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सूही
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गुर परसादी को विरला छूटै तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥3॥
गुर परसादी को विरला छूटै तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥3॥
जिनि सिसटि साजी सोई हरि जाणै ता का रूपु अपारो ॥
नानक आपे वेखि हरि बिगसै गुरमुखि ब्रहम बीचारो ॥4॥3॥14॥
जिनि सिसटि साजी सोई हरि जाणै ता का रूपु अपारो ॥
नानक आपे वेखि हरि बिगसै गुरमुखि ब्रहम बीचारो ॥4॥3॥14॥
हिन्दी अर्थ: कोई विरला मनुष्य गुरू की कृपा से (इस अहंम् रोग से) खलासी पाता है। मैं (ऐसे) उस मनुष्य के सदके जाता हूँ। 3। हे भाई ! जिस परमात्मा ने ये सारी सृष्टि पैदा की है। वह खुद ही (इसके रोग को) जानता है (और। दूर करता है)।उस परमात्मा का स्वरूप किसी भी हदबंदी से परे है। हे नानक ! वह परमात्मा खुद ही (अपनी रची सृष्टि को) देख के खुश होता है। गुरू की शरण पड़ कर ही परमात्मा के गुणों की समझ आती है। 4। 3। 14।
कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥
सूही महला 4 ॥
कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥
आपणा कीता किछू न होवै जिउ हरि भावै तिउ रखीऐ ॥1॥
मेरे हरि जीउ सभु को तेरै वसि ॥
असा जोरु नाही जे किछु करि हम साकह जिउ भावै तिवै बखसि ॥1॥ रहाउ ॥
सभु जीउ पिंडु दीआ तुधु आपे तुधु आपे कारै लाइआ ॥
जेहा तूं हुकमु करहि तेहे को करम कमावै जेहा तुधु धुरि लिखि पाइआ ॥2॥
पंच ततु करि तुधु स्रिसटि सभ साजी कोई छेवा करिउ जे किछु कीता होवै ॥
इकना सतिगुरु मेलि तूं बुझावहि इकि मनमुखि करहि सि रोवै ॥3॥
हरि की वडिआई हउ आखि न साका हउ मूरखु मुगधु नीचाणु ॥
जन नानक कउ हरि बखसि लै मेरे सुआमी सरणागति पइआ अजाणु ॥4॥4॥15॥24॥
कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥
आपणा कीता किछू न होवै जिउ हरि भावै तिउ रखीऐ ॥1॥
मेरे हरि जीउ सभु को तेरै वसि ॥
असा जोरु नाही जे किछु करि हम साकह जिउ भावै तिवै बखसि ॥1॥ रहाउ ॥
सभु जीउ पिंडु दीआ तुधु आपे तुधु आपे कारै लाइआ ॥
जेहा तूं हुकमु करहि तेहे को करम कमावै जेहा तुधु धुरि लिखि पाइआ ॥2॥
पंच ततु करि तुधु स्रिसटि सभ साजी कोई छेवा करिउ जे किछु कीता होवै ॥
इकना सतिगुरु मेलि तूं बुझावहि इकि मनमुखि करहि सि रोवै ॥3॥
हरि की वडिआई हउ आखि न साका हउ मूरखु मुगधु नीचाणु ॥
जन नानक कउ हरि बखसि लै मेरे सुआमी सरणागति पइआ अजाणु ॥4॥4॥15॥24॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई ! जो कुछ जगत में बना है जो कुछ कर रहा है। ये सब रजा का मालिक परमात्मा कर रहा है। हम जीव (तब ही) कुछ करें। अगर कुछ कर सकते हों। हम जीवों का किया कुछ नहीं हो सकता। जैसे परमात्मा को अच्छा लगता है। वैसे जीवों को रखता है। 1। हे मेरे प्रभू जी ! हरेक जीव आपके बस में हैं। हम जीवों में को समर्थता नहीं कि (आपसे परे) कुछ कर सकें। हे प्रभू ! आपको जैसे अच्छा लगे। हम पर मेहर कर। 