गुरु नानकु मिलिआ पारब्रहमु तेरिआ चरणा कउ बलिहारा ॥4॥1॥47॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरा भाणा तूहै मनाइहि जिस नो होहि दइआला ॥
साई भगति जो तुधु भावै तूं सरब जीआ प्रतिपाला ॥1॥
मेरे राम राइ संता टेक तुम॑ारी ॥
जो तुधु भावै सो परवाणु मनि तनि तूहै अधारी ॥1॥ रहाउ ॥
तूं दइआलु क्रिपालु क्रिपा निधि मनसा पूरणहारा ॥
भगत तेरे सभि प्राणपति प्रीतम तूं भगतन का पिआरा ॥2॥
तू अथाहु अपारु अति ऊचा कोई अवरु न तेरी भाते ॥
इह अरदासि हमारी सुआमी विसरु नाही सुखदाते ॥3॥
दिनु रैणि सासि सासि गुण गावा जे सुआमी तुधु भावा ॥
नामु तेरा सुखु नानकु मागै साहिब तुठै पावा ॥4॥1॥48॥
विसरहि नाही जितु तू कबहू सो थानु तेरा केहा ॥
आठ पहर जितु तुधु धिआई निरमल होवै देहा ॥1॥
मेरे राम हउ सो थानु भालण आइआ ॥
खोजत खोजत भइआ साधसंगु तिन॑ सरणाई पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
बेद पड़े पड़ि ब्रहमे हारे इकु तिलु नही कीमति पाई ॥
साधिक सिध फिरहि बिललाते ते भी मोहे माई ॥2॥
दस अउतार राजे होइ वरते महादेव अउधूता ॥
तिन॑ भी अंतु न पाइओ तेरा लाइ थके बिभूता ॥3॥
सहज सूख आनंद नाम रस हरि संती मंगलु गाइआ ॥
सफल दरसनु भेटिओ गुर नानक ता मनि तनि हरि हरि धिआइआ ॥4॥2॥49॥
करम धरम पाखंड जो दीसहि तिन जमु जागाती लूटै ॥
निरबाण कीरतनु गावहु करते का निमख सिमरत जितु छूटै ॥1॥
संतहु सागरु पारि उतरीऐ ॥
जे को बचनु कमावै संतन का सो गुर परसादी तरीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि तीरथ मजन इसनाना इसु कलि महि मैलु भरीजै ॥
साधसंगि जो हरि गुण गावै सो निरमलु करि लीजै ॥2॥
बेद कतेब सिम्रिति सभि सासत इन॑ पड़िआ मुकति न होई ॥
एकु अखरु जो गुरमुखि जापै तिस की निरमल सोई ॥3॥
खत्री ब्राहमण सूद वैस उपदेसु चहु वरना कउ साझा ॥
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे अपहुँच प्रभू ! हे बेअंत प्रभू ! जब (किसी अति भाग्यशाली को) आप मिल जाता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।