Lulla Family

अंग 762

अंग
762
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आवहि जाहि अनेक मरि मरि जनमते ॥
बिनु बूझे सभु वादि जोनी भरमते ॥5॥
जिन॑ कउ भए दइआल तिन॑ साधू संगु भइआ ॥
अंम्रितु हरि का नामु तिन॑ी जनी जपि लइआ ॥6॥
खोजहि कोटि असंख बहुतु अनंत के ॥
जिसु बुझाए आपि नेड़ा तिसु हे ॥7॥
विसरु नाही दातार आपणा नामु देहु ॥
गुण गावा दिनु राति नानक चाउ एहु ॥8॥2॥5॥16॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (परमात्मा के नाम से टूट के) अनेकों प्राणी (बार-बार) पैदा होते मरते हैं।आत्मिक मौत सहेड़-सहेड़ के बार-बार जन्म लेते रहते हैं। (आत्मिक जीवन की) सूझ के बिना उनका सारा ही उद्यम व्यर्थ रहता है।वे अनेकों जूनियों में भटकते रहते हैं। 5। हे भाई ! जिन मनुष्यों पर परमात्मा दयावान होता है उन्हें गुरू की संगति प्राप्त होती है। वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम जपते रहते हैं। 6। हे भाई ! करोड़ों।अनगिनत।बेअंत।अनेकों ही प्राणी (परमात्मा की) तलाश करते हैं। पर परमात्मा स्वयं जिस मनुष्य को सूझ बख्शता है।उस मनुष्य को प्रभू की समीपता मिल जाती है। 7। मुझे अपना नाम बख्श।मैं आपको कभी ना भुलाऊँ। हे नानक ! (प्रभू चरणों में अरदास कर और कह) हे दातार ! मेरे अंदर ये तमन्ना है कि मैं दिन-रात आपके गुण गाता रहूँ। 8। 2। 5।
रागु सूही महला 1 कुचजी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मंञु कुचजी अंमावणि डोसड़े हउ किउ सहु रावणि जाउ जीउ ॥
इक दू इकि चड़ंदीआ कउणु जाणै मेरा नाउ जीउ ॥
जिन॑ी सखी सहु राविआ से अंबी छावड़ीएहि जीउ ॥
से गुण मंञु न आवनी हउ कै जी दोस धरेउ जीउ ॥
किआ गुण तेरे विथरा हउ किआ किआ घिना तेरा नाउ जीउ ॥
इकतु टोलि न अंबड़ा हउ सद कुरबाणै तेरै जाउ जीउ ॥
सुइना रुपा रंगुला मोती तै माणिकु जीउ ॥
से वसतू सहि दितीआ मै तिन॑ सिउ लाइआ चितु जीउ ॥
मंदर मिटी संदड़े पथर कीते रासि जीउ ॥
हउ एनी टोली भुलीअसु तिसु कंत न बैठी पासि जीउ ॥
अंबरि कूंजा कुरलीआ बग बहिठे आइ जीउ ॥
सा धन चली साहुरै किआ मुहु देसी अगै जाइ जीउ ॥
सुती सुती झालु थीआ भुली वाटड़ीआसु जीउ ॥
तै सह नालहु मुतीअसु दुखा कूं धरीआसु जीउ ॥
तुधु गुण मै सभि अवगणा इक नानक की अरदासि जीउ ॥
सभि राती सोहागणी मै डोहागणि काई राति जीउ ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 1 कुचजी सतिगुर प्रसादि ॥ (हे सहेली !) मैंने सही जीवन की जाच नहीं सीखी।मेरे अंदर इतने ऐब हैं कि अंदर समा ही नहीं सकते (इस हालत में) मैं प्रभू-पति को प्रसन्न करने के लिए कैसे जा सकती हूँ। (उसके दर पर तो) एक से बढ़ कर एक हैं।मेरा तो वहाँ कोई नाम भी नहीं जानता। जिन सहेलियों ने प्रभू-पति को प्रसन्न कर लिया है।वह मानो (चौमासे में) आमों की (ठंडी) छाया में बैठी हुई हैं। मेरे अंदर तो वह गुण ही नहीं हैं (जिन पर प्रभू-पति रीझता है) मैं (अपने इस दुर्भाग्य का) दोष और किस पर दे सकती हूँ। हे प्रभू पति ! (आप बेअंत गुणों का मालिक है) मैं आपके कौन-कौन से गुण विस्तार से कहूँ।और मैं आपका कौन-कौन सा नाम लूँ।(आपके अनेकों गुणों को देख-देख के आपका अनेकों ही नाम जीव ले रहे हैं)। आपके बख्शे हुए किसी एक सुंदर पदार्थ के द्वारा भी (आपकी दातों के लेखे तक) नहीं पहुँच सकती (बस !) मैं आप पर से कुर्बान ही कुर्बान जाती हूँ। (हे सहेली ! देख मेरे दुर्भाग्य) सोना।चाँदी।मोती और हीरा आदि सुंदर व कीमती पदार्थ- ये चीजें प्रभू-पति ने मुझे दीं। (और) मैं (उसको भुला के।