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अंग 757

अंग
757
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हउ तिन कै बलिहारणै मनि हरि गुण सदा रवंनि ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु सरवरु मान सरोवरु है वडभागी पुरख लहंनि॑ ॥
सेवक गुरमुखि खोजिआ से हंसुले नामु लहंनि ॥2॥
नामु धिआइनि॑ रंग सिउ गुरमुखि नामि लगंनि॑ ॥
धुरि पूरबि होवै लिखिआ गुर भाणा मंनि लएनि॑ ॥3॥
वडभागी घरु खोजिआ पाइआ नामु निधानु ॥
गुरि पूरै वेखालिआ प्रभु आतम रामु पछानु ॥4॥
सभना का प्रभु एकु है दूजा अवरु न कोइ ॥
गुर परसादी मनि वसै तितु घटि परगटु होइ ॥5॥
सभु अंतरजामी ब्रहमु है ब्रहमु वसै सभ थाइ ॥
मंदा किस नो आखीऐ सबदि वेखहु लिव लाइ ॥6॥
बुरा भला तिचरु आखदा जिचरु है दुहु माहि ॥
गुरमुखि एको बुझिआ एकसु माहि समाइ ॥7॥
सेवा सा प्रभ भावसी जो प्रभु पाए थाइ ॥
जन नानक हरि आराधिआ गुर चरणी चितु लाइ ॥8॥2॥4॥9॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य अपने मन में सदा परमात्मा के गुण याद करते रहते हैं।मैं उनसे सदके जाता हूँ। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू एक सुंदर सा सरोवर है।मान सरोवर है।बड़े भाग्यों वाले मनुष्य उसको पा लेते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाले जिन सेवकों ने तलाश की।वह सुंदर हंस (-गुरसिख उस मान सरोवर में से) नाम (-मोती) पा लेते हैं। 2। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रेम से परमात्मा का नाम सिमरते हैं।और नाम में जुड़े रहते हैं। जिन मनुष्यों के भाग्यों में धुर-दरगाह से पहले से ही लिखा होता है।वही गुरू की रजा को मानते हैं। 3। हे भाई ! जिन बड़े भाग्यों वाले मनुष्यों ने अपने हृदय-घर की खोज की।उन्होंने (अपने हृदय में से ही) परमात्मा का नाम-खजाना पा लिया। पूरे गुरू ने (उन्हें उनके अंदर ही वह नाम-खजाना) दिखला दिया।हे भाई ! आप भी (गुरू की शरण पड़ कर) उस सर्व-व्यापक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल। 4। हे भाई ! एक परमात्मा ही सब जीवों का मालिक है।उसके बराबर का और कोई नहीं हैं। गुरू की कृपा से (जिस) मन में आ बसता है।उसके हृदय में वह प्रत्यक्ष उघड़ ही पड़ता है (उस मनुष्य के जीवन में सुचॅजी तब्दीली आ जाती है)। 5। हे भाई ! ये सारा जगत-आकार उस अंतरजामी परमात्मा का स्वरूप है।हरेक जगह में ही परमात्मा बस रहा है। हे भाई ! गुरू के शबद में सुरति जोड़ के देखो (हरेक जगह वही दिखेगा।जब हरेक जगह वही दिख पड़े।तो) किसी को बुरा कहा नहीं जा सकता। 6। हे भाई ! मनुष्य उतनी देर ही किसी को अच्छा या बुरा कहता है जब तक वह खुद मेर-तेर में रहता है। जो मनुष्य गुरू के राह पर चलता है।वह (हर जगह) एक प्रभू को ही (बसता) समझता है।वह एक परमात्मा में लीन रहता है। 7। हे भाई ! वही सेवा-भक्ति प्रभू को पसंद आती है।जो प्रभू कबूल करता है। हे दास नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य गुरू के चरणों में चित्त जोड़ के परमात्मा की आराधना करते हैं। 8। 2। 4। 9।
रागु सूही असटपदीआ महला 4 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोई आणि मिलावै मेरा प्रीतमु पिआरा हउ तिसु पहि आपु वेचाई ॥1॥
दरसनु हरि देखण कै ताई ॥
क्रिपा करहि ता सतिगुरु मेलहि हरि हरि नामु धिआई ॥1॥ रहाउ ॥
जे सुखु देहि त तुझहि अराधी दुखि भी तुझै धिआई ॥2॥
जे भुख देहि त इत ही राजा दुख विचि सूख मनाई ॥3॥
तनु मनु काटि काटि सभु अरपी विचि अगनी आपु जलाई ॥4॥
