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अंग 734

अंग
734
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर किरपा ते हरि मनि वसै होरतु बिधि लइआ न जाई ॥1॥
हरि धनु संचीऐ भाई ॥
जि हलति पलति हरि होइ सखाई ॥1॥ रहाउ ॥
सतसंगती संगि हरि धनु खटीऐ होर थै होरतु उपाइ हरि धनु कितै न पाई ॥
हरि रतनै का वापारीआ हरि रतन धनु विहाझे कचै के वापारीए वाकि हरि धनु लइआ न जाई ॥2॥
हरि धनु रतनु जवेहरु माणकु हरि धनै नालि अंम्रित वेलै वतै हरि भगती हरि लिव लाई ॥
हरि धनु अंम्रित वेलै वतै का बीजिआ भगत खाइ खरचि रहे निखुटै नाही ॥
हलति पलति हरि धनै की भगता कउ मिली वडिआई ॥3॥
हरि धनु निरभउ सदा सदा असथिरु है साचा इहु हरि धनु अगनी तसकरै पाणीऐ जमदूतै किसै का गवाइआ न जाई ॥
हरि धन कउ उचका नेड़ि न आवई जमु जागाती डंडु न लगाई ॥4॥
साकती पाप करि कै बिखिआ धनु संचिआ तिना इक विख नालि न जाई ॥
हलतै विचि साकत दुहेले भए हथहु छुड़कि गइआ अगै पलति साकतु हरि दरगह ढोई न पाई ॥5॥
इसु हरि धन का साहु हरि आपि है संतहु जिस नो देइ सु हरि धनु लदि चलाई ॥
इसु हरि धनै का तोटा कदे न आवई जन नानक कउ गुरि सोझी पाई ॥6॥3॥10॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: (पर वह) परमात्मा गुरू की कृपा से (ही मनुष्य के) मन में बस सकता है।किसी भी और तरीके से उसको पाया नहीं जा सकता। 1। हे भाई !उसका नाम-धन इकट्ठा करना चाहिए। जो हरी इस लोक में और परलोक में मित्र बनता है।1।रहाउ। हे भाई ! सत्संगियों के साथ (मिल के) परमात्मा का नाम-धन कमाया जा सकता है।(सत्संग के बिना) किसी भी और जगह।किसी भी अन्य प्रयासों से (अगर) नाम-धन खरीदता है। (तो) नाशवंत चीजों के (कच्ची चीजों के) के व्यापारी (मायावी पदार्थ ही अर्थात कच्ची चीजें ही खरीदते हैं उनकी) शिक्षा से हरी-नाम-धन प्राप्त नहीं किया जा सकता। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम (भी) धन (है।ये धन) रत्न-जवाहर-मोती (जैसा कीमती) है।प्रभू के भक्तों ने वत्र के वक्त उठ के अमृत बेला में उठ के (उस वक्त उठ के जब आत्मिक जीवन अंकुरित होता है) इस हरी-नाम-धन से सुरति जोड़ी होती है। अमृत बेला में (उठ के) बीजा हुआ ये हरी-नाम-धन भक्त जन खुद इस्तेमाल करते रहते हैं।औरों कोबाँटते रहते हैं।पर ये खत्म नहीं होता। भक्त जनों को इस लोक में परलोक में इस हरी-नाम-धन के कारण इज्जत मिलती है। 3। हे भाई ! जिस हरी-नाम-धन को किसी किस्म का कोई खतरा नहीं।ये सदा ही कायम रहने वाला है।सदा ही टिका रहता है।आग-चोर-पानी-मौत।किसी के द्वारा भी इस धन का नुकसान नहीं किया जा सकता। कोई लुटेरा इस हरी-नाम-धन के नजदीक नहीं फटक सकता।जम मसूलिया इस धन को महसूल नहीं लगा सकता। 4। हे भाई ! माया-ग्रसित मनुष्यों ने (सदा) पाप कर-करके माया-धन ही जोड़ा।(पर) उनके साथ (जगत से चलने के वक्त) ये धन एक कदम भी साथ नहीं निभा सका। (इस माया धन के कारण) माया-ग्रसित लोग इस लोक में दुखी ही रहे (मरने के वक्त ये धन) हाथों से छिन गया।