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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 746 · सूही

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अंग
746
सूही
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  1. प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥
  2. रासि मंडलु कीनो आखारा ॥
  3. तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥
  4. सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सूही

प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥

रागु सूही महला 5 घरु 5 पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥
जपि मन गोबिंद एकै अवरु नही को लेखै संत लागु मनहि छाडु दुबिधा की कुरीआ ॥1॥ रहाउ ॥
निरगुन हरीआ सरगुन धरीआ अनिक कोठरीआ भिंन भिंन भिंन भिन करीआ ॥
विचि मन कोटवरीआ ॥
निज मंदरि पिरीआ ॥
तहा आनद करीआ ॥
नह मरीआ नह जरीआ ॥1॥
किरतनि जुरीआ बहु बिधि फिरीआ पर कउ हिरीआ ॥
बिखना घिरीआ ॥
अब साधू संगि परीआ ॥
हरि दुआरै खरीआ ॥
दरसनु करीआ ॥
नानक गुर मिरीआ ॥
बहुरि न फिरीआ ॥2॥1॥44॥

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 5 घरु 5 पड़ताल ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! (दुनिया की) प्रीतों से बड़ी प्रीति मन को मोहने वाले प्रभू की है। हे मन! हे मन! सिर्फ उस प्रभू का नाम जपा करें। और कोई उद्यम उसकी दरगाह में परवान नहीं होता। हे भाई! संतों के चरणों में लगे रहें। और अपने मन में से डाँवा-डोल रहने वाली दशा की पगडंडी दूर कर दें। 1। रहाउ। हे भाई! निर्लिप प्रभू ने त्रैगुणी संसार बनाया। इसमें ये अनेकों (शरीर) रूपी कोठरियां उसने अलग-अलग (किस्म की) बना दीं। (हरेक शरीर-कोठरी) में मन को कोतवाल बना दिया। प्यारा प्रभू (हरेक शरीर-कोठरी में) अपने मन्दिर में रहता है। और वहाँ आनंद लेता है। उस प्रभू को ना मौत आती है। ना ही बुढ़ापा उसके नजदीक फटकता है। 1। हे भाई! जीव प्रभू की रची रचना में ही जुड़ा रहता है। कई तरीकों से भटकता फिरता है। पराए (धन को, रूप को) ताकता फिरता है। विषौ-विकारों में घिरा रहता है। इस मानस जनम में जब जीव गुरू की संगति में पहुँचता है, तब प्रभू के दर पर आ खड़ा होता है। (प्रभू के) दर्शन करता है। हे नानक! (जो भी मनुष्य) गुरू को मिलता है। वह दोबारा जन्म-मरण के चक्कर में नहीं भटकता। 2। 1। 44।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सूही

रासि मंडलु कीनो आखारा ॥

सूही महला 5 ॥
रासि मंडलु कीनो आखारा ॥
सगलो साजि रखिओ पासारा ॥1॥ रहाउ ॥
बहु बिधि रूप रंग आपारा ॥
पेखै खुसी भोग नही हारा ॥
सभि रस लैत बसत निरारा ॥1॥
बरनु चिहनु नाही मुखु न मासारा ॥
कहनु न जाई खेलु तुहारा ॥
नानक रेण संत चरनारा ॥2॥2॥45॥

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई! ये सारा जगत-पसारा परमात्मा ने (रास डालने के लिए) अखाड़ा तैयार किया है। ये(जैसे) उसने खुद रासों के लिए मंडूआ बना दिया है। 1। रहाउ। हे भाई! (इस जगत-अखाड़े में) कई किस्मों के बेअंत रूप हैं रंग हैं (परमात्मा खुद इसे) खुशी से देखता है। (पदार्थों के) भोग (भोगता है। पर भोगते हुए) थकता नहीं। सारे रसों के आनंद लेता हुआ भी वह प्रभू खुद निर्लिप रहता है। 1। आपका ना कोई रंग है। ना कोई निशान है। ना आपका कोई मुँह है। ना कोई दाढ़ी है। हे प्रभू! आपका रचे हुए जगत-खेल को बयान नहीं किया जा सकता। हे नानक! (कहें, हे प्रभू! मैं आपके दर से आपके) संत जनों के चरणों की धूल माँगता हूँ। 2। 2। 45।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सूही

तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥

सूही महला 5 ॥
तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥
भरोसै आइआ किरपा आइआ ॥
जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी मारगु गुरहि पठाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
महा दुतरु माइआ ॥ जैसे पवनु झुलाइआ ॥1॥
सुनि सुनि ही डराइआ ॥
कररो ध्रमराइआ ॥2॥
ग्रिह अंध कूपाइआ ॥
पावकु सगराइआ ॥3॥
गही ओट साधाइआ ॥
नानक हरि धिआइआ ॥
अब मै पूरा पाइआ ॥4॥3॥46॥

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे प्रभू! मैं आपकी शरण आया हूँ। इस भरोसे से आया हूँ कि आप कृपा करेंगे। सो हे मालिक प्रभू! जैसे आपको अच्छा लगे। मेरी रक्षा करें। (मुझे आपके दर पे) गुरू ने भेजा है। (मुझे आपके दर का) रास्ता गुरू ने (दिखाया है)। 1। रहाउ। हे प्रभू! वैसे ही माया (की लहरें धक्के मारती हैं) जैसे (तेज) हवा धक्के मारती है। (आपकी रची हुई) माया (एक बड़ा समुंद्र है जिससे) पार लांघना बहुत मुश्किल है। 1। हे प्रभू! मैं तो ये सुन-सुन के ही डर रहा हूँ कि धर्मराज बड़ा कठोर (हाकिम) है। 2। हे प्रभू! ये संसार एक अंधा कूआँ है। इसमें सारी (तृष्णा की) आग ही आग है। 3। हे नानक (कहें, हे प्रभू! जब से) मैंने गुरू का आसरा लिया है। मैं परमात्मा का नाम सिमर रहा हूँ। और, मुझे पूर्ण प्रभू मिल गया है। 4। 3। 46।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सूही

सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥

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रागु सूही महला 5 घरु 6
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥
तुठा सचा पातिसाहु तापु गइआ संसारा ॥1॥
भगता की टेक तूं संता की ओट तूं सचा सिरजनहारा ॥1॥ रहाउ ॥
सचु तेरी सामगरी सचु तेरा दरबारा ॥
सचु तेरे खाजीनिआ सचु तेरा पासारा ॥2॥
तेरा रूपु अगंमु है अनूपु तेरा दरसारा ॥
हउ कुरबाणी तेरिआ सेवका जिन॑ हरि नामु पिआरा ॥3॥

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 5 घरु 6 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! मैं तो गुरू के पास ही (सदा) आरजू करता हूँ कि मुझे परमात्मा का नाम मिल जाए। (ये नाम ही मेरी जिंदगी का) सहारा (है)। हे भाई! सदा कायम रहने वाला प्रभू-पातशाह जिस मनुष्य पर दयावान होता है (उसको उसका नाम मिलता है। और) उसका माया के मोह वाला ताप दूर हो जाता है। 1। हे सदा कायम रहने वाले सृजनहार! आप (आपका नाम) आपके भक्तों का सहारा है। आपका नाम आपके संतों का आसरा है। 1। रहाउ। हे प्रभू! आपका दरबार सदा कायम रहने वाला है। (आपके खजानों में) आपके पदार्थ सदा-स्थिर रहने वाले हैं। आपके खजाने सदा भरपूर रहने वाले हैं। आपका रचा हुआ जगत-पसारा अॅटल नियमों वाला है। 2। हे प्रभू! आपकी हस्ती ऐसी है जिस तक (हम जीवों की) पहुँच नहीं हो सकती। आपका नजारा अद्वितीय है (आपके जैसा और कोई नहीं)। हे प्रभू! मैं आपके उन सेवकों पर से सदके जाता हूँ। जिन्हें आपका नाम प्यारा लगता है। 3।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 746 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।