सरणि समरथ अगोचर सुआमी ॥
उधरु नानक प्रभ अंतरजामी ॥4॥27॥33॥
साधसंगि तरै भै सागरु ॥
हरि हरि नामु सिमरि रतनागरु ॥1॥
सिमरि सिमरि जीवा नाराइण ॥
दूख रोग सोग सभि बिनसे गुर पूरे मिलि पाप तजाइण ॥1॥ रहाउ ॥
जीवन पदवी हरि का नाउ ॥
मनु तनु निरमलु साचु सुआउ ॥2॥
आठ पहर पारब्रहमु धिआईऐ ॥
पूरबि लिखतु होइ ता पाईऐ ॥3॥
सरणि पए जपि दीन दइआला ॥
नानकु जाचै संत रवाला ॥4॥28॥34॥
घर का काजु न जाणी रूड़ा ॥
झूठै धंधै रचिओ मूड़ा ॥1॥
जितु तूं लावहि तितु तितु लगना ॥
जा तूं देहि तेरा नाउ जपना ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के दास हरि सेती राते ॥
राम रसाइणि अनदिनु माते ॥2॥
बाह पकरि प्रभि आपे काढे ॥
जनम जनम के टूटे गाढे ॥3॥
उधरु सुआमी प्रभ किरपा धारे ॥
नानक दास हरि सरणि दुआरे ॥4॥29॥35॥
संत प्रसादि निहचलु घरु पाइआ ॥
सरब सूख फिरि नही डोुलाइआ ॥1॥
गुरू धिआइ हरि चरन मनि चीन॑े ॥
ता ते करतै असथिरु कीन॑े ॥1॥ रहाउ ॥
गुण गावत अचुत अबिनासी ॥
ता ते काटी जम की फासी ॥2॥
करि किरपा लीने लड़ि लाए ॥
सदा अनदु नानक गुण गाए ॥3॥30॥36॥
अंम्रित बचन साध की बाणी ॥
जो जो जपै तिस की गति होवै हरि हरि नामु नित रसन बखानी ॥1॥ रहाउ ॥
कली काल के मिटे कलेसा ॥
एको नामु मन महि परवेसा ॥1॥
साधू धूरि मुखि मसतकि लाई ॥
नानक उधरे हरि गुर सरणाई ॥2॥31॥37॥
गोबिंदा गुण गाउ दइआला ॥
दरसनु देहु पूरन किरपाला ॥ रहाउ ॥
करि किरपा तुम ही प्रतिपाला ॥
जीउ पिंडु सभु तुमरा माला ॥1॥
अंम्रित नामु चलै जपि नाला ॥
नानकु जाचै संत रवाला ॥2॥32॥38॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥
आपे थंमै सचा सोई ॥1॥
हरि हरि नामु मेरा आधारु ॥
करण कारण समरथु अपारु ॥1॥ रहाउ ॥
सभ रोग मिटावे नवा निरोआ ॥
नानक रखा आपे होआ ॥2॥33॥39॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा की सिफत सालाह के आनंद की अवस्था आप (अब तक) समझी ही नहीं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।