Lulla Family

अंग 761

अंग
761
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आवणु जाणा रहि गए मनि वुठा निरंकारु जीउ ॥
ता का अंतु न पाईऐ ऊचा अगम अपारु जीउ ॥
जिसु प्रभु अपणा विसरै सो मरि जंमै लख वार जीउ ॥6॥
साचु नेहु तिन प्रीतमा जिन मनि वुठा आपि जीउ ॥
गुण साझी तिन संगि बसे आठ पहर प्रभ जापि जीउ ॥
रंगि रते परमेसरै बिनसे सगल संताप जीउ ॥7॥
तूं करता तूं करणहारु तूहै एकु अनेक जीउ ॥
तू समरथु तू सरब मै तूहै बुधि बिबेक जीउ ॥
नानक नामु सदा जपी भगत जना की टेक जीउ ॥8॥1॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा आ बसता है।उसके जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। हे भाई ! उस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।वह सबसे ऊँची हस्ती वाला है।अपहुँच है।वह बेअंत है। जिस मनुष्य को परमात्मा भूल जाता है।वह लाखों बार पैदा होता मरता रहता है। 6। हे भाई ! जिन गुरमुख सज्जनों के मन में परमात्मा आ बसता है।उनके हृदय में प्रभू का सदा कायम रहने वाला प्यार बन जाता है। जो मनुष्य उनकी संगति में बसते हैं।वे भी आठों पहर प्रभू का नाम जप के उनके साथ गुणों की सांझ बना लेते हैं। जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे जाते हैं।उनके अंदर से सारे दुख-कलेश दूर हो जाते हैं। 7। हे प्रभू ! आप सबको पैदा करने वाला है।आप सब कुछ करने के समर्थ है।आप आप ही आप एक है। (जगत-रचना करके) अनेक रूप भी आप स्वयं ही है।आप सब ताकतों का मालिक है।आप सबमें व्यापक है।(जीवों।को अच्छे-बुरे की) परख की बुद्धि (देने वाला भी) आप स्वयं ही है। हे नानक ! (कह,हे प्रभू ! अगर आप मेहर करे।तो) आपके भक्तजनों का आसरा ले के मैं सदा आपका नाम जपता रहूँ। 8। 1। 3।
रागु सूही महला 5 असटपदीआ घरु 10 काफी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जे भुली जे चुकी साइंी भी तहिंजी काढीआ ॥
जिन॑ा नेहु दूजाणे लगा झूरि मरहु से वाढीआ ॥1॥
हउ ना छोडउ कंत पासरा ॥
सदा रंगीला लालु पिआरा एहु महिंजा आसरा ॥1॥ रहाउ ॥
सजणु तूहै सैणु तू मै तुझ उपरि बहु माणीआ ॥
जा तू अंदरि ता सुखे तूं निमाणी माणीआ ॥2॥
जे तू तुठा क्रिपा निधान ना दूजा वेखालि ॥
एहा पाई मू दातड़ी नित हिरदै रखा समालि ॥3॥
पाव जुलाई पंध तउ नैणी दरसु दिखालि ॥
स्रवणी सुणी कहाणीआ जे गुरु थीवै किरपालि ॥4॥
किती लख करोड़ि पिरीए रोम न पुजनि तेरिआ ॥
तू साही हू साहु हउ कहि न सका गुण तेरिआ ॥5॥
सहीआ तऊ असंख मंञहु हभि वधाणीआ ॥
हिक भोरी नदरि निहालि देहि दरसु रंगु माणीआ ॥6॥
जै डिठे मनु धीरीऐ किलविख वंञनि॑ दूरे ॥
सो किउ विसरै माउ मै जो रहिआ भरपूरे ॥7॥
होइ निमाणी ढहि पई मिलिआ सहजि सुभाइ ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ नानक संत सहाइ ॥8॥1॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 5 असटपदीआ घरु 10 काफी सतिगुर प्रसादि ॥ हे मेरे पति-प्रभू ! अगर मैं भूलें करती हूँ।अगर मैं गलतियां करती हूँ।तो भी मैं आपकी ही कहलवाती हूँ (मैं आपका दर छोड़ के कहीं और जाने को तैयार नहीं हूँ)। जिनका प्यार (आपके बग़ैर) किसी और से बना हुआ है।वे छुटॅड़ें जरूर झुर-झुर के मर रही हैं (वे पति से विछफड़ी हुई अवश्य चिंता में झुर रही हैं)। 1। मैं पति-प्रभू का सोहाना पासा (का उक्तम पक्ष) (कभी भी) नहीं छोड़ूँगी। मेरा वह प्यारा लाल सदा आनंद-स्वरूप है।मेरा यही आसरा है। 1।रहाउ। हे पति-प्रभू ! मेरा तो आप ही सज्जन है।