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अंग 72

अंग
72
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुरि नर मुनि जन लोचदे सो सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ॥4॥
सतसंगति कैसी जाणीऐ ॥
जिथै एको नामु वखाणीऐ ॥
एको नामु हुकमु है नानक सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ॥5॥
इहु जगतु भरमि भुलाइआ ॥
आपहु तुधु खुआइआ ॥
परतापु लगा दोहागणी भाग जिना के नाहि जीउ ॥6॥
दोहागणी किआ नीसाणीआ ॥
खसमहु घुथीआ फिरहि निमाणीआ ॥
मैले वेस तिना कामणी दुखी रैणि विहाइ जीउ ॥7॥
सोहागणी किआ करमु कमाइआ ॥
पूरबि लिखिआ फलु पाइआ ॥
नदरि करे कै आपणी आपे लए मिलाइ जीउ ॥8॥
हुकमु जिना नो मनाइआ ॥
तिन अंतरि सबदु वसाइआ ॥
सहीआ से सोहागणी जिन सह नालि पिआरु जीउ ॥9॥
जिना भाणे का रसु आइआ ॥
तिन विचहु भरमु चुकाइआ ॥
नानक सतिगुरु ऐसा जाणीऐ जो सभसै लए मिलाइ जीउ ॥10॥
सतिगुरि मिलिऐ फलु पाइआ ॥
जिनि विचहु अहकरणु चुकाइआ ॥
दुरमति का दुखु कटिआ भागु बैठा मसतकि आइ जीउ ॥11॥
अंम्रितु तेरी बाणीआ ॥
तेरिआ भगता रिदै समाणीआ ॥
सुख सेवा अंदरि रखिऐ आपणी नदरि करहि निसतारि जीउ ॥12॥
सतिगुरु मिलिआ जाणीऐ ॥
जितु मिलिऐ नामु वखाणीऐ ॥
सतिगुर बाझु न पाइओ सभ थकी करम कमाइ जीउ ॥13॥
हउ सतिगुर विटहु घुमाइआ ॥
जिनि भ्रमि भुला मारगि पाइआ ॥
नदरि करे जे आपणी आपे लए रलाइ जीउ ॥14॥
तूं सभना माहि समाइआ ॥
तिनि करतै आपु लुकाइआ ॥
नानक गुरमुखि परगटु होइआ जा कउ जोति धरी करतारि जीउ ॥15॥
आपे खसमि निवाजिआ ॥
जीउ पिंडु दे साजिआ ॥
आपणे सेवक की पैज रखीआ दुइ कर मसतकि धारि जीउ ॥16॥
सभि संजम रहे सिआणपा ॥
मेरा प्रभु सभु किछु जाणदा ॥
प्रगट प्रतापु वरताइओ सभु लोकु करै जैकारु जीउ ॥17॥
मेरे गुण अवगन न बीचारिआ ॥
प्रभि अपणा बिरदु समारिआ ॥
कंठि लाइ कै रखिओनु लगै न तती वाउ जीउ ॥18॥
मै मनि तनि प्रभू धिआइआ ॥
जीइ इछिअड़ा फलु पाइआ ॥
साह पातिसाह सिरि खसमु तूं जपि नानक जीवै नाउ जीउ ॥19॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (जिस नाम पदार्थ को) देवते, मनुष्य, मौनधारी लोग तरसते आ रहें हैं वह (पदार्थ) सत्गुरू ने समझा दिया है।4। किस तरह के एकत्र को सत संगति समझना चाहिए? (सतसंगति वह है) जहाँ सिर्फ परमात्मा का नाम सलाहा जाता है। हे नानक ! सतिगुरू ने ये बात समझा दी है कि (सतसंगति में) सिर्फ परमात्मा का नाम जपना ही (प्रभू का) हुकम है।5। हे नानक ! सतिगुरू ने ये बात समझा दी है कि (सतसंगति में) सिर्फ परमात्मा का नाम जपना ही (प्रभू का) हुकम है।5। ये जगत माया की भटकना में पड़ के जीवन के सही राह से भटक के कुमार्ग पर जा रहा है। (पर, जीवों के भी क्या वश? हे प्रभू !) तूने स्वयं ही (जगत को) अपने आप से विछोड़ा हुआ है। जिन दुर्भागी जीव सि्त्रयों के अच्छे भाग्य नहीं होते, उनको (माया के मोह में फंसने के कारण आत्मिक) दुख लगा हुआ है।6। दुर्भाग्यशाली जीव सि्त्रयों के क्या लक्षण हैं? (दुर्भाग्यशाली जीव सि्त्रयां वह हैं) जो खसम प्रभू से वंचित हैं और बेआसरा हो के भटक रही हैं। ऐसी जीव सि्त्रयों के चेहरे भी विकारों की मैल के साथ भ्रष्ट हुए दिखाई देते हैं, उनकी जिंदगी-रूप रात दुखों में ही व्यतीत होती है।7। जो जीव-सि्त्रयां भाग्यशाली कहलाती हैं उन्होंने कौन सा (अच्छा काम) किया हुआ है? उन्होंने पिछले जन्म में की नेक कमायी के लिखे संस्कारों के तौर पर अब परमात्मा का नाम फल प्राप्त कर लिया है। परमात्मा अपनी मेहर की निगाह करके खुद ही उनको अपने चरणों में मिला लेता है।