दरसनु देखि जीवा गुर तेरा ॥
पूरन करमु होइ प्रभ मेरा ॥1॥
इह बेनंती सुणि प्रभ मेरे ॥
देहि नामु करि अपणे चेरे ॥1॥ रहाउ ॥
अपणी सरणि राखु प्रभ दाते ॥
गुर प्रसादि किनै विरलै जाते ॥2॥
सुनहु बिनउ प्रभ मेरे मीता ॥
चरण कमल वसहि मेरै चीता ॥3॥
नानकु एक करै अरदासि ॥
विसरु नाही पूरन गुणतासि ॥4॥18॥24॥
मीतु साजनु सुत बंधप भाई ॥
जत कत पेखउ हरि संगि सहाई ॥1॥
जति मेरी पति मेरी धनु हरि नामु ॥
सूख सहज आनंद बिसराम ॥1॥ रहाउ ॥
पारब्रहमु जपि पहिरि सनाह ॥
कोटि आवध तिसु बेधत नाहि ॥2॥
हरि चरन सरण गड़ कोट हमारै ॥
कालु कंटकु जमु तिसु न बिदारै ॥3॥
नानक दास सदा बलिहारी ॥
सेवक संत राजा राम मुरारी ॥4॥19॥25॥
गुण गोपाल प्रभ के नित गाहा ॥
अनद बिनोद मंगल सुख ताहा ॥1॥
चलु सखीए प्रभु रावण जाहा ॥
साध जना की चरणी पाहा ॥1॥ रहाउ ॥
करि बेनती जन धूरि बाछाहा ॥
जनम जनम के किलविख लाहां ॥2॥
मनु तनु प्राण जीउ अरपाहा ॥
हरि सिमरि सिमरि मानु मोहु कटाहां ॥3॥
दीन दइआल करहु उतसाहा ॥
नानक दास हरि सरणि समाहा ॥4॥20॥26॥
बैकुंठ नगरु जहा संत वासा ॥
प्रभ चरण कमल रिद माहि निवासा ॥1॥
सुणि मन तन तुझु सुखु दिखलावउ ॥
हरि अनिक बिंजन तुझु भोग भुंचावउ ॥1॥ रहाउ ॥
अंम्रित नामु भुंचु मन माही ॥
अचरज साद ता के बरने न जाही ॥2॥
लोभु मूआ त्रिसना बुझि थाकी ॥
पारब्रहम की सरणि जन ताकी ॥3॥
जनम जनम के भै मोह निवारे ॥
नानक दास प्रभ किरपा धारे ॥4॥21॥27॥
अनिक बींग दास के परहरिआ ॥
करि किरपा प्रभि अपना करिआ ॥1॥
तुमहि छडाइ लीओ जनु अपना ॥
उरझि परिओ जालु जगु सुपना ॥1॥ रहाउ ॥
परबत दोख महा बिकराला ॥
खिन महि दूरि कीए दइआला ॥2॥
सोग रोग बिपति अति भारी ॥
दूरि भई जपि नामु मुरारी ॥3॥
द्रिसटि धारि लीनो लड़ि लाइ ॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही महला 5 ॥ हे गुरू ! आपके दर्शन करके मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।