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अंग 74

अंग
74
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुणि गला गुर पहि आइआ ॥
नामु दानु इसनानु दिड़ाइआ ॥
सभु मुकतु होआ सैसारड़ा नानक सची बेड़ी चाड़ि जीउ ॥11॥
सभ स्रिसटि सेवे दिनु राति जीउ ॥
दे कंनु सुणहु अरदासि जीउ ॥
ठोकि वजाइ सभ डिठीआ तुसि आपे लइअनु छडाइ जीउ ॥12॥
हुणि हुकमु होआ मिहरवाण दा ॥
पै कोइ न किसै रञाणदा ॥
सभ सुखाली वुठीआ इहु होआ हलेमी राजु जीउ ॥13॥
झिंमि झिंमि अंम्रितु वरसदा ॥
बोलाइआ बोली खसम दा ॥
बहु माणु कीआ तुधु उपरे तूं आपे पाइहि थाइ जीउ ॥14॥
तेरिआ भगता भुख सद तेरीआ ॥
हरि लोचा पूरन मेरीआ ॥
देहु दरसु सुखदातिआ मै गल विचि लैहु मिलाइ जीउ ॥15॥
तुधु जेवडु अवरु न भालिआ ॥
तूं दीप लोअ पइआलिआ ॥
तूं थानि थनंतरि रवि रहिआ नानक भगता सचु अधारु जीउ ॥16॥
हउ गोसाई दा पहिलवानड़ा ॥
मै गुर मिलि उच दुमालड़ा ॥
सभ होई छिंझ इकठीआ दयु बैठा वेखै आपि जीउ ॥17॥
वात वजनि टंमक भेरीआ ॥
मल लथे लैदे फेरीआ ॥
निहते पंजि जुआन मै गुर थापी दिती कंडि जीउ ॥18॥
सभ इकठे होइ आइआ ॥
घरि जासनि वाट वटाइआ ॥
गुरमुखि लाहा लै गए मनमुख चले मूलु गवाइ जीउ ॥19॥
तूं वरना चिहना बाहरा ॥
हरि दिसहि हाजरु जाहरा ॥
सुणि सुणि तुझै धिआइदे तेरे भगत रते गुणतासु जीउ ॥20॥
मै जुगि जुगि दयै सेवड़ी ॥
गुरि कटी मिहडी जेवड़ी ॥
हउ बाहुड़ि छिंझ न नचऊ नानक अउसरु लधा भालि जीउ ॥21॥2॥29॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: ये बात सुन के मैं भी गुरू के पास आ गया हूँ, और उसने मेरे हृदय में यह बैठा दिया है कि नाम सिमरना, औरों को सिमरन की ओर प्रेरित करना, पवित्र जीवन बनाना- यही है सही जीवन का राह हे नानक ! गुरू (जिस जिस को) सदा स्थिर प्रभू के सिमरन की बेड़ी में बैठाता है वह सारा जगत ही विकारों से बचता जाता है ।11। (हे प्रभू !) सारी सृष्टि दिन रात आपकी ही सेवा भक्ति करती है। आप (हरेक जीव की) अरदास ध्यान से सुनता है। (हे भाई !) मैंने सारी दुनिया को अच्छी तरह परख के देख लिया है (जिन जिन को विकारों से छुड़ाया है) प्रभू ने खुद ही छुड़ाया है।12। (जिस जिस पर प्रभू की मेहर हुई है वह) सारा संसार (अंतर आत्मे) आत्मिक आनन्द में बस रहा है, (हरेक के अंदर) इस निम्रता का राज हो गया है। मिहरवान प्रभू का अब ऐसा हुकम वरता है कि कोई भी कामादिक विकार (शरण आए) किसी को भी दुखी नहीं कर सकते।13। आत्मिक अडोलता पैदा करके आपका नाम-अमृत मेरे अंदर वर्षा कर रहा है। हे प्रभू ! हे मेरे पति ! मैं भी आपकी ही प्रेरणा से आपकी सिफत सलाह के बोल बोल रहा हूँ। मैं आपके ऊपर ही मान (गर्व) करता आया हूँ (मुझे निष्चय है कि) आप स्वयं ही (मुझे) कबूल कर लेगा।14। हे प्रभू ! आपकी भक्ति करने वाले भाग्यशालियों को सदा आपके दर्शनों की भूख लगी रहती है। हे हरी ! मेरी भी ये तमन्ना पूरी कर। हे सुखों को देने वाले प्रभू ! मुझे अपना दर्शन दे, मुझे अपने गले से लगा ले।15। आपके बराबर का कोई और (कहीं भी) नहीं मिलता। हे प्रभू ! आप सारे देशों में सारे भवनों मेंऔर पातालों में बसता है। हे प्रभू ! आप हरेक जगह में व्याप्त है। हे नानक ! प्रभू की भक्ति करने वाले लोगों को सदा स्थिर प्रभू का नाम ही (जीवन के लिए) सहारा है।