अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह,हे भाई !) जिस मनुष्य ने परमात्मा के चरण पकड़ लिए।जो मनुष्य प्रभू की शरण आ पड़ा। 4। 22। 28।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम-धन कमाने से हटा के दुनियावी धन की ओर लगा देता है। वह मनुष्य दोनों जहानों में (इस लोक में और परलोक में) गुनहगार कहलवाता है। 1। जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है।जीवों को वही कुछ सिर माथे मानना पड़ता है (वही कुछ जीव करते हैं)। हे भाई ! परमात्मा अपनी रची सृष्टि के बारे में स्वयं ही सब कुछ जानने वाला है। 1।रहाउ। हे भाई ! (जिस मनुष्य से परमात्मा) सदा-स्थिर रहने वाला (नाम-सिमरन) धर्म करवाता है।(नाम-सिमरन का) नेक भला काम करवाता है। नाम-धन इकट्ठा करते हुए उसकी ये दुनिया भी नहीं बिगड़ती। 2। सब जीवों के हृदय में एक परमात्मा ही जाग्रत रहता है। हे भाई ! (जीवों के भी क्या वश।) हरेक जीव उसी उसी काम में लगता है जिस जिस काम में परमात्मा लगाता है। 3। हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाला मेरा मालिक है।आप अपहुँच है।ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से आपके तक पहुँचा नहीं जा सकता। (आपका दास) नानक आपके से प्रेरित हैं के ही आपका नाम उचार सकता है। 4। 23। 29।
सूही महला 5 ॥ प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥ ईत ऊत की ओट सवारी ॥1॥ सदा सदा जपीऐ हरि नाम ॥ पूरन होवहि मन के काम ॥1॥ रहाउ ॥ प्रभु अबिनासी रैणि दिनु गाउ ॥ जीवत मरत निहचलु पावहि थाउ ॥2॥ सो साहु सेवि जितु तोटि न आवै ॥ खात खरचत सुखि अनदि विहावै ॥3॥ जगजीवन पुरखु साधसंगि पाइआ ॥ गुर प्रसादि नानक नामु धिआइआ ॥4॥24॥30॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! अमृत बेला में (उठ के) परमात्मा का नाम सिमरा कर। (इस तरह) इस लोक और परलोक के लिए सुंदर आसरा बनाते रहा कर। 1। हे भाई ! सदा ही परमात्मा का नाम सिमरते रहना चाहिए। (सिमरन की बरकति से) मन के चितवे हुए सारे काम सफल हो जाते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! रात-दिन अविनाशी प्रभू (की सिफत-सालाह के गीत) गाया कर। (इस तरह) दुनिया के कार्य व्यवहार करते हुए निर्मोह रह के आप (प्रभू-चरणों में) सदा कायम रहने वाली जगह प्राप्त कर लेगा। 2। हे भाई ! नाम-धन के मालिक उस प्रभू की सेवा-भक्ति किया कर।(उससे ऐसा धन मिलता है) जिस धन में कभी घाटा नहीं पड़ता। उस धन को खुद इस्तेमाल करते हुए औरों में बाँटते हुए जिंदगी सुख-आनंद से बीतती है। 3। उसने जगत के जीवन सर्व-व्यापक प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया हे नानक ! जिस मनुष्य ने साध-संगति में गुरू की कृपा से परमात्मा का नाम सिमरना शुरू कर दिया। 4। 24। 30।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! जब (किसी मनुष्य पर) पूरे सतिगुरू जी दयावान होते हैं । (वह मनुष्य हरी-नाम सिमरता है उसकी ये) मेहनत सफल हो जाती है।और उसके सारे दुख नाश हो जाते हैं। 1। हे प्रभू ! (मेहर कर) आपके दर्शन सदा कर कर के मुझे आत्मिक जीवन मिलता रहे। मैं आपके सुंदर चरणों से सदके होता रहूँ। हे मालिक आपके सिवा और कोण है जो हमारा है 1।रहाउ। हे भाई !उस मनुष्य का प्यार गुरू की संगति से बन जाता है पूर्बले जन्मों के किए कर्मों के अनुसार धुर दरगाह से जिस मनुष्य के लिखे लेख उघड़ते हैं। 2। हे भाई ! सदा परमात्मा का नाम जपा कर।ऐसा हैरान करने वाला आत्मिक तेज प्राप्त होता है कि (आधि-व्याधि-उपाधि। ये) तीनों ही ताप (आत्मिक जीवन को) जला नहीं सकेंगे। 3। आपके चरण (नानक को) आँख झपकने जितने समय के लिए भी ना भूलें हे हरी ! हे प्यारे ! (आपके दर से आपका दास) नानक (ये) दान माँगता है । 4। 25। 31।
सूही महला 5 ॥ से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥ जितु रसना हरि नामु उचारे ॥1॥ सुणि बेनती प्रभ दीन दइआला ॥ साध गावहि गुण सदा रसाला ॥1॥ रहाउ ॥ जीवन रूपु सिमरणु प्रभ तेरा ॥ जिसु क्रिपा करहि बसहि तिसु नेरा ॥2॥ जन की भूख तेरा नामु अहारु ॥ तूं दाता प्रभ देवणहारु ॥3॥ राम रमत संतन सुखु माना ॥ नानक देवनहार सुजाना ॥4॥26॥32॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे मेरे प्यारे ! (मेरे लिए) वह संयोग बना। जिससे (मेरी) जीभ आपका नाम उचारती रहे। 1। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! (मेरी) विनती सुन। (जैसे) संत जन सदा आपके रस भरे गुण गाते रहते हैुं (वैसे ही मैं भी गाता रहूँ)। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपका नाम सिमरना (हम जीवों के लिए) आत्मिक जीवन के बराबर है। जिस मनुष्य पर आप कृपा करता है।उसके दिल में आ बसता है। 2। हे प्रभू ! आपके संत-जनों की (आत्मिक) भूख (दूर करने के लिए) आपका नाम खुराक है। ये खुराक आप ही देता है।आप ही दे सकता है। 3। हे नानक ! संत-जन उस परमात्मा का नाम सिमर के आत्मिक आनंद लेते रहते हैं। जो सब कुछ देने के समर्थ है और जो (हर पहलू से) समझदार है। 4। 26। 32।
सूही महला 5 ॥ बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥ मिथिआ मोह बंधहि नित पारच ॥1॥ माधवे भजु दिन नित रैणी ॥ जनमु पदारथु जीति हरि सरणी ॥1॥ रहाउ ॥ करत बिकार दोऊ कर झारत ॥ राम रतनु रिद तिलु नही धारत ॥2॥ भरण पोखण संगि अउध बिहाणी ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (आपकी उम्र की नदी) बहती जा रही है।पर आप इधर ध्यान नहीं करता। आप नाशवंत पदार्थों के मोह के बँधन ही सदा बाँधता रहता है। 1। हे भाई ! दिन-रात सदा माया के पति प्रभू का नाम जपा कर। प्रभू की शरण पड़ कर कीमती मानस जन्म का फायदा उठा ले। 1। हे भाई ! आप हानि-लाभ विचारे बिना ही विकार किए जा रहा है परमात्मा का रत्न (जैसा कीमती) नाम अपने दिल में आप एक पल के लिए भी नहीं टिकाता। 2। हे भाई ! (अपना शरीर) पालने-पोसने में ही आपकी उम्र बीतती जा रही है।
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह,हे भाई !) जिस मनुष्य ने परमात्मा के चरण पकड़ लिए।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।