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अंग 741

अंग
741
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
करणहार की सेव न साधी ॥1॥
पतित पावन प्रभ नाम तुमारे ॥
राखि लेहु मोहि निरगुनीआरे ॥1॥ रहाउ ॥
तूं दाता प्रभ अंतरजामी ॥
काची देह मानुख अभिमानी ॥2॥
सुआद बाद ईरख मद माइआ ॥
इन संगि लागि रतन जनमु गवाइआ ॥3॥
दुख भंजन जगजीवन हरि राइआ ॥
सगल तिआगि नानकु सरणाइआ ॥4॥13॥19॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आप हमें पैदा करने वाला है।हम आपकी सेवा-भक्ति नहीं करते। 1। हे प्रभू ! आपका नाम विकारियों को पवित्र करने वाला है। मुझे गुण-हीन को (अपना नाम दे के) विकारों से बचाए रख। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आप हमें सब दातें देने वाला है।हमारे दिल की जानने वाला है।पर। हम जीव इस नाशवंत शरीर का ही गुमान करते रहते हैं (और।आपको याद नहीं करते)। 2। हे प्रभू ! (दुनिया के पदार्थों के) चस्के।झगड़े।ईष्या।माया का घमण्ड- हम जीव इनमें ही लग के कीमती मानस जन्म को गवा रहे हैं। 3। हे दुखों के नाश करने वाले ! हे जगत के जीवन ! हे प्रभू पातशाह ! और सारे (आसरे छोड़ के) नानक आपकी शरण आया है। 4। 13। 19।
सूही महला 5 ॥
पेखत चाखत कहीअत अंधा सुनीअत सुनीऐ नाही ॥
निकटि वसतु कउ जाणै दूरे पापी पाप कमाही ॥1॥
सो किछु करि जितु छुटहि परानी ॥
हरि हरि नामु जपि अंम्रित बानी ॥1॥ रहाउ ॥
घोर महल सदा रंगि राता ॥
संगि तुम॑ारै कछू न जाता ॥2॥
रखहि पोचारि माटी का भांडा ॥
अति कुचील मिलै जम डांडा ॥3॥
काम क्रोधि लोभि मोहि बाधा ॥
महा गरत महि निघरत जाता ॥4॥
नानक की अरदासि सुणीजै ॥
डूबत पाहन प्रभ मेरे लीजै ॥5॥14॥20॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (परमात्मा हर वक्त मनुष्य के अंग-संग बसता है।पर मनुष्य उसको देखता नहीं।इस वास्ते।दुनिया के और सारे पदार्थ) देखते-चाखते हुए भी (आत्मिक जीवन की ओर से) अंधा ही कहा जा सकता है। (दुनिया के और राग नाद) सुनता हुआ भी (परमात्मा की) सिफत-सालाह नहीं सुन रहा (आत्मिक जीवन की तरफ से बहरा ही है)। नजदीक बस रहे (नाम-) पदार्थ को कहीं दूर समझता है।(इस कमी के कारण) विकारों में फंसे हुए मनुष्य विकार ही करते रहते हैं। 1। हे प्राणी ! कोई वह काम कर जिसकी वजह से आप (विकारों से) बचा रह सके। सदा परमात्मा का नाम जपा कर।(प्रभू की सिफत सालाह की) बाणी आत्मिक जीवन देने वाली है। 1।रहाउ। हे प्राणी ! आप सदा घोड़े-महल-माढ़ियों के प्यार में मस्त रहता है। (पर इनमें से) कोई भी चीज आपके साथ नहीं जा सकती। 2। हे प्राणी ! आप इस मिट्टी के बर्तन (शरीर) को (बाहर से) बना-सँवार के रखता है; (पर अंदर सें विकारों से यह) बहुत गंदा हुआ पड़ा है। (इस तरह के जीवन वाले को तो) जमों द्वारा सजा मिलती है। 3। हे प्राणी ! आप काम-क्रोध में।लोभ में मोह में बंधा पड़ा है। विकारों के दल-दल में और भी फंसता जा रहा है। 4। हे मेरे प्रभू ! (अपने दास) नानक की आरजू सुन। हम डूब रहे पत्थरों को डूबने से बचा ले। 5। 14। 20।
सूही महला 5 ॥
जीवत मरै बुझै प्रभु सोइ ॥
तिसु जन करमि परापति होइ ॥1॥
सुणि साजन इउ दुतरु तरीऐ ॥
मिलि साधू हरि नामु उचरीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
एक बिना दूजा नही जानै ॥
घट घट अंतरि पारब्रहमु पछानै ॥2॥
जो किछु करै सोई भल मानै ॥
आदि अंत की कीमति जानै ॥3॥
कहु नानक तिसु जन बलिहारी ॥
