जिनि सिसटि साजी सोई हरि जाणै ता का रूपु अपारो ॥
नानक आपे वेखि हरि बिगसै गुरमुखि ब्रहम बीचारो ॥4॥3॥14॥
कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥
आपणा कीता किछू न होवै जिउ हरि भावै तिउ रखीऐ ॥1॥
मेरे हरि जीउ सभु को तेरै वसि ॥
असा जोरु नाही जे किछु करि हम साकह जिउ भावै तिवै बखसि ॥1॥ रहाउ ॥
सभु जीउ पिंडु दीआ तुधु आपे तुधु आपे कारै लाइआ ॥
जेहा तूं हुकमु करहि तेहे को करम कमावै जेहा तुधु धुरि लिखि पाइआ ॥2॥
पंच ततु करि तुधु स्रिसटि सभ साजी कोई छेवा करिउ जे किछु कीता होवै ॥
इकना सतिगुरु मेलि तूं बुझावहि इकि मनमुखि करहि सि रोवै ॥3॥
हरि की वडिआई हउ आखि न साका हउ मूरखु मुगधु नीचाणु ॥
जन नानक कउ हरि बखसि लै मेरे सुआमी सरणागति पइआ अजाणु ॥4॥4॥15॥24॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥
नाना रूप भेख दिखलाई ॥
सांगु उतारि थंमि॑ओ पासारा ॥
तब एको एकंकारा ॥1॥
कवन रूप द्रिसटिओ बिनसाइओ ॥
कतहि गइओ उहु कत ते आइओ ॥1॥ रहाउ ॥
जल ते ऊठहि अनिक तरंगा ॥
कनिक भूखन कीने बहु रंगा ॥
बीजु बीजि देखिओ बहु परकारा ॥
फल पाके ते एकंकारा ॥2॥
सहस घटा महि एकु आकासु ॥
घट फूटे ते ओही प्रगासु ॥
भरम लोभ मोह माइआ विकार ॥
भ्रम छूटे ते एकंकार ॥3॥
ओहु अबिनासी बिनसत नाही ॥
ना को आवै ना को जाही ॥
गुरि पूरै हउमै मलु धोई ॥
कहु नानक मेरी परम गति होई ॥4॥1॥
कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥
तुझ बिनु दूजा नाही कोइ ॥
जो जनु सेवे तिसु पूरन काज ॥
दास अपुने की राखहु लाज ॥1॥
तेरी सरणि पूरन दइआला ॥
तुझ बिनु कवनु करे प्रतिपाला ॥1॥ रहाउ ॥
जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरि ॥
निकटि वसै नाही प्रभु दूरि ॥
लोक पतीआरै कछू न पाईऐ ॥
साचि लगै ता हउमै जाईऐ ॥2॥
सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कोई विरला मनुष्य गुरू की कृपा से (इस अहंम् रोग से) खलासी पाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।