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अंग 759

अंग
759
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सतिगुरु सागरु गुण नाम का मै तिसु देखण का चाउ ॥
हउ तिसु बिनु घड़ी न जीवऊ बिनु देखे मरि जाउ ॥6॥
जिउ मछुली विणु पाणीऐ रहै न कितै उपाइ ॥
तिउ हरि बिनु संतु न जीवई बिनु हरि नामै मरि जाइ ॥7॥
मै सतिगुर सेती पिरहड़ी किउ गुर बिनु जीवा माउ ॥
मै गुरबाणी आधारु है गुरबाणी लागि रहाउ ॥8॥
हरि हरि नामु रतंनु है गुरु तुठा देवै माइ ॥
मै धर सचे नाम की हरि नामि रहा लिव लाइ ॥9॥
गुर गिआनु पदारथु नामु है हरि नामो देइ द्रिड़ाइ ॥
जिसु परापति सो लहै गुर चरणी लागै आइ ॥10॥
अकथ कहाणी प्रेम की को प्रीतमु आखै आइ ॥
तिसु देवा मनु आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥11॥
सजणु मेरा एकु तूं करता पुरखु सुजाणु ॥
सतिगुरि मीति मिलाइआ मै सदा सदा तेरा ताणु ॥12॥
सतिगुरु मेरा सदा सदा ना आवै न जाइ ॥
ओहु अबिनासी पुरखु है सभ महि रहिआ समाइ ॥13॥
राम नाम धनु संचिआ साबतु पूंजी रासि ॥
नानक दरगह मंनिआ गुर पूरे साबासि ॥14॥1॥2॥11॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! गुरू गुणों का समुंद्र है।परमात्मा के नाम का समुंद्र है।उस गुरू के दर्शन की मुझे तांघ लगी हुई है। मैं उस गुरू के बिना एक घड़ी भर के लिए भी आत्मिक जीवन कायम नहीं रख सकता।गुरू के दर्शन किए बिना मेरी आत्मिक मौत हो जाती है। 6। हे भाई ! जैसे मछली पानी के बिना और किसी भी यत्न से जीवित नहीं रह सकती। वैसे ही परमात्मा के बिना संत भी जीवित नहीं रह सकता।परमात्मा के नाम के बिना वह अपनी आत्मिक मौत समझता है। 7। हे माँ ! मेरा अपने गुरू के साथ गहरा प्यार है।गुरू के बिना मैं कैसे जी सकता हूँ। गुरू की बाणी में जुड़ के ही मैं रह सकता हूँ। 8। हे माँ ! परमात्मा का नाम रत्न (जैसा कीमती पर्दाथ) है।गुरू (जिस पर) प्रसन्न (होता है।उसको ये रत्न) देता है। सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू का नाम ही मेरा आसरा बन चुका है।प्रभू के नाम में सुरति जोड़ के ही मैं रह सकता हूँ। 9। हे भाई ! गुरू की दी हुई आत्मिक जीवन की सूझ एक कीमती चीज है।गुरू का दिया हुआ हरी नाम कीमती पदार्थ है। जिस मनुष्य के भाग्यों में इसकी प्राप्ति लिखी है।वह मनुष्य गुरू के चरणों में आ लगता है।और ये पदार्थ हासिल कर लेता है। 10। हे भाई ! प्रभू के प्रेम की कहानी हर कोई बयान नहीं कर सकता।जो कोई प्यारा सज्ज्न मुझे आ के ये कहानी सुनाए। तो मैं अपना मन उसके हवाले कर दूँ।झुक-झुक के उसके पैरों पर गिर पड़ूँ। 11। हे प्रभू ! सिर्फ आप ही मेरा (असल) सज्जन है।आप सबको पैदा करने वाला है।सबमें व्यापक है।सबकी जानने वाला है। ं मित्र गुरू ने मुझे आपके साथ मिला दिया है।मुझे सदा ही आपका सहारा है। 12। हे भाई ! प्यारा गुरू (बताता है कि) परमात्मा सदा ही कायम रहने वाला है।वह ना मरता है न पैदा होता है। वह पुरुख-प्रभू कभी नाश होने वाला नहीं।वह सबमें मौजूद है। 13। हे नानक ! (कह,हे भाई !) जिस मनुष्य की पूरे गुरू ने पीठ थप-थपा दी उसने परमात्मा का नाम-धन इकट्ठा कर लिया।उसकी ये राशि-पूँजी सदा अखॅुट रहती है। और उसको प्रभू की दरगाह में सत्कार प्राप्त होता है। 14। 1। 2। 11।
