू हमारा ॥
जुग महि राम नामु निसतारा ॥3॥
साजन आइ वुठे घर माही ॥
हरि गुण गावहि त्रिपति अघाही ॥
हरि गुण गाइ सदा त्रिपतासी फिरि भूख न लागै आए ॥
दह दिसि पूज होवै हरि जन की जो हरि हरि नामु धिआए ॥
नानक हरि आपे जोड़ि विछोड़े हरि बिनु को दूजा नाही ॥
साजन आइ वुठे घर माही ॥4॥1॥
रागु सूही महला 3 घरु 3 ॥
भगत जना की हरि जीउ राखै जुगि जुगि रखदा आइआ राम ॥
सो भगतु जो गुरमुखि होवै हउमै सबदि जलाइआ राम ॥
हउमै सबदि जलाइआ मेरे हरि भाइआ जिस दी साची बाणी ॥
सची भगति करहि दिनु राती गुरमुखि आखि वखाणी ॥
भगता की चाल सची अति निरमल नामु सचा मनि भाइआ ॥
नानक भगत सोहहि दरि साचै जिनी सचो सचु कमाइआ ॥1॥
हरि भगता की जाति पति है भगत हरि कै नामि समाणे राम ॥
हरि भगति करहि विचहु आपु गवावहि जिन गुण अवगण पछाणे राम ॥
गुण अउगण पछाणै हरि नामु वखाणै भै भगति मीठी लागी ॥
अनदिनु भगति करहि दिनु राती घर ही महि बैरागी ॥
भगती राते सदा मनु निरमलु हरि जीउ वेखहि सदा नाले ॥
नानक से भगत हरि कै दरि साचे अनदिनु नामु सम॑ाले ॥2॥
मनमुख भगति करहि बिनु सतिगुर विणु सतिगुर भगति न होई राम ॥
हउमै माइआ रोगि विआपे मरि जनमहि दुखु होई राम ॥
मरि जनमहि दुखु होई दूजै भाइ परज विगोई विणु गुर ततु न जानिआ ॥
भगति विहूणा सभु जगु भरमिआ अंति गइआ पछुतानिआ ॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर अपने) हृदय में से माया की ओर ले जाने वाली खोटी मति दूर करता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।