हउ तिसु बिनु घड़ी न जीवऊ बिनु देखे मरि जाउ ॥6॥
जिउ मछुली विणु पाणीऐ रहै न कितै उपाइ ॥
तिउ हरि बिनु संतु न जीवई बिनु हरि नामै मरि जाइ ॥7॥
मै सतिगुर सेती पिरहड़ी किउ गुर बिनु जीवा माउ ॥
मै गुरबाणी आधारु है गुरबाणी लागि रहाउ ॥8॥
हरि हरि नामु रतंनु है गुरु तुठा देवै माइ ॥
मै धर सचे नाम की हरि नामि रहा लिव लाइ ॥9॥
गुर गिआनु पदारथु नामु है हरि नामो देइ द्रिड़ाइ ॥
जिसु परापति सो लहै गुर चरणी लागै आइ ॥10॥
अकथ कहाणी प्रेम की को प्रीतमु आखै आइ ॥
तिसु देवा मनु आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥11॥
सजणु मेरा एकु तूं करता पुरखु सुजाणु ॥
सतिगुरि मीति मिलाइआ मै सदा सदा तेरा ताणु ॥12॥
सतिगुरु मेरा सदा सदा ना आवै न जाइ ॥
ओहु अबिनासी पुरखु है सभ महि रहिआ समाइ ॥13॥
राम नाम धनु संचिआ साबतु पूंजी रासि ॥
नानक दरगह मंनिआ गुर पूरे साबासि ॥14॥1॥2॥11॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उरझि रहिओ बिखिआ कै संगा ॥
मनहि बिआपत अनिक तरंगा ॥1॥
मेरे मन अगम अगोचर ॥ कत पाईऐ पूरन परमेसर ॥1॥ रहाउ ॥
मोह मगन महि रहिआ बिआपे ॥
अति त्रिसना कबहू नही ध्रापे ॥2॥
बसइ करोधु सरीरि चंडारा ॥
अगिआनि न सूझै महा गुबारा ॥3॥
भ्रमत बिआपत जरे किवारा ॥
जाणु न पाईऐ प्रभ दरबारा ॥4॥
आसा अंदेसा बंधि पराना ॥
महलु न पावै फिरत बिगाना ॥5॥
सगल बिआधि कै वसि करि दीना ॥
फिरत पिआस जिउ जल बिनु मीना ॥6॥
कछू सिआनप उकति न मोरी ॥
एक आस ठाकुर प्रभ तोरी ॥7॥
करउ बेनती संतन पासे ॥
मेलि लैहु नानक अरदासे ॥8॥
भइओ क्रिपालु साधसंगु पाइआ ॥
नानक त्रिपते पूरा पाइआ ॥1॥ रहाउ दूजा ॥1॥
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! गुरू गुणों का समुंद्र है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।