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अंग 744

अंग
744
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जै जगदीस की गति नही जाणी ॥3॥
सरणि समरथ अगोचर सुआमी ॥
उधरु नानक प्रभ अंतरजामी ॥4॥27॥33॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा की सिफत सालाह के आनंद की अवस्था आप (अब तक) समझी ही नहीं। 3। हे नानक ! (कह) हे सब ताकतों के मालिक ! ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे रहने वाले हे मालिक !मैं आपकी शरण आया हूँ। (मुझे विकारों से) बचा ले।आप मेरा मालिक है।आप मेरे दिल की जानने वाला है। 4। 27। 33।
सूही महला 5 ॥
साधसंगि तरै भै सागरु ॥
हरि हरि नामु सिमरि रतनागरु ॥1॥
सिमरि सिमरि जीवा नाराइण ॥
दूख रोग सोग सभि बिनसे गुर पूरे मिलि पाप तजाइण ॥1॥ रहाउ ॥
जीवन पदवी हरि का नाउ ॥
मनु तनु निरमलु साचु सुआउ ॥2॥
आठ पहर पारब्रहमु धिआईऐ ॥
पूरबि लिखतु होइ ता पाईऐ ॥3॥
सरणि पए जपि दीन दइआला ॥
नानकु जाचै संत रवाला ॥4॥28॥34॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! मनुष्य डरों भरे संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है गुरू की संगति में रत्नों की खान हरि नाम सिमर सिमर के । 1। हे भाई ! (गुरू की कृपा से) मैं परमात्मा का नाम सिमर सिमर के आत्मिक जीवन हासिल कर रहा हूँ। हे भाई ! गुरू को मिल के सारे दुख रोग ग़म नाश हो जाते हैं।पाप तिआगे जाते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम (ही) आत्मिक जिंदगी का प्यार है। (नाम की बरकति से) मन पवित्र हो जाता है।शरीर पवित्र हो जाता है।(नाम सिमरते हुए) सदा-स्थिर प्रभू (का मिलाप ही) जीवन उद्देश्य बन जाता है। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम आठों पहर सिमरते रहना चाहिए। पर ये दाति तब ही मिलती है अगर पूर्बले जन्म में (माथे पर नाम सिमरन का) लेख लिखा हो। 3। हे भाई ! दीनों पर दया करने वाले प्रभू का नाम जप के जो मनुष्य उस प्रभू की शरण में पड़े रहते हैं। नानक उन संत-जनों के चरणों की धूड़ माँगता है। 4। 28। 34।
सूही महला 5 ॥
घर का काजु न जाणी रूड़ा ॥
झूठै धंधै रचिओ मूड़ा ॥1॥
जितु तूं लावहि तितु तितु लगना ॥
जा तूं देहि तेरा नाउ जपना ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के दास हरि सेती राते ॥
राम रसाइणि अनदिनु माते ॥2॥
बाह पकरि प्रभि आपे काढे ॥
जनम जनम के टूटे गाढे ॥3॥
उधरु सुआमी प्रभ किरपा धारे ॥
नानक दास हरि सरणि दुआरे ॥4॥29॥35॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ वह उस सुन्दर काम को नहीं करता।जो इसके अपने हृदय-घर भले के काम आने वाले हैं (हे प्रभू आपकी मेहर के बिना) ये मूर्ख झूठे धंधे में मस्त रहता है। 1। हे प्रभू ! जिस जिस काम में आप (हम जीवों को) लगाता है।उस उस काम में हम लगते हैं। जब आप (हमें अपना नाम) देता है।तब आपका नाम जपते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के सेवक परमात्मा के साथ ही रंगे रहते हैं। हर वक्त सब रसों से श्रेष्ठ हरी-नाम-रस में मस्त रहते हैं। 2। हे भाई ! प्रभू ने खुद ही (जिन मनुष्यों को) बाँह पकड़ के (झूठे धंधों में से) निकाल लिया। अनेकों जन्मों के (प्रभू से) विछुड़े हुओं को (उस प्रभू ने खुद ही अपने साथ) जोड़ लिया। 3। हे दास नानक ! (कह) हे मालिक प्रभू ! मेहर कर।(मुझे झूठे धंधों से) बचा ले। मैं आपकी शरण आया हूँ।मैं आपके दर पे (आ गिरा हूँ)। 4। 29। 35।
सूही महला 5 ॥
संत प्रसादि निहचलु घरु पाइआ ॥
सरब सूख फिरि नही डोुलाइआ ॥1॥
गुरू धिआइ हरि चरन मनि चीन॑े ॥
ता ते करतै असथिरु कीन॑े ॥1॥ रहाउ ॥
