होइ क्रिपालु प्रभ मिलह सभागे ॥3॥
भइओ क्रिपालु सतसंगि मिलाइआ ॥
बूझी तपति घरहि पिरु पाइआ ॥
सगल सीगार हुणि मुझहि सुहाइआ ॥
कहु नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥4॥
जह देखा तह पिरु है भाई ॥
खोलि॑ओ कपाटु ता मनु ठहराई ॥1॥ रहाउ दूजा ॥5॥
किआ गुण तेरे सारि सम॑ाली मोहि निरगुन के दातारे ॥
बै खरीदु किआ करे चतुराई इहु जीउ पिंडु सभु थारे ॥1॥
लाल रंगीले प्रीतम मनमोहन तेरे दरसन कउ हम बारे ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभु दाता मोहि दीनु भेखारी तुम॑ सदा सदा उपकारे ॥
सो किछु नाही जि मै ते होवै मेरे ठाकुर अगम अपारे ॥2॥
किआ सेव कमावउ किआ कहि रीझावउ बिधि कितु पावउ दरसारे ॥
मिति नही पाईऐ अंतु न लहीऐ मनु तरसै चरनारे ॥3॥
पावउ दानु ढीठु होइ मागउ मुखि लागै संत रेनारे ॥
जन नानक कउ गुरि किरपा धारी प्रभि हाथ देइ निसतारे ॥4॥6॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेवा थोरी मागनु बहुता ॥
महलु न पावै कहतो पहुता ॥1॥
जो प्रिअ माने तिन की रीसा ॥
कूड़े मूरख की हाठीसा ॥1॥ रहाउ ॥
भेख दिखावै सचु न कमावै ॥
कहतो महली निकटि न आवै ॥2॥
अतीतु सदाए माइआ का माता ॥
मनि नही प्रीति कहै मुखि राता ॥3॥
कहु नानक प्रभ बिनउ सुनीजै ॥
कुचलु कठोरु कामी मुकतु कीजै ॥4॥
दरसन देखे की वडिआई ॥
तुम॑ सुखदाते पुरख सुभाई ॥1॥ रहाउ दूजा ॥1॥7॥
बुरे काम कउ ऊठि खलोइआ ॥
नाम की बेला पै पै सोइआ ॥1॥
अउसरु अपना बूझै न इआना ॥
माइआ मोह रंगि लपटाना ॥1॥ रहाउ ॥
लोभ लहरि कउ बिगसि फूलि बैठा ॥
साध जना का दरसु न डीठा ॥2॥
कबहू न समझै अगिआनु गवारा ॥
बहुरि बहुरि लपटिओ जंजारा ॥1॥ रहाउ ॥
बिखै नाद करन सुणि भीना ॥
हरि जसु सुनत आलसु मनि कीना ॥3॥
द्रिसटि नाही रे पेखत अंधे ॥
छोडि जाहि झूठे सभि धंधे ॥1॥ रहाउ ॥
कहु नानक प्रभ बखस करीजै ॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस प्रभू-पति के चरणों में पड़े बिना मुझे एक छिन के लिए भी शांति प्राप्त नहीं होती।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।