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अंग 740

अंग
740
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सूही महला 5 ॥
रहणु न पावहि सुरि नर देवा ॥
ऊठि सिधारे करि मुनि जन सेवा ॥1॥
जीवत पेखे जिन॑ी हरि हरि धिआइआ ॥
साधसंगि तिन॑ी दरसनु पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
बादिसाह साह वापारी मरना ॥
जो दीसै सो कालहि खरना ॥2॥
कूड़ै मोहि लपटि लपटाना ॥
छोडि चलिआ ता फिरि पछुताना ॥3॥
क्रिपा निधान नानक कउ करहु दाति ॥
नामु तेरा जपी दिनु राति ॥4॥8॥14॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (अनेकों मनुष्य अपने आप को) दैवी मनुष्य।देवते (कहलवा गए।अनेकों अपने आप को) ऋषी मुनी (कहलवा गए। अनेकों ही उनकी) सेवा कर के (जगत से आखिर अपनी-अपनी बारी) चले जाते रहे।(कोई भी यहाँ) सदा के लिए टिका नहीं रह सकता। 1। हे भाई ! आत्मिक जीवन वाले (सफल जीवन वाले सिर्फ वही) देखे जाते हैं जिन्होंने परमात्मा का सिमरन किया है। उन्होंने ही साध-संगति में टिक के परमात्मा के दर्शन किए हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! शाह।व्यापारी।बादशाह (सबने आखिर) मरना है। जो भी कोई (यहाँ) दिखता है।हरेक को मौत ने ले जाना है। 2। हे भाई ! मनुष्य सदा झूठे मोह में फसा रहता है (और परमात्मा को भुलाए रखता है। पर जब दुनिया के पदार्थ) छोड़ के चलता है।तब पछताता है। 3। हे कृपा के खजाने प्रभू ! (मुझे) नानक को (ये) दाति दे (कि) मैं (नानक) दिन-रात आपका नाम जपता रहूँ। 4। 8। 14।
सूही महला 5 ॥
घट घट अंतरि तुमहि बसारे ॥
सगल समग्री सूति तुमारे ॥1॥
तूं प्रीतम तूं प्रान अधारे ॥
तुम ही पेखि पेखि मनु बिगसारे ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक जोनि भ्रमि भ्रमि भ्रमि हारे ॥
ओट गही अब साध संगारे ॥2॥
अगम अगोचरु अलख अपारे ॥
नानकु सिमरै दिनु रैनारे ॥3॥9॥15॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे प्रभू ! हरेक शरीर में आप ही बसता है। (दुनिया की) सारी चीजें आपकी ही मर्यादा के धागे में (परोई हुई) हैं। 1। हे प्रभू ! आप हमारा प्रीतम है।आप हमारी जिंद का आसरा है। आपको ही देख-देख के (हमारा) मन खुश होता है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! (आपसे विछुड़ के जीव) अनेकों जूनियों में भटक-भटक के थक जाते हैं। मानस जनम में आ के (आपकी मेहर से) साध-संगति का आसरा लेते हैं। 2। जिस तक ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं हैं सकती।जो अपहुँच है। अनंत है जो मनुष्य की समझ से परे है।और जो बेअंत है। हे भाई ! (साध-संगति की बरकति से) नानक दिन-रात उस परमात्मा का नाम सिमरता है3। 9। 15।
सूही महला 5 ॥
कवन काज माइआ वडिआई ॥
जा कउ बिनसत बार न काई ॥1॥
इहु सुपना सोवत नही जानै ॥
अचेत बिवसथा महि लपटानै ॥1॥ रहाउ ॥
महा मोहि मोहिओ गावारा ॥
पेखत पेखत ऊठि सिधारा ॥2॥
ऊच ते ऊच ता का दरबारा ॥
कई जंत बिनाहि उपारा ॥3॥
दूसर होआ ना को होई ॥
जपि नानक प्रभ एको सोई ॥4॥10॥16॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ उस माया के कारण मिली वडिआई भी किसी काम की नहीं। हे भाई ! जिस माया के नाश होने में रक्ती भर भी समय नहीं लगता। 1। हे भाई ! ये (जगत ऐसे है।जैसे) सपना (होता) है।(सपने में) सोया हुआ मनुष्य (ये) नहीं जानता (कि मैं सोया हुआ हूँ।और सपना देख रहा हूँ। इसी तरह मनुष्य जगत के मोह वाली) गाफल हालत में (जगत के मोह के साथ) चिपका रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! मूर्ख मनुष्य माया के बड़े मोह में मस्त रहता है। पर देखते-देखते ही (यहाँ से) उठ के चल पड़ता है। 2। हे भाई ! (परमात्मा का नाम ही जप) उसका दरबार ऊँचे से ऊँचा है। वह अनेकों जीवों का नाश भी करता है।और।पैदा भी करता है। 3। जिस जैसा और कोई दूसरा ना अभी तक कोई हुआ है।ना ही (आगे) होंगे। हे नानक ! उस एक परमात्मा का नाम ही जपा कर।4। 10। 16।
