नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 गुणवंती ॥ मुझे जो भी कोई गुरू का प्यारा सिख मिल जाता है।मैं झुक-झुक के (भाव।विनम्रता-अधीनगी से) उसके पैरों पे लगता हूँ। और उसे अपने दिल की पीड़ा (तमन्ना) बताता हूँ (और विनती करता हूँ- हे गुरसिख !) मुझे सज्जन गुरू मिला दे। मुझे कोई ऐसा सुंदर उपदेश दे (जिसकी बरकति से) मेरा मन किसी और की तरफ ना जाए। मैं अपना ये मन आपके हवाले कर दूँगा।मुझे रास्ता बता (जिस रास्ते पर चल के प्रभू के दर्शन कर सकूँ)। मैं (चौरासी लाख के) दूर की राहों से चल के आया हूँ।अब मैंने आपका ही सहारा देखा है। मैंने अपने चित्त में यही आस रखी हुई है कि आप मेरा सारा दुख दूर कर देगा। (आगे से उक्तर मिलता है) इस रास्ते पर जो गुर-भाई चलते हैं (वे गुरू के बताए हुए कर्म करते हैं) आप भी वही काम कर जो गुरू बताता है। अगर आप अपने मन की कोझी मति छोड़ दे।अगर आप प्रभू के बिना अन्य (माया आदि) का प्यार भुला दे। तो इस तरह आप प्रभू के सुंदर दर्शन कर लेगा।आपको कोई दुख-कलेश नहीं व्यापेगा। मैंने जो कुछ आपको बताया है गुरू का हुकम ही बताया है।मैं अपनी अक्ल का आसरा ले के ये रास्ता नहीं बता रहा। जिस (सौभाग्यशाली व्यक्ति) पर नानक ने कृपा की है।परमात्मा ने उसको अपनी भक्ति का खजाना बख्श दिया है। (गुरू नानक की मेहर के सदके मैं पूरी तरह से तृप्त हो गया हूँ।मुझे अब माया की कोई भूख नहीं सताती।) मुझे जो भी कोई गुरू का प्यारा सिख मिल जाता है।मैं विनम्रता-अधीनगी सहित उसके पैर लगता हूँ। 3।
रागु सूही छंत महला 1 घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ भरि जोबनि मै मत पेईअड़ै घरि पाहुणी बलि राम जीउ ॥ मैली अवगणि चिति बिनु गुर गुण न समावनी बलि राम जीउ ॥ गुण सार न जाणी भरमि भुलाणी जोबनु बादि गवाइआ ॥ वरु घरु दरु दरसनु नही जाता पिर का सहजु न भाइआ ॥ सतिगुर पूछि न मारगि चाली सूती रैणि विहाणी ॥ नानक बालतणि राडेपा बिनु पिर धन कुमलाणी ॥1॥ बाबा मै वरु देहि मै हरि वरु भावै तिस की बलि राम जीउ ॥ रवि रहिआ जुग चारि त्रिभवण बाणी जिस की बलि राम जीउ ॥ त्रिभवण कंतु रवै सोहागणि अवगणवंती दूरे ॥ जैसी आसा तैसी मनसा पूरि रहिआ भरपूरे ॥ हरि की नारि सु सरब सुहागणि रांड न मैलै वेसे ॥ नानक मै वरु साचा भावै जुगि जुगि प्रीतम तैसे ॥2॥ बाबा लगनु गणाइ हं भी वंञा साहुरै बलि राम जीउ ॥ साहा हुकमु रजाइ सो न टलै जो प्रभु करै बलि राम जीउ ॥ किरतु पइआ करतै करि पाइआ मेटि न सकै कोई ॥ जाञी नाउ नरह निहकेवलु रवि रहिआ तिहु लोई ॥ माइ निरासी रोइ विछुंनी बाली बालै हेते ॥ नानक साच सबदि सुख महली गुर चरणी प्रभु चेते ॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: रागु सूही छंत महला 1 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे प्रभू जी ! मैं आपसे सदके हूँ (तूने कैसी आश्चर्यजनक लीला रचाई है !) जीव स्त्री (आपकी रची माया के प्रभाव तहत) जवानी के वक्त वह ऐसे मस्त है जैसे शराब पी के मदहोश है।(ये भी नहीं समझती कि) इस पेके घर में (इस जगत में) वह एक मेहमान ही है। विकारों की कमाई के कारण चित्त से वह मैली रहती है (गुरू की शरण नहीं आती।