Lulla Family

अंग 733

अंग
733
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जे सउ लोचै रंगु न होवै कोइ ॥3॥
नदरि करे ता सतिगुरु पावै ॥
नानक हरि रसि हरि रंगि समावै ॥4॥2॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: ऐसा मनुष्य जो सौ बार भी चाहे।उसको (प्रभू के प्यार का) रंग नहीं चढ़ सकता। 3। हे नानक ! (कह,जब परमात्मा किसी मनुष्य पर) मेहर की निगाह करता है।तो वह गुरू (का मिलाप) प्राप्त करता है। (फिर वह) परमात्मा के नाम-रस में परमात्मा के प्रेम-रंग में समाया रहता है। 4। 2। 6।
सूही महला 4 ॥
जिहवा हरि रसि रही अघाइ ॥
गुरमुखि पीवै सहजि समाइ ॥1॥
हरि रसु जन चाखहु जे भाई ॥
तउ कत अनत सादि लोभाई ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमति रसु राखहु उर धारि ॥
हरि रसि राते रंगि मुरारि ॥2॥
मनमुखि हरि रसु चाखिआ न जाइ ॥
हउमै करै बहुती मिलै सजाइ ॥3॥
नदरि करे ता हरि रसु पावै ॥
नानक हरि रसि हरि गुण गावै ॥4॥3॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई !जिस मनुष्य की जीभ परमात्मा के नाम के रस में तृप्त रहती है। वह गुरू की शरण पड़ कर सदा वह नाम-रस ही पीता है।और आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। 1। हे प्यारे सज्जनों ! अगर आप परमात्मा के नाम का स्वाद चख लो। तो फिर किसी भी और स्वाद में नहीं फंसोगे। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू की शिक्षा पर चल के प्रभू के नाम का स्वाद अपने हृदय में बसाए रखो। जो मनुष्य प्रभू के नाम-रस में मगन हो जाते हैं।वह मुरारी प्रभू के प्रेम-रंग में रंगे जाते हैं। 2। पर। हे भाई ! जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है।वह परमात्मा के नाम-रस का स्वाद नहीं चख सकता। (ज्यों-ज्यों अपनी समझदारी का) अहंकार करता है (त्यों-त्यों) उसे और ज्यादा से ज्यादा सजा मिलती है (आत्मिक कलेश सहना पड़ता है)। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जब परमात्मा (किसी मनुष्य पर) मेहर की निगाह करता है तब वह प्रभू के नाम का स्वाद हासिल करता है। (फिर) वह हरी-नाम के स्वाद में मगन हो के परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता रहता है। 4। 3। 7।
सूही महला 4 घरु 6
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नीच जाति हरि जपतिआ उतम पदवी पाइ ॥
पूछहु बिदर दासी सुतै किसनु उतरिआ घरि जिसु जाइ ॥1॥
हरि की अकथ कथा सुनहु जन भाई जितु सहसा दूख भूख सभ लहि जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
रविदासु चमारु उसतति करे हरि कीरति निमख इक गाइ ॥
पतित जाति उतमु भइआ चारि वरन पए पगि आइ ॥2॥
नामदेअ प्रीति लगी हरि सेती लोकु छीपा कहै बुलाइ ॥
खत्री ब्राहमण पिठि दे छोडे हरि नामदेउ लीआ मुखि लाइ ॥3॥
जितने भगत हरि सेवका मुखि अठसठि तीरथ तिन तिलकु कढाइ ॥
जनु नानकु तिन कउ अनदिनु परसे जे क्रिपा करे हरि राइ ॥4॥1॥8॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 घरु 6 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! नीच जाति वाला मनुष्य भी परमात्मा का नाम जपने से उच्च आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है (अगर यकीन नहीं होता। तो किसी से) दासी के पुत्र बिदर की बात पूछ के देख लो।उस बिदर के घर में कृष्ण जी जा के ठहरे थे। 1। हे सज्जनो ! परमात्मा की आश्चर्य सिफत-सालाह सुना करो।जिसकी बरकति से हरेक किस्म की सहम।हरेक दुख दूर हो जाता है।