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अंग 735

अंग
735
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सूही महला 4 घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥
तुमरी महिमा बरनि न साकउ तूं ठाकुर ऊच भगवाना ॥1॥
मै हरि हरि नामु धर सोई ॥
जिउ भावै तिउ राखु मेरे साहिब मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥1॥ रहाउ ॥
मै ताणु दीबाणु तूहै मेरे सुआमी मै तुधु आगै अरदासि ॥
मै होरु थाउ नाही जिसु पहि करउ बेनंती मेरा दुखु सुखु तुझ ही पासि ॥2॥
विचे धरती विचे पाणी विचि कासट अगनि धरीजै ॥
बकरी सिंघु इकतै थाइ राखे मन हरि जपि भ्रमु भउ दूरि कीजै ॥3॥
हरि की वडिआई देखहु संतहु हरि निमाणिआ माणु देवाए ॥
जिउ धरती चरण तले ते ऊपरि आवै तिउ नानक साध जना जगतु आणि सभु पैरी पाए ॥4॥1॥12॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 घरु 7 सतिगुर प्रसादि ॥ आप सारे गुणों का खजाना है।आप सबको पालने वाला है।मैं आपके कौन-कौन से गुण बता के आपकी सिफत-सालाह कर सकता हूँ। हे सबसे ऊँचे भगवान ! आप सबका मालिक है।मैं आपकी महिमा बयान नहीं कर सकता। 1। हे हरी ! मेरे वास्ते आपका वह नाम ही सहारा है। हे मेरे मालिक ! जैसे आपको अच्छा लगे वैसे मेरी रक्षा कर आपके बिना मेरा और कोई (सहारा) नहीं। 1।रहाउ। हे मेरे मालिक ! आप ही मेरे वास्ते बल है।आप ही मेरे वास्ते आसरा है।मैं आपके आगे ही आरजू कर सकता हूँ। मेरे लिए कोई और ऐसी जगह नहीं।जिसके पास मैं विनती कर सकूँ।मैं अपना हरेक सुख हरेक दुख आपके सामने ही रख सकता हूँ। 2। हे मेरे मन ! देख।(पानी के) बीच में ही धरती है।(धरती के) बीच में ही पानी है।लकड़ी में आग रखी हुई है। (मालिक प्रभू ने।मानो) शेर और बकरी एक ही जगह रखे हुए हैं।हे मन ! (आप डरता क्यों है।ऐसी शक्ति वाले) परमात्मा का नाम जप के आप अपना हरेक डर-भ्रम दूर कर लिया कर। 3। हे संत जनो ! देखो परमात्मा की बड़ी ताकत ! परमात्मा उनको आदर दिलवाता है।जिनकी कोई इज्जत नहीं करता था। हे नानक ! जैसे धरती (मनुष्य के) पैरों के नीचे से (मौत आने से उसके) ऊपर आ जाती है।वैसे ही परमात्मा सारे जगत को ला के साध-जनों के चरणों में डाल देता है। 4। 1। 12।
सूही महला 4 ॥
तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥
बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै जेहा को करे तेहा को पाईऐ ॥1॥
मेरे साहिब तूं अंतर की बिधि जाणहि ॥
बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै तुधु भावै तिवै बुलावहि ॥1॥ रहाउ ॥
सभु मोहु माइआ सरीरु हरि कीआ विचि देही मानुख भगति कराई ॥
इकना सतिगुरु मेलि सुखु देवहि इकि मनमुखि धंधु पिटाई ॥2॥
सभु को तेरा तूं सभना का मेरे करते तुधु सभना सिरि लिखिआ लेखु ॥
जेही तूं नदरि करहि तेहा को होवै बिनु नदरी नाही को भेखु ॥3॥
तेरी वडिआई तूंहै जाणहि सभ तुधनो नित धिआए ॥
