जो किछु करै सोई प्रभ मानहि ओइ राम नाम रंगि राते ॥
तिन॑ की सोभा सभनी थाई जिन॑ प्रभ के चरण पराते ॥1॥
मेरे राम हरि संता जेवडु न कोई ॥
भगता बणि आई प्रभ अपने सिउ जलि थलि महीअलि सोई ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि अप्राधी संतसंगि उधरै जमु ता कै नेड़ि न आवै ॥
जनम जनम का बिछुड़िआ होवै तिन॑ हरि सिउ आणि मिलावै ॥2॥
माइआ मोह भरमु भउ काटै संत सरणि जो आवै ॥
जेहा मनोरथु करि आराधे सो संतन ते पावै ॥3॥
जन की महिमा केतक बरनउ जो प्रभ अपने भाणे ॥
कहु नानक जिन सतिगुरु भेटिआ से सभ ते भए निकाणे ॥4॥4॥51॥
महा अगनि ते तुधु हाथ दे राखे पए तेरी सरणाई ॥
तेरा माणु ताणु रिद अंतरि होर दूजी आस चुकाई ॥1॥
मेरे राम राइ तुधु चिति आइऐ उबरे ॥
तेरी टेक भरवासा तुम॑रा जपि नामु तुम॑ारा उधरे ॥1॥ रहाउ ॥
अंध कूप ते काढि लीए तुम॑ आपि भए किरपाला ॥
सारि सम॑ालि सरब सुख दीए आपि करे प्रतिपाला ॥2॥
आपणी नदरि करे परमेसरु बंधन काटि छडाए ॥
आपणी भगति प्रभि आपि कराई आपे सेवा लाए ॥3॥
भरमु गइआ भै मोह बिनासे मिटिआ सगल विसूरा ॥
नानक दइआ करी सुखदातै भेटिआ सतिगुरु पूरा ॥4॥5॥52॥
जब कछु न सीओ तब किआ करता कवन करम करि आइआ ॥
अपना खेलु आपि करि देखै ठाकुरि रचनु रचाइआ ॥1॥
मेरे राम राइ मुझ ते कछू न होई ॥
आपे करता आपि कराए सरब निरंतरि सोई ॥1॥ रहाउ ॥
गणती गणी न छूटै कतहू काची देह इआणी ॥
क्रिपा करहु प्रभ करणैहारे तेरी बखस निराली ॥2॥
जीअ जंत सभ तेरे कीते घटि घटि तुही धिआईऐ ॥
तेरी गति मिति तूहै जाणहि कुदरति कीम न पाईऐ ॥3॥
निरगुणु मुगधु अजाणु अगिआनी करम धरम नही जाणा ॥
दइआ करहु नानकु गुण गावै मिठा लगै तेरा भाणा ॥4॥6॥53॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(किसी भी वर्ण का हो) जो मनुष्य गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल के प्रभू का नाम जपता है वह जगत में विकारों से बच निकलता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।