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अंग 738

अंग
738
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
खिनु रहनु न पावउ बिनु पग पागे ॥
होइ क्रिपालु प्रभ मिलह सभागे ॥3॥
भइओ क्रिपालु सतसंगि मिलाइआ ॥
बूझी तपति घरहि पिरु पाइआ ॥
सगल सीगार हुणि मुझहि सुहाइआ ॥
कहु नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥4॥
जह देखा तह पिरु है भाई ॥
खोलि॑ओ कपाटु ता मनु ठहराई ॥1॥ रहाउ दूजा ॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: उस प्रभू-पति के चरणों में पड़े बिना मुझे एक छिन के लिए भी शांति प्राप्त नहीं होती।(हाँ। हे सखी !) अगर वह खुद दयावान हो।तो ही जीव-सि्त्रयों के सौभाग्य जागने से उस प्रभू को मिल सकती हैं। 3। प्रभू मेरे पर दयावान हो गया है।मुझे उसने सत्संग में मिला दिया है। मेरी (विकारों की) तपश मिट गई है।मैंने उस पति-प्रभू को हृदय-गृह में ही पा लिया है। अब मुझे (अपने) सारे श्रंृगार (उद्यम) सुंदर लग रहे हैं। हे नानक ! कह, गुरू ने मेरी भटकना दूर कर दी है। 4। अब मैं जिधर देखता हूँ।मुझे प्रभू ही दिखता है। हे भाई ! (गुरू ने मेरे अंदर से) भ्रम का पर्दा उतार दिया है।मेरा मन टिक गया है। 1।रहाउ दूजा। 5।
सूही महला 5 ॥
किआ गुण तेरे सारि सम॑ाली मोहि निरगुन के दातारे ॥
बै खरीदु किआ करे चतुराई इहु जीउ पिंडु सभु थारे ॥1॥
लाल रंगीले प्रीतम मनमोहन तेरे दरसन कउ हम बारे ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभु दाता मोहि दीनु भेखारी तुम॑ सदा सदा उपकारे ॥
सो किछु नाही जि मै ते होवै मेरे ठाकुर अगम अपारे ॥2॥
किआ सेव कमावउ किआ कहि रीझावउ बिधि कितु पावउ दरसारे ॥
मिति नही पाईऐ अंतु न लहीऐ मनु तरसै चरनारे ॥3॥
पावउ दानु ढीठु होइ मागउ मुखि लागै संत रेनारे ॥
जन नानक कउ गुरि किरपा धारी प्रभि हाथ देइ निसतारे ॥4॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ मुझ गुणहीन के हे दातार ! मैं आपके कौन-कौन से गुण याद कर-कर के अपने दिल में बसाऊँ। (मैं तो आपका मूल्य खरीदा हुआ सेवक हूँ) मूल्य खरीदा हुआ नौकर कोई चालाकी भरी बात नहीं कर सकता।(हे दातार !् मेरा) ये शरीर और मेरी ये जिंद सब आपके ही दिए हुए हैं। 1। हे चोजी लाल ! हे प्रीतम ! हे मन को मोह लेने वाले ! हम जीव आपके दर्शनों को कुर्बान हैं। 1।रहाउ। (हे दातार !) आप मालिक है।दातें देने वाला है।मैं (आपके दर पर) कंगाल मंगता हूँ।आप सदा ही।आप हमेशा ही मेरे ऊपर मेहरवानियाँ करता है। हे मेरे अपहुँच और बेअंत मालिक ! कोई ऐसा काम नहीं जो (बग़ैर आपकी मदद के) मुझसे हैं सके। 2। हे प्रभू ! मैं आपकी कौन सी सेवा करूं।मैं क्या कह के आपको प्रसन्न करूँ।मैं किस तरह आपके दीदार हासिल करूँ। आपकी हस्ती का नाप नहीं पाया जा सकता।आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।मेरा मन सदा आपके चरणों में पड़े रहने को तरसता है। 3। हे प्रभू ! मैं ढीठ हो के (बार-बार आपके दर से) माँगता हूँ।मुझे ये दान मिल जाए कि मेरे माथे पर आपके संत जनों के चरणों की धूल लगती रहे। हे नानक ! (कह) जिस दास पर गुरू ने मेहर कर दी।प्रभू ने (उसको अपना) हाथ दे के (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लिया। 4। 6।
सूही महला 5 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेवा थोरी मागनु बहुता ॥
महलु न पावै कहतो पहुता ॥1॥
जो प्रिअ माने तिन की रीसा ॥
कूड़े मूरख की हाठीसा ॥1॥ रहाउ ॥
भेख दिखावै सचु न कमावै ॥
कहतो महली निकटि न आवै ॥2॥
