बिनु बूझे सभु वादि जोनी भरमते ॥5॥
जिन॑ कउ भए दइआल तिन॑ साधू संगु भइआ ॥
अंम्रितु हरि का नामु तिन॑ी जनी जपि लइआ ॥6॥
खोजहि कोटि असंख बहुतु अनंत के ॥
जिसु बुझाए आपि नेड़ा तिसु हे ॥7॥
विसरु नाही दातार आपणा नामु देहु ॥
गुण गावा दिनु राति नानक चाउ एहु ॥8॥2॥5॥16॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मंञु कुचजी अंमावणि डोसड़े हउ किउ सहु रावणि जाउ जीउ ॥
इक दू इकि चड़ंदीआ कउणु जाणै मेरा नाउ जीउ ॥
जिन॑ी सखी सहु राविआ से अंबी छावड़ीएहि जीउ ॥
से गुण मंञु न आवनी हउ कै जी दोस धरेउ जीउ ॥
किआ गुण तेरे विथरा हउ किआ किआ घिना तेरा नाउ जीउ ॥
इकतु टोलि न अंबड़ा हउ सद कुरबाणै तेरै जाउ जीउ ॥
सुइना रुपा रंगुला मोती तै माणिकु जीउ ॥
से वसतू सहि दितीआ मै तिन॑ सिउ लाइआ चितु जीउ ॥
मंदर मिटी संदड़े पथर कीते रासि जीउ ॥
हउ एनी टोली भुलीअसु तिसु कंत न बैठी पासि जीउ ॥
अंबरि कूंजा कुरलीआ बग बहिठे आइ जीउ ॥
सा धन चली साहुरै किआ मुहु देसी अगै जाइ जीउ ॥
सुती सुती झालु थीआ भुली वाटड़ीआसु जीउ ॥
तै सह नालहु मुतीअसु दुखा कूं धरीआसु जीउ ॥
तुधु गुण मै सभि अवगणा इक नानक की अरदासि जीउ ॥
सभि राती सोहागणी मै डोहागणि काई राति जीउ ॥1॥
जा तू ता मै सभु को तू साहिबु मेरी रासि जीउ ॥
तुधु अंतरि हउ सुखि वसा तूं अंतरि साबासि जीउ ॥
भाणै तखति वडाईआ भाणै भीख उदासि जीउ ॥
भाणै थल सिरि सरु वहै कमलु फुलै आकासि जीउ ॥
भाणै भवजलु लंघीऐ भाणै मंझि भरीआसि जीउ ॥
भाणै सो सहु रंगुला सिफति रता गुणतासि जीउ ॥
भाणै सहु भीहावला हउ आवणि जाणि मुईआसि जीउ ॥
तू सहु अगमु अतोलवा हउ कहि कहि ढहि पईआसि जीउ ॥
किआ मागउ किआ कहि सुणी मै दरसन भूख पिआसि जीउ ॥
गुर सबदी सहु पाइआ सचु नानक की अरदासि जीउ ॥2॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(परमात्मा के नाम से टूट के) अनेकों प्राणी (बार-बार) पैदा होते मरते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।