1।रहाउ। हे प्रभू ! ये जिंद। ये शरीर। सब कुछ (हरेक जीव को) आपने खुद ही दिया है। आपने स्वयं ही (हरेक जीव को) काम में लगाया हुआ है। जैसा हुकम आप करते हैं। जीव वैसा ही काम करता है (जीव वैसा ही बनता है) जैसा आपने धुर-दरगाह से (उसके माथे पर) लेख लिख के रख दिया है। 2। हे प्रभू ! आपने पाँच तत्व बना के सारी दुनिया पैदा की है। अगर (आपसे बाहर) जीव से कुछ हो सकता हैं। तो वह बेशक छेवाँ तत्व (ही) बना कर दिखा दे। हे प्रभू ! कई जीवों को आप गुरू मिला के आत्मिक जीवन की सूझ बख्शते हैं। कई जीवों को आप अपने मन के पीछे चलने वाला बना देते हैं। फिर वह (अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य) दुखी होता रहता है। 3। हे भाई ! मैं (तो) मूर्ख हूँ। नीच जीवन वाला हूँ। मैं परमात्मा की बुजुर्गी बयान नहीं कर सकता। हे हरी ! दास नानक पर मेहर कर। (ये) अंजान दास आपकी शरण आ पड़ा है। 4। 4। 15। 24।
बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥
रागु सूही महला 5 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥
नाना रूप भेख दिखलाई ॥
सांगु उतारि थंमि॑ओ पासारा ॥
तब एको एकंकारा ॥1॥
कवन रूप द्रिसटिओ बिनसाइओ ॥
कतहि गइओ उहु कत ते आइओ ॥1॥ रहाउ ॥
जल ते ऊठहि अनिक तरंगा ॥
कनिक भूखन कीने बहु रंगा ॥
बीजु बीजि देखिओ बहु परकारा ॥
फल पाके ते एकंकारा ॥2॥
सहस घटा महि एकु आकासु ॥
घट फूटे ते ओही प्रगासु ॥
भरम लोभ मोह माइआ विकार ॥
भ्रम छूटे ते एकंकार ॥3॥
ओहु अबिनासी बिनसत नाही ॥
ना को आवै ना को जाही ॥
गुरि पूरै हउमै मलु धोई ॥
कहु नानक मेरी परम गति होई ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥
नाना रूप भेख दिखलाई ॥
सांगु उतारि थंमि॑ओ पासारा ॥
तब एको एकंकारा ॥1॥
कवन रूप द्रिसटिओ बिनसाइओ ॥
कतहि गइओ उहु कत ते आइओ ॥1॥ रहाउ ॥
जल ते ऊठहि अनिक तरंगा ॥
कनिक भूखन कीने बहु रंगा ॥
बीजु बीजि देखिओ बहु परकारा ॥
फल पाके ते एकंकारा ॥2॥
सहस घटा महि एकु आकासु ॥
घट फूटे ते ओही प्रगासु ॥
भरम लोभ मोह माइआ विकार ॥
भ्रम छूटे ते एकंकार ॥3॥
ओहु अबिनासी बिनसत नाही ॥
ना को आवै ना को जाही ॥
गुरि पूरै हउमै मलु धोई ॥
कहु नानक मेरी परम गति होई ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 5 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! जैसे किसी बाजीगर ने (कभी) बाजी डाल के दिखाई हो। वह कई किस्मों के रूप और भेष दिखाता है (इसी तरह परमात्मा ने ये जगत-तमाशा रचा हुआ है। इसमें अनेकों रूप और भेष दिखा रहा है)। जब प्रभू अपनी ये (जगत-रूपी) नकली-शक्ल उतार के खेल का पसारा रोक देता है। तब स्वयं ही स्वयं रह जाता है। 1। हे भाई ! (परमात्मा के) अनेकों ही रूप दिखते रहते हैं। अनेकों ही रूप् नाश होते रहते हैं। (कोई नहीं बता सकता है कि) जीव कहाँ से आया था। और कहाँ चला जाता है। 1।