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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 739 · सूही

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अंग
739
सूही
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  1. करि किरपा मोहि साधसंगु दीजै ॥4॥
  2. घर महि ठाकुरु नदरि न आवै ॥
  3. लालनु राविआ कवन गती री ॥
  4. तूं जीवनु तूं प्रान अधारा ॥
  5. सूख महल जा के ऊच दुआरे ॥
  6. जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥

करि किरपा मोहि साधसंगु दीजै ॥4॥

अंग 738 से चला आ रहा अंश

करि किरपा मोहि साधसंगु दीजै ॥4॥
तउ किछु पाईऐ जउ होईऐ रेना ॥
जिसहि बुझाए तिसु नामु लैना ॥1॥ रहाउ ॥2॥8॥

हिन्दी अर्थ: कृपा कर के मुझे गुरमुखों की संगति बख्श। 4। हे भाई ! (साध-संगति में से भी) तब ही कुछ हासिल हो सकता है। जब गुरमुखों के चरणों की धूल बन जाएं। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा (चरण-धूल होने की) सूझ बख्शता है। वे (साध-संगति में टिक के उसका) नाम सिमरते हैं। 1।रहाउ। 2। 8।

घर महि ठाकुरु नदरि न आवै ॥

सूही महला 5 ॥
घर महि ठाकुरु नदरि न आवै ॥
गल महि पाहणु लै लटकावै ॥1॥
भरमे भूला साकतु फिरता ॥
नीरु बिरोलै खपि खपि मरता ॥1॥ रहाउ ॥
जिसु पाहण कउ ठाकुरु कहता ॥
ओहु पाहणु लै उस कउ डुबता ॥2॥
गुनहगार लूण हरामी ॥
पाहण नाव न पारगिरामी ॥3॥
गुर मिलि नानक ठाकुरु जाता ॥
जलि थलि महीअलि पूरन बिधाता ॥4॥3॥9॥

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ (साकत को अपने) हृदय-घर में मालिक प्रभू (बसता) नही दिखता। पत्थर (की मूर्ति) ले के अपने गले लटकाए फिरता है। 1। हे भाई ! परमात्मा से टूटा हुआ मनुष्य भटकनों में पड़ के गलत रास्ते पर चलता फिरता है। (मूर्ती पूजा करके) पानी (ही) मथता है। ये व्यर्थ की मेहनत करके आत्मिक मौत सहेड़ता रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! साकत मनुष्य जिस पत्थर को परमात्मा कहता (समझता) रहता है। वह पत्थर (अपने) उस (पुजारी) को भी ले के (पानी में) डूब जाता है। 2। हे पापी ! हे अकृतघ्न ! (जैसे) पत्थर की नाव (नदी से) पार नहीं लांघ सकती (ऐसे ही पत्थर की मूर्ती की पूजा संसार-संमुद्र से पार नहीं लंघा सकती)। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू को मिल के मालिक-प्रभू के साथ गहरी सांझ डाली हुई है। उसको वह करतार पानी में। धरती में आकाश में हर जगह बसता दिखाई देता है। 4। 3। 9।

लालनु राविआ कवन गती री ॥

सूही महला 5 ॥
लालनु राविआ कवन गती री ॥
सखी बतावहु मुझहि मती री ॥1॥
सूहब सूहब सूहवी ॥ अपने प्रीतम कै रंगि रती ॥1॥ रहाउ ॥
पाव मलोवउ संगि नैन भतीरी ॥
जहा पठावहु जांउ तती री ॥2॥
जप तप संजम देउ जती री ॥
इक निमख मिलावहु मोहि प्रानपती री ॥3॥
माणु ताणु अहंबुधि हती री ॥
सा नानक सोहागवती री ॥4॥4॥10॥

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे सखी ! आपने किस ढंग से सोहाने लाल का मिलाप पाया है। हे सखी ! मुझे भी बताएँ। 1। हे सखी ! आपके मुँह पर लाली भख रही है। आप अपने प्यारे के प्रेम-रंग में रंगी हुई हैं। 1।रहाउ। हे सखी ! (मुझे भी बताएँ) मैं आपके पैर अपनी आँखों की पुतलियों से मलूँगी। आप मुझे जहाँ भी (किसी काम पर) भेजेंगी। मैं वहीं (खुशी से) जाऊँगी। 2। मैं उसके बदले में सारे जप-तप-संजम दे दूँगी। हे सखी ! आँख झपकने जितने समय के लिए ही सही मुझे जिंद का मालिक प्रभू मिला दें।3। जो जीव-स्त्री (किसी भी अपने निहित पदार्थ अथवा उद्यम का) गुमान और आसरा छोड़ देती है। अहंकार वाली बुद्धि त्याग देती है। हे नानक !वह सोहाग-भाग वाली हो जाती है। 4। 4। 10।

तूं जीवनु तूं प्रान अधारा ॥

सूही महला 5 ॥
तूं जीवनु तूं प्रान अधारा ॥
तुझ ही पेखि पेखि मनु साधारा ॥1॥
तूं साजनु तूं प्रीतमु मेरा ॥
चितहि न बिसरहि काहू बेरा ॥1॥ रहाउ ॥
बै खरीदु हउ दासरो तेरा ॥
तूं भारो ठाकुरु गुणी गहेरा ॥2॥
कोटि दास जा कै दरबारे ॥
निमख निमख वसै तिन॑ नाले ॥3॥
हउ किछु नाही सभु किछु तेरा ॥
ओति पोति नानक संगि बसेरा ॥4॥5॥11॥

