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अंग 750

अंग
750
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तेरे सेवक कउ भउ किछु नाही जमु नही आवै नेरे ॥1॥ रहाउ ॥
जो तेरै रंगि राते सुआमी तिन॑ का जनम मरण दुखु नासा ॥
तेरी बखस न मेटै कोई सतिगुर का दिलासा ॥2॥
नामु धिआइनि सुख फल पाइनि आठ पहर आराधहि ॥
तेरी सरणि तेरै भरवासै पंच दुसट लै साधहि ॥3॥
गिआनु धिआनु किछु करमु न जाणा सार न जाणा तेरी ॥
सभ ते वडा सतिगुरु नानकु जिनि कल राखी मेरी ॥4॥10॥57॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आपके सेवक को कोई डर छू नहीं सकता।मौत का डर उसके नजदीक नहीं फटकता। 1।रहाउ। हे मेरे मालिक ! जो मनुष्य आपके प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं।उनके पैदा होने-मरने (के चक्रों) के दुख दूर हैं जाते हैं। उन्हें गुरू द्वारा (दिया हुआ ये) भरोसा (हमेशा याद रहता है कि उनके ऊपर हुई) आपकी कृपा को कोई मिटा नहीं सकता। 2। हे प्रभू ! (आपके संत आपका) नाम सिमरते रहते हैं।आत्मिक आनंद भोगते रहते हैं।आठों पहर आपकी आराधना करते हैं। आपकी शरण में आ के।आपके आसरे रह के वह (कामादिक) पाँचों वैरियों को पकड़ कर बस में कर लेते हैं। 3। हे मेरे मालिक प्रभू ! मैं (भी) आपकी (कृपा की) कद्र नहीं था जानता।मुझे आत्मिक जीवन की समझ नहीं थी।आपके चरणों में सुरति टिकानी भी नहीं जानता था।किसी अन्य धार्मिक कर्म की भी मुझे सूझ नहीं थी। पर (आपकी मेहर से) मुझे सबसे बड़ा गुरू नानक मिल गया।जिसने मेरी लाज रख ली (और मुझे आपके चरणों में जोड़ दिया)। 4। 10। 57।
सूही महला 5 ॥
सगल तिआगि गुर सरणी आइआ राखहु राखनहारे ॥
जितु तू लावहि तितु हम लागह किआ एहि जंत विचारे ॥1॥
मेरे राम जी तूं प्रभ अंतरजामी ॥
करि किरपा गुरदेव दइआला गुण गावा नित सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥
आठ पहर प्रभु अपना धिआईऐ गुर प्रसादि भउ तरीऐ ॥
आपु तिआगि होईऐ सभ रेणा जीवतिआ इउ मरीऐ ॥2॥
सफल जनमु तिस का जग भीतरि साधसंगि नाउ जापे ॥
सगल मनोरथ तिस के पूरन जिसु दइआ करे प्रभु आपे ॥3॥
दीन दइआल क्रिपाल प्रभ सुआमी तेरी सरणि दइआला ॥
करि किरपा अपना नामु दीजै नानक साध रवाला ॥4॥11॥58॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे रक्षा करने के समर्थ प्रभू ! मेरी रखा कर।मैं सारे (आसरे) छोड़ के गुरू की शरण आ पड़ा हूँ। हे प्रभू ! इन जीव विचारों की क्या बिसात है।आप जिस काम में हम जीवों को लगा लेता है।हम उस काम में लग पड़ते हैं। 1। हे मेरे राम जी ! हे मेरे प्रभू ! आप (मेरे) दिल की जानने वाला है। हे दया के घर गुरदेव ! ळे स्वामी ! मेहर कर।मैं सदा आपके गुण गाता रहूँ। 1।रहाउ। हे भाई ! आठों पहर अपने मालिक प्रभू का ध्यान धरना चाहिए।(इस तरह) गुरू की कृपा से संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है। हे भाई ! स्वै भाव छोड़ के गुरू के चरणों की धूड़ बन जाना चाहिए।इस तरह दुनिया कें कार्य-व्यवहार करते हुए ही निर्मोही हो जाना चाहिए। 2। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की संगति में रह के परमात्मा का नाम जपता है।जगत में उसका जीवन कामयाब हो जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा आप ही कृपा करता है।उसकी सारी मुरादें पूरी हैं जाती हैं। 3। हे नानक ! (कह) हे दीनों पर दया करने वाले ! हे कृपालू ! हे मालिक प्रभू ! हे दया के श्रोत ! मैं आपकी शरण आया हूँ ! मेहर कर। मुझे अपना नाम बख्श।गुरू के चरणों की धूल दे। 4। 11। 58।
