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743
सूही
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हरि चरण गहे नानक सरणाइ ॥4॥22॥28॥
हरि चरण गहे नानक सरणाइ ॥4॥22॥28॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह,हे भाई !) जिस मनुष्य ने परमात्मा के चरण पकड़ लिए। जो मनुष्य प्रभू की शरण आ पड़ा। 4। 22। 28।
दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥
सूही महला 5 ॥
दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥
दुही सराई खुनामी कहाए ॥1॥
जो तिसु भावै सो परवाणु ॥
आपणी कुदरति आपे जाणु ॥1॥ रहाउ ॥
सचा धरमु पुंनु भला कराए ॥
दीन कै तोसै दुनी न जाए ॥2॥
सरब निरंतरि एको जागै ॥
जितु जितु लाइआ तितु तितु को लागै ॥3॥
अगम अगोचरु सचु साहिबु मेरा ॥
नानकु बोलै बोलाइआ तेरा ॥4॥23॥29॥
दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥
दुही सराई खुनामी कहाए ॥1॥
जो तिसु भावै सो परवाणु ॥
आपणी कुदरति आपे जाणु ॥1॥ रहाउ ॥
सचा धरमु पुंनु भला कराए ॥
दीन कै तोसै दुनी न जाए ॥2॥
सरब निरंतरि एको जागै ॥
जितु जितु लाइआ तितु तितु को लागै ॥3॥
अगम अगोचरु सचु साहिबु मेरा ॥
नानकु बोलै बोलाइआ तेरा ॥4॥23॥29॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम-धन कमाने से हटा के दुनियावी धन की ओर लगा देता है। वह मनुष्य दोनों जहानों में (इस लोक में और परलोक में) गुनहगार कहलवाता है। 1। जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है। जीवों को वही कुछ सिर माथे मानना पड़ता है (वही कुछ जीव करते हैं)। हे भाई ! परमात्मा अपनी रची सृष्टि के बारे में स्वयं ही सब कुछ जानने वाला है। 1।रहाउ। हे भाई ! (जिस मनुष्य से परमात्मा) सदा-स्थिर रहने वाला (नाम-सिमरन) धर्म करवाता है। (नाम-सिमरन का) नेक भला काम करवाता है। नाम-धन इकट्ठा करते हुए उसकी ये दुनिया भी नहीं बिगड़ती। 2। सब जीवों के हृदय में एक परमात्मा ही जाग्रत रहता है। हे भाई ! (जीवों के भी क्या वश।) हरेक जीव उसी उसी काम में लगता है जिस जिस काम में परमात्मा लगाता है। 3। हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाले मेरे मालिक हैं। आप अपहुँच हैं। ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से आपके तक पहुँचा नहीं जा सकता। (आपका दास) नानक आपके से प्रेरित हो के ही आपका नाम उचार सकता है। 4। 23। 29।
प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥
सूही महला 5 ॥
प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥
ईत ऊत की ओट सवारी ॥1॥
सदा सदा जपीऐ हरि नाम ॥
पूरन होवहि मन के काम ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभु अबिनासी रैणि दिनु गाउ ॥
जीवत मरत निहचलु पावहि थाउ ॥2॥
सो साहु सेवि जितु तोटि न आवै ॥
खात खरचत सुखि अनदि विहावै ॥3॥
जगजीवन पुरखु साधसंगि पाइआ ॥
गुर प्रसादि नानक नामु धिआइआ ॥4॥24॥30॥
प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥
ईत ऊत की ओट सवारी ॥1॥
सदा सदा जपीऐ हरि नाम ॥
पूरन होवहि मन के काम ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभु अबिनासी रैणि दिनु गाउ ॥
