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अंग 749

अंग
749
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भागठड़े हरि संत तुम॑ारे जिन॑ घरि धनु हरि नामा ॥
परवाणु गणी सेई इह आए सफल तिना के कामा ॥1॥
मेरे राम हरि जन कै हउ बलि जाई ॥
केसा का करि चवरु ढुलावा चरण धूड़ि मुखि लाई ॥1॥ रहाउ ॥
जनम मरण दुहहू महि नाही जन परउपकारी आए ॥
जीअ दानु दे भगती लाइनि हरि सिउ लैनि मिलाए ॥2॥
सचा अमरु सची पातिसाही सचे सेती राते ॥
सचा सुखु सची वडिआई जिस के से तिनि जाते ॥3॥
पखा फेरी पाणी ढोवा हरि जन कै पीसणु पीसि कमावा ॥
नानक की प्रभ पासि बेनंती तेरे जन देखणु पावा ॥4॥7॥54॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे हरी ! आपके संत जन बड़े भाग्यशाली हैं क्योंकि उनके हृदय-घर में आपका नाम-धन बसता है। मैं समझता हूँ कि उनका ही जगत में आना आपकी नजरों में कबूल है।उन संतजनों के सारे (संसारिक) काम (भी) सफल हैं जाते हैं। 1। हे मेरे राम ! (अगर आपकी मेहर हैं।तो) मैं आपके सेवकों से सदके जाऊँ (अपना सब कुछ बार दूँ)। मैं अपने केसों का चवर बना के उन पर झुलाऊँ।मैं उनके चरणों की धूड़ ले के अपने माथे पर लगाऊँ। 1।रहाउ। हे भाई ! संत जन जनम-मरन के चक्कर में नहीं आते।वे तो जगत में दूसरों की भलाई करने के लिए आते हैं। संत जन (औरों को) आत्मिक जीवन की दाति दे के परमात्मा की भक्ति में जोड़ते हैं।और उनको परमात्मा के साथ मिला देते हैं। 2। हे भाई ! संत जन सदा-स्थिर प्रभू के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं।उनका हुकम सदा कायम रहता है।उनकी बादशाहियत् भी अॅटल रहती है। उनको सदा कायम रहने वाला आनंद प्राप्त रहता है।उनकी शोभा सदा के लिए टिकी रहती है।जिस परमात्मा के वे सेवक बने रहते हैं।वह परमात्मा ही उनकी कद्र जानता है। 3। मैं उनको पंखा करता रहूँ।उनके लिए पानी ढोता रहूँ और उनके दर पर चक्की पीस के सेवा करता रहूँ हे भाई ! नानक की परमात्मा के आगे सदा यही विनती है कि- हे प्रभू ! मैं आपके संत जनों के दर्शन करता रहूँ। 4। 7। 54।
सूही महला 5 ॥
पारब्रहम परमेसर सतिगुर आपे करणैहारा ॥
चरण धूड़ि तेरी सेवकु मागै तेरे दरसन कउ बलिहारा ॥1॥
मेरे राम राइ जिउ राखहि तिउ रहीऐ ॥
तुधु भावै ता नामु जपावहि सुखु तेरा दिता लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मुकति भुगति जुगति तेरी सेवा जिसु तूं आपि कराइहि ॥
तहा बैकुंठु जह कीरतनु तेरा तूं आपे सरधा लाइहि ॥2॥
सिमरि सिमरि सिमरि नामु जीवा तनु मनु होइ निहाला ॥
चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा मेरे सतिगुर दीन दइआला ॥3॥
कुरबाणु जाई उसु वेला सुहावी जितु तुमरै दुआरै आइआ ॥
नानक कउ प्रभ भए क्रिपाला सतिगुरु पूरा पाइआ ॥4॥8॥55॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे परमात्मा ! हे परमेश्वर ! हे सतिगुरू ! आप स्वयं सब कुछ करने के समर्थ है। (आपका) दास (आपके से) आपके चरणों की धूड़ माँगता है।आपके दर्शन से सदके जाता है। 1। हे मेरे प्रभू पातशाह ! आप जैसे (हम जीवों को) रखता है।वैसे ही रहा जा सकता है। अगर आपको अच्छा लगे तो आप (हम जीवों से अपना) नाम जपाता है।आपका ही बख्शा हुआ सुख हम ले सकते हैं। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपकी सेवा-भक्ति में ही (विकारों से) खलासी है।संसार के सुख हैं।सुचज्जी जीवन-जाच है (पर आपकी भक्ति वही करता है) जिससे आप स्वयं करवाता है। हे प्रभू ! जिस जगह आपकी सिफत-सालाह हैं रही हैं।