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अंग 739

अंग
739
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
करि किरपा मोहि साधसंगु दीजै ॥4॥
तउ किछु पाईऐ जउ होईऐ रेना ॥
जिसहि बुझाए तिसु नामु लैना ॥1॥ रहाउ ॥2॥8॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: कृपा कर के मुझे गुरमुखों की संगति बख्श। 4। हे भाई ! (साध-संगति में से भी) तब ही कुछ हासिल हो सकता है।जब गुरमुखों के चरणों की धूल बन जाएं। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा (चरण-धूल होने की) सूझ बख्शता है।वे (साध-संगति में टिक के उसका) नाम सिमरते हैं। 1।रहाउ। 2। 8।
सूही महला 5 ॥
घर महि ठाकुरु नदरि न आवै ॥
गल महि पाहणु लै लटकावै ॥1॥
भरमे भूला साकतु फिरता ॥
नीरु बिरोलै खपि खपि मरता ॥1॥ रहाउ ॥
जिसु पाहण कउ ठाकुरु कहता ॥
ओहु पाहणु लै उस कउ डुबता ॥2॥
गुनहगार लूण हरामी ॥
पाहण नाव न पारगिरामी ॥3॥
गुर मिलि नानक ठाकुरु जाता ॥
जलि थलि महीअलि पूरन बिधाता ॥4॥3॥9॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ (साकत को अपने) हृदय-घर में मालिक प्रभू (बसता) नही दिखता। पत्थर (की मूर्ति) ले के अपने गले लटकाए फिरता है। 1। हे भाई ! परमात्मा से टूटा हुआ मनुष्य भटकनों में पड़ के गलत रास्ते पर चलता फिरता है। (मूर्ती पूजा करके) पानी (ही) मथता है।ये व्यर्थ की मेहनत करके आत्मिक मौत सहेड़ता रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! साकत मनुष्य जिस पत्थर को परमात्मा कहता (समझता) रहता है। वह पत्थर (अपने) उस (पुजारी) को भी ले के (पानी में) डूब जाता है। 2। हे पापी ! हे अकृतघ्न ! (जैसे) पत्थर की नाव (नदी से) पार नहीं लांघ सकती (ऐसे ही पत्थर की मूर्ती की पूजा संसार-संमुद्र से पार नहीं लंघा सकती)। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू को मिल के मालिक-प्रभू के साथ गहरी सांझ डाली हुई है। उसको वह करतार पानी में।धरती में आकाश में हर जगह बसता दिखाई देता है। 4। 3। 9।
सूही महला 5 ॥
लालनु राविआ कवन गती री ॥
सखी बतावहु मुझहि मती री ॥1॥
सूहब सूहब सूहवी ॥ अपने प्रीतम कै रंगि रती ॥1॥ रहाउ ॥
पाव मलोवउ संगि नैन भतीरी ॥
जहा पठावहु जांउ तती री ॥2॥
जप तप संजम देउ जती री ॥
इक निमख मिलावहु मोहि प्रानपती री ॥3॥
माणु ताणु अहंबुधि हती री ॥
सा नानक सोहागवती री ॥4॥4॥10॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे सखी ! तूने किस ढंग से सोहाने लाल का मिलाप पाया है। हे सखी ! मुझे भी बता। 1। हे सखी ! आपके मुँह पर लाली भख रही है। आप अपने प्यारे के प्रेम-रंग में रंगी हुई है। 1।रहाउ। हे सखी ! (मुझे भी बता) मैं आपके पैर अपनी आँखों की पुतलियों से मलूँगी। आप मुझे जहाँ भी (किसी काम पर) भेजेगी।मैं वहीं (खुशी से) जाऊँगी। 2। मैं उसके बदले में सारे जप-तप-संजम दे दूँगी। हे सखी ! आँख झपकने जितने समय के लिए ही सही मुझे जिंद का मालिक प्रभू मिला दे।3। जो जीव-स्त्री (किसी भी अपने निहित पदार्थ अथवा उद्यम का) गुमान और आसरा छोड़ देती है।अहंकार वाली बुद्धि त्याग देती है। हे नानक !वह सोहाग-भाग वाली हो जाती है। 4। 4। 10।
सूही महला 5 ॥
तूं जीवनु तूं प्रान अधारा ॥
तुझ ही पेखि पेखि मनु साधारा ॥1॥
तूं साजनु तूं प्रीतमु मेरा ॥
चितहि न बिसरहि काहू बेरा ॥1॥ रहाउ ॥
बै खरीदु हउ दासरो तेरा ॥
तूं भारो ठाकुरु गुणी गहेरा ॥2॥
कोटि दास जा कै दरबारे ॥
निमख निमख वसै तिन॑ नाले ॥3॥
हउ किछु नाही सभु किछु तेरा ॥
