सचा साहु सचे वणजारे ओथै कूड़े न टिकंनि ॥ ओना सचु न भावई दुख ही माहि पचंनि ॥18॥ हउमै मैला जगु फिरै मरि जंमै वारो वार ॥ पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहार ॥19॥ संता संगति मिलि रहै ता सचि लगै पिआरु ॥ सचु सलाही सचु मनि दरि सचै सचिआरु ॥20॥ गुर पूरे पूरी मति है अहिनिसि नामु धिआइ ॥ हउमै मेरा वड रोगु है विचहु ठाकि रहाइ ॥21॥ गुरु सालाही आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥ तनु मनु सउपी आगै धरी विचहु आपु गवाइ ॥22॥ खिंचोताणि विगुचीऐ एकसु सिउ लिव लाइ ॥ हउमै मेरा छडि तू ता सचि रहै समाइ ॥23॥ सतिगुर नो मिले सि भाइरा सचै सबदि लगंनि ॥ सचि मिले से न विछुड़हि दरि सचै दिसंनि ॥24॥ से भाई से सजणा जो सचा सेवंनि ॥ अवगण विकणि पल॑रनि गुण की साझ करंनि॑ ॥25॥ गुण की साझ सुखु ऊपजै सची भगति करेनि ॥ सचु वणंजहि गुर सबद सिउ लाहा नामु लएनि ॥26॥ सुइना रुपा पाप करि करि संचीऐ चलै न चलदिआ नालि ॥ विणु नावै नालि न चलसी सभ मुठी जमकालि ॥27॥ मन का तोसा हरि नामु है हिरदै रखहु सम॑ालि ॥ एहु खरचु अखुटु है गुरमुखि निबहै नालि ॥28॥ ए मन मूलहु भुलिआ जासहि पति गवाइ ॥ इहु जगतु मोहि दूजै विआपिआ गुरमती सचु धिआइ ॥29॥ हरि की कीमति न पवै हरि जसु लिखणु न जाइ ॥ गुर कै सबदि मनु तनु रपै हरि सिउ रहै समाइ ॥30॥ सो सहु मेरा रंगुला रंगे सहजि सुभाइ ॥ कामणि रंगु ता चड़ै जा पिर कै अंकि समाइ ॥31॥ चिरी विछुंने भी मिलनि जो सतिगुरु सेवंनि ॥ अंतरि नव निधि नामु है खानि खरचनि न निखुटई हरि गुण सहजि रवंनि ॥32॥ ना ओइ जनमहि ना मरहि ना ओइ दुख सहंनि ॥ गुरि राखे से उबरे हरि सिउ केल करंनि ॥33॥ सजण मिले न विछुड़हि जि अनदिनु मिले रहंनि ॥ इसु जग महि विरले जाणीअहि नानक सचु लहंनि ॥34॥1॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (हरी-नाम की पूँजी का मालिक) शाह-प्रभू सदा कायम रहने वाला है।उसके नाम का व्यापार करने वाले भी अटॅल आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं।पर उस शाह के दरबार में झूठी दुनिया के बनजारे नहीं टिक सकते। उन्हें सदा-स्थिर प्रभू का नाम पसंद नहीं आता।और वे सदा दुख में ही ख्वार होते रहते हैं। 18। हे भाई ! अहंकार (की मैल) से मैला हुआ ये जगत भटक रहाप है।बार बार जनम-मरन के चक्कर में रहता है। पिछले जन्मों के किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार वैसे ही और कर्म किए जाता है।(कर्मों के बनी इस फाही को) कोई मिटा नहीं सकता। 19। हे भाई ! अगर मनुष्य साध-संगति में टिका रहे।तो इसका प्यार सदा-स्थिर प्रभू में बन जाता है। हे भाई ! आप (साध-संगति में टिक के) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह किया कर।सदा-स्थिर प्रभू को अपने मन में बसा ले।(इस तरह) सदा-स्थिर प्रभू के दर पे सुर्खरू होंगे। 20। हे भाई ! पूरे गुरू की मति किसी (भी तरह की) कमी के बग़ैर है।(जो मनुष्य गुरू की पूरी मति ले के) दिन-रात परमात्मा का नाम सिमरता है। वह मनुष्य अहंकार और ममता के बड़े रोग को अपने अंदर से रोक देता है। 21। हे भाई ! (यदि प्रभू मेहर करे तो) मैं अपने गुरू की वडिआई करूँ।झुक झुक के मैं गुरू के चरणों में लगूँ। अपने अंदर से अहंकार को दूर करके अपना मन अपना तन गुरू के हवाले करि दूँ।गुरू के आगे रख दूँ। 22। हे भाई ! डाँवा-डोल हालत में रहने से दूखी ही हुआ जाता है।एक परमात्मा के साथ ही सुरति जोड़े रख। अपने अंदर से अहंकार दूर कर।ममता दूर कर।(जब मनुष्य अहंकार-ममता दूर करता है) तब सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा में लीन हुआ रहता है। 23। हे भाई ! वे मनुष्य (मेरे) भाई हैं।जो गुरू की शरण में आ पड़े हैं।और सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी में चित्त जोड़ते हैं। जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू में लीन हो जाते हैं।