रहणु न पावहि सुरि नर देवा ॥
ऊठि सिधारे करि मुनि जन सेवा ॥1॥
जीवत पेखे जिन॑ी हरि हरि धिआइआ ॥
साधसंगि तिन॑ी दरसनु पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
बादिसाह साह वापारी मरना ॥
जो दीसै सो कालहि खरना ॥2॥
कूड़ै मोहि लपटि लपटाना ॥
छोडि चलिआ ता फिरि पछुताना ॥3॥
क्रिपा निधान नानक कउ करहु दाति ॥
नामु तेरा जपी दिनु राति ॥4॥8॥14॥
घट घट अंतरि तुमहि बसारे ॥
सगल समग्री सूति तुमारे ॥1॥
तूं प्रीतम तूं प्रान अधारे ॥
तुम ही पेखि पेखि मनु बिगसारे ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक जोनि भ्रमि भ्रमि भ्रमि हारे ॥
ओट गही अब साध संगारे ॥2॥
अगम अगोचरु अलख अपारे ॥
नानकु सिमरै दिनु रैनारे ॥3॥9॥15॥
कवन काज माइआ वडिआई ॥
जा कउ बिनसत बार न काई ॥1॥
इहु सुपना सोवत नही जानै ॥
अचेत बिवसथा महि लपटानै ॥1॥ रहाउ ॥
महा मोहि मोहिओ गावारा ॥
पेखत पेखत ऊठि सिधारा ॥2॥
ऊच ते ऊच ता का दरबारा ॥
कई जंत बिनाहि उपारा ॥3॥
दूसर होआ ना को होई ॥
जपि नानक प्रभ एको सोई ॥4॥10॥16॥
सिमरि सिमरि ता कउ हउ जीवा ॥
चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा ॥1॥
सो हरि मेरा अंतरजामी ॥
भगत जना कै संगि सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥
सुणि सुणि अंम्रित नामु धिआवा ॥
आठ पहर तेरे गुण गावा ॥2॥
पेखि पेखि लीला मनि आनंदा ॥
गुण अपार प्रभ परमानंदा ॥3॥
जा कै सिमरनि कछु भउ न बिआपै ॥
सदा सदा नानक हरि जापै ॥4॥11॥17॥
गुर कै बचनि रिदै धिआनु धारी ॥
रसना जापु जपउ बनवारी ॥1॥
सफल मूरति दरसन बलिहारी ॥
चरण कमल मन प्राण अधारी ॥1॥ रहाउ ॥
साधसंगि जनम मरण निवारी ॥
अंम्रित कथा सुणि करन अधारी ॥2॥
काम क्रोध लोभ मोह तजारी ॥
द्रिड़ु नाम दानु इसनानु सुचारी ॥3॥
कहु नानक इहु ततु बीचारी ॥
राम नाम जपि पारि उतारी ॥4॥12॥18॥
लोभि मोहि मगन अपराधी ॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (अनेकों मनुष्य अपने आप को) दैवी मनुष्य।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।