रागु सूही असटपदीआ महला 1 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभि अवगण मै गुणु नही कोई ॥
किउ करि कंत मिलावा होई ॥1॥
ना मै रूपु न बंके नैणा ॥
ना कुल ढंगु न मीठे बैणा ॥1॥ रहाउ ॥
सहजि सीगार कामणि करि आवै ॥
ता सोहागणि जा कंतै भावै ॥2॥
ना तिसु रूपु न रेखिआ काई ॥
अंति न साहिबु सिमरिआ जाई ॥3॥
सुरति मति नाही चतुराई ॥
करि किरपा प्रभ लावहु पाई ॥4॥
खरी सिआणी कंत न भाणी ॥
माइआ लागी भरमि भुलाणी ॥5॥
हउमै जाई ता कंत समाई ॥
तउ कामणि पिआरे नव निधि पाई ॥6॥
अनिक जनम बिछुरत दुखु पाइआ ॥
करु गहि लेहु प्रीतम प्रभ राइआ ॥7॥
भणति नानकु सहु है भी होसी ॥
जै भावै पिआरा तै रावेसी ॥8॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही असटपदीआ महला 1 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ मेरे अंदर सारे अवगुण ही हैं।एक भी गुण नहीं। (इस हालत में) मुझे पति-प्रभू का मिलाप कैसे हो सकता है। 1। ना मेरी (सुंदर) सूरति है।ना मेरी आँखें सुंदर हैं। ना ही उच्च कुल वालों की तरह मेरे तौर-तरीके (रहन-सहन) है।ना ही मेरी बोली मीठी है (फिर मैं कैसे पति-प्रभू को खुश कर सकूँगी।)। 1।रहाउ। जो जीव स्त्री अडोल आत्मिक अवस्था में (टिकती है।और ये) हार-श्रृंगार करके (प्रभू-पति के दर पर) आती है (वह पति-प्रभू को अच्छी लगती है। और) तब ही जीव-स्त्री सौभाग्यवती है जब वह कंत-प्रभू को पसंद आती है। 2। उस पति-प्रभू की (इन आँखों से दिखाई देने वाली कोई) सूरति नहीं है उसका कोई चिन्ह भी नहीं है (जिसको देख सकें। और उसका सिमरन कर सकें।पर अगर सारी उम्र उसे बिसारे ही रखा।तो) अंत के समय वह मालिक सिमरा नहीं जा सकता। 3। हे प्रभू ! (मेरी ऊँची) सुरति नहीं।(मेरे में कोई) अक्ल नहीं (कोई) समझदारी नहीं। (आप स्वयं ही) मेहर कर के मुझे अपने चरणों से लगा ले। 4। वह (दुनिया के कार्य-व्यवहार में भले ही) बहुत समझदार (भी हो।पर) वह कंत-प्रभू को अच्छी नहीं लगती। जो जीव-स्त्री माया (के मोह) में फसी रहे।भटकना में पड़ कर जीवन-राह से भटकी रहे। 5। हे कंत प्रभू ! जब अहंकार दूर हो तब ही (आपके चरणों में) लीन हुआ जा सकता है। तब ही। हे प्यारी ! जीव-स्त्री तू।नौ-खजाने के श्रोत को मिल सकती है। 6। आपसे विछुड़ के अनेकों जूनियों में भटक-भटक के मैंने दुख सहा है। हे प्रभू राय ! हे प्रीतम !अब आप मेरा हाथ पकड़ ले। 7। नानक विनती करता है,पति-प्रभू (सचमुच मौजूद) है।सदा ही रहेगा। जो जीव-स्त्री उसको भाती है (प्रभू) उसे अपने साथ मिला लेता है। 8। 1।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आपके सेवक को कोई डर छू नहीं सकता।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।