Lulla Family

अंग 730

अंग
730
राग सूही
राग: सूही · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सूही महला 1 ॥
भांडा हछा सोइ जो तिसु भावसी ॥
भांडा अति मलीणु धोता हछा न होइसी ॥
गुरू दुआरै होइ सोझी पाइसी ॥
एतु दुआरै धोइ हछा होइसी ॥
मैले हछे का वीचारु आपि वरताइसी ॥
मतु को जाणै जाइ अगै पाइसी ॥
जेहे करम कमाइ तेहा होइसी ॥
अंम्रितु हरि का नाउ आपि वरताइसी ॥
चलिआ पति सिउ जनमु सवारि वाजा वाइसी ॥
माणसु किआ वेचारा तिहु लोक सुणाइसी ॥
नानक आपि निहाल सभि कुल तारसी ॥1॥4॥6॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 ॥ वही हृदय पवित्र है जो उस परमात्मा को अच्दा लगने लगता है। अगर मनुष्य का हृदय (अंदर से विकारों से) बहुत गंदा हुआ पड़ा है तो बाहर से शरीर को तीर्थ आदि पर स्नान कराने से हृदय शुद्ध नहीं हो सकता। अगर गुरू के दर पर (स्वै भाव मिटा के सवाली) बनें।तो ही (हृदय को पवित्र करने की) बुद्धि मिलती है। गुरू के दर पर रह के ही (विकारों की मैल) धोने से हृदय पवित्र होता है। (अगर गुरू के दर पर टिकें तो) परमात्मा खुद ही ये (विचारने की) समझ देता है कि हम अच्छे हैं अथवा बुरे। (अगर इस मनुष्य-जीवन के समय में गुरू का आसरा नहीं लिया तो) कोई जीव ये ना समझ ले कि (यहाँ से खाली हाथ) जा के परलोक में (जीवन पवित्र करने की सूझ) मिलेगी। (ये एक कुदरती नियम है कि यहाँ) मनुष्य जिस प्रकार के कर्म करता है वैसा वह बन जाता है। (जो मनुष्य गुरू के दर से गिरता है उसको) आत्मिक जीवन देने वाला अपना नाम खुद बख्शता है। (जिस मनुष्य को यह दाति मिलती है) वह अपना मानस जनम सँवार के आदर कमा के यहाँ से जाता है।वह अपनी शोभा का बाजा (यहाँ) बजा जाता था। कोई एक मनुष्य तो क्या ।तीनों ही लोकों में परमात्मा उसकी शोभा बिखेरता है। हे नानक ! वह मनुष्य खुद सदा प्रसन्न-चित्त रहता है।और अपनी सारी कुलों को ही तैरा लेता है (शोभा दिलवाता है)। 1। 4। 6।
सूही महला 1 ॥
जोगी होवै जोगवै भोगी होवै खाइ ॥
तपीआ होवै तपु करे तीरथि मलि मलि नाइ ॥1॥
तेरा सदड़ा सुणीजै भाई जे को बहै अलाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जैसा बीजै सो लुणे जो खटे सोु खाइ ॥
अगै पुछ न होवई जे सणु नीसाणै जाइ ॥2॥
तैसो जैसा काढीऐ जैसी कार कमाइ ॥
जो दमु चिति न आवई सो दमु बिरथा जाइ ॥3॥
इहु तनु वेची बै करी जे को लए विकाइ ॥
नानक कंमि न आवई जितु तनि नाही सचा नाउ ॥4॥5॥7॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 ॥ जो मनुष्य जोगी बन जाता है वह जोग ही कमाता है (योग कमाने को ही सही रास्ता समझता है)।जो मनुष्य गृहस्ती बनता है वह भोगों में ही मस्त है। जो मनुष्य तपी बनता है वह (सदा) तप (ही) करता है।और तीर्थों पर (जा के) मल मल के (भाव।बड़ी श्रद्धा भाव से) स्नान करता है। 1। (पर) हे प्यारे (प्रभू) ! मैं तो आपकी सिफत सालाह के शब्द ही सुनना चाहता हूँ।यदि कोई (मेरे पास) बैठ जाए और मुझे सुनाए। 1।रहाउ। (मनुष्य) जिस तरह का बीज बीजता है उसी (तरह के फल) पाता है।जो कुछ कमाई करता है।वही बरतता है (जोग-भोग और तप में परमात्मा की सिफत सालाह की कमाई नहीं है पर प्रभू की हजूरी में सिफत सालाह ही परवान है)। अगर मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह का परवाना ले के (यहाँ से) जाए तो आगे (प्रभू के दर पर) उसको रोक-टोक नहीं होती। 2। मनुष्य जिस प्रकार का काम करता है वैसा ही उसका नाम पैदा हो जाता है (आत्मिक जीवन की राह में भी यही नियम है।भगत वही जो भक्ति करता है।जोग-भोग अथवा तप में से भक्ति-भाव पैदा नहीं हो सकता)। (मनुष्य का) जो श्वास (किसी ऐसे उद्यम में गुजरता है कि परमात्मा) उसके मन में नहीं बसता तो वह श्वास व्यर्थ ही जाता है। 3। हे नानक ! जिस (मानस) शरीर में परमात्मा का सदा-स्थिर रहने वाला नाम नहीं बसता वह शरीर किसी काम नहीं आता (वह शरीर व्यर्थ ही गया समझो। इस वास्ते) अगर कोई मनुष्य मुझे प्रभू के नाम के बदले में दे के मेरा शरीर लेना चाहे तो मैं ये शरीर बेचने के लिए तैयार हूँ मूल्य देने को तैयार हूँ। 4। 5। 7।
सूही महला 1 घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जोगु न खिंथा जोगु न डंडै जोगु न भसम चड़ाईऐ ॥
