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अंग 736

अंग
736
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर परसादी को विरला छूटै तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥3॥
जिनि सिसटि साजी सोई हरि जाणै ता का रूपु अपारो ॥
नानक आपे वेखि हरि बिगसै गुरमुखि ब्रहम बीचारो ॥4॥3॥14॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: कोई विरला मनुष्य गुरू की कृपा से (इस अहंम् रोग से) खलासी पाता है।मैं (ऐसे) उस मनुष्य के सदके जाता हूँ। 3। हे भाई ! जिस परमात्मा ने ये सारी सृष्टि पैदा की है।वह खुद ही (इसके रोग को) जानता है (और।दूर करता है)।उस परमात्मा का स्वरूप किसी भी हदबंदी से परे है। हे नानक ! वह परमात्मा खुद ही (अपनी रची सृष्टि को) देख के खुश होता है।गुरू की शरण पड़ कर ही परमात्मा के गुणों की समझ आती है। 4। 3। 14।
सूही महला 4 ॥
कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥
आपणा कीता किछू न होवै जिउ हरि भावै तिउ रखीऐ ॥1॥
मेरे हरि जीउ सभु को तेरै वसि ॥
असा जोरु नाही जे किछु करि हम साकह जिउ भावै तिवै बखसि ॥1॥ रहाउ ॥
सभु जीउ पिंडु दीआ तुधु आपे तुधु आपे कारै लाइआ ॥
जेहा तूं हुकमु करहि तेहे को करम कमावै जेहा तुधु धुरि लिखि पाइआ ॥2॥
पंच ततु करि तुधु स्रिसटि सभ साजी कोई छेवा करिउ जे किछु कीता होवै ॥
इकना सतिगुरु मेलि तूं बुझावहि इकि मनमुखि करहि सि रोवै ॥3॥
हरि की वडिआई हउ आखि न साका हउ मूरखु मुगधु नीचाणु ॥
जन नानक कउ हरि बखसि लै मेरे सुआमी सरणागति पइआ अजाणु ॥4॥4॥15॥24॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई ! जो कुछ जगत में बना है जो कुछ कर रहा है।ये सब रजा का मालिक परमात्मा कर रहा है।हम जीव (तब ही) कुछ करें।अगर कुछ कर सकते हों। हम जीवों का किया कुछ नहीं हो सकता।जैसे परमात्मा को अच्छा लगता है।वैसे जीवों को रखता है। 1। हे मेरे प्रभू जी ! हरेक जीव आपके बस में हैं। हम जीवों में को समर्थता नहीं कि (आपसे परे) कुछ कर सकें।हे प्रभू ! आपको जैसे अच्छा लगे।हम पर मेहर कर। 1।रहाउ। हे प्रभू ! ये जिंद।ये शरीर।सब कुछ (हरेक जीव को) तूने खुद ही दिया है।तूने स्वयं ही (हरेक जीव को) काम में लगाया हुआ है। जैसा हुकम आप करता है।जीव वैसा ही काम करता है (जीव वैसा ही बनता है) जैसा तूने धुर-दरगाह से (उसके माथे पर) लेख लिख के रख दिया है। 2। हे प्रभू ! तूने पाँच तत्व बना के सारी दुनिया पैदा की है।अगर (आपसे बाहर) जीव से कुछ हैं सकता हैं।तो वह बेशक छेवाँ तत्व (ही) बना कर दिखा दे। हे प्रभू ! कई जीवों को आप गुरू मिला के आत्मिक जीवन की सूझ बख्शता है।कई जीवों को आप अपने मन के पीछे चलने वाला बना देता है।फिर वह (अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य) दुखी होता रहता है। 3। हे भाई ! मैं (तो) मूर्ख हूँ।नीच जीवन वाला हूँ।मैं परमात्मा की बुजुर्गी बयान नहीं कर सकता। हे हरी ! दास नानक पर मेहर कर।(ये) अंजान दास आपकी शरण आ पड़ा है। 4। 4। 15। 24।
रागु सूही महला 5 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥
नाना रूप भेख दिखलाई ॥
सांगु उतारि थंमि॑ओ पासारा ॥
तब एको एकंकारा ॥1॥
कवन रूप द्रिसटिओ बिनसाइओ ॥
कतहि गइओ उहु कत ते आइओ ॥1॥ रहाउ ॥
जल ते ऊठहि अनिक तरंगा ॥
कनिक भूखन कीने बहु रंगा ॥
बीजु बीजि देखिओ बहु परकारा ॥
फल पाके ते एकंकारा ॥2॥
सहस घटा महि एकु आकासु ॥
घट फूटे ते ओही प्रगासु ॥
भरम लोभ मोह माइआ विकार ॥
