अंग
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सूही
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गुरमुखि नामु जपै उधरै सो कलि महि घटि घटि नानक माझा ॥4॥3॥50॥
गुरमुखि नामु जपै उधरै सो कलि महि घटि घटि नानक माझा ॥4॥3॥50॥
हिन्दी अर्थ: (किसी भी वर्ण का हो) जो मनुष्य गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल के प्रभू का नाम जपता है वह जगत में विकारों से बच निकलता है।हे नानक ! उस मनुष्य को परमात्मा हरेक शरीर में बसा हुआ दिखाई देता है। 4। 3। 50।
जो किछु करै सोई प्रभ मानहि ओइ राम नाम रंगि राते ॥
सूही महला 5 ॥
जो किछु करै सोई प्रभ मानहि ओइ राम नाम रंगि राते ॥
तिन॑ की सोभा सभनी थाई जिन॑ प्रभ के चरण पराते ॥1॥
मेरे राम हरि संता जेवडु न कोई ॥
भगता बणि आई प्रभ अपने सिउ जलि थलि महीअलि सोई ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि अप्राधी संतसंगि उधरै जमु ता कै नेड़ि न आवै ॥
जनम जनम का बिछुड़िआ होवै तिन॑ हरि सिउ आणि मिलावै ॥2॥
माइआ मोह भरमु भउ काटै संत सरणि जो आवै ॥
जेहा मनोरथु करि आराधे सो संतन ते पावै ॥3॥
जन की महिमा केतक बरनउ जो प्रभ अपने भाणे ॥
कहु नानक जिन सतिगुरु भेटिआ से सभ ते भए निकाणे ॥4॥4॥51॥
जो किछु करै सोई प्रभ मानहि ओइ राम नाम रंगि राते ॥
तिन॑ की सोभा सभनी थाई जिन॑ प्रभ के चरण पराते ॥1॥
मेरे राम हरि संता जेवडु न कोई ॥
भगता बणि आई प्रभ अपने सिउ जलि थलि महीअलि सोई ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि अप्राधी संतसंगि उधरै जमु ता कै नेड़ि न आवै ॥
जनम जनम का बिछुड़िआ होवै तिन॑ हरि सिउ आणि मिलावै ॥2॥
माइआ मोह भरमु भउ काटै संत सरणि जो आवै ॥
जेहा मनोरथु करि आराधे सो संतन ते पावै ॥3॥
जन की महिमा केतक बरनउ जो प्रभ अपने भाणे ॥
कहु नानक जिन सतिगुरु भेटिआ से सभ ते भए निकाणे ॥4॥4॥51॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! वे संत जन परमात्मा के नाम-रंग में रंगे रहते हैं।जो कुछ परमात्मा करता है।उसको वे परमात्मा का किया हुआ ही मानते हैं। हे भाई ! जिन्होंने परमात्मा के चरणों के साथ सांझ डाल ली।उनकी महिमा सब जगहों में (फैल जाती है)। 1। हे मेरे प्रभू ! आपके संतों के बराबर का और कोई नहीं। हे भाई ! संत जनों की परमात्मा के साथ गहरी प्रीति बनी रहती है।उन्हें परमात्मा पानी में।धरती में।आकाश में हर जगह बसता दिखाई देता है। 1।रहाउ। हे भाई ! करोड़ों अपराध करने वाले मनुष्य भी संतों की संगति में (टिक के) विकारों से बच जाते हैं।(फिर) जम उसके नजदीक नहीं आता। अगर कोई मनुष्य अनेकों जन्मों से परमात्मा से विछुड़ा रहे - संत ऐसे अनेकों मनुष्यों को ला के परमात्मा से मिला देता है। 2। हे भाई ! जो भी मनुष्य संत की शरण आ पड़ता है।संत उसके अंदर से माया का मोह।भटकना।डर दूर कर देता है। मनुष्य जिस तरह की वासना धार के प्रभू का सिमरन करता है वह वही फल संत जनों से प्राप्त कर लेता है। 3। हे भाई ! जो सेवक अपने प्रभू को प्यारे लग चुके हैं।मैं उनकी कितनी महिमा बयान करूँ। हे नानक ! कह, जिन मनुष्यों को गुरू मिल गया।वे सारी दुनिया से बे-मुहताज हो गए। 4। 4। 51।
