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अंग 742

अंग
742
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सूही महला 5 ॥
दरसनु देखि जीवा गुर तेरा ॥
पूरन करमु होइ प्रभ मेरा ॥1॥
इह बेनंती सुणि प्रभ मेरे ॥
देहि नामु करि अपणे चेरे ॥1॥ रहाउ ॥
अपणी सरणि राखु प्रभ दाते ॥
गुर प्रसादि किनै विरलै जाते ॥2॥
सुनहु बिनउ प्रभ मेरे मीता ॥
चरण कमल वसहि मेरै चीता ॥3॥
नानकु एक करै अरदासि ॥
विसरु नाही पूरन गुणतासि ॥4॥18॥24॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे गुरू ! आपके दर्शन करके मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है। हे मेरे प्रभू ! आपकी सम्पूर्ण कृपा हैं (और मुझे गुरू मिल जाए)। 1। हे मेरे प्रभू (मेरी) ये आरजू सुन। (गुरू के द्वारा) मुझे अपना सेवक बना के (अपना) नाम बख्श। 1।रहाउ। हे सब दातें देने वाले प्रभू ! मुझे अपनी शरण में रख। हे प्रभू ! गुरू की किरपा से किसी विरले मनुष्य ने आपके साथ गहरी सांझ डाली है। 2। हे मेरे प्रभु (मेरी) यह प्रार्थना सुन। (मेहर कर ! आपके) सुंदर चरण मेरे चित्त में बस पड़ें। 3। हे मेरे मित्र प्रभू !नानक (आपके दर पे) एक अर्ज करता है सब गुणों के खजाने प्रभू !(मुझ नानक को कभी) ना भूल। 4। 18। 24।
सूही महला 5 ॥
मीतु साजनु सुत बंधप भाई ॥
जत कत पेखउ हरि संगि सहाई ॥1॥
जति मेरी पति मेरी धनु हरि नामु ॥
सूख सहज आनंद बिसराम ॥1॥ रहाउ ॥
पारब्रहमु जपि पहिरि सनाह ॥
कोटि आवध तिसु बेधत नाहि ॥2॥
हरि चरन सरण गड़ कोट हमारै ॥
कालु कंटकु जमु तिसु न बिदारै ॥3॥
नानक दास सदा बलिहारी ॥
सेवक संत राजा राम मुरारी ॥4॥19॥25॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ परमात्मा ही मेरा मित्र है।सज्जन है।परमात्मा ही (मेरे वास्ते) पुत्र रिश्तेदार व भाई है। हे भाई ! मैं जहाँ-कहाँ देखता हूँ।परमात्मा मेरे साथ मददगार है।1। हे भाई ! परमात्मा का नाम मेरी (उच्च) जाति है।मेरी इज्जत है।मेरा धन है। (इसकी वजह से मेरे अंदर) आनंद है।शांति है।आत्मिक अडोलता और सुख हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! (सदा) परमात्मा (का नाम) जपा कर।(हरी नाम का) संजोअ (कवच) पहने रख। इस (संजोअ) को (कामादिक जैसे) करोड़ो हथियार (भी) नहीं बेध सकते। 2। हे भाई ! मेरे वास्ते (तो) परमात्मा के चरणों की शरण अनेकों किले हैं। इस (किले) को दुखद मौत (का डर) नाश नहीं कर सकता। 3। हे नानक ! (कह)(में उनके) सदा सदके जाता हूँ हे प्रभू-पातशाह ! हे मुरारी ! जोआपके सेवक व् संत है(जिनकी संगति में आपका नाम प्राप्त होता है)। 4। 19। 25।
सूही महला 5 ॥
गुण गोपाल प्रभ के नित गाहा ॥
अनद बिनोद मंगल सुख ताहा ॥1॥
चलु सखीए प्रभु रावण जाहा ॥
साध जना की चरणी पाहा ॥1॥ रहाउ ॥
करि बेनती जन धूरि बाछाहा ॥
जनम जनम के किलविख लाहां ॥2॥
मनु तनु प्राण जीउ अरपाहा ॥
हरि सिमरि सिमरि मानु मोहु कटाहां ॥3॥
दीन दइआल करहु उतसाहा ॥
