Lulla Family

अंग 75

अंग
75
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा विसरि गइआ धिआनु ॥
हथो हथि नचाईऐ वणजारिआ मित्रा जिउ जसुदा घरि कानु ॥
हथो हथि नचाईऐ प्राणी मात कहै सुतु मेरा ॥
चेति अचेत मूड़ मन मेरे अंति नही कछु तेरा ॥
जिनि रचि रचिआ तिसहि न जाणै मन भीतरि धरि गिआनु ॥
कहु नानक प्राणी दूजै पहरै विसरि गइआ धिआनु ॥2॥
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धन जोबन सिउ चितु ॥
हरि का नामु न चेतही वणजारिआ मित्रा बधा छुटहि जितु ॥
हरि का नामु न चेतै प्राणी बिकलु भइआ संगि माइआ ॥
धन सिउ रता जोबनि मता अहिला जनमु गवाइआ ॥
धरम सेती वापारु न कीतो करमु न कीतो मितु ॥
कहु नानक तीजै पहरै प्राणी धन जोबन सिउ चितु ॥3॥
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा लावी आइआ खेतु ॥
जा जमि पकड़ि चलाइआ वणजारिआ मित्रा किसै न मिलिआ भेतु ॥
भेतु चेतु हरि किसै न मिलिओ जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥
झूठा रुदनु होआ दोुआलै खिन महि भइआ पराइआ ॥
साई वसतु परापति होई जिसु सिउ लाइआ हेतु ॥
कहु नानक प्राणी चउथै पहरै लावी लुणिआ खेतु ॥4॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर में (संसार में जनम ले के जीव को परमात्मा के चरणों का वह) ध्यान भूल जाता है (जो उस को माँ के पेट में रहने के समय होता है)। हे बंजारे मित्र ! (जन्म ले के जीव घर के) हरेक जीव के हाथ पर (ऐसे) नचाते हैं जैसे यशोधा के घर में श्री कृष्ण जी को। (नव जन्मा) जीव हरेक के हाथ में नचाया जाता है (खिलाया जाता है), माँ कहती है कि ये मेरा पुत्र है। पर, हे मेरे गाफिल मूर्ख मन ! याद रख, आखिरी समय में कोई भी चीज आपकी नही बनी रहेगी। जीव अपने मन में उस प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल के उसे याद नहीं करता, जिसने इसकी बंतर (रचना) बना कर इसे पैदा किया है। हे नानक ! कह – (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर में (संसार में जन्म ले के) जीव को प्रभू चरणों का ध्यान भूल जाता है।2। हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के तीसरे पहर में आपका मन धन से तथा जवानी के साथ लग गया है। हे बंजारे मित्र ! आप परमात्मा का नाम याद नहीं करता, जिसकी बरकति से आप (धन जोबन के मोह के) बंधनों में से निजात पा सके। जीव माया (के मोह) में इतना खो जाता है कि ये परमात्मा का नाम याद नहीं रखता। मन के रंग में रंगा जाता है, जवानी (के नशे) में मस्ता जाता है, (और इस तरह) श्रेष्ठ मनुष्य जनम गवा लेता है, ना इसने धर्म (भाव, हरि नाम सिमरन) का व्यापार किया, और ना ही इसने उच्च आत्मिक जीवन को अपना मित्र बनाया। हे नानक ! कह, (जिंदगी की रात के) तीसरे पहर में जीव ने धन से और जवानी से ही चित्त जोड़े रखा।3। हरि नाम का व्यापार करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के चौथे पहर (भाव, बुढ़ापा आ जाने पर) (शरीर) खेत को काटने वाला (यम) आ पहुँचा। हे बंजारे मित्र ! जब जम ने (आ के जीवात्मा को) पकड़ के आगे लगा लिया तो किसी (संबंधी) को भी ये समझ ना पड़ी कि ये क्या हैं गया। परमात्मा के इस हुकम और भेद की किसी को भी समझ ना पड़ सकी। जब यम ने (जीवात्मा को) पकड़ कर आगे लगा लिया, तो (उसके मृतक शरीर के) के चारों तरफ व्यर्थ का रोना-धोना शुरू हो गया। (वह जिसको सारे ही संबंधी ‘मेरा मेरा’ कहा करते थे) एक छिन में ही वह पराया हैं गया। जिससे (सारी उम्र) मोह किए रखा (और उसके अनुसार जो जो कर्म किए, अंत के समय) वह की कमाई सामने आ गई (प्राप्त हो गई)। हे नानक ! कह, (जिंदगी की रात के) चौथे पहर (भाव, बुढ़ापा आ जाने पर फसल) काटने वाले (यमदूतों) ने (शरीर) खेत को आ काटा।4।1।
