परवाणु गणी सेई इह आए सफल तिना के कामा ॥1॥
मेरे राम हरि जन कै हउ बलि जाई ॥
केसा का करि चवरु ढुलावा चरण धूड़ि मुखि लाई ॥1॥ रहाउ ॥
जनम मरण दुहहू महि नाही जन परउपकारी आए ॥
जीअ दानु दे भगती लाइनि हरि सिउ लैनि मिलाए ॥2॥
सचा अमरु सची पातिसाही सचे सेती राते ॥
सचा सुखु सची वडिआई जिस के से तिनि जाते ॥3॥
पखा फेरी पाणी ढोवा हरि जन कै पीसणु पीसि कमावा ॥
नानक की प्रभ पासि बेनंती तेरे जन देखणु पावा ॥4॥7॥54॥
पारब्रहम परमेसर सतिगुर आपे करणैहारा ॥
चरण धूड़ि तेरी सेवकु मागै तेरे दरसन कउ बलिहारा ॥1॥
मेरे राम राइ जिउ राखहि तिउ रहीऐ ॥
तुधु भावै ता नामु जपावहि सुखु तेरा दिता लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
मुकति भुगति जुगति तेरी सेवा जिसु तूं आपि कराइहि ॥
तहा बैकुंठु जह कीरतनु तेरा तूं आपे सरधा लाइहि ॥2॥
सिमरि सिमरि सिमरि नामु जीवा तनु मनु होइ निहाला ॥
चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा मेरे सतिगुर दीन दइआला ॥3॥
कुरबाणु जाई उसु वेला सुहावी जितु तुमरै दुआरै आइआ ॥
नानक कउ प्रभ भए क्रिपाला सतिगुरु पूरा पाइआ ॥4॥8॥55॥
तुधु चिति आए महा अनंदा जिसु विसरहि सो मरि जाए ॥
दइआलु होवहि जिसु ऊपरि करते सो तुधु सदा धिआए ॥1॥
मेरे साहिब तूं मै माणु निमाणी ॥
अरदासि करी प्रभ अपने आगै सुणि सुणि जीवा तेरी बाणी ॥1॥ रहाउ ॥
चरण धूड़ि तेरे जन की होवा तेरे दरसन कउ बलि जाई ॥
अंम्रित बचन रिदै उरि धारी तउ किरपा ते संगु पाई ॥2॥
अंतर की गति तुधु पहि सारी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
जिस नो लाइ लैहि सो लागै भगतु तुहारा सोई ॥3॥
दुइ कर जोड़ि मागउ इकु दाना साहिबि तुठै पावा ॥
सासि सासि नानकु आराधे आठ पहर गुण गावा ॥4॥9॥56॥
जिस के सिर ऊपरि तूं सुआमी सो दुखु कैसा पावै ॥
बोलि न जाणै माइआ मदि माता मरणा चीति न आवै ॥1॥
मेरे राम राइ तूं संता का संत तेरे ॥
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे हरी ! आपके संत जन बड़े भाग्यशाली हैं क्योंकि उनके हृदय-घर में आपका नाम-धन बसता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।