सतसंगति कैसी जाणीऐ ॥
जिथै एको नामु वखाणीऐ ॥
एको नामु हुकमु है नानक सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ॥5॥
इहु जगतु भरमि भुलाइआ ॥
आपहु तुधु खुआइआ ॥
परतापु लगा दोहागणी भाग जिना के नाहि जीउ ॥6॥
दोहागणी किआ नीसाणीआ ॥
खसमहु घुथीआ फिरहि निमाणीआ ॥
मैले वेस तिना कामणी दुखी रैणि विहाइ जीउ ॥7॥
सोहागणी किआ करमु कमाइआ ॥
पूरबि लिखिआ फलु पाइआ ॥
नदरि करे कै आपणी आपे लए मिलाइ जीउ ॥8॥
हुकमु जिना नो मनाइआ ॥
तिन अंतरि सबदु वसाइआ ॥
सहीआ से सोहागणी जिन सह नालि पिआरु जीउ ॥9॥
जिना भाणे का रसु आइआ ॥
तिन विचहु भरमु चुकाइआ ॥
नानक सतिगुरु ऐसा जाणीऐ जो सभसै लए मिलाइ जीउ ॥10॥
सतिगुरि मिलिऐ फलु पाइआ ॥
जिनि विचहु अहकरणु चुकाइआ ॥
दुरमति का दुखु कटिआ भागु बैठा मसतकि आइ जीउ ॥11॥
अंम्रितु तेरी बाणीआ ॥
तेरिआ भगता रिदै समाणीआ ॥
सुख सेवा अंदरि रखिऐ आपणी नदरि करहि निसतारि जीउ ॥12॥
सतिगुरु मिलिआ जाणीऐ ॥
जितु मिलिऐ नामु वखाणीऐ ॥
सतिगुर बाझु न पाइओ सभ थकी करम कमाइ जीउ ॥13॥
हउ सतिगुर विटहु घुमाइआ ॥
जिनि भ्रमि भुला मारगि पाइआ ॥
नदरि करे जे आपणी आपे लए रलाइ जीउ ॥14॥
तूं सभना माहि समाइआ ॥
तिनि करतै आपु लुकाइआ ॥
नानक गुरमुखि परगटु होइआ जा कउ जोति धरी करतारि जीउ ॥15॥
आपे खसमि निवाजिआ ॥
जीउ पिंडु दे साजिआ ॥
आपणे सेवक की पैज रखीआ दुइ कर मसतकि धारि जीउ ॥16॥
सभि संजम रहे सिआणपा ॥
मेरा प्रभु सभु किछु जाणदा ॥
प्रगट प्रतापु वरताइओ सभु लोकु करै जैकारु जीउ ॥17॥
मेरे गुण अवगन न बीचारिआ ॥
प्रभि अपणा बिरदु समारिआ ॥
कंठि लाइ कै रखिओनु लगै न तती वाउ जीउ ॥18॥
मै मनि तनि प्रभू धिआइआ ॥
जीइ इछिअड़ा फलु पाइआ ॥
साह पातिसाह सिरि खसमु तूं जपि नानक जीवै नाउ जीउ ॥19॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “(जिस नाम पदार्थ को) देवते, मनुष्य, मौनधारी लोग तरसते आ रहें हैं वह (पदार्थ) सत्गुरू ने समझा दिया है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।