जा कै हिरदै वसहि मुरारी ॥4॥15॥21॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ ही (दुनिया का) मोह त्याग देता है। वह मनुष्य परमात्मा के साथ सांझ डाल लेता है।उस मनुष्य को (परमात्मा की) कृपा से (परमात्मा का मिलाप) प्राप्त हो जाता है। 1। हे सज्जन ! (मेरी विनती) सुन।संसार-समुंद्र से पार लांघना बहुत मुश्किल है। इससे सिर्फ इस तरीके से पार लांघ सकते हैं (कि) गुरू को मिल के परमात्मा का नाम सिमरा जाए। 1।रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य एक परमात्मा के बिना किसी और के साथ सांझ नहीं डालता। वह मनुष्य परमात्मा को हरेक शरीर में बसता पहचान लेता है। 2। जो कुछ भी परमात्मा करता है जो मनुष्य हरेक उस काम को (दुनिया के वास्ते) भला मानता है। वह मनुष्य सदा ही कायम रहने वाले परमात्मा की कद्र समझ लेता है। 3। हे नानक ! कह,जिस मनुष्य के हृदय में सदा आप बसता है (जिसको आप सदा याद रखता है) उस मनुष्य से (मैं) कुर्बान जाता हूँ। 4। 15। 21।
सूही महला 5 ॥
गुरु परमेसरु करणैहारु ॥
सगल स्रिसटि कउ दे आधारु ॥1॥
गुर के चरण कमल मन धिआइ ॥
दूखु दरदु इसु तन ते जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
भवजलि डूबत सतिगुरु काढै ॥
जनम जनम का टूटा गाढै ॥2॥
गुर की सेवा करहु दिनु राति ॥
सूख सहज मनि आवै सांति ॥3॥
सतिगुर की रेणु वडभागी पावै ॥
नानक गुर कउ सद बलि जावै ॥4॥16॥22॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे मेरे मन ! गुरू उस परमात्मा का रूप है जो सबसे बड़ा मालिक है जो सब कुछ कर सकने वाला है। गुरू सारी सृष्टि को (परमात्मा के नाम का) आसरा देता है। 1। हे (मेरे) मन ! (सदा) गुरू के सुंदर कोमल चरणों का ध्यान धरा करो (जो मनुष्य ये उद्यम करता है उसके) इस शरीर के हरेक किस्म के दुख-कलेश दूर हो जाते हैं। 1।रहाउ। (हे मन !) गुरू संसार समुंद्र में डूबतों को बचा लेता है। अनेकों जन्मों से (परमात्मा से) टूटे हुए मनुष्य को (परमात्मा से) जोड़ देता है। 2। हे भाई ! दिन-रात गुरू की (बताई हुई) सेवा किया करो। (जो मनुष्य करता है उसके) मन में शांति पैदा हो जाती है।आत्मिक अडोलता के आनंद पैदा हो जाते हैं। 3। हे नानक ! कोई अति भाग्यशाली मनुष्य गुरू की चरण-धूल हासिल करता है। (फिर वह मनुष्य) गुरू से सदा सदके जाता है। 4। 16। 22।
सूही महला 5 ॥
गुर अपुने ऊपरि बलि जाईऐ ॥
आठ पहर हरि हरि जसु गाईऐ ॥1॥
सिमरउ सो प्रभु अपना सुआमी ॥
सगल घटा का अंतरजामी ॥1॥ रहाउ ॥
चरण कमल सिउ लागी प्रीति ॥
साची पूरन निरमल रीति ॥2॥
संत प्रसादि वसै मन माही ॥
जनम जनम के किलविख जाही ॥3॥
करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥
नानकु मागै संत रवाला ॥4॥17॥23॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! अपने गुरू पर से (सदा) कुर्बान होना चाहिए (गुरू की) शरण पड़ कर अपने अंदर से स्वै-भाव मिटा देना चाहिए।(क्योंकि। गुरू की कृपा से ही) आठों पहर परमात्मा का सिफत सालाह का गीत गाया जा सकता है। 1। हे भाई ! (गुरू की कृपा से) मैं अपना वह मालिक प्रभू सिमरता हूँ। जो सब जीवों के दिल की जानने वाला है। 1।रहाउ। हे भाई ! (गुरू की कृपा से ही) परमात्मा के सुंदर चरणों से प्यार बनता है। (गुरू चरणों की प्रीति ही) अटल सम्पूर्ण और पवित्र जीवन-जुगति है। 2। हे भाई ! गुरू की कृपा से (परमात्मा जिस मनुष्य के) मन में आ बसता है (उस मनुष्य के) अनेकों जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं। 3। हे निमाणों पर दया करने वाले प्रभू ! (अपने दास नानक पर) कृपा कर। (आपका दास) नानक (आपके दर से) गुरू के चरणों की धूल माँगता हूँ। 4। 17। 23।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।