(माया की) भूख मिट जाती है। 1।रहाउ। हे भाई ! (भक्त) रविदास (जाति का) चमार (था।वह परमात्मा की) सिफत सालाह करता था।वह हर वक्त प्रभू की कीर्ति गाता रहता था। नीच जाति का रविदास महापुरुष बन गया।चारों वर्णों के मनुष्य उसके पैरों में आ के लगे। 2। हे भाई ! (भक्त) नामदेव की परमात्मा के साथ प्रीति बन गई।जगत उसे धोबी (छींबा) बुलाता था। परमात्मा ने क्षत्रियों-ब्राहमणों को पीठ दे दी।और नामदेव को माथे से लगाया था। 3। हे भाई ! परमात्मा के जितने भी भक्त हैं।सेवक हैं।उनके माथे पर अढ़सठ तीर्थ तिलक लगाते हैं (सारे ही तीर्थ भी उनका आदर-मान करते हैं)। हे भाई ! अगर प्रभू-पातशाह मेहर करे।तो दास नानक हर वक्त उन (भगतों-सेवकों) के चरण छूता है। 4। 1। 8।
सूही महला 4 ॥
तिन॑ी अंतरि हरि आराधिआ जिन कउ धुरि लिखिआ लिखतु लिलारा ॥
तिन की बखीली कोई किआ करे जिन का अंगु करे मेरा हरि करतारा ॥1॥
हरि हरि धिआइ मन मेरे मन धिआइ हरि जनम जनम के सभि दूख निवारणहारा ॥1॥ रहाउ ॥
धुरि भगत जना कउ बखसिआ हरि अंम्रित भगति भंडारा ॥
मूरखु होवै सु उन की रीस करे तिसु हलति पलति मुहु कारा ॥2॥
से भगत से सेवका जिना हरि नामु पिआरा ॥
तिन की सेवा ते हरि पाईऐ सिरि निंदक कै पवै छारा ॥3॥
जिसु घरि विरती सोई जाणै जगत गुर नानक पूछि करहु बीचारा ॥
चहु पीड़ी आदि जुगादि बखीली किनै न पाइओ हरि सेवक भाइ निसतारा ॥4॥2॥9॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई ! धुर-दरगाह से जिन मनुष्यों के माथे पर लेख लिखा होता है।वही मनुष्य अपने हृदय में परमात्मार की आराधना करते हैं (और परमात्मा उनका ही पक्ष करता है)। प्यारा करतार जिनका पक्ष करता है।कोई मनुष्य उनकी निंदा करके उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम सिमरा कर।हे मन ! प्रभू का ध्यान धरा कर।परमात्मा (जीव के) जन्मों-जन्मांतरों के विकार दूर करने की समर्था रखता है। 1।रहाउ। हे भाई ! धुर-दरगाह से परमात्मा ने अपने भक्तों को अपनी आत्मिक जीवन देने वाली भक्ति का खजाना बख्शा हुआ है। जो मनुष्य मूर्ख होता हैवही उनकी बराबरी करता है (इस ईष्या के कारण।बल्कि) उसका मुँह इस लोक में भी और परलोक में काला होता है (वह लोक-परलोक में बदनामी कमाता है)। 2। हे भाई ! वही मनुष्य भक्त हैं।वह मनुष्य (परमात्मा के) सेवक हैं।जिनको परमात्मा का नाम प्यारा लगता है। उन (सेवक-भक्तों) की शरण पड़ने से परमात्मा (का मिलाप) प्राप्त होता है।(सेवकों-भक्तों के) निंदक के सिर पर (तो जगत की ओर से) राख (ही) पड़ती है। 3। हे भाई ! (वैसे तो अपने अंदर की फिटकार को) वही मनुष्य जानता है जिसके हृदय में ये (बखीली वाली दशा) घटित होती है।(पर) आप जगत के गुरू नानक (पातशाह) को पूछ के विचार के देखो (ये यकीन जानो कि) जगत के आरम्भ से ले के युगों की शुरुवात से ले के। कभी भी किसी मनुष्य ने (महां पुरुषों के साथ) ईष्या से (आत्मिक जीवन का धन) नहीं पाया।(महापुरुषों से) सेवक-भावना रखने से ही (संसार-समुंद्र से) पार-उतारा होता है। 4। 2। 9।
सूही महला 4 ॥
जिथै हरि आराधीऐ तिथै हरि मितु सहाई ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 4 ॥ हे भाई ! जिस भी जगह परमात्मा की आराधना की जाए।वह मित्र परमात्मा वहीं आ के मददगार बनता है।

सूही राग में एक स्नेह-भरा स्वर है, शाम के बाद की घड़ी का। ‘लावां’ इसी की धुन में रची गयी, और सिख विवाह-संस्कार की भीतरी संगीत-संरचना इसी पर खड़ी है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।