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अंग 747

अंग
747
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सभे इछा पूरीआ जा पाइआ अगम अपारा ॥
गुरु नानकु मिलिआ पारब्रहमु तेरिआ चरणा कउ बलिहारा ॥4॥1॥47॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे अपहुँच प्रभू ! हे बेअंत प्रभू ! जब (किसी अति भाग्यशाली को) आप मिल जाता है।उसकी सारी ही मनोकामनाएं पूरी हैं जाती हैं (उसे कोई कमी नहीं रह जाती।उसकी तृष्णा समाप्त हो जाती है)। हे प्रभू ! मैं आपके चरणों से सदके जाता हूँ।हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू मिल गया।उसको परमात्मा मिल गया। 4। 1। 47।
रागु सूही महला 5 घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरा भाणा तूहै मनाइहि जिस नो होहि दइआला ॥
साई भगति जो तुधु भावै तूं सरब जीआ प्रतिपाला ॥1॥
मेरे राम राइ संता टेक तुम॑ारी ॥
जो तुधु भावै सो परवाणु मनि तनि तूहै अधारी ॥1॥ रहाउ ॥
तूं दइआलु क्रिपालु क्रिपा निधि मनसा पूरणहारा ॥
भगत तेरे सभि प्राणपति प्रीतम तूं भगतन का पिआरा ॥2॥
तू अथाहु अपारु अति ऊचा कोई अवरु न तेरी भाते ॥
इह अरदासि हमारी सुआमी विसरु नाही सुखदाते ॥3॥
दिनु रैणि सासि सासि गुण गावा जे सुआमी तुधु भावा ॥
नामु तेरा सुखु नानकु मागै साहिब तुठै पावा ॥4॥1॥48॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 5 घरु 7 सतिगुर प्रसादि ॥ हे प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप दयावान होता है आप स्वयं ही उसको अपनी रजा में चलाता है। असल भक्ति वही है जो आपको पसंद आ जाती है।हे प्रभू ! आप सारे जीवों की पालना करने वाला है। 1। हे मेरे प्रभू पातशाह ! आपके संतों को (सदा) आपका ही आसरा रहता है। जो कुछ आपको अच्छा लगता है वही (आपके संतों को) परवान होता है।उनके मन में।उनके तन में।आप ही आसरा है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आप दया का घर है।आप कृपा का खजाना है।आप (अपने भक्तों की) मनोकामनाएं पूरी करने वाला है। हे जिंद के मालिक ! हे प्रीतम प्रभू ! आपके सारे भक्त (आपको प्यारे लगते हैं)।आप भक्तों को प्यारा लगता है। 2। हे प्रभू ! (आपके दिल की) गहराई नहीं पाई जा सकती।आपकी हस्ती का परला छोर नहीं पाया जा सकता।आप बहुत ही ऊँचा है।कोई और आपके जैसा नहीं। हे मालिक ! हे सुखों के देने वाले ! हम जीवों की (आपके आगे) यही आरजू है।कि हमें आप कभी भी ना भूल। 3। हे स्वामी ! अगर मैं आपको अच्छा लगूँ (यदि आपकी मेरे पर मेहर हो) मैं दिन-रात हरेक सांस के साथ आपके गुण गाता रहूँ। (आपका दास) नानक (आपसे) आपका नाम माँगता है (यही नानक के लिए) सुख (है)।हे मेरे साहिब ! यदि आप दयावान हैं।तो मुझे ये दाति मिल जाए। 4। 1। 48।
सूही महला 5 ॥
विसरहि नाही जितु तू कबहू सो थानु तेरा केहा ॥
आठ पहर जितु तुधु धिआई निरमल होवै देहा ॥1॥
मेरे राम हउ सो थानु भालण आइआ ॥
खोजत खोजत भइआ साधसंगु तिन॑ सरणाई पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
बेद पड़े पड़ि ब्रहमे हारे इकु तिलु नही कीमति पाई ॥
साधिक सिध फिरहि बिललाते ते भी मोहे माई ॥2॥
दस अउतार राजे होइ वरते महादेव अउधूता ॥
तिन॑ भी अंतु न पाइओ तेरा लाइ थके बिभूता ॥3॥
सहज सूख आनंद नाम रस हरि संती मंगलु गाइआ ॥