पखा फेरी पाणी ढोवा जो देवहि सो खाई ॥5॥
नानकु गरीबु ढहि पइआ दुआरै हरि मेलि लैहु वडिआई ॥6॥
अखी काढि धरी चरणा तलि सभ धरती फिरि मत पाई ॥7॥
जे पासि बहालहि ता तुझहि अराधी जे मारि कढहि भी धिआई ॥8॥
जे लोकु सलाहे ता तेरी उपमा जे निंदै त छोडि न जाई ॥9॥
जे तुधु वलि रहै ता कोई किहु आखउ तुधु विसरिऐ मरि जाई ॥10॥
वारि वारि जाई गुर ऊपरि पै पैरी संत मनाई ॥11॥
नानकु विचारा भइआ दिवाना हरि तउ दरसन कै ताई ॥12॥
झखड़ु झागी मीहु वरसै भी गुरु देखण जाई ॥13॥
समुंदु सागरु होवै बहु खारा गुरसिखु लंघि गुर पहि जाई ॥14॥
जिउ प्राणी जल बिनु है मरता तिउ सिखु गुर बिनु मरि जाई ॥15॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही असटपदीआ महला 4 घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! अगर कोई (सज्जन) मेरा प्रीतम ला के मुझे मिला दे।तो मैं उसके आगे अपना आप बेच दूँ। 1। हे प्रभू ! आपके दर्शन करने के लिए मैं सदा अगर आप (मेरे पर) मेहर करे। और (मुझे) गुरू मिला दे। तोआपका नाम सिमरता रहूँगा। 1।रहाउ। हे प्रभू ! (मेहर कर) अगर आप मुझे सुख दे।तो मैं आपको ही सिमरता रहूँ।दुख में भी मैं आपकी ही आराधना करता रहूँ। 2। हे प्रभू ! अगर आप मुझे भूखा रखे।तो मैं इस भूख में ही तृप्त रहूँगा।दुख में मैं सुख प्रतीत करूँगा (आपकी ये मेहर जरूर हैं जाए कि मुझे आपके दर्शन हैं जाएं)। 3। हे प्रभू ! (आपके दर्शन करने की खातिर अगर जरूरत पड़े तो) मैं अपना शरीर अपना मन काट काट के सारा भेटा कर दूँगा।आग में अपने आप को जला (भी) दूँगा। 4। हे प्रभू ! (आपके दीदार की खातिर।आपकी संगतों को) मैं पंखा झेलूँगा।पानी ढोऊँगा।जो कुछ आप मुझे (खाने के लिए) देगा वही (खुश हैं के) खा लूँगा। 5। हे प्रभू ! (आपका दास) गरीब नानक आपके दर पर आ गिरा है।मुझे अपने चरणों में जोड़ ले।आपका ये उपकार होंगे। 6। हे प्रभू ! (अगर जरूरत पड़े तो) मैं अपनी आँखें निकाल के (गुरू के) पैरों तले रख दूँ।मैं सारी धरती पर तलाश करूँ कि शायद कहीं गुरू मिल जाए। 7। हे प्रभू ! यदि आप मुझे अपने पास बैठा ले।तो आपको आराधता रहूँ।अगर आप मुझे (धक्के) मार के (अपने दर से) निकाल दे।तो भी मैं आपका ही ध्यान धरता रहूँगा। 8। हे प्रभू ! अगर जगत मुझे अच्छा कहेगा।तो (दरअसल) ये आपकी ही उपमा होगी।अगर (आपकी सिफत सालाह करने के कारण) दुनिया मेरी निंदा करेगी।तो भी मैं (आपको) छोड़ के नहीं जाऊँगा। 9। हे प्रभू ! अगर मेरी प्रीति आपके पास बनी रहे।तो बेशक कोई कुछ भी मुझे कहता फिरे।पर।आपको भूलते ही।हे प्रभू ! मैं आत्मिक मौत मर जाऊँगा। 10। हे प्रभू ! (आपके दर्शनों की खातिर) मैं गुरू पर कुर्बान-कुर्बान जाऊँगा।मैं संत-गुरू के चरणों में पड़ के उसको प्रसन्न करूँगा। 11। हे हरी ! आपके दर्शन करने की खातिर (आपका दास) बेचारा नानक कमला हुआ फिरता है। 12। हे प्रभू ! (आपका मिलाप प्राप्त करने की खातिर) मैं गुरू के दर्शनों के लिए झक्खड़-अंधेरी (अपने सिर पर) झेलने के लिए भी तैयार हूँ।अगर बारिश होने लगे तो भी (बरसती बारिश में ही) मैं गुरू को देखने के लिए जाने को तैयार हूँ। 13। हे भाई ! खारा समुंद्र भी लांघना पड़े तो भी उसको लांघ के गुरू का सिख गुरू के पास पहुँचता है। 14। जैसे प्राणी पानी के बिना मरने लगता है।वैसे ही सिख गुरू को मिले बिना अपनी आत्मिक मौत आ गई समझता है। 15।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य अपने मन में सदा परमात्मा के गुण याद करते रहते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।