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अंग 746

अंग
746
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु सूही महला 5 घरु 5 पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥
जपि मन गोबिंद एकै अवरु नही को लेखै संत लागु मनहि छाडु दुबिधा की कुरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
निरगुन हरीआ सरगुन धरीआ अनिक कोठरीआ भिंन भिंन भिंन भिन करीआ ॥
विचि मन कोटवरीआ ॥
निज मंदरि पिरीआ ॥
तहा आनद करीआ ॥
नह मरीआ नह जरीआ ॥1॥
किरतनि जुरीआ बहु बिधि फिरीआ पर कउ हिरीआ ॥
बिखना घिरीआ ॥
अब साधू संगि परीआ ॥
हरि दुआरै खरीआ ॥
दरसनु करीआ ॥
नानक गुर मिरीआ ॥
बहुरि न फिरीआ ॥2॥1॥44॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 5 घरु 5 पड़ताल सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! (दुनिया की) प्रीतों से बड़ी प्रीति मन को मोहने वाले प्रभू की है। हे मन ! हे मन ! सिर्फ उस प्रभू का नाम जपा कर।और कोई उद्यम उसकी दरगाह में परवान नहीं होता।हे भाई ! संतों के चरणों में लगा रह।और अपने मन में से डाँवा-डोल रहने वाली दशा की पगडंडी दूर कर दे। 1।रहाउ। हे भाई ! निर्लिप प्रभू ने त्रैगुणी संसार बनाया।इसमें ये अनेकों (शरीर) रूपी कोठरियां उसने अलग-अलग (किस्म की) बना दीं। (हरेक शरीर-कोठरी) में मन को कोतवाल बना दिया। प्यारा प्रभू (हरेक शरीर-कोठरी में) अपने मन्दिर में रहता है। और वहाँ आनंद लेता है। उस प्रभू को ना मौत आती है।ना ही बुढ़ापा उसके नजदीक फटकता है। 1। हे भाई ! जीव प्रभू की रची रचना में ही जुड़ा रहता है।कई तरीकों से भटकता फिरता है।पराए (धन को।रूप को) ताकता फिरता है। विषौ-विकारों में घिरा रहता है। इस मानस जनम में जब जीव गुरू की संगति में पहुँचता है। तब प्रभू के दर पर आ खड़ा होता है। (प्रभू के) दर्शन करता है। हे नानक ! (जो भी मनुष्य) गुरू को मिलता है। वह दोबारा जन्म-मरण के चक्कर में नहीं भटकता। 2। 1। 44।
सूही महला 5 ॥
रासि मंडलु कीनो आखारा ॥
सगलो साजि रखिओ पासारा ॥1॥ रहाउ ॥
बहु बिधि रूप रंग आपारा ॥
पेखै खुसी भोग नही हारा ॥
सभि रस लैत बसत निरारा ॥1॥
बरनु चिहनु नाही मुखु न मासारा ॥
कहनु न जाई खेलु तुहारा ॥
नानक रेण संत चरनारा ॥2॥2॥45॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! ये सारा जगत-पसारा परमात्मा ने (रास डालने के लिए) अखाड़ा तैयार किया है। ये(जैसे) उसने खुद रासों के लिए मंडूआ बना दिया है। 1।रहाउ। हे भाई ! (इस जगत-अखाड़े में) कई किस्मों के बेअंत रूप हैं रंग हैं (परमात्मा खुद इसे) खुशी से देखता है।(पदार्थों के) भोग (भोगता है।पर भोगते हुए) थकता नहीं। सारे रसों के आनंद लेता हुआ भी वह प्रभू खुद निर्लिप रहता है। 1। आपका ना कोई रंग है।ना कोई निशान है।ना आपका कोई मुँह है।ना कोई दाढ़ी है। हे प्रभू ! आपका रचे हुए जगत-खेल को बयान नहीं किया जा सकता। हे नानक ! (कह, हे प्रभू ! मैं आपके दर से आपके) संत जनों के चरणों की धूल माँगता हूँ। 2। 2। 45।
सूही महला 5 ॥
तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥
भरोसै आइआ किरपा आइआ ॥
जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी मारगु गुरहि पठाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
महा दुतरु माइआ ॥ जैसे पवनु झुलाइआ ॥1॥
सुनि सुनि ही डराइआ ॥
कररो ध्रमराइआ ॥2॥
ग्रिह अंध कूपाइआ ॥
पावकु सगराइआ ॥3॥
गही ओट साधाइआ ॥
नानक हरि धिआइआ ॥
अब मै पूरा पाइआ ॥4॥3॥46॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। इस भरोसे से आया हूँ कि आप कृपा करेगा। सो हे मालिक प्रभू ! जैसे आपको अच्छा लगे।मेरी रक्षा कर।(मुझे आपके दर पे) गुरू ने भेजा है।(मुझे आपके दर का) रास्ता गुरू ने (दिखाया है)। 1।रहाउ। हे प्रभू !वैसे ही माया (की लहरें धक्के मारती हैं) जैसे (तेज) हवा धक्के मारती है।(आपकी रची हुई) माया (एक बड़ा समुंद्र है जिससे) पार लांघना बहुत मुश्किल है। 1। हे प्रभू ! मैं तो ये सुन-सुन के ही डर रहा हूँ कि धर्मराज बड़ा कठोर (हाकिम) है। 2। हे प्रभू ! ये संसार एक अंधा कूआँ है। इसमें सारी (तृष्णा की) आग ही आग है। हे नानक (कह, हे प्रभू ! जब से) मैंने गुरू का आसरा लिया है। मैं परमात्मा का नाम सिमर रहा हूँ।और। मुझे पूर्ण प्रभू मिल गया है। 4। 3। 46।
रागु सूही महला 5 घरु 6
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥
तुठा सचा पातिसाहु तापु गइआ संसारा ॥1॥
भगता की टेक तूं संता की ओट तूं सचा सिरजनहारा ॥1॥ रहाउ ॥
सचु तेरी सामगरी सचु तेरा दरबारा ॥
सचु तेरे खाजीनिआ सचु तेरा पासारा ॥2॥
तेरा रूपु अगंमु है अनूपु तेरा दरसारा ॥
हउ कुरबाणी तेरिआ सेवका जिन॑ हरि नामु पिआरा ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 5 घरु 6 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! मैं तो गुरू के पास ही (सदा) आरजू करता हूँ कि मुझे परमात्मा का नाम मिल जाए।(ये नाम ही मेरी जिंदगी का) सहारा (है)। हे भाई ! सदा कायम रहने वाला प्रभू-पातशाह जिस मनुष्य पर दयावान होता है (उसको उसका नाम मिलता है।और) उसका माया के मोह वाला ताप दूर हो जाता है। 1। हे सदा कायम रहने वाले सृजनहार ! आप (आपका नाम) आपके भक्तों का सहारा है।आपका नाम आपके संतों का आसरा है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपका दरबार सदा कायम रहने वाला है।(आपके खजानों में) आपके पदार्थ सदा-स्थिर रहने वाले हैं। आपके खजाने सदा भरपूर रहने वाले हैं।आपका रचा हुआ जगत-पसारा अॅटल नियमों वाला है। 2। हे प्रभू ! आपकी हस्ती ऐसी है जिस तक (हम जीवों की) पहुँच नहीं हैं सकती।आपका नजारा अद्वितीय है (आपके जैसा और कोई नहीं)। हे प्रभू ! मैं आपके उन सेवकों पर से सदके जाता हूँ।जिन्हें आपका नाम प्यारा लगता है। 3।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु सूही महला 5 घरु 5 पड़ताल सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! (दुनिया की) प्रीतों से बड़ी प्रीति मन को मोहने वाले प्रभू की है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।