उसकी दी हुई) इन चीजों से प्यार डाल बैठी। मिट्टी-पत्थर आदि के बनाए हुए सुंदर घर -यही मैंने अपने राशि-पूँजी बना लिए। मैं इन सुंदर पदार्थों में ही (फस के) गलती खा गई।(इन पदार्थों के देने वाले) उस पति-प्रभू के पास ना बैठी। माया के मोह में फस के जिस जीव-स्त्री के शुभ गुण उससे दूर-परे चले जाएं।और उसके अंदर निरे पाखण्ड ही इकट्ठे हो जाएं। वह जब इस हाल में परलोक जाए तो जा के परलोक में (प्रभू की हजूरी में) क्या मुँह दिखाएगी। हे प्रभू ! माया के मोह की नींद में गाफिल पड़े रहने से मुझे बुढ़ापा आ गया है। जीवन के सही रास्ते से मैं विछुड़ी हुई हूँ।मैंने निरे दुख ही दुख सहेड़े हुए हैं। हे प्रभू ! आप बेअंत गुणों वाला है।मेरे अंदर सारे अवगुण ही अवगुण हैं। फिर भी नानक की विनती (आपके ही दर पर) है कि भाग्यशाली जीव-सि्त्रयाँ तो सदा ही आपके नाम-रंग में रंगी हुई हैं।मुझ अभागन को भी कोई एक रात बख्श (मेरे पर भी कभी मेहर की निगाह कर)। 1।
सूही महला 1 सुचजी ॥
जा तू ता मै सभु को तू साहिबु मेरी रासि जीउ ॥
तुधु अंतरि हउ सुखि वसा तूं अंतरि साबासि जीउ ॥
भाणै तखति वडाईआ भाणै भीख उदासि जीउ ॥
भाणै थल सिरि सरु वहै कमलु फुलै आकासि जीउ ॥
भाणै भवजलु लंघीऐ भाणै मंझि भरीआसि जीउ ॥
भाणै सो सहु रंगुला सिफति रता गुणतासि जीउ ॥
भाणै सहु भीहावला हउ आवणि जाणि मुईआसि जीउ ॥
तू सहु अगमु अतोलवा हउ कहि कहि ढहि पईआसि जीउ ॥
किआ मागउ किआ कहि सुणी मै दरसन भूख पिआसि जीउ ॥
गुर सबदी सहु पाइआ सचु नानक की अरदासि जीउ ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 सुचजी ॥ हे प्रभू ! जब आप (मेरी ओर होता है) तब हरेक जीव मुझे (आदर देता है)।आप ही मेरा मालिक है।आप ही मेरा सरमाया है। जब मैं आपको अपने हृदय में बसा लेती हूँ तब मैं सुखी बसती हूँ जब आप मेरे दिल में प्रगट हैं जाता है तब मुझे (हर जगह) शोभा मिलती है। प्रभू की रजा में ही कोई तख़्त पर बैठा है और (उसे) आदर-मान मिल रहा है।उसकी रजा में ही कोई विरक्त हो के (दर-ब-दर) भिक्षा माँगता फिरता है। प्रभू की रजा में ही कहीं सूखी धरती पर सरोवर चल पड़ता है और कमल फूल आकाश में खिल उठता है (भाव।किसी अहंकारी प्रेम-हीन हृदय में प्रेम का प्रवाह चल पड़ता है)। प्रभू की रजा में ही संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है; उसकी रजा के अनुसार ही विकारों से भर के बीच में डूब जाते हैं। उसकी रजा में ही किसी जीव-स्त्री को वह प्रभू-पति प्यारा लगता है।रजा के अनुसार ही कोई जीव उस गुणों के खजाने प्रभू की सिफतों में मस्त रहता है। ये भी उसकी रजा में ही है कि कभी वह पति मुझ जीव-स्त्री को डरावना लगता है।और मैं जनम-मरन के चक्कर में पड़ कर आत्मिक मौत मरती हूँ। हे प्रभू-पति ! आप अपहुँच है।आप बेअंत गुणों का मालिक है।मैं अरदास कर कर के आपके ही दर पर गिर पड़ी हूँ (मैंने आपका ही आसरा-परना लिया है)। मैं आपके दर से और क्या माँगू।आपको और क्या कहूँ जो आप सुने।मुझे आपके दीदार की भूख है।मैं आपके दर्शनों की प्यासी हूँ। आप सदा-स्थिर रहने वाला पति गुरू के शबद के माध्यम से मिलता है।मेरी नानक की आपके आगे आरजू है कि मुझे भी गुरू की शरण डाल के मिल। 2।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(परमात्मा के नाम से टूट के) अनेकों प्राणी (बार-बार) पैदा होते मरते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।