नानक दास हरि सरणि समाहा ॥4॥20॥26॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे सहेली ! गोपाल प्रभू के गुण सदा गाते रहें। (जो गाते हैं) उन्हें सुख-आनंद-चाव-खुशियां बनीं रहती हैं। 1। हे सहेली ! उठ।प्रभू का सिमरन करने चलें। संत जनों के चरणों में जा पड़ें। 1।रहाउ। हे सहेली ! (प्रभू के आगे) विनती कर के (उससे) संतजनों की चरणधूल मांगें। (और अपने) अनेकों जन्मों के पाप दूर कर लें। 2। हे सहेली ! अपना मन-तन-जिंद-जान भेट कर दे। हर वक्त परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के (अपने अंदर से) अहंकार और मोह दूर कर ले। 3। हे नानक ! (कह) हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! (मेरे अंदर) उत्साह पैदा कर (कि) मैं आपके दासों की शरण पड़ा रहूँ। 4। 20। 26।
सूही महला 5 ॥
बैकुंठ नगरु जहा संत वासा ॥
प्रभ चरण कमल रिद माहि निवासा ॥1॥
सुणि मन तन तुझु सुखु दिखलावउ ॥
हरि अनिक बिंजन तुझु भोग भुंचावउ ॥1॥ रहाउ ॥
अंम्रित नामु भुंचु मन माही ॥
अचरज साद ता के बरने न जाही ॥2॥
लोभु मूआ त्रिसना बुझि थाकी ॥
पारब्रहम की सरणि जन ताकी ॥3॥
जनम जनम के भै मोह निवारे ॥
नानक दास प्रभ किरपा धारे ॥4॥21॥27॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! जिस जगह (परमात्मा के) संत जन बसते हों।वही है (असल) बैकुंठ का शहर। (संत जनों की संगति में रह के) प्रभू के सोहणे चरण हृदय में आ बसते हैं। 1। हे भाई ! (मेरी बात) सुन।(आ) मैं (आपके) मन को (आपके) तन को आत्मिक आनंद दिखा दूँ। प्रभू का नाम (मानो) अनेकों स्वादिष्ट भोजन हैं।(आ।साध-संगत में) मैं आपको वह स्वादिष्ट भोजन खिलाऊँ। 1।रहाउ। हे भाई ! (साध-संगति में रह के) आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम (-भोजन) अपने मन में खाया कर। इस भोजन के हैरान कर देने वाले स्वाद हैं।बयान नहीं किए जा सकते। 2। (अनके अंदर से) लोभ समाप्त हो जाता है। तृष्णा की आग बुझ के खत्म हो जाती है। हे भाई ! जिन संतों ने (साध-संगति बैकुंठ में आ के) परमात्मा का आसरा लिया है 3। उनके अनेकों जन्मों के डर-मोह दूर कर देता है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) प्रभू अपने दासों पर मेहर करता है।4। 21। 27।
सूही महला 5 ॥
अनिक बींग दास के परहरिआ ॥
करि किरपा प्रभि अपना करिआ ॥1॥
तुमहि छडाइ लीओ जनु अपना ॥
उरझि परिओ जालु जगु सुपना ॥1॥ रहाउ ॥
परबत दोख महा बिकराला ॥
खिन महि दूरि कीए दइआला ॥2॥
सोग रोग बिपति अति भारी ॥
दूरि भई जपि नामु मुरारी ॥3॥
द्रिसटि धारि लीनो लड़ि लाइ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! प्रभू ने अपने सेवक के अनेकों टेढ़-मेढ़ (छल कपट) दूर कर दिए। और कृपा करके उसको अपना बना लिया है। 1। हे प्रभू !तुमअपने सेवक को स्वयं निकाल लो सपने जैसे जगत (के मोह) जाल (ने आपके सेवक को चारों तरफ से) उलझा लिया है। 1।रहाउ। हे भाई ! (शरण आए मनुष्य के) पहाड़ों जितने बड़े और भयानक ऐब दीनों पर दया करने वाले परमात्मा ने एक छिन में दूर कर दिए। 2। हे भाई ! (सेवक के) अनेकों ग़म और रोग बड़ी भारी मुसीबतें परमात्मा का नाम जपके दूर हो गई। 3। परमात्मा ने मेहर की निगाह करके उसको अपने साथ लगा लिया

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही महला 5 ॥ हे गुरू ! आपके दर्शन करके मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।