जीवत मरत निहचलु पावहि थाउ ॥2॥
सो साहु सेवि जितु तोटि न आवै ॥
खात खरचत सुखि अनदि विहावै ॥3॥
जगजीवन पुरखु साधसंगि पाइआ ॥
गुर प्रसादि नानक नामु धिआइआ ॥4॥24॥30॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! अमृत बेला में (उठ के) परमात्मा का नाम सिमरा करें। (इस तरह) इस लोक और परलोक के लिए सुंदर आसरा बनाते रहा करें। 1। हे भाई ! सदा ही परमात्मा का नाम सिमरते रहना चाहिए। (सिमरन की बरकति से) मन के चितवे हुए सारे काम सफल हो जाते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! रात-दिन अविनाशी प्रभू (की सिफत-सालाह के गीत) गाया करें। (इस तरह) दुनिया के कार्य व्यवहार करते हुए निर्मोह रह के आप (प्रभू-चरणों में) सदा कायम रहने वाली जगह प्राप्त कर लेंगे। 2। हे भाई ! नाम-धन के मालिक उस प्रभू की सेवा-भक्ति किया करें। (उससे ऐसा धन मिलता है) जिस धन में कभी घाटा नहीं पड़ता। उस धन को खुद इस्तेमाल करते हुए औरों में बाँटते हुए जिंदगी सुख-आनंद से बीतती है। 3। उसने जगत के जीवन सर्व-व्यापक प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया हे नानक ! जिस मनुष्य ने साध-संगति में गुरू की कृपा से परमात्मा का नाम सिमरना शुरू कर दिया। 4। 24। 30।
गुर पूरे जब भए दइआल ॥
सूही महला 5 ॥
गुर पूरे जब भए दइआल ॥
दुख बिनसे पूरन भई घाल ॥1॥
पेखि पेखि जीवा दरसु तुम॑ारा ॥
चरण कमल जाई बलिहारा ॥
तुझ बिनु ठाकुर कवनु हमारा ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगति सिउ प्रीति बणि आई ॥
पूरब करमि लिखत धुरि पाई ॥2॥
जपि हरि हरि नामु अचरजु परताप ॥
जालि न साकहि तीने ताप ॥3॥
निमख न बिसरहि हरि चरण तुम॑ारे ॥
नानकु मागै दानु पिआरे ॥4॥25॥31॥
गुर पूरे जब भए दइआल ॥
दुख बिनसे पूरन भई घाल ॥1॥
पेखि पेखि जीवा दरसु तुम॑ारा ॥
चरण कमल जाई बलिहारा ॥
तुझ बिनु ठाकुर कवनु हमारा ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगति सिउ प्रीति बणि आई ॥
पूरब करमि लिखत धुरि पाई ॥2॥
जपि हरि हरि नामु अचरजु परताप ॥
जालि न साकहि तीने ताप ॥3॥
निमख न बिसरहि हरि चरण तुम॑ारे ॥
नानकु मागै दानु पिआरे ॥4॥25॥31॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! जब (किसी मनुष्य पर) पूरे सतिगुरू जी दयावान होते हैं । (वह मनुष्य हरी-नाम सिमरता है उसकी ये) मेहनत सफल हो जाती है। और उसके सारे दुख नाश हो जाते हैं। 1। हे प्रभू ! (मेहर कर) आपके दर्शन सदा कर कर के मुझे आत्मिक जीवन मिलता रहे। मैं आपके सुंदर चरणों से सदके होता रहूँ। हे मालिक आपके सिवा और कोण है जो हमारा है 1।रहाउ। हे भाई !उस मनुष्य का प्यार गुरू की संगति से बन जाता है पूर्बले जन्मों के किए कर्मों के अनुसार धुर दरगाह से जिस मनुष्य के लिखे लेख उघड़ते हैं। 2। हे भाई ! सदा परमात्मा का नाम जपा कर। ऐसा हैरान करने वाला आत्मिक तेज प्राप्त होता है कि (आधि-व्याधि-उपाधि। ये) तीनों ही ताप (आत्मिक जीवन को) जला नहीं सकेंगे। 3। आपके चरण (नानक को) आँख झपकने जितने समय के लिए भी ना भूलें हे हरी ! हे प्यारे ! (आपके दर से आपका दास) नानक (ये) दान माँगता है । 4। 25। 31।