(मेरे वास्ते) वही स्थान बैकुंठ है।आप स्वयं ही (सिफत सालाह करने की) श्रद्धा (हमारे अंदर) पैदा करता है। 2। हे दीनों पर दया करने वाले मेरे सतिगुरू ! (मेहर कर) मैं आपका नाम जप-जप के आत्मिक जीवन हासिल करता रहूँ। मेरा मन मेरा तन (आपके नाम की बरकति से) खिला रहे।(मेहर कर) मैं सदा आपके सुंदर चरण धो-धो के पीता रहूँ। 3। (हे सतिगुरू !) मैं उस सुंदर घड़ी से सदके जाता हूँ।जब मैं आपके दर पर आ गिरूँ। हे भाई ! जब (दास) नानक पर प्रभू जी दयावान हुए।तब (नानक को) पूरा गुरू मिला। 4। 8। 55।
सूही महला 5 ॥
तुधु चिति आए महा अनंदा जिसु विसरहि सो मरि जाए ॥
दइआलु होवहि जिसु ऊपरि करते सो तुधु सदा धिआए ॥1॥
मेरे साहिब तूं मै माणु निमाणी ॥
अरदासि करी प्रभ अपने आगै सुणि सुणि जीवा तेरी बाणी ॥1॥ रहाउ ॥
चरण धूड़ि तेरे जन की होवा तेरे दरसन कउ बलि जाई ॥
अंम्रित बचन रिदै उरि धारी तउ किरपा ते संगु पाई ॥2॥
अंतर की गति तुधु पहि सारी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
जिस नो लाइ लैहि सो लागै भगतु तुहारा सोई ॥3॥
दुइ कर जोड़ि मागउ इकु दाना साहिबि तुठै पावा ॥
सासि सासि नानकु आराधे आठ पहर गुण गावा ॥4॥9॥56॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे प्रभू ! अगर आप चित्त में आ बसे।तो बड़ा सुख मिलता है।जिस मनुष्य को आप बिसर जाता है।वह मनुष्य आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। हे करतार ! जिस मनुष्य पर आप दयावान होता है।वह सदा आपको याद करता रहता है। 1। हे मेरे मालिक-प्रभू ! मुझ निमाणी का आप ही माण है। हे प्रभू ! मैं आपके आगे आरजू करता हूँ।(मेहर कर) आपकी सिफत सालाह की बाणी सुन-सुन के मैं आत्मिक जीवन हासिल करता रहूँ। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मैं आपके दर्शनों से सदके जाता हूँ।(मेहर कर) मैं आपके सेवक के चरणों की धूड़ बना रहूँ। (आपके सेवक के) आत्मिक जीवन देने वाले वचन मैं अपने दिल में हृदय में बसाए रखूँ।आपकी कृपा से मैं (आपके सेवक की) संगति प्राप्त करूँ। 2। हे भाई ! अपने दिल की हालत आपके आगे खोल के रख दी है।मुझे आपके बराबर का और कोई नहीं दिखता। जिस मनुष्य को आप (अपने चरणों में) जोड़ लेता है।वह (आपके चरणों में) जुड़ा रहता है।वही आपका (असल) भक्त है। 3। हे प्रभू ! मैं (अपने) दोनों हाथ जोड़ कर (आपसे) ये दान माँगता हूँ।हे साहिब ! आपके प्रसन्न होने से ही मैं (ये दान) ले सकता हूँ। (मेहर कर) नानक हरेक सांस के साथ आपकी आराधना करता रहे।मैं आठों पहर आपकी सिफत सालाह के गीत गाता रहूँ। 4। 9। 56।
सूही महला 5 ॥
जिस के सिर ऊपरि तूं सुआमी सो दुखु कैसा पावै ॥
बोलि न जाणै माइआ मदि माता मरणा चीति न आवै ॥1॥
मेरे राम राइ तूं संता का संत तेरे ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे मेरे मालिक प्रभू ! जिस मनुष्य के सिर पर आप (हाथ रखे) उसे कोई दुख नहीं व्यापता। वह मनुष्य माया के नशे में मस्त हैं के तो बोलना ही नहीं जानता।मौत का सहिम भी उसके चित्त में पैदा नहीं होता। 1। हे मेरे प्रभू पातशाह ! आप (अपने) संतो का (रखवाला) है।(आपके) संत आपके (आसरे रहते हैं)।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे हरी ! आपके संत जन बड़े भाग्यशाली हैं क्योंकि उनके हृदय-घर में आपका नाम-धन बसता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।