आगे परलोक में जा के माया-ग्रसित मनुष्य को परमात्मा की हजूरी में कोई जगह नहीं मिलती। 5। हे संत जनो ! इस हरी-नाम-धन का मालिक परमात्मा स्वयं ही है।जिस मनुष्य को शाहूकार-प्रभू ये धन देता है।वह मनुष्य (इस जगत में) ये हरी-नाम-सौदा कमा के यहाँ से चलता है। हे नानक ! (कह,हे भाई !) इस हरी-नाम-धन के व्यापार में कभी घाटा नहीं पड़ता।गुरू ने अपने सेवक को ये बात अच्छी तरह समझा दी है। 6। 3। 10।
सूही महला 4 ॥
जिस नो हरि सुप्रसंनु होइ सो हरि गुणा रवै सो भगतु सो परवानु ॥
तिस की महिमा किआ वरनीऐ जिस कै हिरदै वसिआ हरि पुरखु भगवानु ॥1॥
गोविंद गुण गाईऐ जीउ लाइ सतिगुरू नालि धिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
सो सतिगुरू सा सेवा सतिगुर की सफल है जिस ते पाईऐ परम निधानु ॥
जो दूजै भाइ साकत कामना अरथि दुरगंध सरेवदे सो निहफल सभु अगिआनु ॥2॥
जिस नो परतीति होवै तिस का गाविआ थाइ पवै सो पावै दरगह मानु ॥
जो बिनु परतीती कपटी कूड़ी कूड़ी अखी मीटदे उन का उतरि जाइगा झूठु गुमानु ॥3॥
जेता जीउ पिंडु सभु तेरा तूं अंतरजामी पुरखु भगवानु ॥
दासनि दासु कहै जनु नानकु जेहा तूं कराइहि तेहा हउ करी वखिआनु ॥4॥4॥11॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा अच्छी तरह खुश होता है।वह मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है।वह मनुष्य (उसकी नजरों में) भक्त है (उसके दर पर) कबूल है। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में भगवान पुरुष आ बसता है।उसकी महिमा बयान नहीं की जा सकती। 1। हे भाई ! आएँ।चित्त जोड़ के।गुरू (की बाणी) से सुरति जोड़ के।परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाया करें। 1।रहाउ। हे भाई ! वह गुरू (ऐसा समर्थ है) कि उसकी तरफ से सबसे ऊँचा खजाना मिल जाता है।उस गुरू की बताई हुई वह सेवा भी फल लाती है। जो माया-ग्रसित मनुष्य माया के प्यार में (फस के) मन की वासनाएं (पूरी करने) की खातिर किसी विषौ-विकारों में लगे रहते हैं।वे जीवन व्यर्थ गवा लेते हैं।उनका सारा जीवन ही आत्मिक जीवन की ओर से बे-समझी है। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य को (गुरू पर) श्रद्धा होती है।उसका हरी-यश गाना (हरी की हजूरी में) कबूल पड़ता है; वह मनुष्य परमात्मा की दरगाह में आदर पाता है। पर जो फरेबी मनुष्य (गुरू पर) ऐतबार किए बिना झूठ-मूठ ही आँखें बँद करते हैं (जैसे।समाधि लगा के बैठे हों) उनका (अपनी उच्चता के बारे में) झूठा अहंकार (आखिर) उतर जाएगा। 3। हे प्रभू ! जितना भी (जीवों के) जिंद-शरीर हैं ये सभ आपका ही दिया हुआ है।आप सबके दिल की जानने वाला सर्व-व्यापक प्रभू है। हे प्रभू ! आपके दासों का दास नानक कहता है, (हे प्रभू !) आप जो कुछ मुझसे कहलवाता है।मैं वही कुछ कहता हूँ। 4। 4। 11।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(पर वह) परमात्मा गुरू की कृपा से (ही मनुष्य के) मन में बस सकता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।