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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 735 · सूही

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अंग
735
सूही
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  1. तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥
  2. तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥
  3. जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥

तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥

सूही महला 4 घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥
तुमरी महिमा बरनि न साकउ तूं ठाकुर ऊच भगवाना ॥1॥
मै हरि हरि नामु धर सोई ॥
जिउ भावै तिउ राखु मेरे साहिब मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥1॥ रहाउ ॥
मै ताणु दीबाणु तूहै मेरे सुआमी मै तुधु आगै अरदासि ॥
मै होरु थाउ नाही जिसु पहि करउ बेनंती मेरा दुखु सुखु तुझ ही पासि ॥2॥
विचे धरती विचे पाणी विचि कासट अगनि धरीजै ॥
बकरी सिंघु इकतै थाइ राखे मन हरि जपि भ्रमु भउ दूरि कीजै ॥3॥
हरि की वडिआई देखहु संतहु हरि निमाणिआ माणु देवाए ॥
जिउ धरती चरण तले ते ऊपरि आवै तिउ नानक साध जना जगतु आणि सभु पैरी पाए ॥4॥1॥12॥

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 घरु 7 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आप सारे गुणों का खजाना हैं। आप सबको पालने वाले हैं। मैं आपके कौन-कौन से गुण बता के आपकी सिफत-सालाह कर सकता हूँ। हे सबसे ऊँचे भगवान ! आप सबके मालिक हैं। मैं आपकी महिमा बयान नहीं कर सकता। 1। हे हरी ! मेरे वास्ते आपका वह नाम ही सहारा है। हे मेरे मालिक ! जैसे आपको अच्छा लगे वैसे मेरी रक्षा करें। आपके बिना मेरा और कोई (सहारा) नहीं। 1।रहाउ। हे मेरे मालिक ! आप ही मेरे वास्ते बल हैं। आप ही मेरे वास्ते आसरा हैं। मैं आपके आगे ही आरजू कर सकता हूँ। मेरे लिए कोई और ऐसी जगह नहीं। जिसके पास मैं विनती कर सकूँ। मैं अपना हरेक सुख हरेक दुख आपके सामने ही रख सकता हूँ। 2। हे मेरे मन ! देखें। (पानी के) बीच में ही धरती है। (धरती के) बीच में ही पानी है। लकड़ी में आग रखी हुई है। (मालिक प्रभू ने। मानो) शेर और बकरी एक ही जगह रखे हुए हैं। हे मन ! (आप डरते क्यों हैं। ऐसी शक्ति वाले) परमात्मा का नाम जप के आप अपना हरेक डर-भ्रम दूर कर लिया करें। 3। हे संत जनो ! देखें परमात्मा की बड़ी ताकत ! परमात्मा उनको आदर दिलवाता है। जिनकी कोई इज्जत नहीं करता था। हे नानक ! जैसे धरती (मनुष्य के) पैरों के नीचे से (मौत आने से उसके) ऊपर आ जाती है। वैसे ही परमात्मा सारे जगत को ला के साध-जनों के चरणों में डाल देता है। 4। 1। 12।

तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥

सूही महला 4 ॥
तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥
बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै जेहा को करे तेहा को पाईऐ ॥1॥
मेरे साहिब तूं अंतर की बिधि जाणहि ॥
बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै तुधु भावै तिवै बुलावहि ॥1॥ रहाउ ॥
सभु मोहु माइआ सरीरु हरि कीआ विचि देही मानुख भगति कराई ॥
इकना सतिगुरु मेलि सुखु देवहि इकि मनमुखि धंधु पिटाई ॥2॥
सभु को तेरा तूं सभना का मेरे करते तुधु सभना सिरि लिखिआ लेखु ॥
जेही तूं नदरि करहि तेहा को होवै बिनु नदरी नाही को भेखु ॥3॥
तेरी वडिआई तूंहै जाणहि सभ तुधनो नित धिआए ॥
जिस नो तुधु भावै तिस नो तूं मेलहि जन नानक सो थाइ पाए ॥4॥2॥13॥