रहाउ। हे भाई ! पानी से अनेकों लहरें उठती हैं (दोबारा पानी में मिल जाती हैं)। सोने से कई किस्मों के गहने घड़े जाते हैं (वे असल में होते तो सोना ही हैं)। (किसी वृक्ष का) बीज बीज के (शाखा-पत्ते आदि उसके) कई किस्मों में स्वरूप देखने को मिलता है। (वृक्ष के) फल पकने पर (वही पहली किस्म का बीज बन जाता है) (वैसे ही इस बहुरंगी संसार का असल) एक परमात्मा ही है। 2। हे भाई ! एक ही आकाश (पानी से भरे हुए) हजारों घड़ों में (अलग-अलग दिखता है)। जब घड़े टूट जाते हैं। तो वह (आकाश) ही दिखाई देता रह जाता है। माया के भ्रम के कारण (परमात्मा की अंश जीवात्मा में) भटकना। लोभ-मोह आदि विकार उठते हैं। भ्रम मिट जाने के कारण एक परमात्मा का ही रूप हो जाता है। 3। हे भाई ! वह परमात्मा नाश-रहित है। उसका कभी नाश नहीं होता। (वह प्रभू जीवात्मा रूप हो के भी) ना कोई आत्मा पैदा होती है। ना कोई आत्मा मरती है। हे नानक ! कह,पूरे गुरू ने (मेरे अंदर से) अहंकार की मैल धो दी है। अब मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था बन गई है (और। मुझे ये जगत उस परमात्मा का अपना ही रूप दिख रहा है)। 4। 1।
कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥
सूही महला 5 ॥
कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥
तुझ बिनु दूजा नाही कोइ ॥
जो जनु सेवे तिसु पूरन काज ॥
दास अपुने की राखहु लाज ॥1॥
तेरी सरणि पूरन दइआला ॥
तुझ बिनु कवनु करे प्रतिपाला ॥1॥ रहाउ ॥
जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरि ॥
निकटि वसै नाही प्रभु दूरि ॥
लोक पतीआरै कछू न पाईऐ ॥
साचि लगै ता हउमै जाईऐ ॥2॥
कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥
तुझ बिनु दूजा नाही कोइ ॥
जो जनु सेवे तिसु पूरन काज ॥
दास अपुने की राखहु लाज ॥1॥
तेरी सरणि पूरन दइआला ॥
तुझ बिनु कवनु करे प्रतिपाला ॥1॥ रहाउ ॥
जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरि ॥
निकटि वसै नाही प्रभु दूरि ॥
लोक पतीआरै कछू न पाईऐ ॥
साचि लगै ता हउमै जाईऐ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे प्रभू ! जो कुछ आप करना चाहते हैं। (जगत में) वही कुछ होता है। (क्योंकि) आपके बिना (कुछ कर सकने वाला) और कोई नहीं। जो सेवक आपकी शरण आता है। उसके सारे काम सफल हो जाते हैं। आप अपने सेवक की इज्जत खुद रखते हैं। 1। हे सदा दयावान रहने वाले प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। आपके बिना हम जीवों की पालना और कोई नहीं कर सकता। 1।रहाउ। हे भाई ! पानी में। धरती में। आकाश में। हर जगह परमात्मा मौजूद है। (हरेक जीव के) नजदीक बसता है (किसी से भी) प्रभू दूर नहीं। पर निरी लोगों की नजरों में अच्छा बनने से (उस परमात्मा के दर से आत्मिक जीवन की दाति का) कुछ भी नहीं मिलता। जब मनुष्य उस सदा-स्थिर प्रभू में लीन होता है। तब (इसके अंदर से) अहंकार दूर हो जाता है। 2।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 736 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।