सफल दरसनु भेटिओ गुर नानक ता मनि तनि हरि हरि धिआइआ ॥4॥2॥49॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे मेरे राम ! आपका वह (साध-संगति) स्थान बड़ा ही आश्चर्यजनक है।जिसमें बैठ के आप कभी भी ना भूले। जिसमें बैठ के मैं आपको आठों पहर याद कर सकूँ।और।मेरा शरीर पवित्र हैं जाए। 1। हे मेरे राम ! मैं वह जगह तलाशने चल पड़ा (जहाँ मैं आपके दर्शन कर सकूँ)। ढूँढते ढूँढते मुझे गुरमुखों का साथ मिल गया।उन (गुरमुखों) की शरण पड़ कर आपको मैंने (आपको भी) पा लिया। 1।रहाउ। हे मेरे राम ! ब्रहमा जैसे अनेकों वेद (आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़-पढ़ के थक गए।पर वे आपकी रक्ती भर भी कद्र ना समझ सके। साधना करने वाले जोगी।करामाती जोगी (आपके दर्शनों को) बिलकते फिरते हैं।पर वे भी माया के मोह में फंसे रहे। 2। हे मेरे राम ! (विष्णु के) दस अवतार (अपने-अपने युग में) आदर प्राप्त करते रहे।शिव जी बड़ा त्यागी प्रसिद्ध हुआ। पर वे भी आपके गुणों का अंत ना पा सके।(शिव आदि अनेकों अपने शरीर पर) राख मल-मल के थक गए। 3। हे नानक ! (कह) जिन संत-जनों ने परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत सदा गाए।उन्होंने ही आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद हासिल किए।उन्होंने नाम का रस चखा।जब उन्हें वह गुरू मिल गया। जिसका दर्शन जीवन-मनोरथ पूरा कर देता है।तब उन्होंने अपने मन में अपने दिल में परमात्मा का ध्यान आरम्भ कर दिया। 4। 2। 49।
सूही महला 5 ॥
करम धरम पाखंड जो दीसहि तिन जमु जागाती लूटै ॥
निरबाण कीरतनु गावहु करते का निमख सिमरत जितु छूटै ॥1॥
संतहु सागरु पारि उतरीऐ ॥
जे को बचनु कमावै संतन का सो गुर परसादी तरीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि तीरथ मजन इसनाना इसु कलि महि मैलु भरीजै ॥
साधसंगि जो हरि गुण गावै सो निरमलु करि लीजै ॥2॥
बेद कतेब सिम्रिति सभि सासत इन॑ पड़िआ मुकति न होई ॥
एकु अखरु जो गुरमुखि जापै तिस की निरमल सोई ॥3॥
खत्री ब्राहमण सूद वैस उपदेसु चहु वरना कउ साझा ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (तीर्थ-स्नान आदि निहित) धार्मिक काम दिखावे के काम हैं।ये काम जितने भी लोग करते हुए दिखाई देते हैं।उन्हें मसूलिया जम लूट लेता है। (इस वास्ते) वासना-रहित हो के करतार की सिफत सालाह किया करो।क्योंकि इसकी बरकति से छिन भर भी नाम सिमरने मात्र से मनुष्य विकारों से खलासी पा लेता है। 1। हे संत जनों ! (सिफत सालाह की बरकति से) संसार-समुंद्र से पार लांघा जा सकता है। अगर कोई मनुष्य संत जनों के उपदेश को (जीवन में) कमा ले।वह मनुष्य गुरू की कृपा से पार लांघ जाता है। 1।रहाउ। हे भाई ! करोड़ों तीर्थ-स्नान (करते हुए भी) जगत में (विकारों की) मैल लिबड़ जाती है। पर जो मनुष्य गुरू की संगति में (टिक के) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता रहता है।वह पवित्र जीवन वाला बन जाता है। 2। हे भाई ! वेद-पुराण-स्मृतियाँ आदि ये सारे (हिन्दू धर्म पुस्तकें) (कुरान-अंजील आदि) ये सारे (पश्चिमी धर्म की पुस्तकें) आदि को सिर्फ पढ़ने मात्र से विकारों से निजात नहीं मिलती। पर जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर अबिनाशी प्रभू का नाम जपता है।उसकी (लोक-परलोक में) पवित्र शोभा बन जाती है। 3। हे भाई ! (परमात्मा का नाम सिमरने का) उपदेश खत्री-ब्राहमण-वैश-शूद्र चारों वर्णों के लोगों के वास्ते एक जैसा ही है।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे अपहुँच प्रभू ! हे बेअंत प्रभू ! जब (किसी अति भाग्यशाली को) आप मिल जाता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।