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे प्रभू ! आप (सारी सृष्टि को) पैदा करने वाले हैं। (अपनी सारी सृष्टि की बाबत) हरेक बात आप खुद ही जानते हैं। आपसे कोई बात छुपी नहीं (इस वास्ते) आपको कौन सी बात कह के सुनाई जाए। हरेक जीव की बुराई और भलाई का आपको खुद ही पता लग जाता है। (इसी लिए) जैसा कर्म कोई जीव करता है। वह वैसा ही फल पा लेता है। 1। हे मेरे मालिक ! आप (हरेक जीव के) अंदर की हालत जानते हैं। किसी के अंदर बुराई है। किसी के अंदर भलाई। आपको हरेक बात का पता चल जाता है। जैसे आपको अच्छा लगता है। वैसे ही आप (हरेक जीव को अच्छे या बुरे नाम से) बुलाते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! माया का सारा मोह परमात्मा ने बनाया है। हरेक शरीर भी प्रभू ने ही बनाया है। मनुष्य शरीर में भक्ति भी प्रभू खुद ही करवाता है। हे प्रभू ! कई जीवों को आप गुरू मिलवा के आनंद बख्शते हैं। हे भाई ! अनेकों जीव ऐसे हैं जो अपने मन के पीछे चलते हैं। उनको वह खुद ही माया में फसाए रखता है। 2। हे मेरे करतार ! हरेक जीव आपका (पैदा किया हुआ) है। आप सब जीवों के (पति) हैं। सब जीवों के सिर पर आपने ही (किरत का) लेख लिखा हुआ है। उस लेख (के अनुसार) जैसी निगाह आप किसी जीव पर करते हैं वैसा ही वह बन जाता है। (चाहे कोई अच्छा है। चाहे कोई बुरा है) आपकी निगाह के बिना कोई भी जीव (अच्छा या बुरा) नहीं (बना)। 3। हे दास नानक (कह) हे मेरे करतार ! आप कितने बड़े हैं, इस बात को आप खुद ही जानते हैं। सारी दुनिया सदा आपका ध्यान धरती है। जिसे आप चाहते हैं उसको (अपने चरणों में) आप जोड़ लेते हैं। वह मनुष्य (आपकी दरगाह में) कबूल हो जाता है। 4। 2। 13।

जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥

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सूही महला 4 ॥
जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥
ते मुकत भए जिन हरि नामु धिआइआ तिन पवितु परम पदु पाए ॥1॥
मेरे राम हरि जन आरोग भए ॥
गुर बचनी जिना जपिआ मेरा हरि हरि तिन के हउमै रोग गए ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहमा बिसनु महादेउ त्रै गुण रोगी विचि हउमै कार कमाई ॥
जिनि कीए तिसहि न चेतहि बपुड़े हरि गुरमुखि सोझी पाई ॥2॥
हउमै रोगि सभु जगतु बिआपिआ तिन कउ जनम मरण दुखु भारी ॥

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों के हृदय में मेरा हरी-प्रभू आ बसता है। उनके वह हरी सारे रोग दूर कर देता है। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम सिमरा। वह (अहंकार आदि जैसे रोगों से) स्वतंत्र हो गए। उन्होंने सबसे ऊँचा आत्मिक पवित्र दर्जा हासिल कर लिया। 1। हे भाई ! मेरे राम के। मेरे हरी के। दास (अहंकार आदि से) नरोए हो गए हैं। जिन मनुष्यों ने गुरू के वचनों पर चल के मेरे हरी प्रभू का नाम जपा उनके अहंकार (आदि) रोग दूर हो गए। 1।रहाउ। (हे भाई ! पुराणों की बताई साखियों के अनुसार) माया के तीन गुणों के प्रभाव के कारण (बड़े देवते) ब्रहमा, विष्णु, शिव (भी) रोगी ही रहे। (क्योंकि उन्होंने भी) अहंकार में ही कर्म किए। जिस परमात्मा ने उनको पैदा किया था। उसे उन बेचारों ने याद नहीं किया। हे भाई ! परमात्मा की सूझ (तो) गुरू की शरण पड़ने से ही मिल सकती है। 2। हे भाई ! सारा जगत अहंकार के रोग में फसा रहता है (और। अहंकार में फसे हुए) उन मनुष्यों को जन्म-मरण के चक्कर का बहुत सारा दुख लगा रहता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 735 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।