जो तेरै रंगि राते सुआमी तिन॑ का जनम मरण दुखु नासा ॥
तेरी बखस न मेटै कोई सतिगुर का दिलासा ॥2॥
नामु धिआइनि सुख फल पाइनि आठ पहर आराधहि ॥
तेरी सरणि तेरै भरवासै पंच दुसट लै साधहि ॥3॥
गिआनु धिआनु किछु करमु न जाणा सार न जाणा तेरी ॥
सभ ते वडा सतिगुरु नानकु जिनि कल राखी मेरी ॥4॥10॥57॥
सगल तिआगि गुर सरणी आइआ राखहु राखनहारे ॥
जितु तू लावहि तितु हम लागह किआ एहि जंत विचारे ॥1॥
मेरे राम जी तूं प्रभ अंतरजामी ॥
करि किरपा गुरदेव दइआला गुण गावा नित सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥
आठ पहर प्रभु अपना धिआईऐ गुर प्रसादि भउ तरीऐ ॥
आपु तिआगि होईऐ सभ रेणा जीवतिआ इउ मरीऐ ॥2॥
सफल जनमु तिस का जग भीतरि साधसंगि नाउ जापे ॥
सगल मनोरथ तिस के पूरन जिसु दइआ करे प्रभु आपे ॥3॥
दीन दइआल क्रिपाल प्रभ सुआमी तेरी सरणि दइआला ॥
करि किरपा अपना नामु दीजै नानक साध रवाला ॥4॥11॥58॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभि अवगण मै गुणु नही कोई ॥
किउ करि कंत मिलावा होई ॥1॥
ना मै रूपु न बंके नैणा ॥
ना कुल ढंगु न मीठे बैणा ॥1॥ रहाउ ॥
सहजि सीगार कामणि करि आवै ॥
ता सोहागणि जा कंतै भावै ॥2॥
ना तिसु रूपु न रेखिआ काई ॥
अंति न साहिबु सिमरिआ जाई ॥3॥
सुरति मति नाही चतुराई ॥
करि किरपा प्रभ लावहु पाई ॥4॥
खरी सिआणी कंत न भाणी ॥
माइआ लागी भरमि भुलाणी ॥5॥
हउमै जाई ता कंत समाई ॥
तउ कामणि पिआरे नव निधि पाई ॥6॥
अनिक जनम बिछुरत दुखु पाइआ ॥
करु गहि लेहु प्रीतम प्रभ राइआ ॥7॥
भणति नानकु सहु है भी होसी ॥
जै भावै पिआरा तै रावेसी ॥8॥1॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आपके सेवक को कोई डर छू नहीं सकता।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।