दरसन कउ लोचै सभु कोई ॥
पूरै भागि परापति होई ॥ रहाउ ॥
सिआम सुंदर तजि नीद किउ आई ॥
महा मोहनी दूता लाई ॥1॥
प्रेम बिछोहा करत कसाई ॥
निरदै जंतु तिसु दइआ न पाई ॥2॥
अनिक जनम बीतीअन भरमाई ॥
घरि वासु न देवै दुतर माई ॥3॥
दिनु रैनि अपना कीआ पाई ॥
किसु दोसु न दीजै किरतु भवाई ॥4॥
सुणि साजन संत जन भाई ॥
चरण सरण नानक गति पाई ॥5॥34॥40॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भली सुहावी छापरी जा महि गुन गाए ॥
कित ही कामि न धउलहर जितु हरि बिसराए ॥1॥ रहाउ ॥
अनदु गरीबी साधसंगि जितु प्रभ चिति आए ॥
जलि जाउ एहु बडपना माइआ लपटाए ॥1॥
पीसनु पीसि ओढि कामरी सुखु मनु संतोखाए ॥
ऐसो राजु न कितै काजि जितु नह त्रिपताए ॥2॥
नगन फिरत रंगि एक कै ओहु सोभा पाए ॥
पाट पटंबर बिरथिआ जिह रचि लोभाए ॥3॥
सभु किछु तुम॑रै हाथि प्रभ आपि करे कराए ॥
सासि सासि सिमरत रहा नानक दानु पाए ॥4॥1॥41॥
हरि का संतु परान धन तिस का पनिहारा ॥
भाई मीत सुत सगल ते जीअ हूं ते पिआरा ॥1॥ रहाउ ॥
केसा का करि बीजना संत चउरु ढुलावउ ॥
सीसु निहारउ चरण तलि धूरि मुखि लावउ ॥1॥
मिसट बचन बेनती करउ दीन की निआई ॥
तजि अभिमानु सरणी परउ हरि गुण निधि पाई ॥2॥
अवलोकन पुनह पुनह करउ जन का दरसारु ॥
अंम्रित बचन मन महि सिंचउ बंदउ बार बार ॥3॥
चितवउ मनि आसा करउ जन का संगु मागउ ॥
नानक कउ प्रभ दइआ करि दास चरणी लागउ ॥4॥2॥42॥
जिनि मोहे ब्रहमंड खंड ताहू महि पाउ ॥
राखि लेहु इहु बिखई जीउ देहु अपुना नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जा ते नाही को सुखी ता कै पाछै जाउ ॥
छोडि जाहि जो सगल कउ फिरि फिरि लपटाउ ॥1॥
करहु क्रिपा करुणापते तेरे हरि गुण गाउ ॥
नानक की प्रभ बेनती साधसंगि समाउ ॥2॥3॥43॥
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही महला 5 ॥ हे भाई ! हरेक जीव (चाहे) परमात्मा के दर्शनों की चाह रखता हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।