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अंग ७५ · सिरी राग

अंग
75
सिरी राग
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  1. दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा विसरि गइआ धिआनु ॥
  2. पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बालक बुधि अचेतु ॥

दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा विसरि गइआ धिआनु ॥

अंग ७४ से चला आ रहा अंश

दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा विसरि गइआ धिआनु ॥
हथो हथि नचाईऐ वणजारिआ मित्रा जिउ जसुदा घरि कानु ॥
हथो हथि नचाईऐ प्राणी मात कहै सुतु मेरा ॥
चेति अचेत मूड़ मन मेरे अंति नही कछु तेरा ॥
जिनि रचि रचिआ तिसहि न जाणै मन भीतरि धरि गिआनु ॥
कहु नानक प्राणी दूजै पहरै विसरि गइआ धिआनु ॥2॥
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धन जोबन सिउ चितु ॥
हरि का नामु न चेतही वणजारिआ मित्रा बधा छुटहि जितु ॥
हरि का नामु न चेतै प्राणी बिकलु भइआ संगि माइआ ॥
धन सिउ रता जोबनि मता अहिला जनमु गवाइआ ॥
धरम सेती वापारु न कीतो करमु न कीतो मितु ॥
कहु नानक तीजै पहरै प्राणी धन जोबन सिउ चितु ॥3॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा लावी आइआ खेतु ॥
जा जमि पकड़ि चलाइआ वणजारिआ मित्रा किसै न मिलिआ भेतु ॥
भेतु चेतु हरि किसै न मिलिओ जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥
झूठा रुदनु होआ दोुआलै खिन महि भइआ पराइआ ॥
साई वसतु परापति होई जिसु सिउ लाइआ हेतु ॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै लावी लुणिआ खेतु ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर में (संसार में जनम ले के जीव को परमात्मा के चरणों का वह) ध्यान भूल जाता है (जो उस को माँ के पेट में रहने के समय होता है)। हे बंजारे मित्र ! (जन्म ले के जीव घर के) हरेक जीव के हाथ पर (ऐसे) नचाते हैं जैसे यशोधा के घर में श्री कृष्ण जी को। (नव जन्मा) जीव हरेक के हाथ में नचाया जाता है (खिलाया जाता है), माँ कहती है कि ये मेरा पुत्र है। पर, हे मेरे गाफिल मूर्ख मन ! याद रख, आखिरी समय में कोई भी चीज आपकी नही बनी रहेगी। जीव अपने मन में उस प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल के उसे याद नहीं करता, जिसने इसकी बंतर (रचना) बना कर इसे पैदा किया है। हे नानक ! कह - (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर में (संसार में जन्म ले के) जीव को प्रभू चरणों का ध्यान भूल जाता है।2। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के तीसरे पहर में आपका मन धन से तथा जवानी के साथ लग गया है। हे बंजारे मित्र ! आप परमात्मा का नाम याद नहीं करता, जिसकी बरकति से आप (धन जोबन के मोह के) बंधनों में से निजात पा सके। जीव माया (के मोह) में इतना खो जाता है कि ये परमात्मा का नाम याद नहीं रखता। मन के रंग में रंगा जाता है, जवानी (के नशे) में मस्ता जाता है, (और इस तरह) श्रेष्ठ मनुष्य जनम गवा लेता है, ना इसने धर्म (भाव, हरि नाम सिमरन) का व्यापार किया, और ना ही इसने उच्च आत्मिक जीवन को अपना मित्र बनाया। हे नानक ! कह, (जिंदगी की रात के) तीसरे पहर में जीव ने धन से और जवानी से ही चित्त जोड़े रखा।3। हरि नाम का व्यापार करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के चौथे पहर (भाव, बुढ़ापा आ जाने पर) (शरीर) खेत को काटने वाला (यम) आ पहुँचा। हे बंजारे मित्र ! जब जम ने (आ के जीवात्मा को) पकड़ के आगे लगा लिया तो किसी (संबंधी) को भी ये समझ ना पड़ी कि ये क्या हो गया। परमात्मा के इस हुकम और भेद की किसी को भी समझ ना पड़ सकी। जब यम ने (जीवात्मा को) पकड़ कर आगे लगा लिया, तो (उसके मृतक शरीर के) के चारों तरफ व्यर्थ का रोना-धोना शुरू हो गया। (वह जिसको सारे ही संबंधी ‘मेरा मेरा’ कहा करते थे) एक छिन में ही वह पराया हो गया। जिससे (सारी उम्र) मोह किए रखा (और उसके अनुसार जो जो कर्म किए, अंत के समय) वह की कमाई सामने आ गई (प्राप्त हो गई)। हे नानक ! कह, (जिंदगी की रात के) चौथे पहर (भाव, बुढ़ापा आ जाने पर फसल) काटने वाले (यमदूतों) ने (शरीर) खेत को आ काटा।4।1।

पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बालक बुधि अचेतु ॥

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सिरीरागु महला 1 ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बालक बुधि अचेतु ॥
खीरु पीऐ खेलाईऐ वणजारिआ मित्रा मात पिता सुत हेतु ॥ मात पिता सुत नेहु घनेरा माइआ मोहु सबाई ॥
संजोगी आइआ किरतु कमाइआ करणी कार कराई ॥
राम नाम बिनु मुकति न होई बूडी दूजै हेति ॥
कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै छूटहिगा हरि चेति ॥1॥
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा भरि जोबनि मै मति ॥
अहिनिसि कामि विआपिआ वणजारिआ मित्रा अंधुले नामु न चिति ॥
राम नामु घट अंतरि नाही होरि जाणै रस कस मीठे ॥
गिआनु धिआनु गुण संजमु नाही जनमि मरहुगे झूठे ॥
तीरथ वरत सुचि संजमु नाही करमु धरमु नही पूजा ॥
नानक भाइ भगति निसतारा दुबिधा विआपै दूजा ॥2॥
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा सरि हंस उलथड़े आइ ॥
जोबनु घटै जरूआ जिणै वणजारिआ मित्रा आव घटै दिनु जाइ ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हरि नाम का वणज करने आए जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के पहले पहर में (जीव) बालकों की अक्ल वाला (अंजान) होता है। (नाम सिमरन से) बे-परवाह रहता है। हे वणजारे मित्र ! (बाल उम्र में जीव माँ का) दूध पीता है और खेलों में ही मस्त रहता है, (उस उम्र में) माता पिता का (अपने) पुत्र से (बड़ा) प्यार होता है। माँ-बाप का पुत्र से बहुत प्यार होता है। माया का (ये) मोह सारी सृष्टि को (ही व्याप रहा है)। (जीव ने पिछले जन्मों में) कर्मों का जो संग्रह कमाया, उनके संजोग अनुसार (जगत में) जन्मा, (और यहां आ के पुनः उनके अनुसार) कर्म करता है, कार कमाता है। दुनिया माया के मोह में डूब रही है, परमात्मा का नाम सिमरन के बिना (इस मोह में से) खलासी नहीं हो सकती। हे नानक ! कह, हे जीव ! (जिंदगी की रात के) पहिले पहर में (आप बेपरवाह हैं), परमात्मा का सिमरन करें (सिमरन की मदद से ही आप माया के मोह से) बचेंगे।1। हरि नाम का वणज करने आए जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर में भर-जवानी के कारण जीव की मति (अक्ल ऐसे हो जाती है जैसे) शराब (में गॅुट है)। हे वणजारे मित्र ! (जीव) दिन रात काम वासना में दबा रहता है, (काम में) अंधे हुए को परमात्मा का नाम चित्त में (टिकाने की सुरति) नहीं (होती)। परमात्मा का नाम जीव के हृदय में नहीं बसता, (नाम के बिना) और मीठे कसेले अनेकों रसों के स्वाद पहचानता है। हे झूठे (मोह में फंसे जीव) ! आपने परमात्मा के साथ जान पहिचान नहीं डाली, प्रभू चरणों में आपकी सुरति नहीं, परमात्मा के गुण याद नहीं किए (इसका नतीजा ये होगा कि) आप जनम मरण के चक्कर में पड़ जाएँगे। (उच्च आत्मिक जीवन बनाने वाले सेवा-सिमरन के काम करने तो दूर रहे, कामुकता में मदहोश हुआ जीव) तीर्थ, व्रत, सुचि, संजम, पूजा आदिक कर्म काण्ड के धर्म भी नहीं करता। (वैसे) हे नानक ! परमात्मा के प्रेम के द्वारा प्रभू की भक्ति के द्वारा ही (इस काम वासना से) बचाव हो सकता है, (भक्ति-सिमरन की ओर से) दुचित्तापन रखने से (कामादिक की शक्ल में) माया का मोह ही जोर डालता है।2। हरि नाम का वणज करने वाले हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के तीसरे पहर सर पर हंस आ उतरते हैं (सिर पर सफेद बाल आ जाते हैं)। हे बंजारे मित्र ! (ज्यों ज्यों) जवानी घटती है बुढ़ापा (शारीरिक ताकत को) जीतता जाता है। (उम्र का) एक एक दिन गुजरता है उम्र घटती जाती है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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