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· अष्टपदी · राग सूही
आवणु जाणा रहि गए मनि वुठा निरंकारु जीउ ॥
आवणु जाणा रहि गए मनि वुठा निरंकारु जीउ ॥
ता का अंतु न पाईऐ ऊचा अगम अपारु जीउ ॥
जिसु प्रभु अपणा विसरै सो मरि जंमै लख वार जीउ ॥6॥
साचु नेहु तिन प्रीतमा जिन मनि वुठा आपि जीउ ॥
गुण साझी तिन संगि बसे आठ पहर प्रभ जापि जीउ ॥
रंगि रते परमेसरै बिनसे सगल संताप जीउ ॥7॥
तूं करता तूं करणहारु तूहै एकु अनेक जीउ ॥
तू समरथु तू सरब मै तूहै बुधि बिबेक जीउ ॥
नानक नामु सदा जपी भगत जना की टेक जीउ ॥8॥1॥3॥
ता का अंतु न पाईऐ ऊचा अगम अपारु जीउ ॥
जिसु प्रभु अपणा विसरै सो मरि जंमै लख वार जीउ ॥6॥
साचु नेहु तिन प्रीतमा जिन मनि वुठा आपि जीउ ॥
गुण साझी तिन संगि बसे आठ पहर प्रभ जापि जीउ ॥
रंगि रते परमेसरै बिनसे सगल संताप जीउ ॥7॥
तूं करता तूं करणहारु तूहै एकु अनेक जीउ ॥
तू समरथु तू सरब मै तूहै बुधि बिबेक जीउ ॥
नानक नामु सदा जपी भगत जना की टेक जीउ ॥8॥1॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा आ बसता है। उसके जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। हे भाई! उस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। वह सबसे ऊँची हस्ती वाला है। अपहुँच है। वह बेअंत है। जिस मनुष्य को परमात्मा भूल जाता है। वह लाखों बार पैदा होता मरता रहता है। 6। हे भाई! जिन गुरमुख सज्जनों के मन में परमात्मा आ बसता है। उनके हृदय में प्रभू का सदा कायम रहने वाला प्यार बन जाता है। जो मनुष्य उनकी संगति में बसते हैं। वे भी आठों पहर प्रभू का नाम जप के उनके साथ गुणों की सांझ बना लेते हैं। जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे जाते हैं। उनके अंदर से सारे दुख-कलेश दूर हो जाते हैं। 7। हे प्रभू! आप सबको पैदा करने वाले हैं। आप सब कुछ करने के समर्थ हैं। आप स्वयं ही एक हैं। (जगत-रचना करके) अनेक रूप भी आप स्वयं ही हैं। आप सब ताकतों के मालिक हैं। आप सबमें व्यापक हैं। (जीवों। को अच्छे-बुरे की) परख की बुद्धि (देने वाले भी) आप स्वयं ही हैं। हे नानक! (कहें,हे प्रभू! अगर आप मेहर करें, तो) आपके भक्तजनों का आसरा ले के मैं सदा आपका नाम जपता रहूँ। 8। 1। 3।
· अष्टपदी · राग सूही
जे भुली जे चुकी साइंी भी तहिंजी काढीआ ॥
रागु सूही महला 5 असटपदीआ घरु 10 काफी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जे भुली जे चुकी साइंी भी तहिंजी काढीआ ॥
जिन॑ा नेहु दूजाणे लगा झूरि मरहु से वाढीआ ॥1॥
हउ ना छोडउ कंत पासरा ॥
सदा रंगीला लालु पिआरा एहु महिंजा आसरा ॥1॥ रहाउ ॥
सजणु तूहै सैणु तू मै तुझ उपरि बहु माणीआ ॥
जा तू अंदरि ता सुखे तूं निमाणी माणीआ ॥2॥
जे तू तुठा क्रिपा निधान ना दूजा वेखालि ॥
एहा पाई मू दातड़ी नित हिरदै रखा समालि ॥3॥
पाव जुलाई पंध तउ नैणी दरसु दिखालि ॥
स्रवणी सुणी कहाणीआ जे गुरु थीवै किरपालि ॥4॥
किती लख करोड़ि पिरीए रोम न पुजनि तेरिआ ॥
तू साही हू साहु हउ कहि न सका गुण तेरिआ ॥5॥