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप ही मेरी जिंद हैं। आप ही मेरी जिंद का सहारा हैं। आपको देख के ही मेरा मन धैर्य धरता है। 1। हे प्रभू ! आप ही मेरे सज्जन हैं। आप ही मेरे प्यारे हैं (मेहर कर) किसी भी वक्त मन से ना बिसर। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मैं मोल खरीदा हुआ आपका अदना सा सेवक हूँ। आप मेरे बड़े मालिक हैं। आप सारे गुणों से भरपूर हैं। आप बड़े जिगरे वाले हैं। 2। हे भाई ! वह प्रभू ऐसा है कि करोड़ों सेवक उसके दर पर (गिरे रहते हैं) वह हर वक्त उनके साथ बसता है। 3। मेरी अपनी कोई बिसात नहीं। (मेरे पास जो कुछ भी है) सब कुछ आपका ही बख्शा हुआ है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) ताने-पेटे की तरह परोए हुए आप ही मेरे साथ बसते हैं। 4। 5। 11।

सूख महल जा के ऊच दुआरे ॥

सूही महला 5 ॥
सूख महल जा के ऊच दुआरे ॥
ता महि वासहि भगत पिआरे ॥1॥
सहज कथा प्रभ की अति मीठी ॥
विरलै काहू नेत्रहु डीठी ॥1॥ रहाउ ॥
तह गीत नाद अखारे संगा ॥
ऊहा संत करहि हरि रंगा ॥2॥
तह मरणु न जीवणु सोगु न हरखा ॥
साच नाम की अंम्रित वरखा ॥3॥
गुहज कथा इह गुर ते जाणी ॥
नानकु बोलै हरि हरि बाणी ॥4॥6॥12॥

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! जिस परमात्मा के महल आनंद से भरपूर हैं। और जिसके दरवाजे ऊँचे हैं (भाव। वहाँ आत्मिक आनंद के बिना और किसी विकार आदि की पहुँच नहीं है)। उस (आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली सिफत सालाह) में उस परमात्मा के प्यारे भक्त (ही) बसते हैं1। हे भाई ! आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली प्रभू की सिफत सालाह बड़ी ही रसीली (स्वादिष्ट) है। पर किसी विरले ही मनुष्य ने उसको अपनी आँखों से देखा है (महसूस किया है)। 1।रहाउ। हे भाई ! आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली उस सिफत-सालाह में (मानो) गीत और राग हो रहे होते हैं (उसमें। मानो) दंगल बने होते है। (जहाँ कामादिक पहलवानों से मुकाबला करने की जाच सीखी जाती है)।उस सिफत सालाह में जुड़ के संत जन परमात्मा के मिलाप का आनंद लेते हैं। 2। हे भाई ! सिफत-सालाह में जुड़ने से जनम-मरण का चक्कर नहीं रहता। खुशी-ग़मी नहीं छू सकती। उस अवस्था में सदा-स्थिर प्रभू के आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की बरखा होती रहती है। 3। हे भाई ! (सिफत सालाह के बारे में) ये भेद की बात (नानक ने) गुरू के पास से समझी है (तभी तो) नानक परमात्मा की सिफत-सालाह की बाणी उचारता रहता है। 4। 6। 12।

जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥

सूही महला 5 ॥
जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥
भेटत संगि इहु भवजलु तारे ॥1॥
ओइ साजन ओइ मीत पिआरे ॥
जो हम कउ हरि नामु चितारे ॥1॥ रहाउ ॥
जा का सबदु सुनत सुख सारे ॥
जा की टहल जमदूत बिदारे ॥2॥
जा की धीरक इसु मनहि सधारे ॥
जा कै सिमरणि मुख उजलारे ॥3॥
प्रभ के सेवक प्रभि आपि सवारे ॥
सरणि नानक तिन॑ सद बलिहारे ॥4॥7॥13॥

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (वह संत जन ही मेरे प्यारे मित्र हैं) जिनके दर्शनों से करोड़ों पाप उतर जाते हैं। (जिन के चरणों) को छूने से संसार-समुंदर से पार लांध जाया जाता है। 1। वह (ही) मेरे प्यारे मित्र हैं वह (ही) मेरे सज्जन हैं। हे भाई ! जो (संत जन) मुझे परमात्मा का नाम याद करवाते हैं । 1।रहाउ। हे भाई ! (वही हैं मेरे मित्र) जिनके वचन सुन के सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं। जिनकी टहल करने से जमदूत (भी) नाश हो जाते हैं। 2। हे भाई ! (वही हैं मेरे मित्र) जिन के द्वारा (दिया हुआ) धीरज (मेरे) इस मन को सहारा देता है। जिन (के दिए हुए हरी-नाम) के सिमरन से (लोक-परलोक में) मुँह उज्जवल होता है। 3। हे नानक ! प्रभू ने स्वयं ही अपने सेवकों का जीवन सुंदर बना दिया है। हे भाई ! उन सेवकों की शरण पड़ना चाहिए। उन पर से सदा कुर्बान होना चाहिए। 4। 7। 13।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 739 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।