ओति पोति नानक संगि बसेरा ॥4॥5॥11॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप ही मेरी जिंद है।आप ही मेरी जिंद का सहारा है। आपको देख के ही मेरा मन धैर्य धरता है। 1। हे प्रभू ! आप ही मेरा सज्जन है। आप ही मेरा प्यारा है (मेहर कर) किसी भी वक्त मन से ना बिसर। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मैं मोल खरीदा हुआ आपका अदना सा सेवक हूँ। आप मेरा बड़ा मालिक है।आप सारे गुणों से भरपूर है।आप बड़े जिगरे वाला है। 2। हे भाई ! वह प्रभू ऐसा है कि करोड़ों सेवक उसके दर पर (गिरे रहते हैं) वह हर वक्त उनके साथ बसता है। 3। मेरी अपनी कोई बिसात नहीं।(मेरे पास जो कुछ भी है) सब कुछ आपका ही बख्शा हुआ है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) ताने-पेटे की तरह परोया हुआ आप ही मेरे साथ बसता है। 4। 5। 11।
सूही महला 5 ॥
सूख महल जा के ऊच दुआरे ॥
ता महि वासहि भगत पिआरे ॥1॥
सहज कथा प्रभ की अति मीठी ॥
विरलै काहू नेत्रहु डीठी ॥1॥ रहाउ ॥
तह गीत नाद अखारे संगा ॥
ऊहा संत करहि हरि रंगा ॥2॥
तह मरणु न जीवणु सोगु न हरखा ॥
साच नाम की अंम्रित वरखा ॥3॥
गुहज कथा इह गुर ते जाणी ॥
नानकु बोलै हरि हरि बाणी ॥4॥6॥12॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! जिस परमात्मा के महल आनंद से भरपूर हैं। और जिसके दरवाजे ऊँचे हैं (भाव।वहाँ आत्मिक आनंद के बिना और किसी विकार आदि की पहुँच नहीं है)। उस (आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली सिफत सालाह) में उस परमात्मा के प्यारे भक्त (ही) बसते हैं1। हे भाई ! आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली प्रभू की सिफत सालाह बड़ी ही रसीली (स्वादिष्ट) है। पर किसी विरले ही मनुष्य ने उसको अपनी आँखों से देखा है (महसूस किया है)। 1।रहाउ। हे भाई ! आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली उस सिफत-सालाह में (मानो) गीत और राग हो रहे होते हैं (उसमें।मानो) दंगल बने होते है। (जहाँ कामादिक पहलवानों से मुकाबला करने की जाच सीखी जाती है)।उस सिफत सालाह में जुड़ के संत जन परमात्मा के मिलाप का आनंद लेते हैं। 2। हे भाई ! सिफत-सालाह में जुड़ने से जनम-मरण का चक्कर नहीं रहता।खुशी-ग़मी नहीं छू सकती। उस अवस्था में सदा-स्थिर प्रभू के आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की बरखा होती रहती है। 3। हे भाई ! (सिफत सालाह के बारे में) ये भेद की बात (नानक ने) गुरू के पास से समझी है (तभी तो) नानक परमात्मा की सिफत-सालाह की बाणी उचारता रहता है। 4। 6। 12।
सूही महला 5 ॥
जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥
भेटत संगि इहु भवजलु तारे ॥1॥
ओइ साजन ओइ मीत पिआरे ॥
जो हम कउ हरि नामु चितारे ॥1॥ रहाउ ॥
जा का सबदु सुनत सुख सारे ॥
जा की टहल जमदूत बिदारे ॥2॥
जा की धीरक इसु मनहि सधारे ॥
जा कै सिमरणि मुख उजलारे ॥3॥
प्रभ के सेवक प्रभि आपि सवारे ॥
सरणि नानक तिन॑ सद बलिहारे ॥4॥7॥13॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! (वह संत जन ही मेरे प्यारे मित्र हैं) जिनके दर्शनों से करोड़ों पाप उतर जाते हैं। (जिन के चरणों) को छूने से संसार-समुंदर से पार लांध जाया जाता है। 1। वह (ही) मेरे प्यारे मित्र हैं वह (ही) मेरे सज्जन हैं। हे भाई ! जो (संत जन) मुझे परमात्मा का नाम याद करवाते हैं । 1।रहाउ। हे भाई ! (वही हैं मेरे मित्र) जिनके वचन सुन के सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं। जिनकी टहल करने से जमदूत (भी) नाश हो जाते हैं। 2। हे भाई ! (वही हैं मेरे मित्र) जिन के द्वारा (दिया हुआ) धीरज (मेरे) इस मन को सहारा देता है। जिन (के दिए हुए हरी-नाम) के सिमरन से (लोक-परलोक में) मुँह उज्जवल होता है। 3। हे नानक ! प्रभू ने स्वयं ही अपने सेवकों का जीवन सुंदर बना दिया है। हे भाई ! उन सेवकों की शरण पड़ना चाहिए।उन पर से सदा कुर्बान होना चाहिए। 4। 7। 13।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कृपा कर के मुझे गुरमुखों की संगति बख्श।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।