अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू! तूने अपने आप को (जगत रूप में) स्वयं ही प्रगट किया है। (ये आपसे अलग दिखाई देता) माया का जगत तमाशा तूने स्वयं ही बना के दिखा दिया है। (हे भाई!) हर जगह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा ही मौजूद है। जिस पर वह मेहर करता है, उसको (यह भेद) समझा देता है।20। जिस मनुष्य ने गुरू की कृपा से (परमात्मा की सर्व व्यापकता का भेद) पा लिया है, उसके हृदय में से प्रभू ने माया का मोह दूर कर दिया है। प्रभू अपनी मेहर करके खुद ही उसको अपने में लीन कर लेता है।21। हे प्रभू! आप ही (गोकुल की) गोपी है, आप स्वयं ही (यमुना) नदी है, आप स्वयं ही (गोकुल का) ग्वाला है। तूने स्वयं ही (कृष्ण रूप हैं के) धरती (गौवर्धन पर्वत) उठाई थी। आप अपने हुकम में स्वयं ही जीवों के शरीर सजाता है, आप खुद ही नाश करता है, आप खुद ही पैदा करता है।22। जिन (भाग्यशाली) मनुष्यों ने गुरू के साथ प्यार डाला है, उन्होंने अपने अंदर से माया का प्यार दूर कर लिया है। उन लोगों की आत्मिक ज्योति पवित्र हो जाती है। वह अपना जन्म स्वच्छ करके (जगत से) जाते हैं।23। हे प्रभू! आपके सदा कायम रहने वाले गुण (आपकी मेहर से) मैं दिन रात सलाहता हूँ। हे नानक! कह, प्रभू (जीवों के) मांगने के बिनां ही हरेक दात बख्शने वाला है। (हे भाई!) उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभू को अपने हृदय में बसाए रख।24।1।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: श्रीरागु महला 5 ॥ (हे भाई!) मैं (गुरू के) चरणों में लग के उस (परमात्मा) को प्रसन्न करने का प्रयत्न करता हूँ। गुरू पुरुष ने (मुझे) परमात्मा मिलाया है। (अब मुझे समझ आई है कि) उस परमात्मा के बराबर और कोई नहीं।1।रहाउ। सृष्टि का मालिक मेरा (प्रभू) बहुत प्यारा है। (मुझे अपने) माता-पिता से भी ज्यादा मीठा लग रहा है। (हे प्रभु!) बहिन भाई व अन्य सारे साक-संबंधी (मैंने देख लिए हैं), आपके बराबर का और कोई (हित करने वाला) नहीं।1। (हे प्रभू!) आपके हुकम में ही (गुरू से मिलाप हुआ। मानो, मेरे वास्ते) सावन का महीना आ गया। (गुरू की कृपा से) मैंने उच्च आचरण बनाने का हल जोत दिया। मैं यह आस करके आपका नाम (अपने हृदय रूपी खेत में) बीजने लग पड़ा कि आपकी बख्शिशों का बोहल (अन्न का ढेर) इकट्ठा हैं जाएगा।2। (हे प्रभू!) गुरू को मिल के मैंने सिर्फ आपके नाम के साथ सांझ डाली है। मैं आपके नाम के बिनां और कोई लेखा लिखना नहीं जानता। हे हरी! तूने मुझे (अपना नाम सिमरने के ही) एक ही काम में जोड़ दिया है। अब जैसे आपकी रजा हो, इस काम को सरअंजाम दे।3। हे मेरे सत्संगी भाईयो! आप भी (गुरू की शरण में आ के) प्रभू के नाम रस का आनंद लो। मुझे गुरू ने परमात्मा की दरगाह में सिरोपा (आदर का प्रतीक कपड़ा) पहिना दिया है (आदर दिलवा दिया है, क्योंकि) मैं अब अपने शरीर का चौधरी (मुखिया) बन गया हूँ, (गुरू की मेहर से) मैंने (कामादिक) पाँचों ही विरोध करने वालों को ला बैठाया है।4। हे नानक! (कह, हे मेरे प्रभू!) मैं आपकी शरण आया हूँ। (आपकी मेहर से) पाँचों (ज्ञानेन्द्रियां) किसान मेरे मुजारे बन गए हैं (मेरे कहे में चलते हैं)। कोई (भी ज्ञानेंद्रिय रूपी किसान मुझसे आकी हो के) सिर नहीं उठा सकता। अब मेरा शरीर रूपी नगर (भले गुणों की) संघनी आबादी से बस गया है।5। (हे मेरे शाह-प्रभू!) मैं आपसे सदके जाता हूँ, मैं तूझसे कुर्बान जाता हूँ। में सिर्फ आपको ही अपने दिल में टिकाए बैठा हूँ। (हे मेरे शाह प्रभू!) मैं आपसे कुर्बान जाता हूँ तूने मेरा उजड़ा हुआ थेह हुआ हृदय-घर बसा दिया है।6। (हे भाई!) मैं अब सदा सदा प्यारे हरि को ही सिमरता हूँ। अपने मन में मैं जो इच्छा धारे बैठा था, वह नाम फल अब मैंने पा लिया है। उस (प्रभू) ने मेरे सारे काम सवार दिए हैं, मेरे मन की माया वाली भूख उसने दूर कर दी है।7। (हे भाई! सिमरन की बरकति से) मैंने दुनिया वाला सारा लालच छोड़ दिया है। मैं सदा स्थिर रहने वाले सृष्टि के मालिक प्रभू को ही सिमरता रहता हूँ। (अब) परमात्मा का नाम खजाना ही (मेरे वास्ते) जगत के नौ खजाने हैं, मैंने उस नाम धन को अपने (हृदय के) पल्ले में कस के बांध लिया है।8। (उसकी बरकति से) मैं (दुनिया के) सारे सुखों से बढ़िया उत्तम आत्मिक सुख ढूँढ लिया है। गुरू ने मेरे दिल में परमात्मा की सिफत-सालाह का शबद बसा दिया है गुरू पुरख ने सिर पर अपना (मेहर भरा) हाथ रख के मुझे (परमात्मा का) दर्शन करा दिया है।9। उनकी संगति में बैठना मैंने धर्मशाला बनायी है। गुरू के सिखों को मैं (यत्न से) ढूँढ के मिलता हूँ। (जो गुरसिख मिल जाए) मैं (जरूरत के मुताबिक) उसके पैर धोता हूं, उसको पंखे से खुद हवा देता हूँ। मैं पूरे अदब से उसकी पैरीं लगता हूँ।10।
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू! तूने अपने आप को (जगत रूप में) स्वयं ही प्रगट किया है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।