Lulla Family

अंग 752

अंग
752
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
लालि रता मनु मानिआ गुरु पूरा पाइआ ॥2॥
हउ जीवा गुण सारि अंतरि तू वसै ॥
तूं वसहि मन माहि सहजे रसि रसै ॥3॥
मूरख मन समझाइ आखउ केतड़ा ॥
गुरमुखि हरि गुण गाइ रंगि रंगेतड़ा ॥4॥
नित नित रिदै समालि प्रीतमु आपणा ॥
जे चलहि गुण नालि नाही दुखु संतापणा ॥5॥
मनमुख भरमि भुलाणा ना तिसु रंगु है ॥
मरसी होइ विडाणा मनि तनि भंगु है ॥6॥
गुर की कार कमाइ लाहा घरि आणिआ ॥
गुरबाणी निरबाणु सबदि पछाणिआ ॥7॥
इक नानक की अरदासि जे तुधु भावसी ॥
मै दीजै नाम निवासु हरि गुण गावसी ॥8॥1॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: प्रभू नाम की लाली में मस्त हुआ उसका मन उस लाली में भीग जाता है (उसके बिना रह नहीं सकता)। 2। हे प्रभू !आपके गुण याद कर कर के मेरे अंदर आत्मिक जीवन मौल पड़े।मेरे अंदर ‘आप ही आप’ की धुन लग जाए। यदि आप मेरे मन में बस जाए।तो मेरा मन अडोल अवस्था में टिक के आपके नाम के स्वाद में भीग जाए। 3। हे मेरे मूर्ख मन ! मैं आपको कितना समझा-समझा के बताऊँ कि गुरू की शरण पड़ के परमात्मा की सिफत सालाह कर। परमात्मा के नाम-रंग में रंगा जा (और इस तरह अपना जन्म-मरण सुंदर बना ले)। 4। हे भाई ! अपने प्रीतम प्रभू को सदा अपने दिल में संभाल के रख। अगर आप (प्रभू की भक्ति वाले अच्छे) गुण ले के (जीवन-यात्रा में) चले तो कोई दुख-कलेश आपको नहीं छू सकेगा। 5। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का मन भटकन में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है।उसको परमात्मा के नाम की लाली नहीं चढ़ती। वह बेगाना (बिना पति वाला निखसमा) हो के आत्मिक मौत सहेड़ता है।उसके मन में उसके शरीर में (परमात्मा से) विछोड़ा बना रहता है। 6। जिस मनुष्य ने गुरू द्वारा बताया हुआ काम (भक्ति) करके (भक्ति का) लाभ अपने हृदय-गृह में ले लिया उसने गुरू की बाणी की बरकति से गुरू के शबद में जुड़ के वासना-रहित परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना ली। 7। हे प्रभू ! मेरी नानक की अरदास भी यही है कि अगर आपको ये बात पसंद आ जाए तो मेरे हृदय में भी अपने नाम का निवास कर दे ता कि मैं आपके गुण गाता रहूँ। 8। 1। 3।
सूही महला 1 ॥
जिउ आरणि लोहा पाइ भंनि घड़ाईऐ ॥
तिउ साकतु जोनी पाइ भवै भवाईऐ ॥1॥
बिनु बूझे सभु दुखु दुखु कमावणा ॥
हउमै आवै जाइ भरमि भुलावणा ॥1॥ रहाउ ॥
तूं गुरमुखि रखणहारु हरि नामु धिआईऐ ॥
मेलहि तुझहि रजाइ सबदु कमाईऐ ॥2॥
तूं करि करि वेखहि आपि देहि सु पाईऐ ॥
तू देखहि थापि उथापि दरि बीनाईऐ ॥3॥
देही होवगि खाकु पवणु उडाईऐ ॥
इहु किथै घरु अउताकु महलु न पाईऐ ॥4॥
दिहु दीवी अंध घोरु घबु मुहाईऐ ॥
गरबि मुसै घरु चोरु किसु रूआईऐ ॥5॥
गुरमुखि चोरु न लागि हरि नामि जगाईऐ ॥
सबदि निवारी आगि जोति दीपाईऐ ॥6॥
लालु रतनु हरि नामु गुरि सुरति बुझाईऐ ॥
सदा रहै निहकामु जे गुरमति पाईऐ ॥7॥
राति दिहै हरि नाउ मंनि वसाईऐ ॥
नानक मेलि मिलाइ जे तुधु भाईऐ ॥8॥2॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 ॥ जैसे भट्ठी में लोहा डाल के (और) गला के (नए सिरे से) घड़ा जाता है (लोहे से काम आने वाली चीजें बनाई जाती हैं) वैसे ही माया-ग्रसित जीव को जूनियों में डाला जाता है।जनम-मरन के चक्करों में डाल के (उसे तपाया जाता है) (और आखिर गुरू की मेहर से इन दुखों में वह सुमति सीखता है)। 1। (सही जीवन जुगति) समझे बिना मनुष्य (जो भी) कर्म करता है दुख (दुख पैदा करने वाले करता है) दुख ही दुख (सहेड़ता है)। अहंकार के कारण मनुष्य जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है।