नामु दानु इसनानु दिड़ाइआ ॥
सभु मुकतु होआ सैसारड़ा नानक सची बेड़ी चाड़ि जीउ ॥11॥
सभ स्रिसटि सेवे दिनु राति जीउ ॥
दे कंनु सुणहु अरदासि जीउ ॥
ठोकि वजाइ सभ डिठीआ तुसि आपे लइअनु छडाइ जीउ ॥12॥
हुणि हुकमु होआ मिहरवाण दा ॥
पै कोइ न किसै रञाणदा ॥
सभ सुखाली वुठीआ इहु होआ हलेमी राजु जीउ ॥13॥
झिंमि झिंमि अंम्रितु वरसदा ॥
बोलाइआ बोली खसम दा ॥
बहु माणु कीआ तुधु उपरे तूं आपे पाइहि थाइ जीउ ॥14॥
तेरिआ भगता भुख सद तेरीआ ॥
हरि लोचा पूरन मेरीआ ॥
देहु दरसु सुखदातिआ मै गल विचि लैहु मिलाइ जीउ ॥15॥
तुधु जेवडु अवरु न भालिआ ॥
तूं दीप लोअ पइआलिआ ॥
तूं थानि थनंतरि रवि रहिआ नानक भगता सचु अधारु जीउ ॥16॥
हउ गोसाई दा पहिलवानड़ा ॥
मै गुर मिलि उच दुमालड़ा ॥
सभ होई छिंझ इकठीआ दयु बैठा वेखै आपि जीउ ॥17॥
वात वजनि टंमक भेरीआ ॥
मल लथे लैदे फेरीआ ॥
निहते पंजि जुआन मै गुर थापी दिती कंडि जीउ ॥18॥
सभ इकठे होइ आइआ ॥
घरि जासनि वाट वटाइआ ॥
गुरमुखि लाहा लै गए मनमुख चले मूलु गवाइ जीउ ॥19॥
तूं वरना चिहना बाहरा ॥
हरि दिसहि हाजरु जाहरा ॥
सुणि सुणि तुझै धिआइदे तेरे भगत रते गुणतासु जीउ ॥20॥
मै जुगि जुगि दयै सेवड़ी ॥
गुरि कटी मिहडी जेवड़ी ॥
हउ बाहुड़ि छिंझ न नचऊ नानक अउसरु लधा भालि जीउ ॥21॥2॥29॥
सिरीरागु महला 1 पहरे घरु 1 ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हुकमि पइआ गरभासि ॥
उरध तपु अंतरि करे वणजारिआ मित्रा खसम सेती अरदासि ॥
खसम सेती अरदासि वखाणै उरध धिआनि लिव लागा ॥
ना मरजादु आइआ कलि भीतरि बाहुड़ि जासी नागा ॥
जैसी कलम वुड़ी है मसतकि तैसी जीअड़े पासि ॥
कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै हुकमि पइआ गरभासि ॥1॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ये बात सुन के मैं भी गुरू के पास आ गया हूँ, और उसने मेरे हृदय में यह बैठा दिया है कि नाम सिमरना, औरों को सिमरन की ओर प्रेरित करना, पवित्र जीवन बनाना- यही है सही जीवन का राह हे नानक।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।