महा अगनि ते तुधु हाथ दे राखे पए तेरी सरणाई ॥
सूही महला 5 ॥
महा अगनि ते तुधु हाथ दे राखे पए तेरी सरणाई ॥
तेरा माणु ताणु रिद अंतरि होर दूजी आस चुकाई ॥1॥
मेरे राम राइ तुधु चिति आइऐ उबरे ॥
तेरी टेक भरवासा तुम॑रा जपि नामु तुम॑ारा उधरे ॥1॥ रहाउ ॥
अंध कूप ते काढि लीए तुम॑ आपि भए किरपाला ॥
सारि सम॑ालि सरब सुख दीए आपि करे प्रतिपाला ॥2॥
आपणी नदरि करे परमेसरु बंधन काटि छडाए ॥
आपणी भगति प्रभि आपि कराई आपे सेवा लाए ॥3॥
भरमु गइआ भै मोह बिनासे मिटिआ सगल विसूरा ॥
नानक दइआ करी सुखदातै भेटिआ सतिगुरु पूरा ॥4॥5॥52॥
महा अगनि ते तुधु हाथ दे राखे पए तेरी सरणाई ॥
तेरा माणु ताणु रिद अंतरि होर दूजी आस चुकाई ॥1॥
मेरे राम राइ तुधु चिति आइऐ उबरे ॥
तेरी टेक भरवासा तुम॑रा जपि नामु तुम॑ारा उधरे ॥1॥ रहाउ ॥
अंध कूप ते काढि लीए तुम॑ आपि भए किरपाला ॥
सारि सम॑ालि सरब सुख दीए आपि करे प्रतिपाला ॥2॥
आपणी नदरि करे परमेसरु बंधन काटि छडाए ॥
आपणी भगति प्रभि आपि कराई आपे सेवा लाए ॥3॥
भरमु गइआ भै मोह बिनासे मिटिआ सगल विसूरा ॥
नानक दइआ करी सुखदातै भेटिआ सतिगुरु पूरा ॥4॥5॥52॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे प्रभू ! जो मनुष्य आपकी शरण आ पड़े।आपने उन्हें अपना हाथ दे के (तृष्णा की) बड़ी आग में से बचा लिया। उन्होंने किसी और से मदद की आस अपने दिल से खत्म कर दी।उनके हृदय में आपका ही माण आपका ही आसरा बना रहता है। 1। हे मेरे प्रभू पातशाह ! अगर आप (जीवों के) चित्त में आ बसे।तो वह (संसार-समुंद्र में) डूबने से बच जाते हैं। वह मनुष्य आपका नाम जप के विकारों से खलासी पा लेते हैं।उनको (हर बात के लिए) आपका ही आसरा आपकी सहायता का भरोसा बना रहता है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! जिन मनुष्यों पर आप खुद दयावान हो गया।आपने उनको (माया के मोह के) अंधेरे कूएँ में से निकाल लिया। आपने उनकी सार ले के।उनकी संभाल करके उन्हें सारे सुख बख्शे।हे भाई ! प्रभू खुद ही उनकी पालना करता है। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों पर परमात्मा अपनी मेहर की निगाह करता है।उनके (मोह के) बँधन काट के उनकों विकारों से छुड़वा लेता है। उनको खुद ही अपनी सेवा-भक्ति में जोड़ लेता है।हे भाई ! प्रभू ने उनसे अपनी भक्ति खुद ही करवा ली। 3। (उनके अंदर से) भटकना दूर हो गई।उनके अंदर से मोह और अन्य सारे डर नाश हो गए।उनकी सारी चिंता-फिक्र समाप्त हो गई हे नानक ! सुख देने वाले प्रभू ने जिन पर दया की उन्हें पूरा गुरू मिल गया। 4। 5। 52।