जोगु न मुंदी मूंडि मुडाइऐ जोगु न सिंङी वाईऐ ॥
अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥1॥
गली जोगु न होई ॥
एक द्रिसटि करि समसरि जाणै जोगी कहीऐ सोई ॥1॥ रहाउ ॥
जोगु न बाहरि मड़ी मसाणी जोगु न ताड़ी लाईऐ ॥
जोगु न देसि दिसंतरि भविऐ जोगु न तीरथि नाईऐ ॥
अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥2॥
सतिगुरु भेटै ता सहसा तूटै धावतु वरजि रहाईऐ ॥
निझरु झरै सहज धुनि लागै घर ही परचा पाईऐ ॥
अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥3॥
नानक जीवतिआ मरि रहीऐ ऐसा जोगु कमाईऐ ॥
वाजे बाझहु सिंङी वाजै तउ निरभउ पदु पाईऐ ॥
अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति तउ पाईऐ ॥4॥1॥8॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 घरु 7 सतिगुर प्रसादि ॥ गुदड़ी पहन लेना परमात्मा से मिलाप का साधन नहीं।डंडा हाथ में पकड़ लेने से हरी-मेल नहीं हो जाता।अगर शरीर पर राख मल लें तो भी प्रभू से मिलाप नहीं होता। (कानों में) मुंद्राएं पहनने से रॅब का मेल नहीं।अगर सिर मुनवा लें तो भी प्रभू से मिलाप संभव नहीं।सिंगी बजाने से भी जोग सिद्ध नहीं हो जाता। परमात्मा से मिलाप का ढंग सिर्फ इस तरह ही हासिल होता है कि माया के मोह की कालिख में रहते हुए ही माया से निर्लिप प्रभू में जुड़े रहें। 1। सिर्फ बातें करने से प्रभू-मिलाप नहीं होता। वही मनुष्य जोगी कहलवा सकता है जो एक जैसी निगाह से ही सब (जीवों) को बराबर (के इन्सान) समझे। 1।रहाउ। (घर से) बाहर मढ़ीयों में मसाणों में रहने से प्रभू-मेल नहीं होता।समाधियां लगाने से भी प्रभू नहीं मिलता। अगर देस-परदेस में भटकते फिरें तो भी प्रभू का मिलाप नहीं होता।तीर्थों पर स्नान करने से भी प्रभू-प्राप्ति नहीं होती। परमात्मा से मिलाप का ढंग सिर्फ इस तरह ही आता है कि माया के मोह की कालिख में रहते हुए ही माया से निर्लिप प्रभू में जुड़े रहें। 2। जब गुरू मिल जाए तो मन का सहम समाप्त हो जाता है।विकारों की ओर दौड़ते मन को रोक सकते हैं। (मन में प्रभू के अंमृत नाम का एक) चश्मा चल पड़ता है।अडोल अवस्था की ही रौंअ बन जाती है; हृदय के अंदर ही परमात्मा के नाम के साथ सांझ बन जाती है। परमात्मा के साथ मिलाप की सलीका सिर्फ इसी तरह आता है कि माया के मोह की कालिख में रहते हुए ही माया से निर्लिप प्रभू में जुड़े रहें। 3। हे नानक ! परमात्मा से मिलाप का अभ्यास यूँ करना चाहिए कि दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए ही विकारों से परे हट के रहना चाहिए। (जोगी तो सिंगी का बाजा बजाता है।पर सिमरन अभ्यास करने वाले के अंदर एक ऐसा सुरीला आनंद बनता है कि।मानो) बिना बाजा बजाए ही सिंगी बज रही हैं।(जब मनुष्य इस आत्मिक आनंद को पाने लग जाता है) तब वह ऐसी आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेता है जिस में किसी तरह का कोई डर नहीं रह जाता। जब माया के मोह की कालिख में रहते हुए ही माया से निर्लिप प्रभू में जुड़े रह सकें।तब प्रभू-मिलाप का सलीका आ जाता है। 4। 1। 8।
सूही महला 1 ॥
कउण तराजी कवणु तुला तेरा कवणु सराफु बुलावा ॥
कउणु गुरू कै पहि दीखिआ लेवा कै पहि मुलु करावा ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: सूही महला 1 ॥ हे प्रभू ! कोई ऐसा तराजू नहीं।कोई ऐसा बाँट नहीं (कोई ऐसा पैमाना नहीं।जो आपके गुणों का अंदाजा लगा सके)।कोई ऐसा सर्राफ नहीं जिसे में (आपके गुणों की पैमायश के लिए) बुला सकूँ (इस्तेमाल कर सकूँ)। मुझे कोई ऐसा उस्ताद नहीं दिखता जिससे मैं आपका मूल्य डलवा सकूँ अथवा मूल्य डालने की जाच सीख सकूँ। 1।

सूही राग शाम के बाद का है, अक्सर पति-पत्नी के प्रेम-स्तर पर खड़ा। ‘सूही-दी-लावां’ विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, गुरु राम दास जी की रचना। 1574 के क़रीब रची गयी, और आज भी हर सिख विवाह में पढ़ी जाती है। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सूही महला 1 ॥ वही हृदय पवित्र है जो उस परमात्मा को अच्दा लगने लगता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।