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अंग 758

अंग
758
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिउ धरती सोभ करे जलु बरसै तिउ सिखु गुर मिलि बिगसाई ॥16॥
सेवक का होइ सेवकु वरता करि करि बिनउ बुलाई ॥17॥
नानक की बेनंती हरि पहि गुर मिलि गुर सुखु पाई ॥18॥
तू आपे गुरु चेला है आपे गुर विचु दे तुझहि धिआई ॥19॥
जो तुधु सेवहि सो तूहै होवहि तुधु सेवक पैज रखाई ॥20॥
भंडार भरे भगती हरि तेरे जिसु भावै तिसु देवाई ॥21॥
जिसु तूं देहि सोई जनु पाए होर निहफल सभ चतुराई ॥22॥
सिमरि सिमरि सिमरि गुरु अपुना सोइआ मनु जागाई ॥23॥
इकु दानु मंगै नानकु वेचारा हरि दासनि दासु कराई ॥24॥
जे गुरु झिड़के त मीठा लागै जे बखसे त गुर वडिआई ॥25॥
गुरमुखि बोलहि सो थाइ पाए मनमुखि किछु थाइ न पाई ॥26॥
पाला ककरु वरफ वरसै गुरसिखु गुर देखण जाई ॥27॥
सभु दिनसु रैणि देखउ गुरु अपुना विचि अखी गुर पैर धराई ॥28॥
अनेक उपाव करी गुर कारणि गुर भावै सो थाइ पाई ॥29॥
रैणि दिनसु गुर चरण अराधी दइआ करहु मेरे साई ॥30॥
नानक का जीउ पिंडु गुरू है गुर मिलि त्रिपति अघाई ॥31॥
नानक का प्रभु पूरि रहिओ है जत कत तत गोसाई ॥32॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: जैसे जब बारिश होती है तब धरती सुंदर लगने लगती है।वैसे ही सिख को मिल के प्रसन्न होता है। 16। हे भाई ! मैं गुरू के सेवक का सेवक बन के उसके काम करने को तैयार हूँ मैं उसको विनतियाँ कर कर के (खुशी से) बुलाऊँगा। 17। नानक की परमात्मा के पास विनती है (- हे प्रभू ! मुझे गुरू मिला) गुरू को मिल के मुझे बड़ा आनंद प्राप्त होता है। 18। हे प्रभू ! आप स्वयं ही गुरू है।आप खुद ही सिख है।मैं गुरू के द्वारा आपको ही ध्याता हूँ। 19। हे प्रभू ! जो मनुष्य आपकी सेवा-भक्ति करते हैं।वे आपका ही रूप बन जाते हैं।आप अपने सेवकों की इज्जत (सदा) रखता आया है। 20। हे हरी ! आपके पास आपकी भक्ति के खजाने भरे पड़े हैं।जिस पर आपकी रजा होती है उसको आप (गुरू के द्वारा ये खजाना) दिलवाता है। 21। हे प्रभू ! (आपकी भक्ति का खजाना प्राप्त करने के लिए) हरेक समझदारी-चतुराई बेकार है।वही मनुष्य (इस खजाने को) हासिल करता है जिसको आप खुद देता है। 22। हे प्रभू ! (आपकी मेहर से) मैं अपने गुरू को बार-बार याद करके (माया के मोह की नींद में) सोए हुए अपने मन को जगाता रहता हूँ। 23। हे प्रभू ! (आपके दर से आपका) गरीब (दास) नानक एक दान माँगता है, (मेहर कर) मुझे अपने दासों का दास बनाए रख। 24। अगर गुरू (मुझे मेरी किसी भूल के कारण) फटकार दे।तो उसकी वह झिड़क मुझे प्यारी लगती है।अगर गुरू मेरे पर मेहर की निगाह करता है।तो ये गुरू का उपकार है (मुझ में कोई कोई गुण नहीं)। 25। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य जो वचन बोलते हैं।गुरू उन्हें परवान करता है।अपने मन के पीछे चलने वालों का बोला हुआ कबूल नहीं होता। 26। पाला पड़े।कक्कर पड़े।बर्फ पड़े।फिर भी गुरू का सिख गुरू के दर्शन करने जाता है। 27। मैं भी दिन-रात हर वक्त अपने गुरू के दर्शन करता रहता हूँ।गुरू के चरणों को अपनी आँखों में बसाए रखता हूँ। 28। अगर मैं गुरू (को प्रसन्न करने) के लिए अनेकों ही यत्न करता रहूँ वही प्रयत्न कबूल होता है।