सहीआ तऊ असंख मंञहु हभि वधाणीआ ॥
हिक भोरी नदरि निहालि देहि दरसु रंगु माणीआ ॥6॥
जै डिठे मनु धीरीऐ किलविख वंञनि॑ दूरे ॥
सो किउ विसरै माउ मै जो रहिआ भरपूरे ॥7॥
होइ निमाणी ढहि पई मिलिआ सहजि सुभाइ ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ नानक संत सहाइ ॥8॥1॥4॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जे भुली जे चुकी साइंी भी तहिंजी काढीआ ॥
जिन॑ा नेहु दूजाणे लगा झूरि मरहु से वाढीआ ॥1॥
हउ ना छोडउ कंत पासरा ॥
सदा रंगीला लालु पिआरा एहु महिंजा आसरा ॥1॥ रहाउ ॥
सजणु तूहै सैणु तू मै तुझ उपरि बहु माणीआ ॥
जा तू अंदरि ता सुखे तूं निमाणी माणीआ ॥2॥
जे तू तुठा क्रिपा निधान ना दूजा वेखालि ॥
एहा पाई मू दातड़ी नित हिरदै रखा समालि ॥3॥
पाव जुलाई पंध तउ नैणी दरसु दिखालि ॥
स्रवणी सुणी कहाणीआ जे गुरु थीवै किरपालि ॥4॥
किती लख करोड़ि पिरीए रोम न पुजनि तेरिआ ॥
तू साही हू साहु हउ कहि न सका गुण तेरिआ ॥5॥
सहीआ तऊ असंख मंञहु हभि वधाणीआ ॥
हिक भोरी नदरि निहालि देहि दरसु रंगु माणीआ ॥6॥
जै डिठे मनु धीरीऐ किलविख वंञनि॑ दूरे ॥
सो किउ विसरै माउ मै जो रहिआ भरपूरे ॥7॥
होइ निमाणी ढहि पई मिलिआ सहजि सुभाइ ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ नानक संत सहाइ ॥8॥1॥4॥
हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 5 असटपदीआ घरु 10 काफी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मेरे पति-प्रभू! अगर मैं भूलें करती हूँ। अगर मैं गलतियां करती हूँ, तो भी मैं आपकी ही कहलवाती हूँ (मैं आपका दर छोड़ के कहीं और जाने को तैयार नहीं हूँ)। जिनका प्यार (आपके बग़ैर) किसी और से बना हुआ है। वे छुटॅड़ें जरूर झुर-झुर के मर रही हैं (वे पति से विछफड़ी हुई अवश्य चिंता में झुर रही हैं)। 1। मैं पति-प्रभू का सोहाना पासा (का उक्तम पक्ष) (कभी भी) नहीं छोड़ूँगी। मेरा वह प्यारा लाल सदा आनंद-स्वरूप है। मेरा यही आसरा है। 1। रहाउ। हे पति-प्रभू! मेरे तो आप ही सज्जन हैं। आप ही संबंधी हैं। मुझे तो आपके पर ही गर्व है। जब आप मेरे हृदय-घर में बसते हैं, तब ही मैं सुखी होती हूँ। मुझ निमाणी का आप ही माण हैं। 2। हे कृपा के खजाने पति-प्रभू! अगर आप मेरे पर दयावान हुए हैं, तो (अपने चरणों के बिना) कोई और (आसरा) ना दिखलाइए। मैंने तो यही सुंदर दाति पाई हुई है। इसी को मैं सदा अपने हृदय में संभाल-संभाल के रखती हूँ। 3। हे पति-प्रभू! अगर गुरू (मेरे पर) दयावान हो, तो मैं (उससे) अपने कानों से आपकी सिफत-सालाह की बातें सुनती रहूँ। मैं अपने पैरों को आपके (देश ले जाने वाले) रास्ते पर चलाऊँ। हे प्यारे! (मेरी इन) आँखों को अपने दर्शन दें। 4। अगर में कितने ही लाखों-करोड़ों गुण आपके बताऊँ, तो भी वह सारे आपके एक रोम (जितनी महिमा) तक नहीं पहुँच सकते। हे प्यारे! आप शाहों के पातशाह हैं। मैं आपके सारे गुण बयान नहीं कर सकती। 