ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥
जपि मन गोबिंद एकै अवरु नही को लेखै संत लागु मनहि छाडु दुबिधा की कुरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
निरगुन हरीआ सरगुन धरीआ अनिक कोठरीआ भिंन भिंन भिंन भिन करीआ ॥
विचि मन कोटवरीआ ॥
निज मंदरि पिरीआ ॥
तहा आनद करीआ ॥
नह मरीआ नह जरीआ ॥1॥
किरतनि जुरीआ बहु बिधि फिरीआ पर कउ हिरीआ ॥
बिखना घिरीआ ॥
अब साधू संगि परीआ ॥
हरि दुआरै खरीआ ॥
दरसनु करीआ ॥
नानक गुर मिरीआ ॥
बहुरि न फिरीआ ॥2॥1॥44॥
रासि मंडलु कीनो आखारा ॥
सगलो साजि रखिओ पासारा ॥1॥ रहाउ ॥
बहु बिधि रूप रंग आपारा ॥
पेखै खुसी भोग नही हारा ॥
सभि रस लैत बसत निरारा ॥1॥
बरनु चिहनु नाही मुखु न मासारा ॥
कहनु न जाई खेलु तुहारा ॥
नानक रेण संत चरनारा ॥2॥2॥45॥
तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥
भरोसै आइआ किरपा आइआ ॥
जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी मारगु गुरहि पठाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
महा दुतरु माइआ ॥ जैसे पवनु झुलाइआ ॥1॥
सुनि सुनि ही डराइआ ॥
कररो ध्रमराइआ ॥2॥
ग्रिह अंध कूपाइआ ॥
पावकु सगराइआ ॥3॥
गही ओट साधाइआ ॥
नानक हरि धिआइआ ॥
अब मै पूरा पाइआ ॥4॥3॥46॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥
तुठा सचा पातिसाहु तापु गइआ संसारा ॥1॥
भगता की टेक तूं संता की ओट तूं सचा सिरजनहारा ॥1॥ रहाउ ॥
सचु तेरी सामगरी सचु तेरा दरबारा ॥
सचु तेरे खाजीनिआ सचु तेरा पासारा ॥2॥
तेरा रूपु अगंमु है अनूपु तेरा दरसारा ॥
हउ कुरबाणी तेरिआ सेवका जिन॑ हरि नामु पिआरा ॥3॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु सूही महला 5 घरु 5 पड़ताल सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! (दुनिया की) प्रीतों से बड़ी प्रीति मन को मोहने वाले प्रभू की है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।