16। मैं मालिक प्रभू का अन्जान सा पहिलवान था। पर, गुरू को मिल के मैं ऊंचे दुमाले वाला (विजयी) बन गया हूँ। जगत अखाड़े में सारे जीव आ इकट्ठे हुए हैं, और (इस अखाड़े को) प्यारा प्रभू स्वयं बैठा देख रहा है।17। बाजे बज रहे हैं, ढोल बज रहे हैं, नगारे बज रहे हैं (भाव, सारे जीव माया वाली दौड़ भाग कर रहे हैं) पहिलवान आ के एकत्र हुए हैं, (अखाड़े के चारों ओर, जगत अखाड़े में) फेरियां ले रहे हैं। मेरी पीठ पर (मेरे) गुरू ने थापी दी, तो मैं (विरोधी) पंजे (कामादिक) जवान काबू कर लिए।18। सारे (नर-नारी) मनुष्य जन्म ले के आए हैं, पर (यहां अपने अपने किए कर्मों के मुताबिक) परलोक घर में अलग अलग जूनियों में पड़ के जाएंगे। जो लोग गुरू के बताए राह पर चलते हैं, वे यहां से (हरि नाम का) मुनाफा कमा के जाते हैं। पर अपने मन के पीछे चलने वाले लोग पहिली राशि पूँजी भी गवा जाते हैं (अर्थात, पहिले किए नेक कामों के संस्कार भी बुरे काम करके मिटा लेते हैं)।19। हे प्रभू ! आपका ना कोई खास रंग है और ना कोई खास चक्र-चिन्ह है। फिर भी, हे हरी ! आप (सारे जगत में) प्रत्यक्ष दिखाई देता है। आपकी भगती करने वाले लोग आपकी सिफतें सुन सुन के आपको सिमरते हैं। आप गुणों का खजाना है। आपके भगत आपके प्यार में रंगे रहते हैं।20। मैं सदा ही उस प्यारे प्रभू की खूबसूरत सेवा भक्ति करता रहता हूँ। हे नानक ! (कह) गुरू ने मेरा (माया के मोह का) फंदा काट दिया है, (गुरू की कृपा से) ढूँढ के मैंने (सिमरन) भक्ति का मौका प्राप्त कर लिया है, अब मैं बार-बार इस जगत अखाड़े में भटकता नहीं फिरूँगा।21।2।9।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिरीरागु महला 1 पहरे घरु 1 ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हुकमि पइआ गरभासि ॥
उरध तपु अंतरि करे वणजारिआ मित्रा खसम सेती अरदासि ॥
खसम सेती अरदासि वखाणै उरध धिआनि लिव लागा ॥
ना मरजादु आइआ कलि भीतरि बाहुड़ि जासी नागा ॥
जैसी कलम वुड़ी है मसतकि तैसी जीअड़े पासि ॥
कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै हुकमि पइआ गरभासि ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्रीरागु महला 1 पहरे घरु 1 ॥ हरि के नाम का व्यापार करने आए हे जीव मित्र ! (जिंदगी की) रात के पहले पहर में परमात्मा के हुकम अनुसार तूने माँ के पेट में आ के निवास लिया है। हे वणजारे जीव मित्र ! माँ के पेट में तु उल्टा लटक के तप करता रहा, पति प्रभू के आगे अरदास करता रहा। (माँ के पेट में जीव) उल्टा (लटका हुआ) खसम प्रभू के आगे अरदास करता है, (प्रभू के) ध्यान में (जुड़ता है), (प्रभू चरणों में) सुरति जोड़ता है। जगत में नंगा आता है, दुबारा (यहां से) नंगा ही चला जाएगा। जीव के माथे पे (परमात्मा के हुकम अनुसार) जैसी (किए कर्मों के संस्कारों की) कलम चलती है (जगत में आने के समय) जीव के पास वैसी ही (आत्मिक जीवन की राशि पूँजी) होती है। हे नानक ! कह, जीव ने परमात्मा के हुकम अनुसार (जिंदगी की रात के) पहिले पहर में माँ के पेट में आ के निवास लिया है।1।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ये बात सुन के मैं भी गुरू के पास आ गया हूँ, और उसने मेरे हृदय में यह बैठा दिया है कि नाम सिमरना, औरों को सिमरन की ओर प्रेरित करना, पवित्र जीवन बनाना- यही है सही जीवन का राह हे नानक।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।