जिस नो तुधु भावै तिस नो तूं मेलहि जन नानक सो थाइ पाए ॥4॥2॥13॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे प्रभू ! आप (सारी सृष्टि को) पैदा करने वाला है।(अपनी सारी सृष्टि की बाबत) हरेक बात आप खुद ही जानता है।आपसे कोई बात छुपी नहीं (इस वास्ते) आपको कौन सी बात कह के सुनाई जाए। हरेक जीव की बुराई और भलाई का आपको खुद ही पता लग जाता है।(इसी लिए) जैसा कर्म कोई जीव करता है।वह वैसा ही फल पा लेता है। 1। हे मेरे मालिक ! आप (हरेक जीव के) अंदर की हालत जानता है। किसी के अंदर बुराई है।किसी के अंदर भलाई।आपको हरेक बात का पता चल जाता है।जैसे आपको अच्छा लगता है।वैसे ही आप (हरेक जीव को अच्छे या बुरे नाम से) बुलाता है। 1।रहाउ। हे भाई ! माया का सारा मोह परमात्मा ने बनाया है।हरेक शरीर भी प्रभू ने ही बनाया है।मनुष्य शरीर में भक्ति भी प्रभू खुद ही करवाता है। हे प्रभू ! कई जीवों को आप गुरू मिलवा के आनंद बख्शता है।हे भाई ! अनेकों जीव ऐसे हैं जो अपने मन के पीछे चलते हैं।उनको वह खुद ही माया में फसाए रखता है। 2। हे मेरे करतार ! हरेक जीव आपका (पैदा किया हुआ) है।आप सभ जीवों का (पति) है।सब जीवों के सिर पर तूने ही (किरत का) लेख लिखा हुआ है। उस लेख (के अनुसार) जैसी निगाह आप किसी जीव पर करता है वैसा ही वह बन जाता है।(चाहे कोई अच्छा है।चाहे कोई बुरा है) आपकी निगाह के बिना कोई भी जीव (अच्छा या बुरा) नहीं (बना)। 3। हे दास नानक (कह) हे मेरे करतार ! आप कितना बड़ा है, इस बात को आप खुद ही जानता है।सारी दुनिया सदा आपका ध्यान धरती है। जिसे आप चाहता है उसको (अपने चरणों में) आप जोड़ लेता है।वह मनुष्य (आपकी दरगाह में) कबूल हैं जाता है। 4। 2। 13।
सूही महला 4 ॥
जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥
ते मुकत भए जिन हरि नामु धिआइआ तिन पवितु परम पदु पाए ॥1॥
मेरे राम हरि जन आरोग भए ॥
गुर बचनी जिना जपिआ मेरा हरि हरि तिन के हउमै रोग गए ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहमा बिसनु महादेउ त्रै गुण रोगी विचि हउमै कार कमाई ॥
जिनि कीए तिसहि न चेतहि बपुड़े हरि गुरमुखि सोझी पाई ॥2॥
हउमै रोगि सभु जगतु बिआपिआ तिन कउ जनम मरण दुखु भारी ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों के हृदय में मेरा हरी-प्रभू आ बसता है।उनके वह हरी सारे रोग दूर कर देता है। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम सिमरा।वह (अहंकार आदि जैसे रोगों से) स्वतंत्र हो गए।उन्होंने सबसे ऊँचा आत्मिक पवित्र दर्जा हासिल कर लिया। 1। हे भाई ! मेरे राम के।मेरे हरी के।दास (अहंकार आदि से) नरोए हैं गए हैं। जिन मनुष्यों ने गुरू के वचनों पर चल के मेरे हरी प्रभू का नाम जपा उनके अहंकार (आदि) रोग दूर हो गए। 1।रहाउ। (हे भाई ! पुराणों की बताई साखियों के अनुसार) माया के तीन गुणों के प्रभाव के कारण (बड़े देवते) ब्रहमा।विष्णु।शिव (भी) रोगी ही रहे।(क्योंकि उन्होंने भी) अहंकार में ही कर्म किए। जिस परमात्मा ने उनको पैदा किया था।उसे उन बेचारों ने याद नहीं किया।हे भाई ! परमात्मा की सूझ (तो) गुरू की शरण पड़ने से ही मिल सकती है। 2। हे भाई ! सारा जगत अहंकार के रोग में फसा रहता है (और।अहंकार में फसे हुए) उन मनुष्यों को जन्म-मरण के चक्कर का बहुत सारा दुख लगा रहता है।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही महला 4 घरु 7 सतिगुर प्रसादि ॥ आप सारे गुणों का खजाना है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।