8। परमात्मा जिन जीव-सि्त्रयों को अपना हुकम मानने के लिए प्रेरता है, वह अपने दिल में परमात्मा की सिफत सलाह की बाणी बसाती हैं। वही जीव सहेलियां भाग्यशाली होती हैं, जिनका अपने पति प्रभू के साथ प्यार बना रहता है।9। जिन मनुष्यों को परमात्मा की रजा में चलने का आनंद आ जाता है, वे अंदर से माया वाली भटकना दूर कर लेते हैं (पर यह मेहर सतिगुरू की ही है)। हे नानक ! गुरू ऐसा (दयाल) है कि वह (शरण आए) सभ जीवों को प्रभू चरणों में मिला देता है।10। उसने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम रस प्राप्त कर लिया, जिस मनुष्य ने अपने अंदर से अहंकार दूर कर लिया उस मनुष्य के अंदर से बुरी मति का दुख काटा जाता है, उसके माथे के भाग्य जाग पड़ते हैं।11। (हे प्रभू !) आपकी सिफत सलाह की बाणी (मानो) आत्मिक जीवन देने वाला जल है, ये बाणी आपके भगतों के दिल में (हर वक्त) टिकी रहती है। आपकी सुखदायी सेवा भक्ति भक्तों के अंदर टिकने के कारण आप उन पर अपनी मेहर की निगाह करता है और उनको पार लंघा लेता है।12। तभी (किसी भाग्यशाली को) गुरू से मिला हुआ समझना चाहिए जब गुरू के मिलने से परमात्मा का नाम सिमरा जाए। गुरू की शरण पड़े बिना (परमात्मा का नाम) नहीं मिलता। (गुरू का आसरा छोड़ के) सारी दुनिया (तीर्थ वर्त आदि और और निहित धार्मिक) कर्म कर के खप जाती है।13। मैं (तो) गुरू पर से कुर्बान हूँ, जिसने भटक रहे कुमार्ग पर पड़े जीव को सही रास्ते पर डाला है। अगर गुरू अपनी मेहर की निगाह करे, तो वह स्वयं ही (प्रभू चरणों में) जोड़ देता है।14। (हे प्रभू !) आप सारे जीवों में व्यापक है। (हे भाई ! सारे जीवों में व्यापक होते हुए भी) उस करतार ने अपने आप को गुप्त रखा हुआ है। हे नानक ! जिस मनुष्य के अंदर गुरू के द्वारा करतार ने अपनी ज्योति प्रगट की हुई है, उसके अंदर करतार प्रगट हो जाता है।15। पति प्रभू ने (अपने सेवक को) स्वयं ही आदर मान दिया है, जिंद और शरीर दे के खुद ही उसको पैदा किया है। अपने दोनों हाथ सेवक के सिर पर रख कर खसम प्रभू ने खुद ही उसकी लाज रखी है (और उसको विकारों से बचाया है)।16। इन्द्रियों को वश में करने के सारे प्रयत्न और इस तरह की और सभी सियानप भरे निहित धार्मिक कर्म सेवक को करने की जरूरत नहीं पड़ती। प्यारा प्रभू सेवक की हरेक आवश्यक्ता स्वयं जानता है। परमात्मा अपने सेवक का तेज प्रताप प्रगट कर देता है। सारा जगत उसकी जै जैकार करता है।17। प्रभू ने ना मेरे गुणों का ख्याल किया है, ना ही मेरे अवगुणों की परवाह की है। (हे प्रभू !) तूने ही जगत पैदा किया है। उसने मुझे अपने गले से लगा के (विकारों से) बचा लिया है, कोई दुख विकार मेरा बाल भी बाँका नही कर सके।18। मैंने अपने मन में प्रभू को सिमरा है, अपने हृदय में परमात्मा को ध्याया है। मुझे वह नाम-फल मिल गया है, जिसकी मैं सदा अपने जी में इच्छा रखा करता था। हे प्रभू! आप सारे शाहों के सिर पर, आप बादशाहों के सिर पर मालिक है। हे नानक! (बड़े भाग्यों वाला मनुष्य) प्रभू का नाम जप के आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता है।19।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “(जिस नाम पदार्थ को) देवते, मनुष्य, मौनधारी लोग तरसते आ रहें हैं वह (पदार्थ) सत्गुरू ने समझा दिया है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।