अतीतु सदाए माइआ का माता ॥
मनि नही प्रीति कहै मुखि राता ॥3॥
कहु नानक प्रभ बिनउ सुनीजै ॥
कुचलु कठोरु कामी मुकतु कीजै ॥4॥
दरसन देखे की वडिआई ॥
तुम॑ सुखदाते पुरख सुभाई ॥1॥ रहाउ दूजा ॥1॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 घरु 3 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! ये मूर्ख काम तो थोड़ा करता है।पर उसके बदले में इसकी माँग बहुत ज्यादा है। प्रभू के चरणों तक पहुँच तो हासिल कर नहीं सकता।पर कहता है कि मैं (प्रभू की हजूरी में) पहुँचा हुआ हूँ। 1। ये उनकी नकल करता है जो प्यारे प्रभू के दर से सत्कार हासिल कर चुके हैं। हे भाई ! झूठे मूर्ख मनुष्य के हठ की बात (सुन)।1।रहाउ। (हे भाई ! झूठा मूर्ख औरों को अपने धर्मी होने के निरे) भेष दिखा रहा है।सदा-स्थिर प्रभू के नाम-सिमरन की कमाई नहीं करता। मुँह से कहता है कि मैं हजूरी में पहुँचा हुआ हूँ।पर (प्रभू-चरणों के कहीं) नजदीक भी नहीं पहुँचा। 2। (हे भाई ! देख मूर्ख के हठ की बात ! ये अपने आप को) त्यागी कहलवाता है पर माया (की लालसा) में मस्त रहता है। (इसके) मन में (प्रभू चरणों का) प्यार नहीं।पर मुँह से कहता है कि मैं (प्रभू के प्रेम-रंग में) रंगा हुआ हूँ। 3। हे नानक ! कह,हे प्रभू ! मेरी विनती सुन (जीव बेचारा कुछ करने के लायक नहीं। ये) दुष्कर्मी है।निर्दयी है।विषयी है (फिर भी आपका) है इसको इन विकारों से खलासी बख्श। 4। (हम जीवों को) यह महिमा बख्श कि आपके दर्शन कर सकें। हे पुरख प्रभू ! आप सब सुख देने के योग्य है।आप प्यार भरपूर है।1।रहाउ दूजा। 1। 7।
सूही महला 5 ॥
बुरे काम कउ ऊठि खलोइआ ॥
नाम की बेला पै पै सोइआ ॥1॥
अउसरु अपना बूझै न इआना ॥
माइआ मोह रंगि लपटाना ॥1॥ रहाउ ॥
लोभ लहरि कउ बिगसि फूलि बैठा ॥
साध जना का दरसु न डीठा ॥2॥
कबहू न समझै अगिआनु गवारा ॥
बहुरि बहुरि लपटिओ जंजारा ॥1॥ रहाउ ॥
बिखै नाद करन सुणि भीना ॥
हरि जसु सुनत आलसु मनि कीना ॥3॥
द्रिसटि नाही रे पेखत अंधे ॥
छोडि जाहि झूठे सभि धंधे ॥1॥ रहाउ ॥
कहु नानक प्रभ बखस करीजै ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे भाई ! मूर्ख मनुष्य बुरे काम करने के लिए (तो) जल्दी तैयार हो जाता है। पर परमात्मा का नाम सिमरन के वक्त (अमृत बेला में) लंबी तान के पड़ा रहता है (बेपरवाह हो के सोया रहता है)। 1। हे भाई ! आप ये नहीं समझता कि ये मानस जीवन ही अपना असली मौका है (जब प्रभू को याद किया जा सकता है)। मूर्ख मनुष्य माया के मोह की लगन में मस्त रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! (अंदर उठ रही) लोभ की लहर के कारण (माया के लाभ की आस पर) खुश हो के फूल-फूल बैठता है। कभी संत-जनों के दर्शन भी नहीं करता। 2। हे भाई ! आत्मिक जीवन की समझ से वंचित मूर्ख मनुष्य (अपने असल भले की बात) कभी नहीं समझता। बार-बार (माया के) धंधों में व्यस्त रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! (माया के मोह में अंधा हुआ मनुष्य) विषौ-विकारों के गीत कानों से सुन-सुन के प्रसन्न होता है।पर। परमात्मा की सिफत सालाह सुनने से मन में आलस करता है। 3। हे अंधे ! आप आँखों से (क्यों) नहीं देखता कि ये सारे (दुनिया वाले) घंधे छोड़ के (आप आखिर। यहाँ से) चला जाएगा। 1।रहाउ। हे नानक ! कह,हे प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस प्रभू-पति के चरणों में पड़े बिना मुझे एक छिन के लिए भी शांति प्राप्त नहीं होती।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।