जो गुरू को पसंद आता है। 29। हे मेरे पति-प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर।मैं दिन-रात हर वक्त गुरू के चरणों का ध्यान धरता रहूँ। 30। नानक की जिंद गुरू के हवाले है।नानक का शरीर गुरू के चरणों में है।गुरू को मिल के मैं तृप्त हो जाता हूँ।अघा जाता हूँ (माया की भूख नहीं रह जाती)। 31। (गुरू की कृपा से ये समझ आती है कि) नानक का प्रभू सब सृष्टि का पति हर जगह व्यापक हो रहा है। 32। 1।
रागु सूही महला 4 असटपदीआ घरु 10
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंदरि सचा नेहु लाइआ प्रीतम आपणै ॥
तनु मनु होइ निहालु जा गुरु देखा साम॑णे ॥1॥
मै हरि हरि नामु विसाहु ॥
गुर पूरे ते पाइआ अंम्रितु अगम अथाहु ॥1॥ रहाउ ॥
हउ सतिगुरु वेखि विगसीआ हरि नामे लगा पिआरु ॥
किरपा करि कै मेलिअनु पाइआ मोख दुआरु ॥2॥
सतिगुरु बिरही नाम का जे मिलै त तनु मनु देउ ॥
जे पूरबि होवै लिखिआ ता अंम्रितु सहजि पीएउ ॥3॥
सुतिआ गुरु सालाहीऐ उठदिआ भी गुरु आलाउ ॥
कोई ऐसा गुरमुखि जे मिलै हउ ता के धोवा पाउ ॥4॥
कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु मै प्रीतमु देइ मिलाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ हरि पाइआ मिलिआ सहजि सुभाइ ॥5॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 4 असटपदीआ घरु 10 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! (गुरू ने) अपने प्यारे प्रभू का सदा कामय रहने वाला प्यार मेरे दिल में पैदा कर दिया है। (तभी तो) जब मैं गुरू को अपने सामने देखता हूँ।तो मेरा तन मेरा मन खिल उठता है। 1। हे भाई ! मैंने उस परमात्मा का वह नाम सरमाया पूरे गुरू से प्राप्त कर लिया है जो आत्मिक जीवन देने वाला है। जो (गुरू के बिना) अपहुँच है।जो बड़े गहरे दिल वाला है। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू को देख के मेरी जिंद खिल उठती है।(गुरू की कृपा) परमात्मा के नाम में मेरा प्यार बन गया है। (जिन्हें गुरू ने) मेहर करके (परमात्मा के चरणों से) जोड़ दिया है।उन्होंने (दुनिया के मोह से) खलासी का रास्ता पा लिया। 2। हे भाई ! गुरू परमात्मा के नाम का प्रेमी है।अगर मुझे गुरू मिल जाए तो मैं अपना तन अपना मन उसके आगे भेटा रख दूँ। अगर पूर्बले समय में (गुरू के मिलाप के लेख मेरे माथे पर) लिखें हों।तब ही (गुरू से ले के) मैं आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल आत्मिक अडोलता में पी सकता हूँ। 3। हे भाई ! सोए हुए भी गुरू की सिफत सालाह करनी चाहिए।उठते समय पर भी मैं गुरू का नाम उचारूँ – अगर ऐसी मति देने वाले गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई सज्जन मुझे मिल जाए।तो मैं उसके पैर धोऊँ। 4। हे भाई ! मुझे कोई ऐसा सज्जन ढूँढ दो।जो मुझे प्रीतम-गुरू से मिला दे। गुरू के मिलने से ही परमात्मा (का मिलाप) हासिल होता है।(जिसको गुरू मिल जाता है।उसको) परमात्मा आत्मिक अडोलता में प्यार-रंग में मिल जाता है। 5।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैसे जब बारिश होती है तब धरती सुंदर लगने लगती है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।