रागु सूही असटपदीआ महला 5 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उरझि रहिओ बिखिआ कै संगा ॥
मनहि बिआपत अनिक तरंगा ॥1॥
मेरे मन अगम अगोचर ॥ कत पाईऐ पूरन परमेसर ॥1॥ रहाउ ॥
मोह मगन महि रहिआ बिआपे ॥
अति त्रिसना कबहू नही ध्रापे ॥2॥
बसइ करोधु सरीरि चंडारा ॥
अगिआनि न सूझै महा गुबारा ॥3॥
भ्रमत बिआपत जरे किवारा ॥
जाणु न पाईऐ प्रभ दरबारा ॥4॥
आसा अंदेसा बंधि पराना ॥
महलु न पावै फिरत बिगाना ॥5॥
सगल बिआधि कै वसि करि दीना ॥
फिरत पिआस जिउ जल बिनु मीना ॥6॥
कछू सिआनप उकति न मोरी ॥
एक आस ठाकुर प्रभ तोरी ॥7॥
करउ बेनती संतन पासे ॥
मेलि लैहु नानक अरदासे ॥8॥
भइओ क्रिपालु साधसंगु पाइआ ॥
नानक त्रिपते पूरा पाइआ ॥1॥ रहाउ दूजा ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही असटपदीआ महला 5 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ मनुष्य माया की संगति में फंसा रहता है। मनुष्य के मन को (लोभ की) अनेकों लहरें दबाए रखती हैं। 1। हे मेरे मन ! जो मनुष्य की बुद्धि से वह परे है।ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से भी उस तक पहुँचा नहीं जा सकता। वह पूर्ण परमात्मा कैसे मिले। 1।रहाउ। (मनुष्य का मन) मोह की मगनता में दबा रहता है (हर वक्त इसे माया की) बहुत सारी तृष्णा बनी रहती है।किसी भी वक्त (किसी भी तरह से) (इसका मन) तृप्त नहीं होता। 2। मनुष्य के शरीर में चांडाल क्रोध बसता है। आत्मिक जीवन से बेसमझी के कारण (इसकी जीवन-यात्रा में) बहुत अंधकार बना रहता है (जिसके कारण इसे सही जीवन-राह) नहीं सूझता (दिखाई देता)। 3। भटकना और माया का दबाव- (हर वक्त) ये दो किवाड़ बँद रहते हैं। इसलिए मनुष्य परमात्मा के दरबार में नहीं पहुँच सकता। 4। मनुष्य हर वक्त माया की आसा और चिंता-फिक्र के बँधन में पड़ा रहता है। प्रभू की हजूरी प्राप्त नहीं कर सकता।परदेसियों की तरह (राहों से बेराह हुआ) भटकता फिरता है। 5। हे भाई ! मनुष्य सारी ही बिमारियों के वश में आया रहता है। जैसे पानी के बिना मछली तड़फती है।वैसे ही ये तृष्णा का मारा हुआ भटकता है। 6। हे प्रभू ! (इन सारे विकारों के मुकाबले) मेरी कोई चतुराई कोई विकार चल नहीं सकते। हे मेरे मालिक ! सिर्फ आपकी (सहायता की ही) आशा है (कि आप बचा ले)। 7। हे प्रभू ! मैं आपके संत-जनों के आगे विनती करता हूँ। आरजू करता हूँे कि मुझ नानक को (अपने चरणों में) मिलाए रखे। 8। हे नानक ! (कह) जिन मनुष्यों पर परमात्मा दयावान होता है।उनको गुरू की संगति प्राप्त होती है। वह (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाते हैं।और।उन्हें पूरन प्रभू मिल जाता है। 1।रहाउ दूजा।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! गुरू गुणों का समुंद्र है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।