सूही महला 5 ॥
सिमरि सिमरि ता कउ हउ जीवा ॥
चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा ॥1॥
सो हरि मेरा अंतरजामी ॥
भगत जना कै संगि सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥
सुणि सुणि अंम्रित नामु धिआवा ॥
आठ पहर तेरे गुण गावा ॥2॥
पेखि पेखि लीला मनि आनंदा ॥
गुण अपार प्रभ परमानंदा ॥3॥
जा कै सिमरनि कछु भउ न बिआपै ॥
सदा सदा नानक हरि जापै ॥4॥11॥17॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (भक्तजनों के अंग-संग रहने वाले) उस (प्रभू के नाम) को मैं सदा सिमर के आत्मिक जीवन हासिल कर रहा हूँ। हे प्रभू ! मैं आपके सोहणे चरण धो-धो के (नित्य) पीता हूँ। 1। मेरा वह हरी-प्रभू हरेक के दिल की जानने वाला है। हे भाई ! मालिक प्रभू अपने भक्त जनों के साथ बसता है।1।रहाउ। हे प्रभू ! बार बार (ये) सुन के (कि आपका) नाम आत्मिक जीवन देने वाला (है।) मैं (आपका नाम) सिमरता रहता हूँ। आठों पहर मैं आपकी सिफत-सालाह के गीत गाता रहता हूँ। 2। आपके करिश्मे देख-देख के मेरे मन में आनंद पैदा होता है। हे सबसे ऊँचे आनंद के मालिक प्रभू ! आपके गुण बेअंत हैं। जिसके सिमरन की बरकति से कोई डर छू नहीं सकता। हे नानक ! आप भी सदा उस हरी का नाम जपा कर।4। 11। 17।
सूही महला 5 ॥
गुर कै बचनि रिदै धिआनु धारी ॥
रसना जापु जपउ बनवारी ॥1॥
सफल मूरति दरसन बलिहारी ॥
चरण कमल मन प्राण अधारी ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगि जनम मरण निवारी ॥
अंम्रित कथा सुणि करन अधारी ॥2॥
काम क्रोध लोभ मोह तजारी ॥
द्रिड़ु नाम दानु इसनानु सुचारी ॥3॥
कहु नानक इहु ततु बीचारी ॥
राम नाम जपि पारि उतारी ॥4॥12॥18॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू के शबद के द्वारा मैं अपने दिल में परमात्मा का ध्यान धरता हूँ। और अपनी जीभ से परमात्मा (के नाम) का जाप जपता हूँ। 1। हे भाई ! गुरू की हस्ती मानस जन्म का फल देने वाली है।मैं (गुरू के) दर्शनों से सदके जाता हूँ। गुरू के कोमल चरणों को मैं अपने मन का जिंद का आसरा बनाता हूँ। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू की संगति में (रह के) मैंने जनम-मरण का चक्कर समाप्त कर लिया है। और आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह कानों से सुन कर (इस को मैं अपने जीवन का) आसरा बना रहा हूँ। 2। हे भाई ! (गुरू की बरकति से) मैंने काम-क्रोध-लोभ-मोह (आदि) को त्याग दिया है। हृदय में प्रभू-नाम को पक्का करके।दूसरों की सेवा करनी।आचरण को पवित्र रखना- ये मैंने अपना सदाचार (जीवन-मर्यादा) बना लिया है। 3। हे नानक ! कह, (हे भाई ! आप भी) ये अस्लियत अपने मन में बसा ले। और गुरू के माध्यम से परमात्मा का नाम जप के (अपने आप को संसार-समुंद्र से) पार लंघा ले। 4। 12। 18।
सूही महला 5 ॥
लोभि मोहि मगन अपराधी ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे प्रभू ! हम भूल करने वाले जीव लोभ में।मोह में मस्त रहते हैं।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (अनेकों मनुष्य अपने आप को) दैवी मनुष्य।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।