से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥
सूही महला 5 ॥
से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥
जितु रसना हरि नामु उचारे ॥1॥
सुणि बेनती प्रभ दीन दइआला ॥
साध गावहि गुण सदा रसाला ॥1॥ रहाउ ॥
जीवन रूपु सिमरणु प्रभ तेरा ॥
जिसु क्रिपा करहि बसहि तिसु नेरा ॥2॥
जन की भूख तेरा नामु अहारु ॥
तूं दाता प्रभ देवणहारु ॥3॥
राम रमत संतन सुखु माना ॥
नानक देवनहार सुजाना ॥4॥26॥32॥
से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥
जितु रसना हरि नामु उचारे ॥1॥
सुणि बेनती प्रभ दीन दइआला ॥
साध गावहि गुण सदा रसाला ॥1॥ रहाउ ॥
जीवन रूपु सिमरणु प्रभ तेरा ॥
जिसु क्रिपा करहि बसहि तिसु नेरा ॥2॥
जन की भूख तेरा नामु अहारु ॥
तूं दाता प्रभ देवणहारु ॥3॥
राम रमत संतन सुखु माना ॥
नानक देवनहार सुजाना ॥4॥26॥32॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे मेरे प्यारे ! (मेरे लिए) वह संयोग बना। जिससे (मेरी) जीभ आपका नाम उचारती रहे। 1। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! (मेरी) विनती सुन। (जैसे) संत जन सदा आपके रस भरे गुण गाते रहते हैुं (वैसे ही मैं भी गाता रहूँ)। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपका नाम सिमरना (हम जीवों के लिए) आत्मिक जीवन के बराबर है। जिस मनुष्य पर आप कृपा करते हैं। उसके दिल में आ बसते हैं। 2। हे प्रभू ! आपके संत-जनों की (आत्मिक) भूख (दूर करने के लिए) आपका नाम खुराक है। ये खुराक आप ही देते हैं। आप ही दे सकते हैं। 3। हे नानक ! संत-जन उस परमात्मा का नाम सिमर के आत्मिक आनंद लेते रहते हैं। जो सब कुछ देने के समर्थ है और जो (हर पहलू से) समझदार है। 4। 26। 32।
बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥
सूही महला 5 ॥
बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥
मिथिआ मोह बंधहि नित पारच ॥1॥
माधवे भजु दिन नित रैणी ॥
जनमु पदारथु जीति हरि सरणी ॥1॥ रहाउ ॥
करत बिकार दोऊ कर झारत ॥ राम रतनु रिद तिलु नही धारत ॥2॥
भरण पोखण संगि अउध बिहाणी ॥
बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥
मिथिआ मोह बंधहि नित पारच ॥1॥
माधवे भजु दिन नित रैणी ॥
जनमु पदारथु जीति हरि सरणी ॥1॥ रहाउ ॥
करत बिकार दोऊ कर झारत ॥ राम रतनु रिद तिलु नही धारत ॥2॥
भरण पोखण संगि अउध बिहाणी ॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (आपकी उम्र की नदी) बहती जा रही है। पर आप इधर ध्यान नहीं करते। आप नाशवंत पदार्थों के मोह के बँधन ही सदा बाँधते रहते हैं। 1। हे भाई ! दिन-रात सदा माया के पति प्रभू का नाम जपा करें। प्रभू की शरण पड़ कर कीमती मानस जन्म का फायदा उठा लें। 1। रहाउ। हे भाई ! आप हानि-लाभ विचारे बिना ही विकार किए जा रहे हैं परमात्मा का रत्न (जैसा कीमती) नाम अपने दिल में आप एक पल के लिए भी नहीं टिकाते। 2। हे भाई ! (अपना शरीर) पालने-पोसने में ही आपकी उम्र बीतती जा रही है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 743 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।