5। हे प्यारे! अनगिनत ही सहेलियां आपके (दर की दासियां) हैं। मुझसे तो वह सारी ही अति उक्तम हैं। एक रक्ती भर समय के लिए ही सही मेरी तरफ भी मेहर भरी निगाह से देखें। मुझे भी दर्शन दें ता कि मैं आत्मिक आनंद ले सकूँ। 6। जिसके दर्शन करने से मन धैर्य धरता है और सारे पाप दुख दूर हो जाते हैं। हे माँ! मुझे (भला) वह (प्यारा) कैसे बिसर सकता है। जो सारे जगत में व्यापक है। 7। हे नानक! (कहें) जब मैं आत्मिक अडोलता में प्रेम में टिक के, आज़िज़ हो के (गुमान त्याग के उसके दर पर) गिर पड़ी, तो वह प्यारा मुझे मिल गया। किसी पूर्बले जन्म में अच्छी किस्मत के लिखे लेखों (के संयोग) मुझे गुरू की सहायता से मिल गए। 8। 1। 4।
· अष्टपदी · राग सूही
सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥
सूही महला 5 ॥
सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥
नाम बिना सभि कूड़ु गाल॑ी होछीआ ॥1॥
नामु निधानु अपारु भगता मनि वसै ॥
जनम मरण मोहु दुखु साधू संगि नसै ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि बादि अहंकारि सरपर रुंनिआ ॥
सुखु न पाइनि॑ मूलि नाम विछुंनिआ ॥2॥
मेरी मेरी धारि बंधनि बंधिआ ॥
नरकि सुरगि अवतार माइआ धंधिआ ॥3॥
सोधत सोधत सोधि ततु बीचारिआ ॥
नाम बिना सुखु नाहि सरपर हारिआ ॥4॥
सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥
नाम बिना सभि कूड़ु गाल॑ी होछीआ ॥1॥
नामु निधानु अपारु भगता मनि वसै ॥
जनम मरण मोहु दुखु साधू संगि नसै ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि बादि अहंकारि सरपर रुंनिआ ॥
सुखु न पाइनि॑ मूलि नाम विछुंनिआ ॥2॥
मेरी मेरी धारि बंधनि बंधिआ ॥
नरकि सुरगि अवतार माइआ धंधिआ ॥3॥
सोधत सोधत सोधि ततु बीचारिआ ॥
नाम बिना सुखु नाहि सरपर हारिआ ॥4॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई! जो मनुष्य वेद-पुराण-स्मृतियाँ आदि पुस्तकें पढ़ कर (नाम को किनारे छोड़ के कर्म काण्ड आदि के उपदेश) ऊँचे स्वरों में सुनाते फिरते हैं। वे लोग थोथी बातें करते हैं। परमात्मा के नाम के बिना झूठा प्रचार ही ये सारे लोग करते हैं। 1। हे भाई! परमात्मा के नाम का बेअंत खजाना (परमात्मा के) भक्तों के हृदय में बसता है। गुरू की संगति में (नाम जपने से) जनम-मरण के दुख और मोह आदि हरेक कलेश दूर हो जाते हैं। 1। रहाउ। वह मनुष्य माया के मोह में। शास्त्रार्थ में, अहंकार में फंस के अवश्य दुखी होते हैं। हे भाई! प्रभू के नाम से विछुड़े हुए मनुष्य कभी भी आत्मिक आनंद नहीं पाते। 2। हे भाई! (परमात्मा के नाम से टूट के) माया की ममता का विचार मन में टिका के मोह के बँधन में बँधे रहते हैं। निरी माया के झमेलों के कारण वे लोग दुख-सुख भोगते रहते हैं। 3। हे भाई! अच्छी तरह पड़ताल करके निर्णय करके हम इस सच्चाई पर पहुँचे हैं कि परमात्मा के नाम के बिना आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता। नाम से टूटे रहने वाले अवश्य ही (मनुष्य जन्म की बाजी) हार के जाते हैं। 4।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 761 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।