आप ही संबंधी है।मुझे तो आपके पर ही गर्व है। जब आप मेरे हृदय-घर में बसता है।तब ही मैं सुखी होती हूँ।मुझ निमाणी का आप ही माण है। 2। हे कृपा के खजाने पति-प्रभू ! अगर आप मेरे पर दयावान हुआ है।तो (अपने चरणों के बिना) कोई और (आसरा) ना दिखलाना। मैंने तो यही सुंदर दाति पाई हुई है।इसी को मैं सदा अपने हृदय में संभाल-संभाल के रखती हूँ। 3। हे पति-प्रभू ! अगर गुरू (मेरे पर) दयावान हो।तो मैं (उससे) अपने कानों से आपकी सिफत-सालाह की बातें सुनती रहूँ। मैं अपने पैरों को आपके (देश ले जाने वाले) रास्ते पर चलाऊँ।हे प्यारे ! (मेरी इन) आँखों को अपने दर्शन दे। 4। अगर में कितने ही लाखों-करोड़ों गुण आपके बताऊँ।तो भी वह सारे आपके एक रोम (जितनी महिमा) तक नहीं पहुँच सकते। हे प्यारे ! आप शाहों का पातशाह है।मैं आपके सारे गुण बयान नहीं कर सकती। 5। हे प्यारे ! अनगिनत ही सहेलियां आपके (दर की दासियां) हैं।मुझसे तो वह सारी ही अति उक्तम हैं। एक रक्ती भर समय के लिए ही सही मेरी तरफ भी मेहर भरी निगाह से देख।मुझे भी दर्शन दे ता कि मैं आत्मिक आनंद ले सकूँ। 6। जिसके दर्शन करने से मन धैर्य धरता है और सारे पाप दुख दूर हो जाते हैं। हे माँ ! मुझे (भला) वह (प्यारा) कैसे बिसर सकता है।जो सारे जगत में व्यापक है। 7। हे नानक ! (कह) जब मैं आत्मिक अडोलता में प्रेम में टिक के।आज़िज़ हो के (गुमान त्याग के उसके दर पर) गिर पड़ी।तो वह प्यारा मुझे मिल गया। किसी पूर्बले जन्म में अच्छी किस्मत के लिखे लेखों (के संयोग) मुझे गुरू की सहायता से मिल गए। 8। 1। 4।
सूही महला 5 ॥
सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥
नाम बिना सभि कूड़ु गाल॑ी होछीआ ॥1॥
नामु निधानु अपारु भगता मनि वसै ॥
जनम मरण मोहु दुखु साधू संगि नसै ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि बादि अहंकारि सरपर रुंनिआ ॥
सुखु न पाइनि॑ मूलि नाम विछुंनिआ ॥2॥
मेरी मेरी धारि बंधनि बंधिआ ॥
नरकि सुरगि अवतार माइआ धंधिआ ॥3॥
सोधत सोधत सोधि ततु बीचारिआ ॥
नाम बिना सुखु नाहि सरपर हारिआ ॥4॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य वेद-पुराण-स्मृतियाँ आदि पुस्तकें पढ़ कर (नाम को किनारे छोड़ के कर्म काण्ड आदि के उपदेश) ऊँचे स्वरों में सुनाते फिरते हैं। वे लोग थोथी बातें करते हैं।परमात्मा के नाम के बिना झूठा प्रचार ही ये सारे लोग करते हैं। 1। हे भाई ! परमात्मा के नाम का बेअंत खजाना (परमात्मा के) भक्तों के हृदय में बसता है। गुरू की संगति में (नाम जपने से) जनम-मरण के दुख और मोह आदि हरेक कलेश दूर हो जाते हैं। 1।रहाउ। वह मनुष्य माया के मोह में।शास्त्रार्थ में।अहंकार में फंस के अवश्य दुखी होते हैं। हे भाई ! प्रभू के नाम से विछुड़े हुए मनुष्य कभी भी आत्मिक आनंद नहीं पाते। 2। हे भाई ! (परमात्मा के नाम से टूट के) माया की ममता का विचार मन में टिका के मोह के बँधन में बँधे रहते हैं। निरी माया के झमेलों के कारण वे लोग दुख-सुख भोगते रहते हैं। 3। हे भाई ! अच्छी तरह पड़ताल करके निर्णय करके हम इस सच्चाई पर पहुँचे हैं कि परमात्मा के नाम के बिना आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता। नाम से टूटे रहने वाले अवश्य ही (मनुष्य जन्म की बाजी) हार के जाते हैं। 4।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा आ बसता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।