सूही महला 1 घरु 9 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ कचा रंगु कसुंभ का थोड़ड़िआ दिन चारि जीउ ॥ विणु नावै भ्रमि भुलीआ ठगि मुठी कूड़िआरि जीउ ॥ सचे सेती रतिआ जनमु न दूजी वार जीउ ॥1॥ रंगे का किआ रंगीऐ जो रते रंगु लाइ जीउ ॥ रंगण वाला सेवीऐ सचे सिउ चितु लाइ जीउ ॥1॥ रहाउ ॥ चारे कुंडा जे भवहि बिनु भागा धनु नाहि जीउ ॥ अवगणि मुठी जे फिरहि बधिक थाइ न पाहि जीउ ॥ गुरि राखे से उबरे सबदि रते मन माहि जीउ ॥2॥ चिटे जिन के कपड़े मैले चित कठोर जीउ ॥ तिन मुखि नामु न ऊपजै दूजै विआपे चोर जीउ ॥ मूलु न बूझहि आपणा से पसूआ से ढोर जीउ ॥3॥ नित नित खुसीआ मनु करे नित नित मंगै सुख जीउ ॥ करता चिति न आवई फिरि फिरि लगहि दुख जीउ ॥ सुख दुख दाता मनि वसै तितु तनि कैसी भुख जीउ ॥4॥ बाकी वाला तलबीऐ सिरि मारे जंदारु जीउ ॥ लेखा मंगै देवणा पुछै करि बीचारु जीउ ॥ सचे की लिव उबरै बखसे बखसणहारु जीउ ॥5॥ अन को कीजै मितड़ा खाकु रलै मरि जाइ जीउ ॥ बहु रंग देखि भुलाइआ भुलि भुलि आवै जाइ जीउ ॥ नदरि प्रभू ते छुटीऐ नदरी मेलि मिलाइ जीउ ॥6॥ गाफल गिआन विहूणिआ गुर बिनु गिआनु न भालि जीउ ॥ खिंचोताणि विगुचीऐ बुरा भला दुइ नालि जीउ ॥ बिनु सबदै भै रतिआ सभ जोही जमकालि जीउ ॥7॥ जिनि करि कारणु धारिआ सभसै देइ आधारु जीउ ॥ सो किउ मनहु विसारीऐ सदा सदा दातारु जीउ ॥ नानक नामु न वीसरै निधारा आधारु जीउ ॥8॥1॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 घरु 9 सतिगुर प्रसादि ॥ (जीव माया की खूबसूरती को देख के फूलता है।पर इस माया का साथ कुसंभ के रंग जैसा ही है) कुसंभ के फूल का रंग कच्चा होता है।थोड़े समय ही रहता है।चार दिन ही टिकता है। माया की व्यापारिन जीव-स्त्री प्रभू-नाम से टूट के (माया-कुसंभ के) भुलेखे में गलत राह पर पड़ जाती है।ठॅगी जाती है।और इसके आत्मिक जीवन (की पूँजी) लुट जाती है। हे भाई ! अगर सदा-स्थिर प्रभू के प्यार-रंग में रंगे जाएं।तो दोबारा बार-बार जन्म (के चक्कर) समाप्त हो जाते हैं। 1। हे भाई ! जो लोग परमात्मा का प्रेम रंग लगा के रंगे जाते हैं उनके रंगे हुए मन को किसी और रंग की आवश्यक्ता नहीं रह जाती (नाम के रंगे हुए को) किसी और कर्म-सुहज की मुथाजी नहीं रहती। (पर ये नाम-रंग परमात्मा खुद ही देता है।सो) उस सदा-स्थिर रहने वाले को और (जीवों के मन को अपने प्रेम-रंग से) रंगने वाले प्रभू को चित्त लगा के सिमरना चाहिए। 1।रहाउ। हे जीवात्मा ! अगर आप चारों कुंटों में तलाशती फिरे तो भी सौभाग्य के बिना नाम-धन नहीं मिलता। अगर अवगुणों ने आपके मन को ठग लिया है।और यदि इस आत्मिक अवस्था में आप (तीर्थ आदि पर भी) फिरती रहे।तो भी शिकारी की तरह बाहर झुकने की तरह आप (अपने इन उद्यमों से) कबूल नहीं होगी। जिनकी गुरू ने रक्षा की।जो गुरू के शबद की बरकति से मन में प्रभू-नाम से रंगे गए हैं।वही (माया के मोह व विकारों से) बचते हैं। 2। (बगुले देखने में तो सफेद हैं।तीर्थों पर निवास भी करते हैं।पर समाधि लगा के पकड़ते मछलियाँ ही हैं।वैसे ही) जिनके कपड़े तो सफेद हैं पर मन मैले हैं और निर्दयी हैं उनके मुँह से (कहने पर मन में) प्रभू का नाम प्रकट नहीं होता वे (बाहर से साधु दिखते हैं पर असल में वे) चोर हैं। वे माया के मोह में फंसे हुए हैं । 