ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥
तुमरी महिमा बरनि न साकउ तूं ठाकुर ऊच भगवाना ॥1॥
मै हरि हरि नामु धर सोई ॥
जिउ भावै तिउ राखु मेरे साहिब मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥1॥ रहाउ ॥
मै ताणु दीबाणु तूहै मेरे सुआमी मै तुधु आगै अरदासि ॥
मै होरु थाउ नाही जिसु पहि करउ बेनंती मेरा दुखु सुखु तुझ ही पासि ॥2॥
विचे धरती विचे पाणी विचि कासट अगनि धरीजै ॥
बकरी सिंघु इकतै थाइ राखे मन हरि जपि भ्रमु भउ दूरि कीजै ॥3॥
हरि की वडिआई देखहु संतहु हरि निमाणिआ माणु देवाए ॥
जिउ धरती चरण तले ते ऊपरि आवै तिउ नानक साध जना जगतु आणि सभु पैरी पाए ॥4॥1॥12॥
तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥
बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै जेहा को करे तेहा को पाईऐ ॥1॥
मेरे साहिब तूं अंतर की बिधि जाणहि ॥
बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै तुधु भावै तिवै बुलावहि ॥1॥ रहाउ ॥
सभु मोहु माइआ सरीरु हरि कीआ विचि देही मानुख भगति कराई ॥
इकना सतिगुरु मेलि सुखु देवहि इकि मनमुखि धंधु पिटाई ॥2॥
सभु को तेरा तूं सभना का मेरे करते तुधु सभना सिरि लिखिआ लेखु ॥
जेही तूं नदरि करहि तेहा को होवै बिनु नदरी नाही को भेखु ॥3॥
तेरी वडिआई तूंहै जाणहि सभ तुधनो नित धिआए ॥
जिस नो तुधु भावै तिस नो तूं मेलहि जन नानक सो थाइ पाए ॥4॥2॥13॥
जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥
ते मुकत भए जिन हरि नामु धिआइआ तिन पवितु परम पदु पाए ॥1॥
मेरे राम हरि जन आरोग भए ॥
गुर बचनी जिना जपिआ मेरा हरि हरि तिन के हउमै रोग गए ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहमा बिसनु महादेउ त्रै गुण रोगी विचि हउमै कार कमाई ॥
जिनि कीए तिसहि न चेतहि बपुड़े हरि गुरमुखि सोझी पाई ॥2॥
हउमै रोगि सभु जगतु बिआपिआ तिन कउ जनम मरण दुखु भारी ॥
सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही महला 4 घरु 7 सतिगुर प्रसादि ॥ आप सारे गुणों का खजाना है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।