भटकना में गलत राह पर पड़ा रहता है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! (भटक-भटक के आखिर) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है आप उसको (चौरासी के चक्करों से) बचाता है; वह हे प्रभू ! आपका नाम सिमरता है। गुरू (भी) आप अपनी रजा अनुसार ही मिलाता है (जिसको मिलाता है) वही गुरू के शबद को कमाता है (गुरू के शबद के अनुसार आचरण बनाता है)। 2। हे प्रभू ! जीव पैदा करके इनकी संभाल भी आप स्वयं ही करता है। जो कुछ आप देता है वही जीवों को मिलता है आप स्वयं पैदा करता है आप स्वयं नाश करता है।सबकी आप अपनी ही निगरानी में संभाल (भी) करता है। 3। जब (शरीर में से) सांसें निकल जाती हैं तो शरीर मिट्टी हो जाता है (जिन महल-माढ़ियों का मनुष्य गुमान करता है) फिर ना ये घर इसको मिलता है ना बैठक मिलती है और ना ये महल मिलता है। 4। (सही जीवन-जुगति समझे बिना) जीव अपने घर का माल (आत्मिक राशि पूँजी) लुटाए जाता है।सफेद दिन होते हुए भी (इसके लिए तो) घोर अंधकार बना रहता है। अहंकार में (गाफ़ल रहने के कारण मोह-रूप) चोर इसके घर (आत्मिक राशि-पूँजी) को लूटता जाता है।(समझ ही नहीं आता) किसके पास शिकायत करे। 5। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है उस (की राशि पूँजी) को चोर नहीं पड़ते।गुरू उसको परमात्मा के नाम के द्वारा (आत्मिक सरमाए के चोर की तरफ से) सचेत रखता है। गुरू अपने शबद से (उसके अंदर से तृष्णा) की आग बुझा देता है।और रॅबी ज्योति जगा देता है। 6। परमात्मा का नाम (ही) लाल है रत्न है (शरण पड़े सिख को) गुरू ने ये समझ दी हुई होती है (इस लिए उसे तृष्णा की आग नहीं सताती)। अगर मनुष्य गुरू की शिक्षा प्राप्त कर ले तो वह सदा (माया की) वासना से बचा रहता है। 7। रात-दिन (हर वक्त) हे हरी ! आपका नाम मन में बसाया जा सके हे नानक ! (प्रभू के दर पर अरदास कर- हे प्रभू !) यदि आपको अच्छा लगे (तो।मेहर कर।और) अपनी संगति में मिला। 8। 2। 4।
सूही महला 1 ॥
मनहु न नामु विसारि अहिनिसि धिआईऐ ॥
जिउ राखहि किरपा धारि तिवै सुखु पाईऐ ॥1॥
मै अंधुले हरि नामु लकुटी टोहणी ॥
रहउ साहिब की टेक न मोहै मोहणी ॥1॥ रहाउ ॥
जह देखउ तह नालि गुरि देखालिआ ॥
अंतरि बाहरि भालि सबदि निहालिआ ॥2॥
सेवी सतिगुर भाइ नामु निरंजना ॥
तुधु भावै तिवै रजाइ भरमु भउ भंजना ॥3॥
जनमत ही दुखु लागै मरणा आइ कै ॥
जनमु मरणु परवाणु हरि गुण गाइ कै ॥4॥
हउ नाही तू होवहि तुध ही साजिआ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 ॥ (हे जिंदे !) परमात्मा के नाम को मन से ना भुला।दिन-रात परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। हे प्रभू ! जैसे मेहर करके तूने मुझे (माया के मोह से) बचाया।वैसे मुझे आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 1। मुझे (माया के मोह में) अंधे को परमात्मा का नाम छड़ी (का काम देता) है।(मेरे लिए ये नाम रूपी छड़ी) टोहनी है (जिससे मैं टोह-टोह के जीवन का सही रास्ता ढूँढता हूँ)। (जब) मैं मालिक प्रभू के आसरे रहता हूँ तो मन को मोहने वाली माया मोह नहीं सकती। 1।रहाउ। (हे प्रभू !) जिधर भी मैं देखता हूँ उधर ही गुरू ने मुझे दिखा दिया है कि आप मेरे साथ ही है। बाहर ढूँढ-ढूँढ के अब गुरू के शबद के माध्यम से मैंने आपको अपने अंदर देख लिया है। 2। हे माया-रहित प्रभू ! गुरू के अनुसार रह के मैं आपका नाम सिमरता हूँ। हे भ्रम और भय नाश करने वाले प्रभू ! जो आपको अच्छा लगता है मैं उसी को आपकी रजा समझता हूँ। 3। (अगर प्रभू का नाम बिसार दें तो) पैदा होते ही जगत में आते ही आत्मिक मौत का दुख आ घेरता है। परमात्मा के गुण गा के सारा ही जीवन सफल हो जाता है। 4। जिस जीव को आप गुरू के शबद में जोड़ के निवाजता है जिसके अंदर आप (प्रकट) होता है उसके अंदर ‘अहंकार’ नहीं रह जाता

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभू नाम की लाली में मस्त हुआ उसका मन उस लाली में भीग जाता है (उसके बिना रह नहीं सकता)।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।