वह (फिर प्रभू से) नहीं विछुड़ते।वह सदा-स्थिर प्रभू के दर पे (टिके हुए) दिखते हैं। 24। हे भाई ! वह मनुष्य मेरे भाई हैं मित्र हैं।जो सदा कायम रहने वाले परमात्मा की सेवा-भक्ति करते हैं। (गुणों के बदले) अवगुण बिक जाने से (दूर हो जाने से) वह मनुष्य (आत्मिक जीवन में) प्रफुल्लित होते हैं।वह मनुष्य परमात्मा के गुणों से सांझ पाते हैं। 25। हे भाई ! गुरू से (आत्मिक) सांझ की बरकति से (उनके अंदर आत्मिक आनंद पैदा होता है।वह परमात्मा की अटल रहने वाली भक्ति करते रहते हैं। वह मनुष्य गुरू के शबद से सदा-स्थिर प्रभू के नाम का व्यापार करते हैं और हरी-नाम (का) लाभ कमाते हैं। 26। हे भाई ! (कई किस्म के) पाप कर कर के सोना-चाँदी (आदि धन) इकट्ठा करते हैं।पर (जगत से) चलने के वक्त (वह धन मनुष्य के) साथ नहीं जाता। परमात्मा के नाम के बिना और कोई भी चीज मनुष्य के साथ नहीं जाएगी।नाम से विहीन सारी दुनिया आत्मिक मौत के हाथों से लूटी जाती है (अपना आत्मिक जीवन लुटा बैठती है)। 27। हे भाई ! मनुष्य के मन के लिए परमात्मा का नाम ही (जीवन यात्रा का) खर्च है।इस यात्रा-खर्च को अपने हृदय में संभाल के रखो। ये खर्च कभी समाप्त होने वाला नहीं।जो मनुष्य गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलता है।उसके साथ ये सदा के लिए साथ बनाता है। 28। जगत के मूल परमात्मा से टूटे हुए ऐ मन ! (अगर आप इसी तरह टूटा रहा तो) अपनी इज्जत गवा के (यहाँ से) जाएगा। ये जगत तो माया के मोह में फसा हुआ है (आप इससे मोह छोड़ दे।और) गुरू की मति पर चल के सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम सिमरा कर। 29। हे भाई ! परमात्मा किसी मूल्य से नहीं मिल सकता।परमात्मा की महिमा बयान नहीं की जा सकती। जिस मनुष्य का मन और तन गुरू के शबद में रंगा जाता है।वह सदा परमात्मा में लीन रहता है। 30। हे भाई ! मेरा वह पति-प्रभू आनंद स्वरूप है (जो मनुष्य उसके चरणों में आ जुड़ता है) उसको वह आत्मिक अडोलता में।प्रेम रंग में रंग देता है। जब कोई जीव-स्त्री उस पति-प्रभू के चरणों में लीन हो जाती है।तब उस (की जिंद) को प्रेम-रंग चढ़ जाता है। 31। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं।वह (प्रभू से) चिरों से विछुड़े हुए भी (प्रभू को) आ मिलते हैं। परमात्मा का नाम (जो।मानो धरती के सारे) नौ खजाने (हैं।उनको) अपने अंदर ही मिल जाते हैं।उस नाम-खजाने को वे खुद इस्तेमाल करते हैं।औरों को बाँटते हैं।वह फिर भी खत्म नहीं होता।आत्मिक अडोलता में टिक के वह मनुष्य परमात्मा के गुण याद करते रहते हैं। 32। हे भाई ! (गुरू की शरण आ पड़े) वे मनुष्य ना तो पैदा होते हैं ना मरते हैं।ना ही वे (जनम-मरण के चक्कर में) दुख सहते हैं। जिनकी रक्षा गुरू ने कर दी है।वह (जन्म-मरन के चक्करों से) बच गए।वह सदा प्रभू के चरणों में जुड़ के आत्मिक आनंद पाते हैं। 33। हे भाई ! जो भले मनुष्य हर वक्त प्रभू-चरणों में जुड़े रहते हैं।वह प्रभू-चरणों में मिल के दोबारा कभी नहीं विछुड़ते।पर। हे नानक ! इस जगत में ऐसे विरले बंदे ही उघड़ते हैं।जो सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का मिलाप प्राप्त करते हैं। 34। 1। 3।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 3 ॥ हे भाई ! परमात्मा अदृश्य है अपहुँच है।(फिर) उसको किस तरीके से मिला जा सकता है। हे भाई ! जब गुरू के शबद की बरकति से (मनुष्य के अंदर से उसके मन की) भटकना कट जाती है।तब परमात्मा सहज स्वभाव ही (खुद ही मनुष्य के) मन में आ बसता है। 1। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जपते हैं।
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (हरी-नाम की पूँजी का मालिक) शाह-प्रभू सदा कायम रहने वाला है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।