भ्रम छूटे ते एकंकार ॥3॥
ओहु अबिनासी बिनसत नाही ॥
ना को आवै ना को जाही ॥
गुरि पूरै हउमै मलु धोई ॥
कहु नानक मेरी परम गति होई ॥4॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु सूही महला 5 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जैसे किसी बाजीगर ने (कभी) बाजी डाल के दिखाई हो। वह कई किस्मों के रूप और भेष दिखाता है (इसी तरह परमात्मा ने ये जगत-तमाशा रचा हुआ है।इसमें अनेकों रूप और भेष दिखा रहा है)। जब प्रभू अपनी ये (जगत-रूपी) नकली-शक्ल उतार के खेल का पसारा रोक देता है। तब स्वयं ही स्वयं रह जाता है। 1। हे भाई ! (परमात्मा के) अनेकों ही रूप दिखते रहते हैं।अनेकों ही रूप् नाश होते रहते हैं। (कोई नहीं बता सकता है कि) जीव कहाँ से आया था।और कहाँ चला जाता है। 1।रहाउ। हे भाई ! पानी से अनेकों लहरें उठती हैं (दोबारा पानी में मिल जाती हैं)। सोने से कई किस्मों के गहने घड़े जाते हैं (वे असल में होते तो सोना ही हैं)। (किसी वृक्ष का) बीज बीज के (शाखा-पत्ते आदि उसके) कई किस्मों में स्वरूप देखने को मिलता है। (वृक्ष के) फल पकने पर (वही पहली किस्म का बीज बन जाता है) (वैसे ही इस बहुरंगी संसार का असल) एक परमात्मा ही है। 2। हे भाई ! एक ही आकाश (पानी से भरे हुए) हजारों घड़ों में (अलग-अलग दिखता है)। जब घड़े टूट जाते हैं।तो वह (आकाश) ही दिखाई देता रह जाता है। माया के भ्रम के कारण (परमात्मा की अंश जीवात्मा में) भटकना।लोभ-मोह आदि विकार उठते हैं। भ्रम मिट जाने के कारण एक परमात्मा का ही रूप हो जाता है। 3। हे भाई ! वह परमात्मा नाश-रहित है।उसका कभी नाश नहीं होता। (वह प्रभू जीवात्मा रूप हो के भी) ना कोई आत्मा पैदा होती है।ना कोई आत्मा मरती है। हे नानक ! कह,पूरे गुरू ने (मेरे अंदर से) अहंकार की मैल धो दी है। अब मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था बन गई है (और।मुझे ये जगत उस परमात्मा का अपना ही रूप दिख रहा है)। 4। 1।
सूही महला 5 ॥
कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥
तुझ बिनु दूजा नाही कोइ ॥
जो जनु सेवे तिसु पूरन काज ॥
दास अपुने की राखहु लाज ॥1॥
तेरी सरणि पूरन दइआला ॥
तुझ बिनु कवनु करे प्रतिपाला ॥1॥ रहाउ ॥
जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरि ॥
निकटि वसै नाही प्रभु दूरि ॥
लोक पतीआरै कछू न पाईऐ ॥
साचि लगै ता हउमै जाईऐ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 5 ॥ हे प्रभू ! जो कुछ आप करना चाहता है।(जगत में) वही कुछ होता है। (क्योंकि) आपके बिना (कुछ कर सकने वाला) और कोई नहीं। जो सेवक आपकी शरण आता है।उसके सारे काम सफल हैं जाते हैं। आप अपने सेवक की इज्जत खुद रखता है। 1। हे सदा दयावान रहने वाले प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। आपके बिना हम जीवों की पालना और कोई नहीं कर सकता। 1।रहाउ। हे भाई ! पानी में।धरती में।आकाश में।हर जगह परमात्मा मौजूद है। (हरेक जीव के) नजदीक बसता है (किसी से भी) प्रभू दूर नहीं। पर निरी लोगों की नजरों में अच्छा बनने से (उस परमात्मा के दर से आत्मिक जीवन की दाति का) कुछ भी नहीं मिलता। जब मनुष्य उस सदा-स्थिर प्रभू में लीन होता है।तब (इसके अंदर से) अहंकार दूर हो जाता है। 2।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कोई विरला मनुष्य गुरू की कृपा से (इस अहंम् रोग से) खलासी पाता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।