जिस नो लाइ लए सो लागै ॥ गिआन रतनु अंतरि तिसु जागै ॥ दुरमति जाइ परम पदु पाए ॥ गुर परसादी नामु धिआए ॥3॥ दुइ कर जोड़ि करउ अरदासि ॥ तुधु भावै ता आणहि रासि ॥ करि किरपा अपनी भगती लाइ ॥ जन नानक प्रभु सदा धिआइ ॥4॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! वही मनुष्य प्रभू (के चरणों) में लीन होता है।जिसको प्रभू स्वयं (अपने चरणों में) जोड़ता है। उस मनुष्य के अंदर रत्न (जैसे कीमती) आत्मिक जीवन की सूझ उघड़ पड़ती है। (उस मनुष्य के अंदर से) खोटी मति दूर हो जाती है। वह उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेता है। गुरू की कृपा से वह परमात्मा का नाम सिमरता रहता है। 3। हे दास नानक ! (कह,हे प्रभू !) मैं (अपने) दोनों हाथ जोड़ के (आपके दर पे) अरदास करता हूँ। जब आपको ठीक लगे (आपकी रजा हो) तब ही आप उस अरदास को सफल करता है। हे भाई ! कृपा करके परमात्मा (जिस मनुष्य को) अपनी भक्ति में जोड़ता है। वह उसको सदा सिमरता रहता है। 4। 2।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे सखिए ! वह जीव-स्त्री सराहनीय है।सोहाग भाग वाली है।जो प्रभू-पति के साथ सांझ बनाती है। जो अहंकार छोड़ के प्रभू-पति का हुकम मानती रहती है। वह जीव-स्त्री प्रभू पति (के प्यार-रंग) में रंगी हुई उसके मिलाप का आत्मिक आनन्द लेती रहती है। 1। हे सखिए ! परमात्मा को मिलने की निशानी (मुझसे) सुन ले। (वह निशानी वह तरीका ये है कि) लोक-लाज की खातिर काम करने छोड़ के अपना मन अपना शरीर परमात्मा के हवाले कर दे। 1।रहाउ। (एक सत्संगी) सहेली (दूसरी सत्संगी) सहेली को (प्रभू-पति के मिलाप के तरीके के बारे में) समझाती है (और कहती है कि) जो जीव-स्त्री वही कुछ करती है जो प्रभू-पति को पसंद आ जाता है। वह सोहाग-भाग वाली जीव-स्त्री उस प्रभू के चरणों में लीन रहती है। 2। (पर) जो जीव-स्त्री अहंकार में फसी रहती है।वह प्रभू-पति के चरणों में जगह प्राप्त नहीं कर सकती। जब (जिंदगी की) रात बीत जाती है।तब वह पछताती है। अपने मन के पीछे चलने वाली वह दुर्भाग्यपूर्ण जीव-स्त्री सदा दुख पाती रहती है। 3। हे भाई ! (लोक-लाज की खातिर मैं तब ही परमात्मा के दर पर) अरदास करूँ।अगर मैं उसको कहीं दूर बसता समझूँ। वह नाश-रहित परमात्मा तो हर जगह व्यापक है। दास नानक (तो उसको अपने) अंग-संग (बसता) देख के उसकी सिफत सालाह करता है। 4। 3।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ (हे सखी !) उस पति-प्रभू ने गुरू के द्वारा (मेरा) शरीर-घर (मेरे) बस में कर दिया है (अब) मैं (उसकी कृपा से इस) घर की मलिका बन गई हूँ। उस पति ने दसों ही इन्द्रियों को मेरी दासियां बना दिया है। (उच्च आत्मिक गुणों वाला) मैंने अपने शरीर-घर का सारा समान जोड़ के (सजा के) रख दिया है। अब मैं प्रभू-पति के दर्शनों की आस और तमन्ना में उसका इन्तजार कर रही हूँ। 1। (हे सखी !) प्रभू-कंत के मैं कौन-कौन से गुण बताऊँ। सुघड़।सुंदर दयावान। परमात्मा है 1।रहाउ। (हे सखी ! पति-प्रभू की कृपा से ही) स्वच्छ आचरण को मैंने (अपने जीवन का) श्रृंगार बना लिया है।उसके डर-अदब (का) मैंने (आँखों में) सुरमा डाल लिया है। (उसकी मेहर से ही) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-धन मैंने मुँह से खाया है। हे सखी !उसके कंगन।कपड़े।गहने।सुंदर लगने लग जाते हैं (सारे धार्मिक उद्यम सफल हो जाते हैं)। जब प्रभू-पति हृदय-घर में आ बसता है। तब जीव-स्त्री सारे सुख हासिल कर लेती है।2। हे सखी !गुणों के टूणे बना के उसने प्रभू-पति को खुश कर लिया। गुरू ने (जिस जीव-स्त्री की) भटकना दूर कर दी।उसने प्रभू-पति को अपने वश में कर लिया। (हे सखी ! उस पति-प्रभू की कृपा से ही) मेरा हृदय-घर सब (वासनाओं) से ऊपर हो गया है। और सारी सि्त्रयों को छोड़ के वह प्रीतम मेरा प्यारा बन गया है। 3। हे सखी ! (उस संत की कृपा से मेरे अंदर आत्मिक जीवन का) सूर्य उदय हो गया है।(आत्मिक जीवन की) ज्योति जग पड़ी है। बेअंत प्रभू की श्रद्धा की सेज मैंने बिछा दी है (मेरे हृदय में प्रभू के लिए पूरी श्रद्धा बन गई है)। (अब अपनी मेहर से ही) वह नित्य नए प्यार वाला प्रीतम मेरे हृदय की सेज पर आ बैठा है। हे दास नानक ! (कह) प्रभू-पति को मिल के जीव-स्त्री आत्मिक आनंद पाती है। 4। 4।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे सखी !मेरा हृदय प्रभू के मिलने के लिए खुशी से नाच उठा। (प्रभू को) तलाशने चढ़ पड़ा (कि) मैं प्यारे के रहने वाली जगह (कहीं) देख लूँ। प्यारे का सनेहा सुन के मैंने हृदय-गृह की सेज बिछा दी। (पर) भटक-भटक के वापस आ गया।तब (प्रभू की मेहर की) निगाह हासिल ना हुई। 1। (आपके दर्शनों के बिना) मेरा ये निमाणा दिल कैसे धीरज धरे। हे सज्जन प्रभू ! (मुझे) मिल।मैं आपसे सदके जाती हूँ। 1।रहाउ। हे सखी ! जीव-स्त्री और प्रभू-पति की एक ही सेज (जीव-स्त्री के दिल में) बिछी हुई है; पर जीव स्त्री (सदा माया के मोह की नींद में) सोई रहती है।प्रभू-पति सदा जागता रहता है (माया के प्रभाव से ऊपर रहता है) जीव-स्त्री यूँ मस्त रहती है जैसे इसने शराब पी हुई हो। (हाँ) जीव स्त्री जाग भी सकती है।अगर प्रभू-पति खुद जगाए। 2। हे सखी ! (उम्र के) बहुत सारे दिन बीत गए हैं।अब) मैं (बाहर ढूँढ-ढूँढ के) निराश हो गई हूँ। में (बाहर) और और सारे देश तलाश के देख लिए हैं (पर बाहर प्रभू-पति कहीं नहीं मिला।
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! वही मनुष्य प्रभू (के चरणों) में लीन होता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।