और) गुरू (की शरण पड़े) बिना (हृदय में) गुण टिक नहीं सकते। (माया की) भटकना में पड़ कर जीव-स्त्री ने (प्रभू के) गुणों की कीमत ना समझी।गलत रास्ते पर पड़ी रही।और जवानी का समय व्यर्थ गवा लिया। ना उसने पति-प्रभू के साथ सांझ डाली।ना उसके दर ना उसके घर और ना ही उसके दर्शनों की कद्र पहचानी।(भटकना में ही रह कर) जीव-स्त्री को प्रभू-पति का सुभाव भी पसंद नहीं आया। माया के मोह में सोई हुई जीव-स्त्री की जिंदगी की सारी रात बीत गई।सतिगुरू की शिक्षा ले के ठीक रास्ते पर कभी ना चली। हे नानक ! ऐसी जीव-स्त्री तो बाली उम्र में ही विधवा हो गई।और प्रभू-पति के मिलाप के बिना उसका हृदय-कमल कुम्हलाया ही रहा। 1। हे प्यारे सतिगुरू ! मुझे पति-प्रभू मिला।(मेहर कर) मुझे वह पति-प्रभू प्यारा लगे।मैं उससे सदके जाऊँ। जो सदा ही हर जगह व्यापक है।तीनों ही भवनों में जिसका हुकम चल रहा है। तीनों भवनों का मालिक प्रभू भाग्यशाली जीव-स्त्री से प्यार करता है।पर जिसने अवगुण ही अवगुण सहेड़ लिए वह उसके चरणों से विछुड़ी रहती है। वह मालिक हरेक के हृदय में व्यापक है (वह हरेक के दिल की जानता है) जैसी आस ले के कोई उसके दर पर आती है वैसी ही इच्छा वह पूरी कर देता है। जो जीव-स्त्री प्रभू-पति की बनी रहती है वह सदा सोहाग-भाग वाली है।वह कभी विधवा नहीं होती।उसका वेश कभी मैला नहीं होता (उसका हृदय कभी विकारों से मैला नहीं होता)। हे नानक ! (अरदास कर और कह, हे सतिगुरू ! आपकी मेहर हैं तो) वह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू-पति मुझे (हमेशा) प्यारा लगता रहे जो प्रीतम हरेक युग में एक समान रहने वाला है। 2। हे सतिगुरू ! (वह) महूरत निकलवा (वह अवसर पैदा कर।जिसकी बरकति से) मैं भी पति-प्रभू के चरणों में जुड़ सकूँ। (हे गुरू ! आपकी कृपा से) रजा का मालिक जो हुकम करता है वह मेल का अवसर बन जाता है।उसको कोई टाल नहीं सकता (उसमें कोई विघ्न नहीं डाल सकता)। जीवों के किए कर्मों के अनुसार करतार ने (उनके मिलन व विछोड़े का) जो भी हुकम दिया है उसकी कोई उलंघ्ना नहीं कर सकता। (गुरू विचोले की कृपा से) वह परमात्मा जो तीनों लोकों में व्यापक है और (फिर भी अपने पैदा किए) बंदों से स्वतंत्र है (जीव-स्त्री को अपने चरणों में जोड़ने के लिए) दूल्हा बन के आता है। (जैसे बेटी को विदा करती माँ दोबारा मिलने की उम्मीदें त्याग के रो के विछुड़ती है।वैसे ही) माया जीव-स्त्री के प्रभू-पति के साथ प्रेम के कारण जीव-स्त्री को अपने काबू में रख सकने की उम्मीदें छोड़ के (मानो) रो के विछुड़ती है। हे नानक ! जीव-स्त्री गुरू के चरणों की बरकति से प्रभू-पति को हृदय में बसाती है।और सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले शबद के द्वारा प्रभू की हजूरी में आनंद पाती है। 3।
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही महला 5 गुणवंती ॥ मुझे जो भी कोई गुरू का प्यारा सिख मिल जाता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।