सेवक का होइ सेवकु वरता करि करि बिनउ बुलाई ॥17॥
नानक की बेनंती हरि पहि गुर मिलि गुर सुखु पाई ॥18॥
तू आपे गुरु चेला है आपे गुर विचु दे तुझहि धिआई ॥19॥
जो तुधु सेवहि सो तूहै होवहि तुधु सेवक पैज रखाई ॥20॥
भंडार भरे भगती हरि तेरे जिसु भावै तिसु देवाई ॥21॥
जिसु तूं देहि सोई जनु पाए होर निहफल सभ चतुराई ॥22॥
सिमरि सिमरि सिमरि गुरु अपुना सोइआ मनु जागाई ॥23॥
इकु दानु मंगै नानकु वेचारा हरि दासनि दासु कराई ॥24॥
जे गुरु झिड़के त मीठा लागै जे बखसे त गुर वडिआई ॥25॥
गुरमुखि बोलहि सो थाइ पाए मनमुखि किछु थाइ न पाई ॥26॥
पाला ककरु वरफ वरसै गुरसिखु गुर देखण जाई ॥27॥
सभु दिनसु रैणि देखउ गुरु अपुना विचि अखी गुर पैर धराई ॥28॥
अनेक उपाव करी गुर कारणि गुर भावै सो थाइ पाई ॥29॥
रैणि दिनसु गुर चरण अराधी दइआ करहु मेरे साई ॥30॥
नानक का जीउ पिंडु गुरू है गुर मिलि त्रिपति अघाई ॥31॥
नानक का प्रभु पूरि रहिओ है जत कत तत गोसाई ॥32॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंदरि सचा नेहु लाइआ प्रीतम आपणै ॥
तनु मनु होइ निहालु जा गुरु देखा साम॑णे ॥1॥
मै हरि हरि नामु विसाहु ॥
गुर पूरे ते पाइआ अंम्रितु अगम अथाहु ॥1॥ रहाउ ॥
हउ सतिगुरु वेखि विगसीआ हरि नामे लगा पिआरु ॥
किरपा करि कै मेलिअनु पाइआ मोख दुआरु ॥2॥
सतिगुरु बिरही नाम का जे मिलै त तनु मनु देउ ॥
जे पूरबि होवै लिखिआ ता अंम्रितु सहजि पीएउ ॥3॥
सुतिआ गुरु सालाहीऐ उठदिआ भी गुरु आलाउ ॥
कोई ऐसा गुरमुखि जे मिलै हउ ता के धोवा पाउ ॥4॥
कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु मै प्रीतमु देइ मिलाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ हरि पाइआ मिलिआ सहजि सुभाइ ॥5॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैसे जब बारिश होती है तब धरती सुंदर लगने लगती है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।