सिरीरागु महला 1 ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बालक बुधि अचेतु ॥
खीरु पीऐ खेलाईऐ वणजारिआ मित्रा मात पिता सुत हेतु ॥ मात पिता सुत नेहु घनेरा माइआ मोहु सबाई ॥
संजोगी आइआ किरतु कमाइआ करणी कार कराई ॥
राम नाम बिनु मुकति न होई बूडी दूजै हेति ॥
कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै छूटहिगा हरि चेति ॥1॥
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा भरि जोबनि मै मति ॥
अहिनिसि कामि विआपिआ वणजारिआ मित्रा अंधुले नामु न चिति ॥
राम नामु घट अंतरि नाही होरि जाणै रस कस मीठे ॥
गिआनु धिआनु गुण संजमु नाही जनमि मरहुगे झूठे ॥
तीरथ वरत सुचि संजमु नाही करमु धरमु नही पूजा ॥
नानक भाइ भगति निसतारा दुबिधा विआपै दूजा ॥2॥
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा सरि हंस उलथड़े आइ ॥
जोबनु घटै जरूआ जिणै वणजारिआ मित्रा आव घटै दिनु जाइ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हरि नाम का वणज करने आए जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के पहले पहर में (जीव) बालकों की अक्ल वाला (अंजान) होता है। (नाम सिमरन से) बे-परवाह रहता है। हे वणजारे मित्र ! (बाल उम्र में जीव माँ का) दूध पीता है और खेलों में ही मस्त रहता है, (उस उम्र में) माता पिता का (अपने) पुत्र से (बड़ा) प्यार होता है। माँ-बाप का पुत्र से बहुत प्यार होता है। माया का (ये) मोह सारी सृष्टि को (ही व्याप रहा है)। (जीव ने पिछले जन्मों में) कर्मों का जो संग्रह कमाया, उनके संजोग अनुसार (जगत में) जन्मा, (और यहां आ के पुनः उनके अनुसार) कर्म करता है, कार कमाता है। दुनिया माया के मोह में डूब रही है, परमात्मा का नाम सिमरन के बिना (इस मोह में से) खलासी नहीं हो सकती। हे नानक ! कह, हे जीव ! (जिंदगी की रात के) पहिले पहर में (आप बेपरवाह है), परमात्मा का सिमरन कर (सिमरन की मदद से ही आप माया के मोह से) बचेगा।1। हरि नाम का वणज करने आए जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर में भर-जवानी के कारण जीव की मति (अक्ल ऐसे हो जाती है जैसे) शराब (में गॅुट है)। हे वणजारे मित्र ! (जीव) दिन रात काम वासना में दबा रहता है, (काम में) अंधे हुए को परमात्मा का नाम चित्त में (टिकाने की सुरति) नहीं (होती)। परमात्मा का नाम जीव के हृदय में नहीं बसता, (नाम के बिना) और मीठे कसेले अनेकों रसों के स्वाद पहचानता है। हे झूठे (मोह में फंसे जीव) ! तूने परमात्मा के साथ जान पहिचान नहीं डाली, प्रभू चरणों में आपकी सुरति नहीं, परमात्मा के गुण याद नहीं किए (इसका नतीजा ये होंगे कि) आप जनम मरण के चक्कर में पड़ जाएगा। (उच्च आत्मिक जीवन बनाने वाले सेवा-सिमरन के काम करने तो दूर रहे, कामुकता में मदहोश हुआ जीव) तीर्थ, व्रत, सुचि, संजम, पूजा आदिक कर्म काण्ड के धर्म भी नहीं करता। (वैसे) हे नानक ! परमात्मा के प्रेम के द्वारा प्रभू की भक्ति के द्वारा ही (इस काम वासना से) बचाव हो सकता है, (भक्ति-सिमरन की ओर से) दुचित्तापन रखने से (कामादिक की शक्ल में) माया का मोह ही जोर डालता है।2। हरि नाम का वणज करने वाले हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के तीसरे पहर सर पर हंस आ उतरते हैं (सिर पर सफेद बाल आ जाते हैं)। हे बंजारे मित्र ! (ज्यों ज्यों) जवानी घटती है बुढ़ापा (शारीरिक ताकत को) जीतता जाता है। (उम्र का) एक एक दिन गुजरता है उम्र घटती जाती है।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर में (संसार में जनम ले के जीव को परमात्मा के चरणों का वह) ध्यान भूल जाता है (जो उस को माँ के पेट में रहने के समय ह।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।