जब कछु न सीओ तब किआ करता कवन करम करि आइआ ॥
सूही महला 5 ॥
जब कछु न सीओ तब किआ करता कवन करम करि आइआ ॥
अपना खेलु आपि करि देखै ठाकुरि रचनु रचाइआ ॥1॥
मेरे राम राइ मुझ ते कछू न होई ॥
आपे करता आपि कराए सरब निरंतरि सोई ॥1॥ रहाउ ॥
गणती गणी न छूटै कतहू काची देह इआणी ॥
क्रिपा करहु प्रभ करणैहारे तेरी बखस निराली ॥2॥
जीअ जंत सभ तेरे कीते घटि घटि तुही धिआईऐ ॥
तेरी गति मिति तूहै जाणहि कुदरति कीम न पाईऐ ॥3॥
निरगुणु मुगधु अजाणु अगिआनी करम धरम नही जाणा ॥
दइआ करहु नानकु गुण गावै मिठा लगै तेरा भाणा ॥4॥6॥53॥
जब कछु न सीओ तब किआ करता कवन करम करि आइआ ॥
अपना खेलु आपि करि देखै ठाकुरि रचनु रचाइआ ॥1॥
मेरे राम राइ मुझ ते कछू न होई ॥
आपे करता आपि कराए सरब निरंतरि सोई ॥1॥ रहाउ ॥
गणती गणी न छूटै कतहू काची देह इआणी ॥
क्रिपा करहु प्रभ करणैहारे तेरी बखस निराली ॥2॥
जीअ जंत सभ तेरे कीते घटि घटि तुही धिआईऐ ॥
तेरी गति मिति तूहै जाणहि कुदरति कीम न पाईऐ ॥3॥
निरगुणु मुगधु अजाणु अगिआनी करम धरम नही जाणा ॥
दइआ करहु नानकु गुण गावै मिठा लगै तेरा भाणा ॥4॥6॥53॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! जब अभी संसार ही नहीं था (ये जीव भी नहीं थे।तब) ये जीव क्या करता था।और।कौन-कौन से कर्म करके ये अस्तित्व में आया है (दरअसल बात ये है कि) परमात्मा ने खुद ही जगत-रचना रची है।वह खुद ही अपना ये जगत-तमाशा रच के खुद ही इस जगत-तमाशे को देख रहा है। 1। हे मेरे प्रभू-पातशाह ! (आपकी प्रेरणा सहायता के बिना) मुझसे कोई काम नहीं हो सकता। हे भाई ! वह परमात्मा ही सारे जीवों में एक-रस व्यापक है।वह खुद ही (जीवों में बैठ के) सब कुछ करता है।वह खुद ही (जीवों से सब कुछ) करवाता है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! ये जीव अंजान अक्ल वाला और नाशवान शरीर वाला है।अगर इसके किए कर्मों का लेखा गिना गया।तो ये किसी भी तरह सुर्खरू नहीं हो सकता। हे सब कुछ कर सकने के समर्थ प्रभू ! आप खुद ही मेहर कर (और बख्श ले)।आपकी कृपा अलग ही किस्म की है। 2। हे प्रभू ! (जगत के) सारे जीव आपके पैदा किए हुए हैं।हरेक शरीर में आपका ही ध्यान धरा जा रहा है। आप कैसे हैं।आप कितने बड़े हैं,ये भेद आप खुद ही जानते हैं।आपकी कुदरति का मूल्य नहीं डाला जा सकता। 3। हे प्रभू ! मैं गुणहीन हूँ।मैं मूर्ख हूँ।मैं बेसमझ हूँ।मुझे आत्मिक जीवन की सूझ नहीं।मैं कोई किए जाने वाले धार्मिक कर्म भी नहीं जानता (जिनसे मैं आपको खुश कर सकूँ)। हे प्रभू ! मेहर कर।(आपका दास) नानक आपके गुण गाता रहे।और (नानक को) आपकी रजा मिठी लगती रहे। 4। 6। 53।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७४८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।