गुण गावत अचुत अबिनासी ॥
ता ते काटी जम की फासी ॥2॥
करि किरपा लीने लड़ि लाए ॥
सदा अनदु नानक गुण गाए ॥3॥30॥36॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (जिसने) गुरू की किरपा से कभी ना डोलने वाला हृदय-घर पा लिया। (हृदय की अडोलता प्राप्त कर ली) उसको सारे सुख प्राप्त हो गए।(वह मनुष्य कभी विकारों में) नहीं डोलता। 1। हे भाई ! (जिन मनुष्यों ने) गुरू का ध्यान धर के परमात्मा के चरणों को (अपने) मन में (बसता) पहचान लिया। इस (परख) की बरकति से करतार ने (उनको) अडोल चित्त बना दिया। 1।रहाउ। हे भाई ! अॅटल अबिनाशी प्रभू के गुण गाते हुए गुण-गान की बरकति से जमों की फाही कट जाती है। 2। हे नानक ! मेहर कर के जिन्हें प्रभू अपने पल्ले से लगा लेता है। वह मनुष्य प्रभू के गुण गा के सदा के लिए आत्मिक आनंद पाते हैं। 3। 30। 36।
सूही महला 5 ॥
अंम्रित बचन साध की बाणी ॥
जो जो जपै तिस की गति होवै हरि हरि नामु नित रसन बखानी ॥1॥ रहाउ ॥
कली काल के मिटे कलेसा ॥
एको नामु मन महि परवेसा ॥1॥
साधू धूरि मुखि मसतकि लाई ॥
नानक उधरे हरि गुर सरणाई ॥2॥31॥37॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू की उचारी हुई बाणी आत्मिक जीवन देने वाले बचन हैं। जो जो मनुष्य (इस बाणी को) जपता है।उसकी उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है।वह मनुष्य सदा अपनी जीभ से परमात्मा का नाम उचारता रहता है। 1। हे भाई ! (गुरबाणी की बरकति से) कलेशों-भरे जीवन-काल के सारे कलेश मिट जाते हैं। (क्योंकि बाणी के सदका) एक हरी-नाम ही मन में टिका रहता है। 1। हे नानक ! गुरू के चरणों की धूल (जिन मनुष्यों ने अपने) मुँह पर माथे पर लगा ली। वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ के (झगड़े-कलेशों से) बच गए। 2। 31। 37।
सूही महला 5 घरु 3 ॥
गोबिंदा गुण गाउ दइआला ॥
दरसनु देहु पूरन किरपाला ॥ रहाउ ॥
करि किरपा तुम ही प्रतिपाला ॥
जीउ पिंडु सभु तुमरा माला ॥1॥
अंम्रित नामु चलै जपि नाला ॥
नानकु जाचै संत रवाला ॥2॥32॥38॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे गोविंद ! हे दयालु ! हे कृपालु ! (मुझे अपने) दर्शन दे। मैं (सदा आपके) गुण गाता रहूँ।रहाउ। हे गोबिंद ! आप ही किरपा कर के (हम जीवों की) पालना करता है। ये जिंद ये शरीर सब कुछ आपकी ही दी हुई राशि-पूँजी है। 1। हे भाई ! आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम (सदा) जपा कर (यही यहाँ से जीवों के) साथ जाता है। नानक (भी) गुरू के चरणों की धूल माँगता है।(जिसकी बरकति से हरि-नाम प्राप्त होता है)। 2। 32। 38।
सूही महला 5 ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥
आपे थंमै सचा सोई ॥1॥
हरि हरि नामु मेरा आधारु ॥
करण कारण समरथु अपारु ॥1॥ रहाउ ॥
सभ रोग मिटावे नवा निरोआ ॥
नानक रखा आपे होआ ॥2॥33॥39॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ उसके बिना और कोई नहीं (जो विकारों-रोगों से बचने के लिए सहारा दे सके) हे भाई ! वह सदा कायम रहने वाला परमात्मा खुद ही (हरेक जीव को) सहारा देता है। 1। हे भाई !उस परमात्मा का नाम मेरा आसरा है जो सारे जगत का मूल है।जो सब ताकतों का मालिक है।जिसकी हस्ती का परला छोर तलाशना नामुमकिन है। 1।रहाउ। उसके वह सारे रोग मिटा देता है।उसको नया-निरोया निरोग कर देता है हे नानक ! जिस मनुष्य का रखवाला प्रभू स्वयं बन जाता है। 2। 33। 39।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा की सिफत सालाह के आनंद की अवस्था आप (अब तक) समझी ही नहीं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।