3। (माया-ग्रसित मनुष्य का) मन सदा दुनिया वाले चाव-मलार ही करता है और सदा सुख ही माँगता है। पर (जब तक) करतार उसके चित्त में नहीं बसता।उसे बारंबार दुख व्यापते रहते हैं। (हाँ) जिस मन में सुख-दुख देने वाला परमात्मा बस जाता है।उसे कोई तृष्णा नहीं रह जाती (और वह सुखों की लालसा नहीं करता)। 4। (जीव बंजारा यहाँ नाम का व्यापार करने आया है।पर जो जीव ये व्यापार बिसार के विकारों का कर्जा अपने सिर पर चढ़ाने लग जाता है।उस) कर्जाई को बुलावा आता है; जमराज उसके सर पर चोट मारता है। उसके सारे किए कर्मों का विचार करके उससे पूछता है और उससे वह लेखा माँगता है जो (उसके जिंम्मे) देना बनता है। जिस जीव बन्जारे के अंदर सदा-स्थिर प्रभू की लगन हो। वह जमराज की मार से बच जाता है।बख्शनेवाला प्रभू उस पर मेहर करता है। 5। अगर परमात्मा के बिना किसी और को मित्र बनाया जाए।तो (ऐसे मित्र बनाने वाला) मिट्टी में मिल जाता है आत्मिक मौत मर जाता है। माया के बहुत सारे रंग-तमाशे देख के वह गलत राह पड़ जाता है।सही जीवन राह से टूट के वह जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाता है। (इस चक्कर में से) परमात्मा की मेहर से निजात पाई जा सकती है।वह प्रभू मेहर की निगाह से (गुरू-चरणों में) मिला के अपने साथ मिला लेता है। 6। हे गाफिल हुए ज्ञानहीन जीव ! गुरू की शरण पड़े बिना परमात्मा के साथ गहरी सांझ की आस करनी व्यर्थ है।किए हुए अच्छे और बुरे संस्कार तो हर वक्त अंदर मौजूद ही हैं।(अगर गुरू की शरण ना पड़ें। तो वह अंदरूनी अच्छे-बुरे संस्कार अच्छी-बुरी तरफ ही खींचते हैं) और इस खींचातानी में (जीव) दुखी ही होता है। गुरू-शबद का आसरा लिए बिना दुनिया (दुनियावी) सहम में ग्रसित रहती है।ऐसी दुनिया को आत्मिक मौत ने (हर वक्त) अपनी ताक में रखा हुआ होता है। 7। जिस करतार ने ये सृष्टि रची है।और रच के इसे टिकाया हुआ है।वह हरेक जीव को आसरा दे रहा है। उस को कभी भी मन से भुलाना नहीं। वह सदा ही सबको दातें देने वाला है। हे नानक ! (अरदास कर कि) परमात्मा का नाम कभी ना भूले।परमात्मा निआसरों का आसरा है। 8। 1। 2।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 काफी घरु 10 सतिगुर प्रसादि ॥ (चौरासी लाख जूनियों में से) मानस जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है।पर इसकी कद्र वही मनुष्य जानता है जो गुरू की शरण पड़े। यदि सतिगुरू को ठीक लगे (अर्थात अगर सतिगुरू की कृपा हो जाए) तो (शरण आए उस मनुष्य का) मन और शरीर (प्रभू के प्रेम-रंग से) गाढ़ा लाल हो जाता है (नाम की बरकति से उसको लाली चढ़ी रहती है)। 1। जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के नाम के सौदे का व्यापार करता है वह अपना जीवन सोहाना बना के (यहाँ से) जाता है सतिगुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा के) डर-अदब में (रह के)वह (परमात्मा की) दरगाह में इज्जत हासिल करता है। 1।रहाउ। जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है वह अपने मन व शरीर के द्वारा सदा-स्थिर परमात्मा की सिफत सालाह करके सदा स्थिर प्रभू के मन में प्यारा लगने लग पड़ता है।
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही महला 1 घरु 9 सतिगुर प्रसादि ॥ (जीव माया की खूबसूरती को देख के फूलता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।